बुधवार, 19 जुलाई 2017

प्रकाश चन्द्र पारख,पूर्व सचिव,कोयला मंत्रालय,भारत सरकार की पुस्तक “कोल-कोनन्ड्रम:द एग्जीक्यूटिव फेलियर एंड ज्यूडिशियल एरोगेन्स” की समीक्षा:- दिनेश कुमार माली

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दो-तीन वर्ष पहले श्री प्रकाश चंद्र पारख,पूर्व कोयला सचिव, भारत सरकार की पहली पुस्तक “क्रूसेडर या कान्स्पिरेटर? (कोलगेट तथा अन्य सत्य)” ने पूरे देश में एक हलचल-सी मचा दी थी,देश-विदेश के पाठक हतप्रभ थे कि अपनी जान-जोखिम में डालकर ऐसा दुस्साहसिक कदम भी कोई सेवानिवृत्त उच्च पदस्थ बिरला अधिकारी ही उठा सकता है! उस पुस्तक ने सरकारी-तंत्रों एवं अन्य जांच-एजेंसियों को आत्मावलोकन करने के लिए प्रेरित किया।फिर उन्हीं मुद्दों से संबन्धित लगभग तीन साल बाद अचानक उन्हें अपनी दूसरी पुस्तक “कोल-कोनन्ड्रम:द एग्जीक्यूटिव फेलियर एंड जुडिशियल एरोगेन्स”लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जबकि कोलगेट संबंधित सारे तथ्यों का खुलासा यथार्थता से उन्होंने अपनी पहली पुस्तक में प्रकाशित कर दिया था। फिर ऐसा क्या बाकी रह गया था,जिसे वे जनता के सामने लाना चाहते थे? यह बात सत्य है कि जीवन की कोई घनीभूत पीड़ा जब इंसान के मस्तिष्क में छाई रहती है तो उनका सृजन नई अनूभूति के रूप में प्रस्तावित होता है।पारख साहब के मन में दर्द और पीड़ा है। यह पीड़ा उनकी दोनों पुस्तकों में दृष्टिगोचर होती है। छायावादी कवि पीड़ा को साहित्यिक सृजन का अनिवार्य अंग मानते हैं,मगर दुखवाद के रूप में। प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के काव्य आँसू की कुछ पंक्तियाँ इस सत्य को उजागर करती है:-

जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई

दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।

जबकि पारख साहब का व्यक्तित्त्व छायावादी साहित्यकारों से पूरी तरह भिन्न हैं,दुर्दिन में उनकी पीड़ा एक अव्यक्त ऊर्जा बन जाती है।जो उन्हें और ज्यादा संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती है।आँसू की पंक्तियों में आँसू की जगह अदृश्य ऊर्जा रूपांतरित हो जाती है।

जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई

दुर्दिन में ऊर्जा बनकर वह आज गरजने आई।

साहित्यकारों के लिए यह एक प्रश्न उठता है कि पारख साहब की पुस्तकों को साहित्यिक-विधा की किस श्रेणी में लिया जाए,निबंध,आत्मकथा,संस्मरण,रेखाचित्र या और कोई दूसरी विधा।आधुनिक प्रबंधन साहित्य के अनुसार ये पुस्तकें पूर्व राष्ट्रपति महामहिम डॉ॰ एपीजे अब्दुल कलाम की पुस्तक ‘विजन-2020’, ‘शक्तिशाली भारत’,‘अग्नि की उड़ान’,पूर्व विदेशमंत्री कुँवर नटवर सिंह की पुस्तक ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ’, लेखक और पत्रकार श्री संजय बारू की पुस्तक ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, सीएजी श्री विनोद राय की पुस्तक ‘नॉट ओनली अकाउंटेंट’ आदि की श्रेणी में लिया जा सकता है, जो हमारे देश की राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक पहलुओं को स्पर्श करते हुए समसामयिक समस्याओं को उजागर करती है। दूसरे शब्दों में, ये सारी पुस्तकें ‘लंर्ड लेसन’(सीखे सबक) साहित्य की केटेगरी में आती है।

पारख साहब की इस पुस्तक की भाषा-शैली कानूनी संदर्भों से ओत-प्रोत होने के बावजूद अत्यंत सहज,सरल, वैचारिक दृष्टिकोण से उतनी ही पैनी और प्रखर हैं।अपनी विलक्षण विश्लेषण क्षमता और प्रकांड बुद्धिमता के आधार पर उन्होंने हमारे देश की कार्यपालिका और न्यायपालिका को अपने कर्तव्यनिष्ठा के प्रति सजग रहने के साथ-साथ नागरिकों के मौलिक अधिकारों व हितों की रक्षा हेतु उन्हें नई दिशा दिखाने के लिए अपनी ओजस्वी कलम चलाई है।

