रविवार, 30 जुलाई 2017

कहानी // फुल्की का स्वंयवर // रवि श्रीवास्तव

राजेन्द्र मधुकर की कलाकृति

अरे आज ये बस को क्या हो गया है ? कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं? समय पर पहुंचना बहुत जरूरी है। किसी और के पहुंचने से पहले हमें वहां होना चाहिए। बड़े उत्साहित लग रहे हो कल्लू। और नहीं तो क्या ? आख़िर फुल्की का स्वंयवर है। पता नहीं कितने प्रतिभागी आए होगें ? मुझे भी अपना भाग्य आज़माना है।

शहर में काम को लेकर भागदौड़ से समय का पता ही नहीं चला। कब सूरज ढल गया ? और रात हो गई। घर जा रहा था तो रास्ते में काफी अंधेरा था। मुझे डर लगने लगा था। मैं आगे बढ़ता जा रहा था । ऊपर वाले का नाम लेकर । तभी अचानक झाड़ी की तरफ से धीरे –धीरे कुछ आवाज़ आ रही थी।

जैसे कोई रो रहा हो। डरपोक तो मै नम्बर 1 का हूं। रात में सबसे ज्यादा भूत से डरता हूं। आज तक कभी देखा नहीं,पर लोगों से सुना बहुत है। जब कभी रात में पैदल गुजरता था। तो हनुमान चालीसा पढ़ते रहता था। आज भी मैं उस आवाज़ को सुनकर हनुमान चालीसा पढ़ने लगा।

ठण्ड थी लेकिन मैं वो आवाज़ सुनकर बुरी तरह से काँप रहा था। जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था आवाज़ तेज़ होने लगी थी। हे भगवान आज बचा लो, सुबह होते ही बताशा चढ़ा दूंगा। मुझे शहर में मामा के यहां ही रूक जाना था। रात में इधर से नहीं आना चाहिए था। चले थे बड़े बहादुर बनने, अब हवा खिसक गई न।

घबराहट में मेरे पैर कहां पड़ रहे थे पता नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे मैं उस झाड़ी के पास पहुंच गया। जहां से आवाज़ आ रही थी। हिम्मत नहीं हो रही थी। उस तरफ मुंह करले। जल्दी से उस झाड़ी को पार भी कर लिया। 10 -20 कदम आगे ही बढ़ा था। इस बार बहुत तेज की आवाज़ थी। ऐसा लगा कि बहुत तेज दर्द से कोई कराहा हो।

मैं मुड़कर उस झाड़ी को देखना चाहता था। लेकिन डर से जकड़ भी गया था। जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस त्रिहु लोक उगाजर। तेज –तेज चिल्लाने लगा। और झाड़ी की ओर बढ़ने लगा। काली रात के अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था। सुनसान रास्ते में झींगुरों की आवाज़ आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कि आज इनकी बारात निकली है । और डीजे पर गाना बज रहा हो। सभी झींगुर पउवा लगाकर जोर-जोर से गा रहे हैं। जैसे कैसे उस जगह पहुंच गया था, पर उस तरफ देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी। ऐसा लग रहा था कि आज हनुमान चालीसा से भूत नहीं डर रहा है। किसी तरह से हिम्मत कर देखा। मुझे कुछ कपड़े में निपटा हुआ दिखा। अंधेरा था इसलिए ठीक से देख नहीं सका।

पर इतना तो पता चल ही गया था कि आवाज़ यहीं से आ रही थी। कुछ नहीं सूझ रहा था तो मोबाइल निकाला, और तो किस्मत देखो आ ही इसकी बैटरी खत्म होनी थी। फिर से इक बार चालू हो गया लेकिन तुरंत बंद हो गया। बस उतनी रोशनी ही काफी थी, देखने के लिए। देखा कपड़े में लिपटा एक मासूम सा चेहरा था।

जो ठण्ड और दर्द और दोनों से कराह रहा था। मुझे अपने आप पर बड़ी हंसी आई। अरे मैं तो बहुत बड़ा फट्टू निकला। इस मासूम से डर रहा था। और कोस भगवान को रहा था। जब भूत हो तभी तो हनुमान चालीसा से भागे। उस मासूम से चेहरे को किसी ने झाड़ी में फेंक दिया होगा। ऐसा लग रहा था। मैने भी सोचा मुझे क्या पड़ी है?

