बुधवार, 19 जुलाई 2017

स्वच्छता से सावधान! बच्चों को मिट्टी में खेलने दें // प्रमोद भार्गव

संदर्भ- अमेरिका के वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट का बच्चों पर किए शोध का नतीजा-

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भारत ही नहीं दुनिया के प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को साफ-सुथरा, सुरक्षा व कीटाणु रहित वातावरण देना चाहते हैं, जिससे उनके बच्चे गंदगी की चपेट में आकर बीमार न पड़ें। लेकिन अब माता-पिता इसे लेकर आश्वस्त हो सकते हैं, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी बच्चों के लिए हानिकारक नहीं है, बल्कि उनकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। अमेरिका में शोधकर्ताओं को टीम के अगुवा वैज्ञानिक जैक गिलबर्ट ने मिट्टी और बच्चों पर यह शोध किया है। दो बच्चों के पिता गिलबर्ट ने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो से माइक्रोबॉयलॉजी परिस्थितिकी तंत्र की पढ़ाई की है। वे खोज कर रहे हैं कि मिट्टी और उसमें पाए जाने कीटाणु किस तरह बच्चों को प्रभावित करते हैं। गिलबर्ट ने मिट्टी में पाए जाने वाले ‘जीवाणुओं से फायदे, बच्चों का विकास और प्रतिरक्षा‘ नाम से एक किताब लिखी है। 

जी हां..., अब नई खोजों और प्रयोगों से यही हकीकत सामने आ रही है कि हाथ धोकर सफाई के पीछे पड़ना मानव जीवन के लिए खतरा है।  अब नए अनुसंधान तय कर रहे हैं कि हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से जो सूक्ष्म जीव, मसलन जीवाणु (बैक्टीरिया) और विषाणु (वायरस) प्रविष्ट होते हैं, वे बीमारियां फैलाने वाले दुश्मन न होकर बीमारियों को दूर रखने वाले मित्र भी होते हैं। इसीलिए गिलबर्ट ने कहा है कि कई बार जमीन पर खाना गिरने के बाद उसे फेंक देते हैं, क्योंकि आपको लगता है कि वह गंदा हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। खाने में लगे कीटाणु बच्चे के लिए फायदेमंद होंगे। बच्चों को मिट्टी में खेलने से एलर्जी इसलिए होती हैं, क्योंकि हम उन्हें कीटाणु से बचाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। जीवाणु की कमी की वजह से बच्चे अस्थमा, फूड एलर्जी जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। 

प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर में 200 किस्म के ऐसे सूक्ष्मजीव निवासरत हैं, जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत व काया को निरोगी बनाए रखने का काम करते हैं। हमारे शरीर में जितनी कोशिकाएं हैं, उनमें 10 प्रतिशत हमारी अपनी हैं, बाकी कोशिकाओं पर 9 करोड़ सूक्ष्म जीवों का कब्जा है। जो शरीर में परजीवी की तरह रहते हैं। तय है, हमें इनकी उतनी ही जरूरत है, जितनी की उनको हमारी। बल्कि अब तो वैज्ञानिक यह भी दावा कर रहे हैं कि मानव और सूक्ष्म जीवों का विकास साथ-साथ हुआ है। मनुष्य ने जीनोम को अब अक्षर-अक्षर पढ़ लिया गया है। इससे ज्ञात हुआ है कि हमारे जीनोम में हजारों जींस का वजूद जीवाणु और विषाणुओं की ही उपज है।

       नए अनुसंधान वैज्ञानिक मान्यताओं को बदलने का काम भी करते हैं और धीरे-धीरे नई मान्यता प्रचलन में आ जाती है। बीसवीं सदी के पहले चरण तक यह धारणा थी कि सूक्ष्मजीव ऐसे शैतान हैं, जो हमारे शरीर में केवल बीमारियां फैलने का काम करते हैं। इसीलिए इनसे दूरी बनाए रखने का आसान सा तरीका अपनाए जाने की नसीहत सामने आई कि यदि चिकित्सक अपने हाथों को साबुन से मल-मलकर धोने की तरकीब अपना लें तो इस एकमात्र उपाय से अस्पताल में इलाज के दौरान मर जाने वाले लाखों मरीजों की जान बचाई जा सकती है ? अलबत्ता नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी वैज्ञानिक इल्या मेचनीकोव ने अपने शोध से इस अवधारणा को बदलने का काम किया। जब 1910 के आसपास मेचनीकोव बुल्गारिया के निरोगी काया के साथ लंबी उम्र जीने वाले किसानों पर शोध कर रहे थे, तब किसानों की लंबी आयु का रहस्य उन्होंने उस दही में पाया जिसे आहार के रूप में खाना उनकी दिनचर्या में शामिल था।