कितनी विडम्बना है कि आज भी हम अपनी अभिव्यक्ति में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है!हमारे देश में अगर कोई लेखक अपने दम पर अपनी आप-बीती को पाठकों के समक्ष पूरे तथ्य एवं सत्य के साथ उजागर करना चाहता है तो कोई भी प्रतिष्ठित प्रकाशक सामने नहीं आते हैं।वे सरकारी संस्थाओं से खतरा मोल लेना नहीं चाहते है, कहीं ऐसा न हो जाए की सरकारी-तंत्र बेवजह उन पर हावी हो जाए और इस कारण उनके व्यापार को ठेस पहुंचे। क्या किसी बड़े लेखक की यथार्थ अभिव्यक्ति को स्वरुप प्रदान करने में हमारे देश के नागरिक आज भी इतने डरे हुए हैं कि इस विषय पर सरकारी दबाव और न्यायपालिका के अज्ञात डर से चर्चा करने तक से कतराते हैं।विवशतावश लेखक ने अपने खर्चे पर इस पुस्तक को प्रकाशित किया ताकि देश की पीढ़ी को न केवल जीवन जीने के सबक मिले,वरन देश के नीति-निर्धारकों को अपने भीतर जागने की जिज्ञासा पैदा हो।पारख साहब ने यह पुस्तक हमारे देश के युवा प्रशासनिक अधिकारियों को समर्पित की है और उनसे उम्मीद जताई है कि वे आजीवन अपने कर्तव्यों का निर्वहन निर्भयता,निष्पक्षता और ईमानदारी से करें।

इस पुस्तक का प्राक्कथन हमारे देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार एवं पूर्व विनिवेश मंत्री अरुण शौरी ने लिखा है:-

“ .... जब किसी ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी को गलत तरीके से आरोपित किया जाता है तो उन्हें जनता के समक्ष विस्तार पूर्वक अपने सारे तथ्यों को उजागर करने में किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरतनी चाहिए। बड़े दुख की बात है कि सीबीआई द्वारा 10 महीनों की लगातार जांच के बावजूद जब उनके विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं होता है तब भी कोर्ट सीबीआई को पुनः जांच करने के आदेश पारित करती है.। यही नहीं बल्कि जब पुनः जांच के बाद भी सीबीआई को कोई गलती नजर नहीं आती,फिर भी कोर्ट सीबीआई की रिपोर्ट को खारिज करते हुए दोषारोपण कर देता है। उस अवस्था में उम्र की ढलान पर आरूढ़ एक ईमानदार अधिकारी को अपने सीमित संसाधनों के साथ अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है,यह हमारी सोच के परे हैं।... ”

पारख साहब ने इस पुस्तक के अपने आमुख में जस्टिस रूमा पाल के उद्बोधन का उदाहरण देते हुए ‘भारतीय न्यायपालिका के सात दोषों’ में “न्यायिक अहंकार” को प्रमुख दोष माना है,जिसमें न्यायाधीश बहुधा न्यायिक स्वतंत्रता को न्यायिक व प्रशासनिक अनुशासनहीनता के रूप में लेता है। इसी तरह ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ कहावत भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में पूरी तरह से चरितार्थ होती है।कानूनी व्यवस्था के अनुरुप नागरिकी मुकदमों के निपटान में ज्यादा से ज्यादा 3 महीने और अपराधिक मुकदमों के निपटान में ज्यादा से ज्यादा 6 महीने से अधिक समय नहीं लगना चाहिए।जबकि यथार्थ कुछ और ही है उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री मिस जयललिता को भ्रष्टाचार की आरोपी घोषित करने में हमारी न्यायपालिका को 20 साल से ज्यादा का समय लगा और अंतिम फैसला उनकी मृत्यु के बाद आया। क्या यह देश की न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न नहीं है? लेखक खुद इस बात से आशंकित है कि हिंडालको केस का अंतिम निर्णय उनके जीवन काल में आ भी पाएगा या नहीं। यह कैसी विडम्बना है कि आजीवन एक ईमानदार अधिकारी को भ्रष्टाचार के आरोपी के रूप में जीना पड़े ?

