शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

कहानी ॥ भोर का तारा! ॥ महेन्द्र सिंह


उस रात महक अपने पापा के साथ टहल रहा था।महक ने आकाश में छाई तारामंडली को उत्कंठित होकर देखते हुए पापा से पूछा-"पापा दादाजी तारा बन गए हैं न? "महक के आकस्मिक प्रश्न से पापा निरुतरित हो गए क्योंकि इस तरह के प्रश्न पूछे जाने की न तो उन्हें कोई उम्मीद थी और न ही आशंका।  पापा ने सवाल का जवाब देने के बजाए सवाल करने से यह सोचा कि इससे महक के बालमन में खदबदा रही जिज्ञासा भटक कर शांत हो जाएगी -

"तुम्हें किसने बताया कि दादाजी तारा बन गए हैं?"

" मम्मी ने तब आपके सामने नहीं कहा था कि दादाजी भगवान जी के पास चले गए हैं..। फिर वह तारा बन कर आकाश में चमकने लगेंगे..!"

महक की तीव्र बालस्मृति ने पापा को यह सोचने के लिए विवश कर दिया कि ऐसा ममा ने महक से कब कहा होगा और क्यों कहा होगा। अपने दिल के टुकड़े की बात सुन कर मम्मी को दादी जी की सफेद साड़ी, उनकी आंखों में भरे हुए पानी, उनकी सूनी मांग, उनकी खाली कलाई, उनका निस्तेज चेहरा और उस पर से गायब हो चुकी हंसी का ख्याल आ गया । वह बात आगे चला कर माहौल को थकाने से बचाने की कोशिश करने लगी। अब उन्होंने अपने बेटे का ध्यान बंटाने की कोशिश करते हुए कहा-

"चिंपी! पहले आइसक्रीम तो खा लो!"

"नहीं, मुझे नहीं खानी।  पहले बताओ!"

"अच्छा बेटा यह तो बताओ कि आज तुम इतने दिनों बाद स्कूल गए थे, आज तुम्हें कैसा लगा?"

"आप ही ने तो कहा था कि जब मैं स्कूल जाऊंगा, तब दादा जी आ जाएंगे। मैं तो स्कूल चला गया - लेकिन दादा जी तो नहीं आए ।" वह रूआंसा हो कर अपनी बात दोहराने लगा।

महक की बालहठ से बगीचे में मम्मी-पापा की स्थिति कुतरी हुई रोटी जैसी हो गई थी जिसे न खाते बनता था और न ही फेंकते। पुराने दृश्य उनके सामने कूं-कूं-कूं करने लगे थे,पर घर का फाटक बंद होने के कारण वह भीतर नहीं घुस पा रहे थे। दादाजी को गए हुए अभी महीना भर भी नहीं हुआ था और उनके मन में नई-नई रवायतें जन्मने लगी थीं। तेरहवीं, श्राद्ध,मासिक श्राद्ध...जैसे संस्कारों के प्रति एक व्यर्थताबोध का सा अहसास उन्हें होने लगा था..गोया घर की दीवारों पर रंग-रोगन करने की ज़रूरत अचानक पैदा हो गई हो ...हालांकि सफेदी कराए हुए अभी ज्यादा वक्त नहीं गुज़रा था ।

किन्तु ममा-पापा के विषयांतर से महक के बाल मन पर अंकित दादाजी की छवि कुछ और पु़ख्ता हो गई थी जैसे मंदिर में रखे दीवा में घृत डालने से वह कुछ और प्रकाशित होने लगता है। बाग से अपनी गर्दन नीचे किए हुए लौटते वक्त वह अपने मन में न मालूम क्या-क्या गुनता-बुनता चला जा रहा था। दरअसल दादाजी के जाने के बाद से उसके व्यवहार में बड़ा बदलाव आ गया था। वह छज्जे पर खड़ा हो कर रोज़ शाम को तारों को निहारता रहता था। आसमान में उसे भांति-भांति के चित्र दिखाई देते थे। किसी में वह दादाजी की गोद में बैठा हुआ होता था, किसी में वह उनके साथ बाजा़र जा रहा होता था, किसी में वह उनकी गांधी टोपी से खेल रहा होता था,...। कभी-कभी उसे दादाजी की कोई बात याद आ जाती थी और वह खु़द-ब-खु़द मुसकुराने लग जाता था। उसे दादाजी का वह चित्र बार-बार याद आता था जिसमें वह उनकी अंगुली पकड़ कर सड़क पार कर रहा होता था ..या फिर उनके कंधे पर चढ़कर बाजार जा रहा होता था।

