शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

शब्द संधान // व्यंग्य और प्रेम // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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हिन्दुस्तानी ज़बान में प्रेम के लिए जितने भी शब्द हैं वे सभी दिव्यांग हैं। प्रेम, प्यार, मुहब्बत, इश्क, यहाँ तक कि स्नेह तक, का कोई न कोई अक्षर अधूरा रह गया है - प्रेम और प्यार में ‘प’, मुहब्बत में ‘ब’ इश्क में ‘श’ और स्नेह में ‘स’। आधे अधूरे अक्षरों वाले शब्दों का उच्चारण तो कठिन होता ही है, उनका आचरण और भी मुश्किल होता है। प्रेम को साध पाना कोई आसान खेल नहीं है। ग़ालिब ने तो बता ही दिया है - “यह इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजे / एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।” जिसने प्रेम को साध लिया समझो पांडित्य पा लिया। ठीक ही कहा है -

“पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भाया न कोय / ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय !”

कबीर ने बहुत पहले ही बता दिया था। आजकल के युवा-युवतियों को अब समझ आ रहा है। तभी तो सभी पंडित बनने की फिराक में मारे मारे फिर रहे हैं।

स्कूल के बुरे हाल हैं। वह भी दिव्यांग है। हज़ार कोशिश कीजिए, इसका उच्चारण तक संभव नहीं हो पा रहा है। कोई इसे सकूल कहता है, कोई अस्कूल, कोई इसे इस्कूल बना देता है। अब आप ही बताइए बच्चे स्कूल जाएं तो जाएं कैसे ! पंडित होने के लिए वे स्कूल से तड़ी मार कर प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ने की कोशिश में लगे हुए हैं।

व्यंग्य और प्रेम ये दोनों अलग अलग चीजें हैं। इनके बीच कोई घपला नहीं है। व्यंग्य विसंगतियों पर तंज कसता है। लेकिन जहां प्रेम है वहां तंज के लिए कोई जगह नहीं है। पर दोनों में एक बात तो समान है। शाब्दिक रूप से देखें तो प्रेम की तरह व्यंग्य भी दिव्यांग है। जैसे प्रेम में प कभी पूरा नहीं हो पाया वैसे ही व्यंग्य में व् अधूरा रह गया।

फिर भी प्रेम के बिना साहित्यकारों का काम नहीं चल पाता। (साहित्य में भी तो त आधा अधूरा ही है।) आप तो जानते ही हैं प्रेमचंद हिन्दी के सबसे बड़े साहित्यकार हैं। मालूम है क्यों ? उनका नाम ही जो प्रेमचंद है। धनपत राय नाम से उन्हें कोई नहीं जानता था। वे प्रेमचंद हुए नहीं कि प्रसिद्धि की शिखर पर पहुँच गए। हरी कृष्ण “प्रेमी” ने भी अपना उपनाम “प्रेमी” इसीलिए रख लिया था। वे जानते थे कि वास्तविक ज़िंदगी में प्रेमी-वेमी तो वे कभी हो नहीं सकते। लेकिन नाम के आगे तकल्लुस तो लगा ही सकते हैं। अत: वे प्रेमी बन गए। खूब नाम कमाया। अन्यथा हरे-कृष्ण हरेकृष्ण करते रह जाते। आप भी साहित्यकार बनना चाहते हैं तो प्रेम से ‘लगाव’ रखिए। फिर देखिए ! आपको मालूम है कि ‘प्रेम पचीसी’ इतनी प्रसिद्ध क्यों हुई ? अब बताने की क्या ज़रूरत है, समझ ही गए होंगे।

हमारे सिनेमा ने शायद प्रेम को सर्वाधिक भुनाया है। ‘अमर प्रेम’ से शुरू करके ‘प्रेम रोग’ का संक्रमण घर घर पहुंचा दिया। पहले लोग छुप छुप कर प्रेम किया करते थे और देने वाले उन्हें हिदायत देते थे –प्यार किया तो डरना क्या ? अब तो तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर हैं। प्रेम चर्चा का विषय तो पहले भी था लेकिन ये चर्चा भी तब दबे ज़बान होती थी। अब तो हर ज़बान पर है। क्या बच्चे क्या बूढ़े ! पहले लोग भजन गाते थे – राम रतन धन पायो। राजनीति में भले ही ‘राम’ की उपस्थिति अभी भी सलामत हो लेकिन अब तो लोगों की ज़बान पर ‘प्रेम’ रतन धन पायो की मुस्कान है।

प्रेम अब हाई-टेक हो चला है। फेस-बुक, वाट्स-एप की आभासी दुनिया में विचरण करता है। वहीं फिरता पड़ता है। वहीं फलता फूलता और पल्लवित होता है। वहीं मुरझा जाता है। आभासी दुनिया से बाहर आते ही अक्सर अपनी मौत मर जाता है।

- डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, /इलाहाबाद -२११००१

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