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इस पुस्तक में पारख साहब ने जिन तीन विषयों पर ध्यान आकृष्ट किया है,वे हैं:-

1. भारत की कोयला नीति

2. कोयले के ब्लॉक आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट के न्याय की विसंगति

3. सीबीआई और सीबीआई कोर्ट का अहम या अनभिज्ञता

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इसके अतिरिक्त, लेखक ने पाठकों की सुविधा के लिए इस पुस्तक के परिशिष्ट में कोल माइंस नेशनलाइजेशन अमेंडमेंट बिल 2000, स्क्रीनिंग कमेटी के नियोजन,श्री मुकुल रोहतगी-अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया के नाम लेखक का पत्र,समाचार पत्रों जैसे ‘दक्कन क्रॉनिकल’, ‘द इकोनॉमिक्स टाइम्स’ आदि में कोलगेट घोटाले की जांच एवं आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित छपे हुए अनेक संपादकीय भी शामिल किए है।

जीवन-पर्यंत ईमानदार छबि वाले कर्मठ प्रशासनिक अधिकारी ने अपने अर्जित अनुभवों एवं कोल माइंस संबन्धित कानून के गहन अध्ययन के आधार पर तथ्यों,तर्कों तथा विश्लेषणात्मक संदेशों द्वारा इस पुस्तक में अपना पक्ष रखा है।अपनी छबि को जांच एजेंसी द्वारा अज्ञानतावश या जानबूझकर धूमिल किए जाने से मर्माहत पारख साहब की मनोव्यथा,वेदना,तीव्र विद्रोह व आक्रोश की झलक इसमें स्पष्ट रुप से दिखाई पड़ती है; उदाहरण के लिए पेज नंबर 101 पर हैदराबाद स्थित अपने निवास स्थान में औचक सीबीआई रेड होने पर अपने पत्नी की मानसिक स्थिति का मार्मिक बयान किया है:-

“ .... She was stunned and was visibly angry at this reward for the 36 years of dedicated and blemish less service in the government॰She of course regained her composure within a few minutes, after which the search operations started. We live in 1600 square feet two and half bedroom flat. It took CBI team little over 3 hours to look into every nook and corner of the house॰ ”

जब एक ईमानदार छबि वाले अधिकारी पर जांच एजेंसी द्वारा आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर आपराधिक भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते हैं तो उसके मन में भयंकर पीड़ा का तूफ़ान पैदा होना स्वाभाविक है।पारख साहब ने अपनी इस पीड़ा का उल्लेख इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 160 पर बेबाकी से किया है:-

... when an honest citizen is robbed of his honour and dignity, by being wrongfully charged with criminal offences, it is worse than death for him॰”

उपरोक्त पंक्तियों में पारख साहब के संवेदनशील मन में गीता के निम्न श्लोक की अनुगूँज साफ सुनाई देती हैं,

अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेअव्य्याम।

संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादातिरिच्यते ॥2.34॥

किसी भी सेलिब्रिटी के लिए अकीर्ति मृत्यु से भी बदतर है। अकीर्ति होने से अवसादपूर्ण मानसिक अवस्था उन अधिकारियों की हो जाती है। यहां तक कि कुछ अधिकारी या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं या फिर आत्महत्या तक कर लेते हैं।कुछ ही वर्ष पूर्व ओड़िशा के संबलपुर जिले के दिल्ली में प्रतिनियुक्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को गोली मारकर स्वयं आत्महत्या कर ली। इस मानसिक तनाव का आखिर का जिम्मेदार कौन हो सकता है? क्या वह खुद जिम्मेदार है अथवा कार्यस्थल की परिस्थितियां उसे इस आत्मघाती कदम के लिए विवश करती है?

एक IAS अधिकारी को निजी कंपनियों में कार्यरत आईआईएम या आईआईटी के स्नातकों से बहुत कम वेतन मिलता है। इसके बावजूद भी केवल सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण वे इस सेवा का चयन करते हैं। मगर जब उनकी प्रतिष्ठा पर आंच लगती है तो वह अधिकारी मानसिक अंतर्द्वंद के थपेड़ों को खाते हुए घोर अवसाद की गहराई में चला जाता है। ऐसी ही मानसिक अवस्था का उल्लेख लेखक ने इस पुस्तक में किया है:-

“ As a Civil Servant, by the time of retirement, one may receive a pay packet equal to what a fresh graduate from IIM or IIT receives on his first posting in the private sectorBut this is a small price to be paid in the service of the nation॰ What is much worse is that despite sincere and honest service, one may be robbed of one’s dignity, honour and self respect and be financially ruined by being forced to run around the CBI, lawyers and courts in the evening of one’s life, all because of ignorance or arrogance of a Police officer or a Judge