पापा-ममा की व्यस्तता और दादीजी को भीतर से साल रहे दादाजी की अनुपस्थिति के ग़म के बीच महक का खुद का बचपना पिसता जा रहा था जिससे वह घुन्ना होता चला जा रहा था। यही सब सोचते-कल्पनाते हुए महक सो गया।यकायक वह नींद में खिलखिला कर हंसने लगा और एक क्षण बाद बड़बड़ाने भी लगा-

"दादाजी आप इतनी जल्दी तारा क्यों बन गए। आपकी बहुत याद आती है।..दादाजी..कल मुझे..अमित ने मारा...आप आ कर उसे डांटना..।" फिर वह सुबकने लगा। दांत किटकिटाने लगा। ममा महक के व्यवहार में आ रहे बदलाव से वैसे ही परेशान हो रखी थी । महक की बड़बड़ाहट ने उनकी नींद उड़ा कर रख दी। उनके माथे पर चिंता की रेखाएं उबर आईं..।

अगले दिन मौसम ख़राब रहा। दिन भर बारिश होती रही। शाम को भी बादल छाए रहे। महक रोज़ की तरह बारजे में गया। पर उसे चंदा मामा के दर्शन नहीं हुए। वह परेशान हो गया। मामा जी ही जब नहीं आए, तो तारे कैसे आ पाएंगे। वह दादाजी से मिलने के लिए बगीचे में जाने की जि़द करने लगा।महक की बालहठ के सामने ममा को झुकना पड़ा। वह पानी की लथपथ-पचपच के बीच बगीचे में एक कोने से दूसरे कोने में जाता रहा, उचक-उचक कर दादाजी का दर्शन करने का प्रयत्न करता रहा, पर किसी भी कोने से उसे अपने दादाजी दिखाई नहीं दिए।

महक की खामोशी और संजी़दगी बाग़वाली घटना के दो दिनों के बाद भी नहीं टूटी। अपने खिलंदड़ बच्चे के चेहरे पर छाई हुई गंभीरता देखकर ममा के माथे की रेखाएं चीखने लगीं। पापा ने महक को खुश करने के लिए उसकी मनपसंद मिठाई निकाल ली। पर महक फिर भी नहीं बहका। पापा ने उसके साथ खेलने की पेशकश की, पर वह गुमसुम बना रहा। महक के असामान्य व्यवहार से पापा का भेजा भी गरमाने लगा । फिर पापा-ममा की आंख बचा कर महक चुपचाप छप्पर में चला गया और वहां पर हवा में कुछ-कुछ लिखने लगा। सबसे पहले महक ने अपनी दांई तर्जनी से ऊपर से नीचे की ओर एक रेखा खीचीं। तत्पश्चात वह एक बार और अपनी वही अंगुली ऊपर ले गया और उसे ऊपर से नीचे की ओर लाते हुए उसने समतल रेखा सी बना डाली। फिर वह तर्जनी से घेरा बनाने लगा। इसके बाद उसने अंग्रेजी के वी अक्षर और तीन दांतों वाली कंघी की आकृति  बनाई। अंत में अर्धचन्द्र बना कर वह आराम फरमाने लगा।  शायद लिखते-लिखते महक की अंगुली थक गई थी या आसमान को एकटक निहारते रहने के कारण उसकी गर्दन दुखने लगी थी और आंखों में धुंधलापन सा छाने लगा था। कुछ ही पलों में उसकी नैनों के पोरों में पानी भर आया। पापा अपने सामने से  महक के यूं ही चले जाने पर बारजे में उसे देखने के लिए गए और उसकी पानीदार आंखें देख कर बोलने लगे -

"बेटा आप रो क्यों रहे हो? आप तो राजा बेटा हो न। अच्छे बच्चे कोई रोते थोड़े हैं!"

"पापा मैं रो थोड़े रहा हूं! भगवानजी ने मेरी आंखों में आंसू डाल दिए हैं!"