चलो यहां से। जैसे ही आगे बढ़ा । उस मासूम की की चिल्लाने की आवाज़ ने मेरे पैर वापस खींच दिए। कटीली झाड़ियों से उसे निकालने लगा। छोटी-छोटी सी आँखें, मासूम सा चेहरा जैसे मुझसे कह रहा हो, मुझे भी यहां डर लग रहा है, अपने साथ ले चलो। मेरे हाथ का सहारा पाकर झट से सीने से चिपक गई। थोड़ी देर के लिए मैं सोचने लगा, क्या करू ? इसको लेकर चले या रहने दे। दिल कह रहा ले चलो. दिमाग कह रहा अरे यार फर्जी का टेंशन है।

दिल दिमाग के बीच में मैं फंस गया। फिर हनुमान जी का नाम लिया, और उस मासूम की तरफ देखा, मेरी गोदी में रहकर वो खुश हो रही थी जैसे। उसने अपनी पलकों को बंद कर ऐसे खोला। जैसे कि वो मुझसे कह रही हो, मैं इस सुनसान जगह पर अकेली हूं। मुझपर दया करो। मुझे यहां किसी अपने ने छोड़ दिया है। मुझे भी ले चलो अपने साथ। मैने उसका चेहरा देखा । और अपने साथ लेकर चल दिया।

रास्ते में सोच रहा था। वैसे मै अकेला ही रहता हूं। ये भी साथ रहेगी। उसमें कौन सी बड़ी बात हैं? घर पहुंचकर मैने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। और थका होने के कारण खुद भी सो गया। अचानक मेरे काम में दरवाजा पीटने की आवाज़ आ रही थी। भड़ भड़ भड़ भड़, अब इतनी रात को कौन आ गया। इस ठण्ड से उठने का भी मन नहीं होता। तभी दरवाजे के बाहर से आवाज़ भैया उठो । किसी तरह से उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि सामने मनीराम दूध की बाल्टी लिए खड़ा था। उसके कुछ बोलने से पहले, मनीराम आज बहुत सुबह आ गए। अरे भइया का बात करत हो, 8 बज रहा है। कोहरा है इसलिए पता नहीं चल रहा है। अच्छा मनीराम, एक काम करो।कल से दूध एक लीटर देना। क्यों भैइया कौनों मेहमान आएवाला है का। अरे नहीं मनीराम, आओ दिखाते हैं मेहमान को।

ये देखो मेहमान जिससे लिए दूध लाना है। अरे भैइया इ तो गजब है। बड़ी मासूम आंखें देखो इसकी। कितनी सुंदर लग रही है। हां किसी ने रास्ते में फेंक दिया था। रात को जब हम आ रहे थे। तो ये रो रही थी, तो ले आए घर। बहुत बढ़िया काम करेव भैइया। चलो बिहान से एक लीटर दूध लाउबय।

मनीराम ने बात पूरे गांव में फैला दी। अब जिसे देखो वहीं देखने आए। भैइया कौन मेहमान लाए हो ? देखने के बात आपस में बात करते हुए हंसते हुए चले जाए। एक पल को लगा जैसे कोई नई नवेली दुल्हन आई हो, लोग आ रहे हो मुंह दिखाई करने के लिए। और फिर दुल्हन देखने में कैसी है, ये बात करते हुए हंसते हुए चले जा रहे हो।

अधार काका देखने आए और कहा कि ये तो देखने में सुंदर है। इसका नाम मै रखूंगा। उन्होनें नाम फुल्की रख दिया। अब क्या था पूरे गांव में लोग उसे फुल्की कहकर पुकारने लगे। शाम को हम दोनों घूमने के लिए निकल जाते। समय बीतता गया देखते ही देखते फुल्की कब बड़ी हो गई पता ही नहीं चला। आज भी उसका चेहरा बड़ा मासूम सा था। बड़े-बड़े बाल, काली-काली आंखें। अधार काका, मेरे घर की तरफ आते हुए नज़र आए।

कैसन हो काका, बस बढ़िया भैइया। बड़ा सूनसान आपन गांव हो गवा। कउनव रौनक नहीं बची। जोहिका देखो शहर भाग रहा है। अरे काका का करेय। पैसा कमाना भी तो जरूरी है। अरे भैया बात तोहार सही है लेकिन बियाह, शादी भी गांव से नहीं शहरे से करत हैं। अब कौन समझाए? अपने पुरखन के जमीन पर नहीं हुआ होटलय मा करिहय।