इस पुस्तक के प्रथम अध्याय ‘भारत की कोयला नीति’ में कोयला खनन के इतिहास,कोयले की खदानों के राष्ट्रीयकरण के कारणों, भारतीय अर्थव्यवस्था एवं बिजली उत्पादन संबंधित सुधारों,कोयला खनन में निजी निवेश,कैप्टिव माइनिंग, कोल माइंस नेशनलाइजेशन अमेंडमेंट बिल 2000 के प्रावधान और विभिन्न स्टेकहोल्डर के सुझावों का विशद वर्णन लेखक ने किया है,जिसमें कोयला-मंत्रालय,ऊर्जा-मंत्रालय,NTPC, स्टील-मंत्रालय भारी उद्योग विभाग,फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज,एसोसिएटेड चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया,श्रमिकसंघों में भारतीय मजदूर संघ,एटक,इंटक,सीटू और अधिकारी संघों में सीएमओएआई, कोल इंडिया ऑफिसर्स एसोसिएशन सभी शामिल हैं।लेखक अपने सटीक तर्कों से स्पष्ट करते हैं कि कैप्टिव माइनिंग एक गलत नीति है।दुनिया में कहीं भी कोयले की कैप्टिव माइनिंग नहीं होती है।जहां हम कोल इंडिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनी होने का दावा करते हैं,वहाँ लेखक इस कंपनी के मंत्रालय की सबसे ऊंची पादान यानी सचिव की भूमिका में रहकर अर्जित अपने अनुभवों के आधार पर इसे खारिज करते हुए स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं:-

“... like most monopolies CIL is an extremely inefficient company॰”

आगे तकनीकी तौर पर उनके कारणों की भी वे व्याख्या करते हैं:-

“.....for political reasons and pressure from coal/sand mafia, it was operating a number of underground mines where the cost of mining was so high that even if all workers employed in the mine were paid wages simply sitting at home without having to work, the losses would be much lower than the operating these mines॰”

लेखक ने उल्लेख किया है कि हालांकि पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग कमेटी के अधिकांश सदस्य कोयला वाणिज्य खनन को निजी क्षेत्र के लिए खोलना चाहते थे,मगर वामपंथी पार्टियों ने इस प्रस्ताव पर अपनी असहमति प्रकट की तथा कोल इंडिया के पांच प्रमुख श्रमिक संघों ने इसके विरोध में हड़ताल पर जाने की सामूहिक घोषणा की।

इनका विचार था कि कामर्शियल माइनिंग को निजी क्षेत्र के लिए खोलने से विदेशी कंपनियाँ आधुनिक संयंत्र और टेक्नोलोजी लाएगी और कोल इंडिया उनकी प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पाएगा। क्या श्रमिक संघ यह चाहते थे कि हमारे देश में नवीन तकनीकी का इस्तेमाल न हो और अभी भी हम अविकसित देशों की भांति पिछड़ा हुआ बने रहे? कोल इंडिया को नवीन तकनीकियों के इस्तेमाल करने से कौन रोक रहा था ? इस तरह के ‘माइंड सेट’ की अवस्था में क्या हमारा देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है?हमारी विफलता की कीमत हमें बढ़ते हुए कोयले के आयात से चुकानी पड़ी है।लेखक ने विभिन्न ग्राफों के माध्यम से चीन,इंडोनेशिया और हमारे देश के कोयला उत्पादन तथा कोयला आयात और निर्यात का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर हमारी विदेशी मुद्रा में अत्यधिक ह्रास को दर्शाया है।सही समय पर सही निर्णय लेने में हमारी राजनीतिक असक्षमता के कारण सम्पूर्ण व्यवस्था किस तरह से पंगु हो जाती है,इस अध्याय में इंगित होती है।

 दूसरे अध्याय “कोयला ब्लॉकों के आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला” में लेखक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नैसर्गिक न्याय को पूरी तरह से नजर अंदाज करने पर गहरी हताशा व्यक्त की है। जब हमारे लोकतन्त्र की बहुत सारी संस्थाएं जनता  की नजरों में इतनी गिर चुकी हैं कि उन पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है,तब सुप्रीम कोर्ट ही जनता के मौलिक अधिकारों की रक्षा की एकमात्र आशा की किरण बनकर हमारे सामने उभरा था।मगर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की सूक्ष्म समीक्षा  द्वारा लेखक ने हमारी न्यायिक प्रणाली की खामियों को उजागर किया है। कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट,माइंस एंड मिनरल डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट के  प्रावधानों और  वैधानिक व्याख्या के सिद्धांतों  के उद्धहरण देते हुए स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों पर बिंदुवार अपने तर्कसम्मत वैधानिक तरीके से यह सिद्ध किया है कि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा लिए गए सभी  निर्णय तत्कालीन समय के अनुरूप असंगत नहीं थे।भारत सरकार के महालेखापरीक्षक ने भी सन 1993 से 2005 तक किए गए आवंटन में किसी भी प्रकार की अनियमितताएं नहीं पाई है। सन 2006 के बाद होने वाले आवंटनों में अवश्य विपरीत प्रेक्षण उन्हें मिले थे। 