महक के भावपूर्ण जवाब ने पापा का मर्म छूने की कोशिश की और एक क्षण के सहज बहाव में उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े को कलेजे से लगा लिया। पापा के स्नेहिल स्पर्श से उत्साहित होते हुए महक हर शाम को टप्पर में आ कर खड़े होने और चंदा मामा को एकटक निहारते रहने के अभ्यास तथा मामाजी के पास अचानचक एक चमकता हुआ तारा नज़र आने से उपजी जिज्ञासा की तर्कसम्मत पुष्टि करने के आवेग और उत्सुकता को रोक नहीं सका  तथा पापा से वह दोबारा पूछ बैठा -

" पापा, सच-सच बतलाना दादाजी तारा बन गए हैं न। उन्हें देखने के लिए ही मैं रोज़ छप्पर में खड़ा हो जाता हूं।वो मेरे ही दादाजी हैं न जो मुसकुरा रहे हैं!"

न जाने क्या बात थी कि पापा या तो महक की पेशानी पर पड़े बल को देख नहीं पा रहे थे या फिर वह अपने माथे की त्यौरियों को पढ़ नहीं कर पा रहे थे। बात चाहे जो भी रही हो, महक की गीली सलेट पर चौक से लिखी गई इबारत वाकई गज़ब की थी क्योंकि वह तभी पढ़ी जा सकती थी जब प्यार और ममत्व की बयार सलेट को सुखाए जिससे कि सलेट पर लिखे गए अक्षर साफ नज़र आ सकें।

महक को हजा़रों-लाखों तारों में से अपने दादाजी वाले तारे को ढूंढ कर लाना था। कभी-कभी ऐसा भी होता कि उसे कोई तारा दादाजी जैसा लगता, पर अगले ही पल वह उसे नकार देता। महक का तारा महक के दादाजी की तरह ही होना चाहिए-बिल्कुल साधारण होते हुए भी असाधारण, अदभुत, अनुपम,..। पर पापा के भावशून्य, उत्साहहीन चेहरे की सपाटता देख कर भी उसे इस फैसले तक पहुंचने में मदद मिलती रहती कि अभी-अभी उसके द्वारा देखा गया तारा वैसा कतई नहीं है, जैसे कि उसके दादाजी थे..। यह अलग बात है कि पापा के चेहरे की भावहीनता महक की उत्सुकता की प्रतिक्रिया में थी या उनका चेहरा ही कुछ वैसा हो गया था। ख़ैर, महक की कश्मकश सरपट दौड़ती रही ......।

दरअसल महक के मन में तारे वाली जिज्ञासा तब अंकुरित हुई थी, जब दादाजी को बैठक में ला कर रख दिया गया था। महक को यह बात हज़म नहीं हो पा रही थी।उसने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछा-

"मम्मी, दादाजी को अपने कमरे में क्यों नहीं लेटाया? उन्हें फर्श पर क्यों लेटाया हुआ है? "तब मम्मी ने उससे कहा-

"बेटा! दादाजी को भगवान जी ने अपने पास बुला लिया है।"

"मम्मी, मैं भी भगवान जी के पास जाऊंगा । "महक ने मम्मी की बात को काटते हुए कहा था।

"नहीं! राजे ऐसा नहीं कहते ....... भगवान जी केवल उन्हीं लोगों को अपने पास बुलाते हैं जिनकी उन्हें ज़रूरत होती है।  अभी तुम कितने छोटे हो।"

"जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, तब भगवान जी मुझे भी अपने पास बुला लेंगे।"

"नहीं बेटा, पहले वह मम्मी-पापा को अपने पास बुलाएंगे ..!"

"क्यों?"

"क्योंकि तब हम बूढ़े हो चुके होंगे.!"

"नहीं, मैं आपको बूढ़ा नहीं होने दूंगा!"  महक ने अपने मम्मी-पापा के छिनने के डर से कह दिया था।

महक के नन्हें से मन में एक बात घर कर गई थी कि सभी लोग भगवान जी के पास जाते हैं। कुछ समय पहले दादीजी ने महक को गुरु सांदीपनि की कहानी सुनाई थी। तब नन्हे कान्हा ने अपने गुरू के मृत बेटे को यमलोक से वापस ला कर अनुपम गुरू दक्षिणा दी थी।उसके मन में भी इस तरह का संकल्प बन रहा था कि वह दादा जी को ऐसे ही वापस लाएगा। मगर उसे यह समझ में नहीं आ पा रहा था कि भगवान जी के पास जाते हुए सब लोग खुश होते हैं - फिर यहां पर लोग रो क्यों रहे हैं।