              दरअसल खमीर युक्त दुग्ध उत्पादों में ऐसे सूक्ष्मजीव बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं, जो हमारे जीवन के लिए जीवनदायी हैं। सूक्ष्मजीव हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण पर होते हैं। ये समूह शरीर में प्रविष्ट होकर पाचन तंत्र प्रणाली में क्रियाशील हो जाते हैं। इस दौरान ये लाभदायी जीवाणुओं की वृद्धि को उत्तेजित करते हैं और हानिकारक जीवाणुओं का शमण करते हैं। इन्हें चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘अनुजीवी‘ या ‘प्रोबायोटिक्स‘ कहते हैं। अब अनुजीवियों को सुगठित व निरोगी देह के लिए जरूरी माना जाने लगा है। इन्हें प्रतिरोधक के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह भी आहार वैज्ञानिक देने लगे हैं। ‘प्रोबायोटिक’ शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है। जिसका सरल सा भावार्थ है ‘स्वस्थ्य जीवन के लिए उपयोगी’। प्रोबायोटिक्स शब्द को चलन में लाने की सबसे पहले शुरूआत लिली एवं स्टिलवैल वैज्ञानिकों ने की थी। इसका प्रयोग उन्होंने तब किया जब वे प्राटोजोआ द्वारा पैदा होने वाले तत्वों का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने पाया कि इसमें ऐसे विचित्र तत्व विद्यमान हैं, जो तत्वों को सक्रिय करते हैं। हालांकि यह कोई नया पहलू नहीं था। प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रंथों में जीवाणुओं के संबंध में विस्तृत जानकारियां हैं। आयुर्वेद दुग्ध के सह-उत्पादों के गुण-लाभ से भरा पड़ा है। अर्थववेद और उपनिषदों में भी सूक्ष्म जीवों के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। ओल्ड टेस्टामेंट के फारसी संस्करण में उल्लेख है कि अब्राहम ने खट्टे दूध व लस्सी के सेवन से ही लंबी आयु हासिल की थी। 76 ईसापूर्व टिलनी नामक रोमन इतिहासकार ने जठराग्नि (गेस्ट्रोइंटीराईटिस) के उपचार के लिए खमीर उठे दूध के उपयोग को लाभकारी बताया था। इन जानकारियों से तय होता है कि अनुजीवियों के अस्तित्व और महत्त्व से आयुर्वेद के वैद्याचार्य बखूबी परिचित थे।

       सूक्ष्मदर्शी यंत्र का आविष्कार होने से पहले तक हम इस वास्तविकता से अनजान थे कि 10 लाख से भी अधिक जीवन के ऐसे विविध रूप हैं, जिन्हें हम सामान्य रूप से देखने में अक्षम हैं। इस हैरतअंगेज जानकारी से चिकित्सा विज्ञानियों का साक्षात्कार तब हुआ, जब लुई पाश्चर और रॉबर्ट कोच ने एक दल के साथ सूक्ष्मदर्शी उपकरण को सामान्य जानकारियां हासिल करने के लिए प्रयोग में लाना शुरू किया। जब इन सूक्ष्म जीवों को पहली मर्तबा सूक्ष्मदर्शी की आंख से देखा गया तो वैज्ञानिक हैरानी के साथ परेशान हो गए और वे इन जीवों को मनुष्य का दुश्मन मानने की भूल कर बैठे। जैसे इंसान की मौत का सबब केवल यही जीव हों। लिहाजा इनसे मुक्ति के उपाय के लिहाज से दूध उत्पादों से इनके विनाश की तरकीबें खोजी जाने लगीं। और विनाश की इस प्रक्रिया को ‘पाश्चरीकरण‘ नाम से भी नवाजा गया। प्रति जैविक या प्रतिरोधी एंटीबायोटिक दवाओं का निर्माण और उनके प्रयोग का सिलसिला भी इनके विनाश के लिए तेज हुआ। लेकिन 1910 में इस अवधारणा को इल्या मेचनीकोव ने बदलने की बुनियाद रखी और फिर मनुष्य के लिए इनके लाभकारी होने के शोधों का सिलसिला चल निकला।