स्क्रीनिंग कमेटी का गठन भारत सरकार के कार्यालय मेमो द्वारा किया गया था,जिसमें कोयला-मंत्रालय,रेलवे मंत्रालय,ऊर्जा-मंत्रालय संबंधित राज्यों की सरकारों के प्रतिनिधि शामिल थे। बाद में कोल इंडिया तथा उनकी अनुषंगी कंपनियों के निदेशक,अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशकों को भी जोड़ दिया गया। ये सभी सदस्य अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे। स्क्रीनिंग कमेटी कोई अंतिम निर्णय नहीं लेती थी,बल्कि सिर्फ सरकार को अपनी सिफ़ारिश करती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने सारे आवंटनों को, जिनमें राज्य सरकारों के उपक्रमों को दिए गए ब्लॉक भी शामिल हैं, अपने आदेश के पैरा 155 में कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट और माइंस एंड मिनरल(डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन)एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ मानकर उन्हें अवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया। लेखक ने अपनी सूक्ष्म विश्लेषण शक्ति के आधार पर यह सिद्ध किया कि कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट की धारा 3(3) के तहत राज्य सरकार द्वारा संचालित उपक्रम भी केंद्र सरकार के उपक्रमों की तरह कामर्शियल माइनिंग के हकदार हैं।सुप्रीम कोर्ट ने यहां ‘सरकारी कंपनी’ का अर्थ केंद्र सरकार की कंपनी समझ लिया,जबकि कंपनी एक्ट की धारा 617 में ‘सरकारी कंपनी’ का अर्थ राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार की कंपनियों से अभिप्रेत होता है। अतः राज्य सरकार के उपक्रमों को आवंटित कोयले के ब्लॉकों को निरस्त करने का कोई कारण अथवा आधार नहीं बनता है।

ठीक इसी तरह कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट की धारा 3(3)(ए)(iii) में ‘कंपनी के इंगेज’ होने की परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गलत मान लिए जाने पर पारख साहब ने दुख व्यक्त किया है।अगर कोर्ट के आदेश के पैरा 151 को सही मान लिया जाए तो बिजली उत्पादन कंपनियों को पहले अपने विद्युत संयंत्रों की स्थापना करनी चाहिए और फिर कोयले की खदानों के लिए आवेदन करना चाहिए।इस अवस्था में क्या उनके पावर प्लांट छह से आठ साल तक कोयले के अभाव में बंद पड़े रहेंगे?

इसके आगे उन्होंने स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों को (जिन्हें कोर्ट द्वारा आर्बिट्रेरी मान लिया गया था) न्याय संगत माना है। कोर्ट की नजरों में स्क्रीनिंग कमेटी ने अलग-अलग बैठकों में अपनी मार्गदर्शिका बदली है। इस संदर्भ में लेखक ने अपना तर्क दिया है कि कार्यान्वयन में अवरोध पैदा होने की स्थिति में उन्हें बदलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी तरह आवेदकों द्वारा प्राप्त सूचनाओं के आधार पर स्क्रीनिंग कमेटी के निर्णय, एक ही ब्लॉक के सब आवेदकों की तुलनात्मक गुणवत्ता,विवादास्पद अवस्था में स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा राज्य सरकार की सिफारिशों को मानना,कमेटी द्वारा बिना विज्ञापन के आवेदकों को आमंत्रित करना,कोयले की कम आवश्यकता वाली पार्टियों को बड़े ब्लॉक आवंटित करना-सभी मुद्दों पर लेखक ने अत्यंत ही सहज ढंग से तार्किक विश्लेषणात्मक पहलुओं पर खुले विचार प्रकट करते हुए उन्हें समय की मांग के अनुरूप सुसंगत,सत्य एवं उपयुक्त बताया है।