तुम्हार फुल्किवा तो बड़ी हो गय। हां काका। जैसे बचपन म रही वैसे ज्यादा सुंदर है। रात को मुझे नींद नहीं आ रही थी। काका की बात याद आ रही थी। मैने भी सोचा कि पुरखों की जमीन पर कुछ कार्यक्रम हो जाए। लेकिन आखिर करे तो क्या कार्यक्रम? फुल्की बड़ी हो गई इसका स्वयंवर कर देते हैं। ये बढ़िया रहेगा।

रात को सोचा और दिन में पूरा करने चल दिया। फुल्की की एक फोटो खिंचवाई। अख़बार में विज्ञापन फोटो के साथ दे दिया। पोस्टर बनवाकर जगह –जगह चस्पवा दिए कि सभी को सूचित किया जाता है कि फुल्की का स्वयंवर 15 तारीख़ को है। जिसमें कुछ शर्तें रखी गई हैं। जो प्रतिभागी इन सभी शर्तों को पूरा करेगा। वहीं फुल्की का विवाह उसी के साथ होगा। पहली शर्त दौड़ की, जिसमें से 1, 2, 3, 4 नम्बर पर स्थान पाने वाला ही आगे बढ़ेगा। दूसरी शर्त फाइट की हैं। जो जीतेगा वहीं फुल्की का विवाह उसी के साथ होगा।

देखते ही देखते फुल्की के स्वयंवर की चर्चा पूरे जिले में फैल गई। प्रतिभागियों के फोन आने लगे। अपना पता और नाम लिखाने लगें। घर लौटते वक़्त अधार काका मिल गए। अरे भइया ही का करवा रहे हो। काका आप ने ही तो कहा था कि गांव में कुछ प्रोग्राम होना चाहिए। तो मैने भी फुल्की का स्वयंवर रख दिया। अब इससे बड़ा क्या प्रोग्राम होगा। काका पूरे गांव को न्योता दूंगा। खाना पीना सब रहेगा। वेज, नानवेज दोनों का।

जिसकी जो मर्जी हो खाए। गांव के लोग बड़ा आश्चर्य चकित थे। आखिर पहली बार किसी ने ऐसा काम किया था। नन्हू हलवाई को खाने की जिम्मेदारी दी गई। टेंट और बर्तन के लिए गुप्ता जी को बयाना दे दिया गया। मुझे दुख भी हो रहा था।

लेकिन खुशी भी थी। मुझे शहर नौकरी के लिए जाना था। तो फुल्की का ख्याल रखने के लिए कोई तो हो। इसलिए स्वयंवर की रचना की गई। आखिर वो दिन आ ही गया जिस दिन का इंतजार था। आज 15 तारीख थी। हलवाई का काम जोरशोर से चल रहा था। मेहमानों के लिए खाना और नाश्ता बन रहा था। गुप्ता जी ने भी सजावट में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। प्रतिभागी आने लगे थे। कल्लू इधर उधर भाग रहे थे।

अरे आज ये बस को क्या हो गया है ? कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं? समय पर पहुंचना बहुत जरूरी है। किसी और के पहुंचने से पहले हमें वहां होना चाहिए। बड़े उत्साहित लग रहे हो कल्लू। और नहीं तो क्या ? आख़िर फुल्की का स्वयंवर है। पता नहीं कितने प्रतिभागी आए होगें ? मुझे भी अपना भाग्य आजमाना है। हां जरूर आजमा लेना।

लेकिन जो शर्त हैं उसपर ख़रे उतरना होगा। अरे ये तो मेरे बाएं हाथ को खेल है। कोई प्रतिभागी मुझसे नहीं जीत पाएगा। दौड़ में बंटी, जैकब, शेरा सबको पछाड़ चुके हैं। ये तो मेरे लिए कुछ नहीं हैं। और बाहरी जो आए होगें उनको देखना है। लो कल्लू बस आ गई। चलो बैठो। कल्लू पूरे जोश के साथ गांव में पहुंच गए।

प्रतिभागियों को देखकर कल्लू के होश उड़ गए। ये सेहतमंद प्रतिभागी। इनसे जीतना तो मुश्किल है। क्या हुआ कल्लू ? डर गए क्या ? नहीं डर नहीं हूं लेकिन अरमानों पर पानी फिर रहा है। कोई बात नहीं मेरे शेर। ये देखने में ऐसे हैं। जब तुम्हारे सामने आएंगे तो बिल्ली बन जाएंगे। बस तुम इतना ख्याल रखना कि खाना कम खाना।