       सूक्ष्मजीव इतने सूक्ष्म होते हैं कि एक ग्राम मिट्टी में लगभग दो करोड़ जीवाणु आसानी से रह लेते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इनकी करीब 10 हजार प्रजातियां हैं। ये हरेक विपरीत माहौल में सरलता से रह लेते हैं। इसीलिए इनका वजूद धरती के कण-कण में तो है ही, बर्फ, रेगिस्तान, समुद्र और जल के गर्म स्रोतों में भी विद्यमान है। हाल ही में स्कॉटलैण्ड के सेंट एंड्रयूज विश्व विद्यालय के शोधकर्त्ताओं ने अफरीकन जनरल ऑफ साइंस में प्रकाशित अपने शोध में बताया है कि नमीबिया के ऐतोशा राष्ट्रीय उद्यान में जीवाश्मविदों ने खुदाई की। इस खुदाई के निष्कर्षों में दावा किया गया है कि उन्होंने सबसे पहले अस्तित्व में आए सूक्ष्मजीवों के जीवाश्मों को खोज निकाला है। ये जीवाश्म 55 करोड़ से लेकर 76 करोड़ वर्ष पुराने हो सकते हैं। ये ओटाविया ऐंटिक्वा स्पंज जैसे जीव थे। जिनके भीतर ढेर सारे छिद्र बने हुए थे, जो जीवाणु, विषाणु और शैवालों को खुराक उपलब्ध कराने में मदद करते थे। शोधकर्ताओं का दावा है कि हिमयुग से पहले के समय में पनपने वाले ये बहुकोशीय जीव हिमयुग के कठोर बर्फानी मौसम को भी बर्दाश्त करने में सक्षम थे। वैज्ञानिकों ने इन जीवों को बेहद पुराना बताते हुए कहा है कि पृथ्वी पर सभी जीवों की उत्पत्ति इन्हीं जीवों से हुई होगी ? इससे तय होता है कि इनकी जीवन रक्षा प्रणाली कितनी मजबूत है।

       मानव शरीर के तंत्र में अनुजीवियों का जीवित रहना जरूरी है। क्योंकि ये सहजीवी हैं और इनका संबंध भोजन के रूप में ली जाने वाली दवा से है। दही में ‘बाइफिडो बैक्टीरियम’ वंश के विषाणु पाए जाते हैं। इन्हें ही लेक्टोबेसिलस बाईफिडस कहते हैं। ये हमारी खाद्य श्रृंखला के अंतिम चरण मसलन आंतों में पल्लवित व पोषित होते रहते हैं। इसे ही आहार नाल कहा जाता है। यह लगभग 30 फीट लंबी व जटिल होती है। आहार को पचाकर मल में तब्दील करने का काम जीवाणु ही करते हैं। इस नाल में जीवाणुओं की करीब 500 प्रजातियां मौजूद रहती हैं। जिन्हें 50 विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। इन सूक्ष्म जीवों की कुल संख्या करीब 1011 खरब है। मनुष्य द्वारा शौच द्वार विसर्जित मल में 75 फीसदी यही जीवाणु होते हैं। शरीर में जरूरी विटामिनों के निर्माण में भागीदारी इन्हीं जीवाणुओं की देन है। यही अनुजीवी शरीर में रोग पैदा करने वाले पैथोजनिक जीवाणुओं को नष्ट करने का काम भी करते हैं। शरीर में रोग के लक्षण दिखाई देने के बाद चिकित्सक जो प्रतिरोधक दवाएं देते हैं, उनके प्रभाव से बड़ी संख्या में शरीर को लाभ पहुंचाने वाले अनुजीवी भी मर जाते हैं। इसीलिए चिकित्सक दही अथवा ऐसी चीजें खाने की सलाह देते हैं, जिससे लेक्टोबेसिलस अनुजीवियों की बड़ी तादाद खुराक के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाए।