दादा जी के नीचे बर्फ की सिल्लियां रख दी गई थीं। कहीं दादाजी को ठंड तो नहीं लग रही होगी।उनकी  नाक में रुई डाल दी गई थी। आंखें उनकी बंद हो रखी थीं। चेहरा उनका हमेशा की तरह मुस्कुरा रहा था। थोड़ी देर बाद दादा जी को सफेद चादर से ढक दिया गया। उन्हें गंगाजल और दूध से नहला कर सीढ़ी (टिखटी) पर रख दिया गया। उनका शरीर सूत से बांध दिया गया। मम्मी-पापा, बुआ, ... सब आ-आ कर उनके पैर छूने लग गये थे। मम्मी ने भी महक से दादा जी के चरण छूने के लिए कह दिया।

लेकिन यह क्या हुआ...दादी जी बेहोश क्यों होने लगी थीं।  उन्होंने अपना लाल शॉल, जोकि दादाजी ने उन्हें दिया था, दादाजी के पांवों पर क्यों रख दिया था। दादा जी के ऐनक और नकली दांतों के सेट भी दादी जी ने उनके पांव पर क्यों रख दिए थे।  फिर वह अपने हाथों को फर्श पर मार-मार कर अपनी लाल चूडि़यों को तोड़-तोड़ कर क्यों चीत्कारने लग गई थीं?

महक अपनी जिज्ञासा पर लगाम नहीं लगा पा रहा था। आखिरकार वह पापा से पूछ ही बैठा-

"दादा जी को आप सब लोग कहां ले जा रहे हो? दादाजी अब घर कब आएंगे?"

प्रश्न सुन कर दादीजी और अधिक अनियंत्रित हो चली थीं जैसे पानी की पाइप लाइन फट जाती है। तब मम्मी ने महक से कहा था -

"जब तुम स्कूल जाने लगोगे, तब दादा जी लौट आएंगे।"

"फिर कल मैं किसके साथ घूमने जाऊंगा?"

"पापा के साथ..!"

"पर पापा के पास तो टाइम ही नहीं होता..!"

"होगा बेटा...फिर दादाजी तो तुम्हें देख रहे हैं न।"

"कहां से..!"

"ऊपर चंदा मामा के घर में तारा बन कर...!"

"लेकिन मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे दादाजी कौन से हैं?"

" बेटा..आप आंख बंद करके दादाजी को याद करना..सामने तुम्हें दादाजी दिखाई दे जाएंगे...।"

"नकलीमुच्ची में!"

"नहीं, सच्चीमुच्ची में!"

"सच्ची..!"

"हां.हां..सच्ची..बाबा!"

"पर दादाजी भगवान जी के पास जाएंगे कैसे?"

"कबूतर बन कर!"

"क्या कबूतर..इतना उड़ लेता है..!"

"और नहीं तो...!"

"पर स्वाति के दादाजी तो भगवान जी के पास चले भी गए और कबूतर भी नहीं बने..!"

"बेटा...आप कपड़े बदल-बदल कर पहनते हो न..। रोज़-रोज़..एक टी-शर्ट नहीं पहनते न। ठीक ऐसे ही भगवानजी के पास जाते समय कोई तारा बन जाता है..कोई.कबूतर..कोई कुछ।"...

ममा की बात महक के बालमन में छप गई थी। तब से महक का दिन आरंभ होता मुंडेर में घोंसला बनाने के लिए प्रयासरत कबूतर-कबूतरी की गुटरगूं-गुटरगूं सुनने में और खत्म होता गुटरगूं-गुटरगूं करते हुए कबूतर-कबूतरी द्वारा बनाए जा रहे नीड़ का निरीक्षण करने में। महक एक कटोरी में पानी भर कर ले आता और उसे मुंडेर पर रख देता। वह अपने खाने-पीने के सामान में से कुछ अंश बचा कर कबूतर-कबूतरी के लिए रख देता। कबूतर-कबूतरी भी तिनके ला-ला कर मुंडेर पर पड़े लकड़ी के खाली डिब्बे में नीड़ का निर्माण करते रहते।शाम होने पर तारा खोज़ कर लाने की उसकी क़वायद पुन:शुरू हो जाती।