जिससे तुम दौड़ और ठीक से लड़ सको। हीरा, सबसे तगड़ा प्रतिभागी। डाइमंड ये कैसा नाम रखा है । ये कोई नाम है। ये अंग्रेजों वाला नाम रखा है। उधर फुल्की नहा धोकर तैयार। आज फुल्की किसी राजकुमारी से कम नहीं लग रही है। भगवान किसी की नज़र न लगे। गांव के लोग भी आ गए। फुल्की को कुर्सी पर बैठा दिया गया। जिससे वो भी अपने होने वाले दूल्हे को देख सके। और उसको जान सके। सभी प्रतिभागी नाश्ता कर रहे थे। लेकिन कल्लू अफसोस में डूबे थे। हीरा और डाइमंड को देखकर।

आज मेरी शामत आ गई। इन सांड़ों के बीच दबकर मर ही जाऊंगा। ढ़ोल नगाड़े बजने शुरू हो गए। गानें की धुनों पर लोग नाचने लगे। कभी नागिन डांस तो कभी भांगड़ा हो रहा था। सभी प्रतिभागी तैयार हो चुके थे दौड़ के लिए। कल्लू की निगाहें, हीरा और डाइमंड पर थी। बाकी प्रतिभागी को हराना कल्लू के बांए हाथ का खेल था। 50 प्रतिभागी दौड़ शुरू हो चुकी थी। सभी प्रतिभागी भाग रहे थे।

कल्लू भी भरपूर कोशिश से दौड़ रहा था। ये क्या कल्लू तो सबसे आगे निकल गया ? हीरा और डाइमंड को भी पछाड़ दिया। सब थोड़ा खाने की वजह से हुआ। सभी ने पेट भर खा लिया था। उनसे दौड़ा तक नही जा रहा था। पहला स्थान कल्लू पाकर बड़ा खुश था। 4 प्रतिभागी बचें थे। बाकी अफसोस करते हुए जा रहे थे। कुछ पूरा स्वयंवर देखने के लिए रूके थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद अगली शर्त शुरू होनी थी। देखा कल्लू कमाल। तुम बे मतलब को घबरा रहे थे। ये सब खा खाकर भैंस हो गए हैं। बाकी इनके बस का कुछ नहीं। अरे नहीं असली परीक्षा तो अब बाकी है। मुझे इन दोनों से लड़ने में डर लग रहा है। अरे कुछ नही होगा। तुम देखते जाओ बस। बंटी को डाइमंड और कल्लू को हीरा से लड़ना था। दूसरी शर्त शुरू होने वाली थी। मैदान में प्रतिभागी आ गए थे। हीरा को देख कल्लू के पैर कांप रहे थे। यार आज तो बलि का बकरा बन गया। उधर डाइमंड और बंटी लड़ रहे थे। इधर कल्लू के हाथ पांव फूल रहे थे। कल्लू दिल से मना रहे थे कि बंटी जीत जाए। लेकिन होता वही है जो लिखा होता है। बंटी को दूसरे ही पटकने में डाइमंड ने धूल चटा दी। अब कल्लू के लिए मुसीबत थी। अपने को कैसे हीरा से बचाना है। ये दांव सोच रहे थे। बंटी की हालत देखकर कल्लू परेशान थे। यार गांव में मैने बड़ी लड़ाइयां लड़ी थी। पर सांड से पहली बार लड़ रहा हूं। मुझे नहीं आना चाहिए था यहां। जान है तो जहान है। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता। चलो मैदान में जो होगा देखा जाएगा। मैदान में पहुंचते ही लग गया कि कल्लू डर रहे थे। हीरा और कल्लू की लड़ाई शुरू हो गई। कल्लू जैसे कैसे अपने को बचा रहे थे। और हीरा किसी बेहतरीन लड़ाके की तरह वार कर रहा था। उसका हर वार देखने लायक था। उछल उछलकर, दौड़कर । इस बार कल्लू खुद को नहीं बचा सके। हीरा ने दो पटकने लगाए। कल्लू , हाय रे मेरी कमर गई।

अबे बेरहम है क्या ? कुछ तो दया कर ।लेकिन हीरा कहां मानने वाला था। पूरा ताकत लगा दी थी। कल्लू सिर्फ भागते नज़र आ रहे थे। लेकिन इस बार कल्लू को बेहतरीन मौका मिल गया। और हीरा का पैर कल्लू के पकड़ में आ गया। और कल्लू कुछ भी हो जाए हीरा का पैर छोड़ने वाले नही थे। जबतक हीरा हार न मान ले।