       जिन जीवाणु और विषाणुओं को शरीर के लिए हानिकारक माना जाता था, वे किस तरह से फायदेमंद हैं, यह अब नई वैज्ञानिकों खोजों ने तलाश लिया है। कुछ समय पहले तक यह धारणा प्रचलन में थी कि छोटी आंत में अल्सर केवल तनावग्रस्त रहने और तीखा आहार लेने से ही नहीं होता, बल्कि इस रोग का कारक ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु है। इस सिद्धांत के जनक डॉ. बैरी मार्शल और रॉबिन वारेन थे। किंतु न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के स्कूल अॉफ मेडिसिन के डॉ. मार्टिन ब्लेसर ने इस सिद्धांत को एकदम उलट दिया। उन्होंने अपने अनुसंधान में पाया कि ‘हेलिकोबैक्टर पायलोरी’ जीवाणु मनुष्य जीवन के लिए बेहद लाभकारी हैं। यह करीब 15 करोड़ सालों से लगभग सभी स्तनधारियों के शरीर में एक सहजीवी के रूप रोग प्रतिरोधात्मक की भूमिका का निर्वहन करता चला आ रहा है। इसकी प्रमुख भूमिका पेट में तेजाब की मात्रा को एक निश्चित औसत अनुपात में बनाए रखना है। यह पेट में बनने वाली अम्लीयता का इस तरह से नियमन करता है कि वह जीवाणु और मनुष्य दोनों के लिए ही फलदायी होता है। किंतु जब जीवाणु का ही हिस्सा बने रहने वाला सीएजी नाम का जीव उत्तेजित हो जाता है तो शरीर में जहरीले तत्व बढ़ने लगते हैं। बहरहाल,हेलिकोबैक्टर पायलोरी की आंतों में मौजूदगी,अम्ल के नियमन की प्रक्रिया जारी रखते हुए, प्रतिरक्षा तंत्र को ताकतवर बनाने का काम करती है। इसलिए ज्यादा मात्रा में प्रतिरोधक दवाएं लेकर इन्हें मारना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

       इस बाबत् एक और बानगी देखें। मिनेसोटा विश्वविद्यालय में एक महिला उपचार के लिए आई। दस्तों के चलते इसके प्राण ही खतरे में पड़ गए थे और दवाएं बेअसर थीं। तमाम नुस्खे आजमाने के बाद चिकित्सा दल ने एक नया प्रयोग करने का निर्णय लिया और इस महिला को निरोगी व्यक्ति के मल में मौजूद जीवाणुओं की सिलसिलेवार खुराकें दीं। प्रयोग आश्चर्यजनक ढंग से सफल रहा। 48 घंटों के भीतर दस्त बंद हो गए। इस प्रयोग से चिकित्सा विज्ञानियों में जिज्ञासा जगी कि अनुजीवियों और प्रतिरक्षा तंत्र के सह-अस्तित्व आधारित उपचार प्रणालियां विकसित की जाएं। इस परिकल्पना को ही आगे बढ़ाते हुए दमा रोग के उपचार का सिलसिला स्विस इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एण्ड अस्थमा रिसर्च में काम शुरू हुआ। इस संस्था के प्रतिरक्षा तंत्र वैज्ञानिकों ने उपचार के नए प्रयोगों में पाया कि टी कोशिकाओं में गड़बड़ी के कारण एलर्जी रोग उत्पन्न होते हैं। अब पौल फोरसाइथ जैसे वैज्ञानिक इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए, इस कोशिश में लगे हैं कि वे कौन सी कार्य-प्रणालियां हैं जिनके जरिए अनुजीवी प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिरोधात्मक क्षमता पर नियमन रखते हुए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। इसी कड़ी में 2010 में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि क्लॉस्ट्रडियम परफ्रिंजेंस नाम का जीवाणु बड़ी आंत का निवासी है। यह जीवाणु जरूरत पड़ने पर टी कोशिकाओं में इजाफा करता है। यही कोशिकाएं रोग उत्पन्न करने वाले तत्वों से लड़कर उन्हें परास्त करती हैं।