लेकिन हजा़रों-लाखों तारों के बीच से अपने दादाजी को खोज़ पाने में मिल रही विफलता से महक उद्विग्न रहने लगा था। एक रात उसने मम्मी की नसीहत के मुताबिक दादाजी को खोजने का निश्चय किया। उस रात वह जल्दी बिस्तर में चला गया। ममा-पापा-दादी के सो जाने के बाद महक बारजे में आ गया। उसने अपने दादाजी की श्वेत-श्याम फोटो हाथ में ले ली। फिर उसने अपनी आंख मूंद ली। दादाजी का हर्षाता चेहरा उसके मन में अंकित होने लगा.. धीरे-धीरे उसने अपनी आंख खोलनी शुरू की। उसे सामने नज़र आया सबसे जुदा..चमचमाता-दमदमाता..हुआ...भोर का तारा। ।यही उसके दादाजी हो सकते हैं-हंसते-मुस्काते हुए, जीवन की खुशियां बांटते हुए, आम होते हुए भी खासमखास, इंसानी,मानवीय..। इसी पल महक को हिचकी आई और मन ही मन दादाजी का नाम लेने पर हिचकी बंद भी हो गई..। इससे उसे पक्का यकीन हो गया कि भोर का तारा बन कर उसके दादाजी लौट आए हैं...।

दादाजी से मिलने के बाद महक को बेहद सुकून मिला। वह बिस्तर में लेट गया। उसके ओठों में मंद-मंद मुस्कान तैरने लगी  थी, उसकी आंखें चमकने लगी थीं। वह मीठी नींद के सपने में झूलने लगा। सपने में महक को दादाजी दिखाई दिए। महक दादाजी की गोद में बैठा हुआ है। वह उसे लोरी सुना रहे हैं-चंदा मामा दूर के दही-पकौड़े बूर के..। फिर वह दूसरा बालगीत गुनगुनाने लगते हैं- नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए, बाकी जो बचा था काले चोर ले गए...। दादाजी की स्वरलहरियों में महक मंत्रमुग्ध हो रहा था..। दादीजी बहुत तन्मयता से दीवान पर बैठे हुए दादा-पोते को देख रही थीं..। उनकी आंखों में खुशी की चमक बसी हुई थी जो रह-रह कर अपने नसीब पर इठलाती जा रही थी...।

थोड़ी देर में महक के पास एक काला कुत्ता आ जाता है। वह महक पर गुर्राने लगता है। दादाजी का क्रोध सातवें आसमान में पहुंच जाता है। वह अपनी लाठी से कुत्ता भगाने लगते हैं। कुत्ता दौड़ने लगता है। दादाजी कुत्ते के पीछे भागने लगते हैं.।

महक सहम जाता है। वह अपने कमरे से उठ कर जाता है और पापा-ममा के बंद पड़े कमरे का दरवाजा खटखटाने लगता है। किवाड़ खुलने पर महक देखता है कि दफ्तर की फाइल के तकिए पर पापा सो रहे हैं, ममा ने काम के बोझ की कागज़ रूपी चादर ओढ़ रखी है। उनकी नींद खुलती है। वह डिस्टर्ब से हो जाते हैं। पापा बजर बजाते हैं। चौकीदार दौड़ा-भागा चला आता है। महक को कंप्यूटर टेबल पर बैठा दिया जाता है। वहां पर महक जेटिक्स पावर रेंजर गेम खेलने लगता है। पापा के चेहरे की सपाटता से ममा संक्रमित होने लगती है..। ममा के चेहरे की भावशून्यता पसरती जाती है..। देखते-देखते पास-पड़ोस और शहर में चपटे चेहरे वाले लोगों की तादाद बढ़ती जाती है..।तब तलक दादाजी काले कुत्ते को भगा कर लौट आते हैं। उनकी बूढ़ी अंगुलियां कांप रही होती हैं। उनकी सांस फूल रही होती है..। उनका चेहरा कसा हुआ होता है।

सपना देख कर महक की नींद सच्चीमुच्ची में खुल जाती है। सुबह हो चुकी है। सूरज दादा आ चुके हैं। भोर का तारा आंखों से ओझल हो चुका है। पापा-ममा के कमरे में कागज़ ..बिखरे पड़े हुए हैं। दादीजी कागजों को समेट रही है। फिर वह दादाजी के दीवान पर बैठ जाती हैं। पूर्व दिशा की ओर वह कुछ खोजने लगती हैं...। महक भी उस दिशा में भोर के तारे को ढूंढने लग जाता है। महक ने अपने कद से भी ऊंची दादीजी की छड़ी पकड़ रखी होती है।