पारख साहब के अनुसार निष्कासित कोयले पर पैनल्टी रु 295/-टन लगाना पूरी तरह से असंगत है।यह आंकड़ा कोर्ट ने सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर लिया है,मगर कोर्ट इस आंकड़े के पीछे छुपे तथ्य को ठीक से नहीं समझ पाया। अलग-अलग खदानों में अलग-अलग गुणवत्ता का कोयला पैदा होता है।अलग-अलग गुणवत्ता के कोयले का विक्रय मूल्य भी अलग-अलग होता है।पारख साहब ने यहां एक और भी प्रश्न उठाया है। कोल इंडिया की तुलना में निजी कंपनियों को खराब गुणवत्ता वाले ब्लॉक दिए गए थे। यदि इसके बावजूद भी निजी कंपनियाँ अधिक लाभ कमा रही थी तो उसके पीछे उनके उच्च कोटि की दक्षता थी,क्या इस दक्षता पर सरकार या कोर्ट को कर लगाना चाहिए?

स्क्रीनिंग कमेटी में भाग लेने वाले सभी अधिकारियों और मंत्रियों को आपराधिक कदाचार के लिए दोषी पाना क्या उचित है?अगर यह मान भी लिया जाए कि सभी अधिकारियों और मंत्रियों ने गलत निर्णय लिए,पर जिन कंपनियों ने उस समय कि व्यवस्था के अनुसार आवेदन किए और कोयले की खदाने खोलने और अपने पॉवर अथवा स्टील प्लांट लगाने में हजारों करोड़ रुपए लगाए,उनकी तो कोई गलती नहीं थी। फिर उनको क्यों दंड दिया गया। करेगा कोई और भरेगा कोई और? क्या कोर्ट के इस प्रकार के निर्णय को जस्टिस रूमा पाल के कथन ‘न्यायिक अहंकार’ और ‘हमारे कानूनों की गैरकानूनी विज्ञान’ के अंतर्गत नहीं आते ?

तीसरा अध्याय ‘सीबीआई और सीबीआई कोर्ट’ इस पुस्तक का सबसे बड़ा अध्याय है। सीबीआई ने 2004-05 में हुए आवंटन की जांच के दौरान पारख साहब को कई बार समन किया।कई ब्लॉकों के आवंटन के बारे में पूछताछ हुई। उनमें एक मसला था तलाबीरा-II कोल ब्लॉक के आवंटन में हिंडालको के नाम का शामिल करना। CBI ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने स्क्रीनिंग कमेटी के निर्णय को पलट दिया।पारख साहब ने सीबीआई को स्पष्ट किया कि इस आवंटन का प्रथम आवेदक हिंडालको ही था और कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट तथा माइंस मिनरल(रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट के प्रावधानों के तहत स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों में आंशिक संशोधन करते हुए अन्य लोक सरकारी उपक्रमों के साथ संयुक्त उद्यम हेतु हिंडालको का नाम उसमें जोड़ना उचित एवं न्याय संगत था। माइंस मिनरल(रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट के अनुसार तो वह सबसे बड़ा दावेदार था। सैकड़ों अन्य कंपनियों की तरह हिंडाल्को को भी उतना ही लाभ मिला। न कुछ ज्यादा,न कुछ कम। मगर ये सारी बातें सीबीआई के सिर से ऊपर चली गई और 15 अक्टूबर 2013 की सुबह पारख साहब के घर पर सीबीआई की टीम ने छापा मारा। जब हिंडाल्को को तलाबीरा-II कोल ब्लॉक आवंटन होने के सिलसिले में सीबीआई ने उन पर और श्री कुमार मंगलम बिरला पर आपराधिक षड्यंत्र के आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की,तब उन्होंने अंतिम निर्णय लेने वाले प्रधानमंत्री का नाम इस निर्णय शृंखला में शामिल नहीं होने के कारण ‘षड्यंत्र-थ्योरी’ पर एक करारा प्रश्न चिन्ह लगा दिया।पारख साहब का नाम आते ही IAS, IPS,IFoS अधिकारियों के संघों ने सीबीआई की कारवाई की खुलेआम भर्त्सना की। अपनी पहली पुस्तक में पारख साहब ने सीबीआई से 9 सवाल पूछे। प्रतिक्रिया-स्वरुप श्री रंजीत सिन्हा,सीबीआई डायरेक्टर ने ‘इकोनॉमिक्स टाइम्स’,‘पीटीआई’,’हिंदुस्तान टाइम्स’, ‘इंडिया टुडे’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में उन पर ‘चरमोत्कर्ष अहंकारी’,‘अपने आप जज होने’, ‘सुपरसिलिसियस एटीट्यूड’ जैसे घटिया आरोप लगाए। मगर 10 महीने के भरसक प्रयास, 57 गवाहों के बयान और हजारों पृष्ठों को पलटने के बाद सीबीआई इस निष्कर्ष पर पहुंची।

“No evidence of criminal conspiracy,dishonest intention or criminal misconduct by public servant has emerged against the person named in the FIR or otherwise॰ it is therefore respectfully prayed that instant report may be accepted and matter closed॰”

सीबीआई कोर्ट इस रिपोर्ट के बावजूद भी संतुष्ट नहीं हुई और न केवल पारख साहब aur श्री बिरला वरन पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी के खिलाफ भी अपने आदेश द्वारा संज्ञान लेने का निश्चित किया। सीबीआई कोर्ट के प्राथमिक आदेश के पैरा 50 से 61 पर लेखक ने अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की है कि वित्तीय मामलों पर जांच करने वाले पुलिस अधिकारी और यहां तक की न्यायधीश भी किस तरह गलत निष्कर्ष निकालते हैं। सरकारी प्रणाली की उचित समझ नहीं होने से नीति-निर्णयों के तथ्यों की तोड़-मरोड़ इसके मुख्य कारण होते हैं।इस पर लेखक ने कई सवाल उठाए हैं।जैसेकि क्या एक मंत्री का अपने उचित तथा सही निर्णय लेने की संवैधानिक दायित्व नहीं होता? क्या अफसरशाही तथा राजनीतिक स्तर पर रिप्रजेंटेशन कोर्ट की समझ में अपराध की श्रेणी में आता है? क्या किसी नागरिक को निम्न स्तर पर लिए गए निर्णय पर शिकायत होने की अवस्था में समाधान हेतु कोर्ट में ही जाना चाहिए?

इसी तरह सीबीआई कोर्ट के अंतिम आदेश पर लेखक ने अपना स्पष्टीकरण दिया है।उनमें भी कई सवाल उठाए हैं।जैसेकि क्या किसी उद्योगपति का अपनी कंपनी की जायज मांग के लिए अधिकारियों या मंत्रियों से मिलना हमारे देश में अपराध की श्रेणी में आता है? न्यायाधीश ने हिंडालको की नोटिंग पर हस्ताक्षर करने वाले ओड़िशा सरकार के सभी अधिकारियों के नाम षड्यंत्रकारी की तालिका में शामिल क्यों नहीं किए? लेखक ने स्पष्ट किया है कि कैसे न्यायाधीश तीन कंपनियों के संयुक्त उद्यम के उद्देश्य और योजना को समझ नहीं पाए और इस वजह से वह गलत निष्कर्ष पर पहुंचे।उनके हर पैराग्राफ का उत्तर अत्यंत सशक्त भाषा में पारख साहब ने दिया है।

इसके अतिरिक्त इस अध्याय में लेखक ने तलाबीरा–II ब्लॉक का पूरा इतिहास (सन 1993 से अद्यतन) प्रस्तुत किया है कि किस प्रकार से कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए हिंडाल्को को संयुक्त उद्यम में सम्मिलित किया गया।

स्क्रीनिंग कमेटी की भूमिका पर लेखक ने यह कहते हुए ध्यान आकर्षित किया है:-

“ ... The screening committee was not like a bench of High Court or Supreme Court where each member of the bench is an expert on law and if there is a difference of opinion, a final decision is taken best based on majority view॰ ”

सारांश, यह पुस्तक कोलगेट पर सीबीआई एवं सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए कानूनी आदेशों में भूल-चूक,गलत निर्णय एवं निष्कर्षों का खुला दस्तावेज होने के साथ-साथ जांच एजेंसियों द्वारा सरकारी प्रणालियों की सही जानकारी नहीं होने के कारण अपनी अज्ञानता अथवा अहंकारवश किस तरह गलत जांच की जाती है,उसका एक प्रतिरूप है। यह पुस्तक न केवल पठनीय, संग्रहणीय बल्कि विचारोत्तेजक भी है,जिसे किसी भी प्रशासनिक अधिकारी,टेक्नोक्रेट,कानूनविद,राजनेता और श्रमिक संघों के नेताओं को अवश्य पढ़नी चाहिए।