       अनुजीवियों के महत्व पर नए अनुसंधान सामने आने के साथ-साथ चिकित्सा-विज्ञानियों की एक शाखा कीटाणुओं पर अनुसंधान करने में जुट गई। हालांकि इसके पहले शताब्दियों से यह अवधारणा विकसित होती चली आ रही है कि शरीर में मुंह के जरिए प्रविष्ट हो जाने वाले कृमि मानव समाज में बीमारियों के जनक हैं ? 1870 में तो पूरा एक ‘कीटाणु सिद्धांत’ ही वजूद में आ चुका था। जिसका दावा था की प्रत्येक बीमारी की जड़ में वातावरण में धमा-चौकड़ी मचाए रखने वाली कृमि हैं। इस सिद्धांत के आधार पर ही बड़े पैमाने पर कीटाणुनाशक प्रतिरोधक दवाएं वजूद में आईं। पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने का काम करने वाले कीटाणुओं को रोग का कारक मानते हुए, इन्हें नष्ट करने के अभियान चलाए जाने लगे। परिवेश को संपूर्ण रूप से स्वच्छ बनाए रखने के साथ मानव अंगों को भी साफ-सुथरे रखने के अभियान इसी सिद्धांत की देन हैं। लेकिन इस सिद्धांत को पलटने का काम रॉबर्ट कोच, जोसेफ लिस्टर और फ्रांस्सेको रेडी जैसे वैज्ञानिकों ने किया। इन्होंने पाया कि कृमि प्रजातियों में कई प्रजातियां ऐसी भी हैं,जो रोगों को नियंत्रित करती हैं। अब तो यह दावा किया जा रहा है कि कोलाइटिस क्रोहन और ऑटिज्म जैसे रोग अतिरिक्त सफाई का माहौल रच दिए जाने के कारण ही बढ़ रहे हैं।

       इस सिलसिले में यहां एक अनूठे उपचार को बतौर बानगी रखना जरूरी है। अयोवा विश्वविद्यालय में कृमियों के महत्व पर शोध चल रहा है। यहां एक ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे को उपचार के लिए लाया गया। ऑटिज्म एक ऐसा बाल रोग है, जो बच्चों को बौरा (पगला) देता है। वे खुद के अंगों को भी नाखून अथवा दांतों से काटकर हानि पहुंचाने लगते हैं। अपनी मां के साथ भी वे ऐसी ही क्रूरता का व्यवहार अपनाने लग जाते हैं। जब दवाएं बेअसर रहीं तो ऐसे बच्चों के इलाज के लिए अयोवा विश्वविद्यालय में जारी कृमि-शोध को प्रयोग में लाया गया। चिकित्सकों की सलाह पर इन बच्चों को ‘ट्राइचुरिस सुइस’ कीटाणु के अण्डों की खुराकें दी गईं। बालकों के पेट में अण्डें पहुंचने पर ऑटिज्म के लक्षणों में आशातीत बदलाव दिखाई देने लगा और धीरे-धीरे इनके अतिवादी आचरण में कमी आती चली गई।

       इन प्रयोगों ने तय किया है कि धवल स्वच्छता के अतिवादी उपाय मनुष्य के लिए कितने घातक साबित हो रहे हैं ? मनुष्य और जीवों का विकास प्रकृति के साथ-साथ हुआ है। जिस तरह से खेतों में कीटनाशकों का बहुलता से प्रयोग कर हम कृषि की उत्पादकता और खेतों की उर्वरा क्षमता खोते जा रहे हैं, उसी तर्ज पर ज्यादा से ज्यादा एंटी बायोटिकों का प्रयोग कर शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करते हुए उसे बीमारियों का अड्ढा बना रहे हैं। जीवाणु, विषाणु और कीटाणु मुक्त जल और भोजन को जरूरी बना दिए जाने की मुहिमें भी खतरनाक बीमारियों को न्यौत रही हैं। दुर्भाग्य से सफाई का दारोमदार अब कारोबार का हिस्सा बन गया है और मनुष्य को जीवन देने वाले तत्वों को निर्जीवीकृत करके आहार बनाने की सलाह दी जा रही है। सूक्ष्मजीवों से दूरी बनाए रखने के ये उपाय दरअसल जीवन से खिलवाड़ के पर्याय बन जाने के नाना रूपों में सामने आ रहे हैं। लिहाजा ज्यादा स्वच्छता के उपायों से सावधान रहने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्दार्थ 49, श्री राम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

फोन- 09425488224&9981061100Qksu 07492 404524

लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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