हीरा ने अपने आप को छुड़ाने की पूरी कोशिश की लेकिन कल्लू धीरे –धीरे हीरा के ऊपर चढ़ गया था। और हीरा को हार माननी पड़ी। कल्लू इसे चमत्कार ही मान रहे थे। ऐसे कैसे हो गया भगवान? मुझमें इतनी ताकत कहां से आ गई? बाल-बाल बच गया। नहीं तो आज मर ही जाता। एक शैतान को हराया अभी दूसरा शैतान बाकी है।

कोई नहीं आज या तो विजय प्राप्ति होगी, या फिर वीरगति। घबराहट तो बहुत है। लेकिन पर कड़िया मा धान डालो तो मुसरे की गिनती नहीं होती। चलो कल्लू मैदान में किस्मत का फैसला होने वाला है। डाइमंड को देख कल्लू, की आंखों में डर नज़र आ रहा था। कल्लू को भरोसा नहीं था कि वो जीत पाएगा। नाश्ता और भोजन तो डाइमंड ने ऐसा किया था, जैसे कभी देखा ही न हो। कल्लू अफसोस के मारे ठीक से खा ही नहीं सके थे।

लड़ाई का बिगुल बज चुका था। दोनों आखिरी के प्रतिभागी आमने-सामने थे। कल्लू के लिए करो या मरे जैसी स्थिति थी। कल्लू बेटा डरो नहीं , अगहर मार करने वाला कभी नहीं हारता। पहले तुम दांव समझ कर हमला कर देना। बस जीत तुम्हारी। डाइमंड की दांव को कल्लू समझ रहा था। मुकाबला जैसे ही शुरू हुआ, कल्लू ने डाइंमड को दो पटकनी लगा दी। सही दांव और सोझ-बूझ ने कल्लू को मजबूत कर दिया।

डाइमंड को अपनी हार का डर सताने लगा। वो बार-बार बचने की कोशिश करने लगा। तभी एक आखिरी दांव कल्लू का । और फुल्की का स्वयंवर खत्म हुआ। कल्लू इस स्वयंवर का विजेता बन गया। ओ हो मै तो जीत गया। मै तो जीत गया। मुझे कोई नहीं हरा सकता । अब फुल्की की शादी मुझसे हो गई। गांव वालों ने खाना खाया। धूमधाम से फुल्की को विदा कर दिया। कल्लू फुल्की को जब देखा तो देखता रहा गया। इतना मासूम चेहरा, बड़े बड़े बाल, छोटी सी आंखें कल्लू को घायल कर दे रहीं थीं। इतने सालों बाद आज मैं घर पर अकेला था। तनहा सा बिस्तर पर पड़ा। आंख हल्की से जब भी झपकी लेता लगता फुल्की मेरे सामने है। आज फुल्की के स्वयंवर को 5 दिन हो चुके थे। अब तो शाम को टहलने भी नही जाते थे। नौकरी के लिए शहर जाने में दो दिन बचे थे। तभी आधी रात को फोन आता है। ये फोन फुल्की के यहां से था। फोन की बात सुनकर मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। रात को ही भागा दौड़ा चल दिया।

फुल्की की तबीयत बहुत ख़राब हो चुकी था। अस्पताल लाया गया था। इंजेक्शन और ग्लूकोस चढ़ने के कुछ घंटो के बाद फुल्की को होश आया। तभी कल्लू के मालिक ने कहा, भैया जब से फुल्की आई है, इसने कुछ भी नहीं खाया, न ही पिया है। बस कोने में बैठी रही। आप फुल्की को अपने ही घर में रखें। मेरा कुत्ता कल्लू को कुछ हो न जाए। मुझे बहुत डर लगता है। कल्लू भी अब चुप-चाप बैठा रहता है।

वो भी परेशान हो गया। मैने सोचा था कि दोनों आपस में मेल मिलाप कर रहेंगे और खेलेंगे। लेकिन फुल्की को आप से बिछड़ने का गम़ बर्दाश्त नहीं है। इंसान और जानवर में इतना प्रेम पहली बार देखा है। बाकी आप की मर्जी। फुल्की काफी बेबस और लाचार लग रही थी। जैसे आज फिर वो मुझसे कह रहा हो कि मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ। आज पिर उसके मुंह से वहीं आवाज गूंज रही थी।

जो तीन साल पहले झाड़ी में फंसी हुई मुझे मिली थी। अस्पताल से हम दोनों साथ घर आए। और फिर से वहीं दिनचर्या शुरू हो गई। मुझे शहर जाना था। इस बार फुल्की को अपने साथ लेकर शहर गया। उसकी खुशी में ही मेरी खुशी है।

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रवि श्रीवास्तव

रायबरेली, ravi21dec1987@gmail.com

लेखक, कहानीकार, व्यंग्यकार

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