महक भर दिन व्यग्र रहा। आखिर, दादाजी से मिलने के मोह से वह बच कैसे सकता था? अगली रात को एक बार फिर वह उठा और छप्पर में पहुंच गया। पूर्व दिशा में अनगिनत तारों के बीच भोर का तारा अपनी खूबसूरती बिखेर रहा था। उधर पीपल, आम और नीम के पेड़ थे। नीम के वृक्ष की फुनगी के ऊपर तारा ऐसा लग रहा था मानो वह कोई दिव्य चमकीला पक्षी हो या फिर चंदा मामा ने अपना ही एक टुकड़ा काट कर कठपुतली सा उसे लटका दिया हो। ख़ैर, बात चाहे जो भी रही हो, पर आसमान के मुकुट में कोहिनूर हीरे की तरह भोर का तारा दिपदिपा-चमचमा ज़रूर रहा था। दरअसल, मामा-भांजे पकड़म-पकड़ाई खेल रहे थे। संतरे की फांक के आकार के मामा पिछली रात पीछे थे-मगर आज उन्होंने रेस में खासी लीड बना ली थी और वह भोर होने से पूर्व अपने घर पहुंचनेवाले थे। तभी उसे तारे की दिशा में एक और प्रकाशपुंज आता हुआ दिखाई दे गया। एक पल को महक भ्रमित हो गया कि भला दो-दो भोर के तारे एक साथ कैसे आ गए। पास आने पर वह हवाईजहाज निकला। महक अपनी बेवकूफी पर हंसने लगा। उसका यह सहज भोलापन देख कर तारा भी हंसने लगा-जैसे दादाजी के ओठों में हंसी तैरती थी..। वह दादाजी से बातें करने लगा---

"आप कैसे है?मुझसे कितनी दूर चले गए? मेरे साथ अब कोई नहीं खेलता..मुझे अब कोई कहानी नहीं सुनाता, लोरी नहीं सुनाता....। दादीजी बस गुमसुम बैठी रहती हैं। पापा-ममा..फाइलों में डूबे रहते हैं..।अब मेरी अंगुली पकड़ कर कोई नहीं चलता...।"

महक की जिज्ञासाओं के टिड्डी दल से दादाजी विचारमग्न हो गए। वह किस प्रश्न का उत्तर पहले दें-यह सोचने लगे..। पापा-ममा का वह कुछ नहीं कर सकते थे, पर दादी जी की चुप्पी से उनकी आंखों में चिंता उग आई और वह कारुणिक स्वर में बोले-

"बेटा..मेरे पीछे अपनी दादीजी का ख्याल रखना..देखो..उन्हें कोई कष्ट पहुंचने न पाए।"

"हां, रखूंगा..,ज़रूर-ज़रूर रखूंगा। पर महरी तो गांव चली गई है। घर का काम अब कौन करेगा?"

महक के स्वर में चिंता तैरने लगी थी। वह इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि महक को बिस्तर में न पा कर ..दादीजी उसे खोजती हुई झरोखे में आ गई..। उन्होंने देखा कि भोर के तारे को देख कर महक मंद-मंद मुसकुरा रहा है और उससे बातें कर रहा है। वह आश्चर्यमिश्रित स्वर में महक से पूछ बैठती हैं-

"चिंपी..इतनी रात को यहां पर क्या कर रहे हो...?"

"दादाजी से बात कर रहा हूं?"

"कहां है..दादाजी? "

"वो देखो..वो रहे..अभी उन्ने मेरे साथ ढेरों बातें की हैं..।" महक ने भोर के तारे की तरफ इशारा करके कहा।

महक के निश्छल.... मासूम प्यार को देख कर दादीजी अपने आंतरिक सोते को रोक न पाई। उनके कुछ अमृतकण महक के कंधे पर भी गिर पड़े। इससे महक खुद को अपराधी महसूस करने लगा क्योंकि अभी-अभी तो उसने दादाजी को दिलासा दी थी कि वह दादाजी को किसी तरह का कष्ट नहीं पहुंचने देगा। दादीजी महक की अंगुली पकड़ कर उसे वापस बिस्तर पर ले गईं..। बारजे में दादीजी जी के कदम पड़ने से सोए हुए कबूतर-कबूतरी अपने पंख फड़फड़ाने लगे।

महक की बालकल्पना के बारे में दादी मां रात भर सोचती रहीं। दादीजी का जख्म़ इससे हरा ज़रूर हो गया था, पर उनके मन में एक सहारा बन सा गया था कि उनका बुढ़ापा मजबूत कंधों पर टिका हुआ है। उनके मन में कश्मकश चलती रही जिसके कारण वह बाद में सो नहीं सकीं। सुबह उठने पर उनका सिर भारी-भारी रहा..।

किन्तु, महक अपने काम में लग गया। वह यह जान गया था कि दादाजी भोर का तारा बन गए हैं और दादाजी को तारों तक पहुंचाया है-कबूतर-कबूतरी ने। वह अपनी तई कोशिश करने लगा कि कबूतर-कबूतरी को किसी तरह की तक़लीफ़ न होने पाए। पहले वह उनके लिए मुंडेर पर दाना-पानी रख कर आता था। अब उसने छज्जे में ही उनके लिए रोटी-पानी रखना शुरू कर दिया। कबूतर-कबूतरी को भी महक की नई व्यवस्था भाने लगी थी। अब कबूतर-कबूतरी दादाजी की दीवान के नीचे एक कोने में तिनके रख-रख कर अपना घोंसला बनाते रहते...।

ममा को महक का दादाजी के प्रति यह ज़ुनून खासा नाग़वार लगने लगा। वज़ह इसकी यह थी कि महरी के न होने पर घर में झाड़ू-बुहारी उन्हें खुद करनी पड़ रही थी। ऊपर से कबूतर-कबूतरी थे कि धवल फर्श पर बीट करते जाते थे। घर-दफ्तर के कामकाज का भार पड़ने पर ममा वैसे ही खीझने लगती थीं। वह दफ्तर जाने से पहले गुटरगूं-गुटरगूं सुन कर कबूतर-कबूतरी को भगाने के लिए दौड़ी-भागी चली आती थीं। लेकिन कबूतर-कबूतरी भी अपनी किस्म के ढीठ थे। वह ममा के भगाने पर उड़ जाते थे और चले जाने पर लौट आते थे। ममा की नसें फड़फड़ाती रहती थीं। वह तब और अधिक कुनमुनाने लगती थीं, जब पोता दादी के घोसले में पड़ा-पड़ा सोता रहता या बगीचे से लाए गए शहतूत खाता रहता या कंच्चे खेलता रहता और वह घर में खटती रहतीं।

फर्श के गंदा होने की बात तो ममा किसी तरह से सहन करती आ रही थी। मगर जब कबूतरी ने घोंसले में अंडे दे दिए और बार-बार हड़काने के बाद भी जब न तो कबूतरी की गुटरगूं खत्म हुई और न ही उनके द्वारा फर्श को गंदा किया जाना ही बंद हुआ, तब ममा के नेत्र आग उगलने लगे जिसमें घी डालने का काम कर डाला ममा की नई नकोर डिजाइनर साड़ी पर लगे बीट के धब्बे ने जिसे छुड़ाते हुए उनकी साड़ी का ज़री का काम भी उघड़ गया जिससे ममा का रहा-सहा संयम का बांध भी टूट गया ।

पिछले कुछ समय से कबूतर-कबूतरी के प्रति महक के ज़ुनून और इस निमित्त दादी मां से उसे मिल रहे संरक्षण को देख-देख कर ममा के मन में जो गुबार भर रहा था, वह पीड़ा से तड़पड़ा कर बाहर आने के लिए हाथ-पांव मारने लगा। ममा बड़बड़ा कर बोलने लगी-"कबूतर को दाना खिलाएगा। कबूतर के बच्चे के साथ खेलेगा। कबूतर की गर्दन में संदेश बांध कर दादाजी तक पहुंचाएगा। मैं देखती हूं कि संदेश कैसे पहुंचाता है। लाख मना किया, पर साहबजादे कब सुनते मेरी बात।सिद्धार्थ बनने चले हैं। मेरी कितनी महंगी साड़ी खराब कर डाली..। "

ममा अपने दांत भींचते, पांव पटकते हुए छज्जे पर पहुंच गई। उन्होंने अपने निष्ठुर हाथों से घोंसला निकाला और कूड़ेदान में डाल दिया। कबाड़ी को बुला कर लकड़ी का डिब्बा बेच डाला। दादी मां ममा को रोकने के लिए कुछ बोलना चाह रही थी, पर उनकी आवाज़ दीवारों के जंगल में कहीं गुम हो कर रह गई।

नन्हें महक का दिल ममा के वहशियाना हमले से जार-जार हो गया। वह फूट-फूट कर रोने लग गया..।उसने दादाजी को गुहारा। पर बादलों के पार से उनका कोई जवाब नहीं आया।महक ने सोचा कि चूंकि कबूतर-कबूतरी ने दादाजी को चंदा मामा के पास पहुंचाया था और ममा ने गुस्से में उनका घोंसला उजाड़ दिया था, इसलिए दादाजी उससे नाराज़ हो गए हैं........महक निरीह पक्षियों के साथ बेरहमी बरते जाने पर मूक जो बना रहा था। यह तो एक तरह की अहसानफरामोशी हुई। जब महक मासूम पक्षियों को ही बचा नहीं सका है, तब उससे दादीजी की देखभाल करने की झूठी आस रखना व्यर्थ ही है। महक जोर-जोर से चीखने लगा"दादीजी, दादाजी मुझसे नाराज़ हो गए हैं..अब वह मुझसे बोल नहीं रहे हैं...नहीं रहे हैं..।"

सदमे और दहशत की हालत में महक के ऊपरी ओठ से निचला ओठ पिचक गया जिससे उसका मुंह बंदर की तरह हो गया। उसके ज़हन की छटपटाहट-विकलता ठीक वैसे कम नहीं हो पा रही थी जैसे कोई सफेद कबूतर अशोक की डाल पर बैठना चाह रहा हो और टहनी उसके वज़न को सह न पाने के कारण झूलने लगी हो तथा कबूतर पंख फडफड़-फड़फड़ा कर डाल पर बैठने का प्रयास करता जा रहा हो।

महक जी भर कर रो लेना चाह रहा था। रो-रो कर आकाश-पाताल एक कर देना चाह रहा था..। वह ममा की व्यस्त टहलकदमी और कामकाजी हाथों की झनझनाहट से कदम बचा-बचा कर दादाजी के दीवान पर बैठी हुई दादीजी के पास चला गया। दादीजी ने उसे अपने आंचल में छिपा लिया। दादीजी महक की बेचैनी का माथा सहलाने लगीं। डरे-सहमे हुए महक की ज़बान से ठहरे-ठहरे शब्द निकलने लगते हैं-"ममा ने कबूतर का घोंसला फेंक दिया। ममा ने घोंसला फेंक दिया। कबूतरी के अंडे फूट गए। घोसला फेंक दिया..ममा ने। दादाजी भी जवाब नहीं दे रहे हैं...।"

महक के भावोच्छवास से दादीजी की खुद की आंखें भर आर्इं। उनके पास अपने पोते को धीरज बंधाने के लिए शब्दों का अकाल पड़ गया।..मगर...ममा कबूतर-कबूतरी के अंतसउघाड़ू आर्तनाद से बेखबर हो कर अपना काम निबटाती रहती है। मन ही मन वह संतुष्ट भी हैं कि चलो बाजरे से गर्दो-गुबार तो साफ हुआ..। ममा के चेहरे में भावशून्यता और सपाटता यथावत बनी रहती है।

पर शायद महक के कलकलाते मन को दादीजी की ममतामयी छांव में भी कल नहीं मिल पा रहा था। इसलिए वह दादीजी की गोद से निकल कर अपने कमरे में खिड़की के पास लगे बिस्तर पर चढ़ कर पूर्व दिशा की ओर झांकने लगता है। खिड़की के बंद पड़े शीशों से चेहरा सटाए रहने के कारण महक का माथा-नाक-ओठ पिचक जाते हैं। उसकी आंखों से बहती हुई भगीरथी से शीशे पर सर्पीली आकृति सी बन जाती है और उसके गालों पर धूल की कालिमा चिपक जाती है। अब महक अपने कमरे में दड़बे में बंद पड़े कबूतर की तरह फड़फड़ा रहा था...।

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  1. कहानी हृदयस्पर्शी है। बच्चे के मोहग्रस्त मनोविज्ञान को उभारने पर खास ध्यान दिया गया है। उसकी कोमल भावनाएं स्वाभाविक हैं। बच्चों का अपने मृतक दादा-दादी के प्रति ऐसा लगाव देखा गया है। इतनी साच्छी कहानी के लिए बधाई!

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