पारख साहब की इन पुस्तकों का गहन अध्ययन करने के उपरांत अगर कोई फिल्म निर्माता ‘एक आईएएस अधिकारी की आत्मकथा’,‘धर्मयोद्धा’,‘शिखर पर संघर्ष’,‘अंधा कानून’ जैसी युगांतरकारी फिल्मों का निर्माण करें तो जनसामान्य के अरण्य में विप्लव की मानसिकता के स्फुलिंग पैदा करने में सक्षम साबित होंगी, क्योंकि अंग्रेजी भाषा में लिखी गई इन दोनों पुस्तकों की लक्षित पाठकों की संख्या अत्यंत ही सीमित है।अधिकांश पाठक परोक्ष या अपरोक्ष रूप से या तो कोयला उद्योग से जुड़े हुए हैं या फिर किसी सरकारी उपक्रम के अधिकारी या कर्मचारीगण है या फिर नीति-निर्धारण में भाग लेने वाले व्यक्ति विशेष।पारख साहब के जीवन चरित्र एवं उनकी सत्यनिष्ठा संबंधित सिद्धांतों को जन सामान्य से अवगत कराने के लिए उनकी दोनों पुस्तकों का देश की अलग-अलग भाषाओं में न केवल अनुवाद होना चाहिए,वरन देश की नामी-गिरामी साहित्यिक संस्थाओं जैसे नेशनल बुक ट्रस्ट,केंद्रीय हिंदी साहित्य अकादमी आदि द्वारा इन पुस्तकों का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार होना चाहिए।सही अर्थों में,भ्रष्टाचार के खिलाफ तथा देश के प्रति अपने कर्तव्यनिष्ठा का उल्लेख करने वाली ये पुस्तकें देश की वर्तमान कार्यपालिका,न्यायपालिका,सांसद एवं जनप्रतिनिधियों को कार्य पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन की ओर दिग्दर्शन करने वाली एक अनूठी दास्तान हैं, जिसमें एक सच्चे अधिकारी के हृदय का दर्द उभर कर सामने आता है।

श्री अरुण शौरी के प्राक्कथन- “हर अधिकारी को अपनी प्रतिष्ठा ऐसी बनानी चाहिए और आजीवन उसकी इस तरह रक्षा करनी चाहिए कि यदि कभी भी उसे गलत तरीके से फंसाया जाए तो जनता ऐसे षड्यंत्र पर विश्वास नहीं करें। ऐसे अधिकारी को विस्तारपूर्वक जनता के सामने सारे सही तथ्यों को रखने में किसी भी तरह हिचकिचाना नहीं चाहिए। उन्हें सत्य को ऐसे शब्दों में लिखना चाहिए,जिसे आम जनता आसानी से समझ सके और उनके मन-मस्तिष्क में उसकी प्रतिष्ठा पर लगे दाग को मिटाकर पुनः प्रतिष्ठा पुनर्जीवित हो सके”- से मैं पूरी तरह सहमत हूँ।

इसलिए मेरा यह प्रयास रहता है कि पारख साहब की पुस्तकों का हिंदी पाठकों के लिए सरल,सहज व सुबोध समीक्षा लिखी जाए और कम से कम कोयला उद्योग जगत में उनकी निष्कलंक छबि को स्थापित किया जा सके। ओवरमेन,माइनिंग सरदार, फिटर तथा अन्य कामगार जो अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों को नहीं पढ़ते हैं,उन पर चर्चा नहीं कर पाते हैं,ऐसा मध्यमवर्गीय जनमानस अपना सही अभिमत प्रस्तुत कर सकें।जैसे भारत सरकार के ‘बिजनेस रूल्स’ के तहत किसी भी मंत्री अथवा मंत्रालय के सचिव के क्या दायित्व होते हैं?क्या उन्होंने अपना दायित्व का सही ढंग से निर्वहन किया?स्क्रीनिंग कमेटी के क्या कार्य निर्धारित किए गए थे? सीबीआई कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को क्यों नहीं माना?क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला न्याय की दृष्टि से सही है? तलाबीरा ब्लॉक का पूर्ण इतिहास क्या कहता है?तरह-तरह के सवालों को सही दृष्टिकोण से तभी समझा जा सकता है। तभी जनमानस अपने ‘नीर क्षीर’ विवेक द्वारा देश में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों तथा नीति निर्धारण के पहलुओं पर अपनी आम सहमति बना सकते हैं।

पुस्तक का विवरण:-

शीर्षक:- द कोल कोन्नड्रम: एग्जिक्यूटिव फेलियर एंड ज्यूडिशियल एरोगेन्स

लेखक/प्रकाशक:- प्रकाश चंद्र पारख

पता:- 4A-1,जागृति रेजीडेंसी, ईस्ट मरेडपल्ली, सिकंदराबाद 5000 26

मोबाइल:- 993 900 30 272

आईएसबीएन:- 978 89 9340 14 08

मूल्य:- रुपए 600

ईमेल:-parakh31@ hotmail.com

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प्रस्तुति - दिनेश कुमार माली

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