रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

व्यंग्य आलेख // टैंक पर टिप्पणी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

अनीस नियाजी की कलाकृति

जब से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति ने मांग की है कि एक किसी बेकार फ़ौजी टैंक को विश्वविद्यालय परिसर में सजाने के लिए उन्हें मुहैया कराया जाए ताकि विद्यार्थी उसे देखकर सेना के त्याग और बलिदान को याद कर सकें – टैंक सुर्ख़ियों में आ गया है।

टैंक, जैसा की हम जानते ही हैं, एक ऐसा उन्नत सैन्य वाहन है जो तोप आदि से लैस होता है और लोहे की मोटी चादर से ढंका रहता है। यह बख्तरबंद भी है और दुश्मन पर तोप से गोले दागने का साधन भी है। बचाव भी करता है और आक्रमण भी करता है। किसी भी देश या व्यक्ति को सम्मुन्नत बनाने के लिए, कहा गया है, शस्त्र और शास्त्र – इन दो चीजों की आवश्यकता होती है। विश्वविद्यालयों में शास्त्र तो इफरात में होता है, शस्त्र नहीं होता। विद्वान कुलपति ने सोचा होगा की यदि विद्यालय के प्रांगण में तोप रख दी जाए तो विद्यार्थियों को ‘शस्त्र’ का कुछ तो आइडिया हो सकेगा। विश्वविद्यालयों में आजकल आए दिन लाठियां और गोलियां चल जाती हैं, लेकिन इनसे उन मारक हथियारों के बारे में विद्यार्थी बिलकुल अनभिज्ञ रहते है जो सेना में इस्तेमाल किए जाते हैं। कम से कम ज्ञान तो उनका भी होना ही चाहिए। अत: एक प्रतीक के रूप में परिसर में एक पुरानी तोप रख दी जाए तो हर्ज ही क्या है ?

[ads-post]

ट्विट करने वाले भी कमाल के टिप्पणीकार होते हैं। किसी ने टिप्पणी की कि आज आप परिसर में कोई पुराना तोप सजाएंगे तो कल यह तय है कि आज के छात्र एक ऐसे ‘नए’ तोप की, जो ‘वर्किंग ऑडर’ में हो, मांग करने लगेंगे और मांग पूरी करने के लिए भूख हड़ताल में बैठ जाएंगे जो तोप से भी कहीं ज्यादह मारक हो सकती है।

एक अन्य ट्विट कुछ इस प्रकार की थी। ‘लगता है हमारे कुलपति महोदय गांधी के इस सिद्धांत से पूरी तरह वाकिफ हैं कि सैनिक और ‘सिवीलियन’ के बीच की खाई ख़त्म होना चाहिए। सैनिक को सिविलियन के और सिविलियन को सैनिक के गुणों को भी अपनाना चाहिए। अपना मानना है कि शिक्षा परिसर में तोप का रखा जाना इसी दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम के रूप में लिया जाना चाहिए।”

एक अन्य ट्विटकार का कहना था, वस्तुत: एक सैनिक टैंक की बजाय परिसर में एक बड़ा पानी का टेंक रखा जाना चाहिए कि जिसमें विश्वविद्यालयीन शिक्षा को रोज़ नहलाया-धुलाया जा सके। शिक्षा यदि शासन में दखल देने लगे और इस प्रकार देश के लिए किसी मसरफ की न रहे तो उसे उसी टैंक में डुबो भी दिया जा सकता है। लेकिन टिप्पणीकार ने यह नहीं बताया की कि पानी का यह विशालकाय टैंक रखा कहाँ जाएगा ? ये ‘अंडर-ग्राउन्ड टैंक’ (ज़मीन के नीचे) होगा या ग्राउंड लेबल (भूमि तल) पर होगा ? या फिर ‘ओवर हेड’ (ऊपरी तल्ला) टैंक होगा ? और फिर इसमें पानी कैसे भरा जाएगा? वैसे, पानी की तो खैर कोई समस्या नहीं होगी। ‘टेंकर’ से उपलब्ध हो ही जाएगा।

एक अन्य विद्वान ने सुझाया, विश्वविद्यालय में शस्त्र वाहक टैंक या पानी की विशाल टंकी की इतनी ज़रूरत नहीं है जितनी एक ‘थिंक टैंक’ की आवश्यकता है। थिंक टैंक विशेषज्ञों का एक ऐसा समूह होता ही जो किसी तंग कर रही कठिन समस्या के सन्दर्भ में उसे हल करने के लिए अपने कीमती और नीतिगत सुझाव दे सके। थिंक टैंक सुझाओं का एक ढेर है जिसे एक वैचारिक टंकी में सुरक्षित रख दिया जाता है और सुविधा- नुसार इसमें से कुछ सुझावों का क्रियान्वयन कर लिया जाता है। यों तो विद्या की अर्थी निकालने के लिए आज विद्यार्थी ही काफी हैं लेकिन इस काम के लिए यदि एक ‘थिंक टैंक’ गठित कर दिया जाए तो इससे विश्वविद्यालय एक गरिमा के साथ अपने ‘लक्ष्य’ तक आगे बढ़ सकेगा। थिंक टैंक के गठन के लिए हमें अनेक अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर आसानी से मिल भी सकते हैं। वे अपनी सेवाएं देने के लिए तत्पर बैठे हैं। उन्हें बस मनोनीत भर करना है } वे थिंक टैंक की कार्य अवधि बढ़वाते जाएंगे, और इस प्रकार खुद की और वि. वि. की उम्र भी बढाते चलेंगे।

बहरहाल अब समय आ गया है कि हर विश्व-विद्यालय में किसी न किसी एक टैंक का होना ज़रूरी है, फिर वह चाहे सेना का टैंक हो या पानी का टैंक हो या फिर ‘थिंक टैंक’ ही क्यों न हो।

( एक ज़रूरी टीप – हिन्दी का एक अदना सा सेवक होने के नाते अंग्रेज़ी शब्दों से – ताकि हिन्दी शुद्ध बनी रहे – मैं हमेशा बचने की कोशिश करता रहा हूँ। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया। क्या किया जाए, पहला सैन्य टैंक भारत में बना ही नहीं और उसे एक अभारतीय नाम ‘टैंक’ दे दिया गया। ‘थिंक टैंक’ का विचार सर्वप्रथम अमेरिका के राष्ट्रपति जाँन एफ़ कैनेडी को आया। सो थिंक टैंक की परिकल्पना भी भारत के हाथ से निकल गई। बचा अब पानी का ‘टैंक’। सो मैं एक पक्का भारतीय होने के नाते गारंटी से कह सकता हूँ कि यह ‘टैंक’ मूलत: हिन्दी शब्द, ‘टंकी’ का बिगड़ा हुआ रूप है। पर टंकी को अब कौन पूछता है। ‘टेंक’ की बात ही अलग है। )

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

विषय:

एक टिप्पणी भेजें

ट्विटर की कल्पनाये बहुत मज़ेदार व अंत की टीप तो काबिलेतारीफ।बहुत बधाई।

सटीक एवं मार्मिक व्यंग्य,ज्ञानवर्धक भी,...

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget