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व्यंग्य - स्वतंत्र लेखन के ज़रिए साहित्यिक टशन - अमित शर्मा (CA)

वे स्वतंत्र लेखक हैं। वे पूर्वाग्रह की बेडियों में बंधकर निर्बाध रूप से स्वतंत्र लेखन का कार्य संपन्न करते हैं और इस कार्य ने उनको काफी संपन्न भी बनाया है। वे काफी वर्षों से स्वतंत्र लेखन को निपटा रहे हैं लेकिन त्वचा के साथ साथ उनके लेखन से भी उनकी उम्र का पता नहीं चलता है। उनका मानना है कि लेखक को किसी के दबाव में नहीं लिखना चाहिए हालाँकि प्रलोभन के लिए वो ऐसा नहीं मानने के लिए स्वतंत्र हैं।  स्वतंत्र लेखन से उन्होंने काफी प्रसिद्धि पाई है। उनके चाहने वाले अब उनकी प्रसिद्धि को चारों तरफ महामारी की तरह फैलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उनकी कलम और ज़बान दोनों समान रूप से स्वतंत्र है और इसकी भरपाई करने के लिए समाज हित  में उन्होंने दिमाग और विचारो की स्वतंत्रता बाधित कर रखी है। स्वतंत्रता बेलगाम रहे इसलिए उनकी कलम और ज़बान दोनों का ब्रेक फ़ैल हो रखा है जो शायद अच्छे दिन आने के बाद ही पास मतलब "ठीक" हो पाए। वे अपने लेखन से समाज में क्रांति की अलख जगाते  हैं , हालाँकि सुबह जल्दी उठने के लिए वो पूरे परिवार के मोबाइल फोन में अलार्म लगाते हैं।

उनका मानना है कि भले ही स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त अधिकार हो लेकिन एक लेखक के लिए स्वतंत्रता उसका स्वाभाविक गुण होना चाहिए। इस स्वाभाविक गुण ने  उनके लेखन को भी अपना बंदी बना रखा है।  वे शुरू ही से समाज को स्वतंत्र लेखन के फायदे बताते आए हैं और हाल ही में उनके घर पर पड़े आयकर के छापे से समाज ने उन फायदों को अपनी आँखों से खुद देखा।

उनके लेखन से स्वतंत्रता, चूड़ियों की तरह खन-खन करके बजती है और ज़रूरत पड़ने पर ठीक उसी तरह से टपकती है जैसे बरसात में गरीब की छत। लेखन में उन्हें किसी तरह की गुलामी पसंद नहीं है केवल सम्मानित करने वाली संस्थाओं को छोड़कर। अपने बेबाक और स्वतंत्र लेखन से वो किसी को नहीं बख्शते, सबको धराशायी कर देते हैं,सिवाय अपने अहम के। देश के सौभाग्य से वो आज़ादी के बाद धरती पर प्रक्षेपित किये गए वरना उनके लेखन की स्वतंत्रता देखकर  देश को आज़ादी दिए बिना ही अंग्रेज़ "नौ-दौ-विजय माल्या" हो जाते।

ईश्वर ने उन्हें लेखन का अद्भुत टैलेंट दिया है, इसी के चलते उन्होंने अपनी फेसबुक प्रोफाइल में भी अपना परिचय स्वतंत्र लेखक के रूप में ही दिया है। उनकी प्रोफाइल में स्वतंत्र लेखक लिखा देखकर कई नौसीखिया लेखकों को लगता है कि कही हम किसी बैंक के काउंटर से कसकर बाँधी हुई पेन से तो अपना लेखन नहीं घसीट रहे हैं। दरअसल उनका अपनी प्रोफाइल पर स्वतंत्र लेखक लिखना अपनी स्वतंत्रता का शो-ऑफ करने से  ज़्यादा दूसरे लेखकों को प्यार से ज़लील करने का "शगल" है जो उनके लिए कोई बड़ी "गल" नहीं है।

लेखकीय स्वतंत्रता उनके लिए "वन-वे ट्रैफिक" जैसी है इसलिए वो ट्रैफिक नियमों का पूरा पालन करते हुए दूसरे पक्ष की स्वतंत्रता से "सुरक्षित-दूरी" बना कर चलते हैं।

वो लेखन में स्वतंत्रता को तब तक बेहद चाव से चबाते हैं जब तक लेखन उनकी विचारधारा की चाशनी में डूबा हुआ हो। उनके विचारो से विपरीत धारा का लेखन उनकी सेहत के लिए "बापू" की तरह हानिकारक है इसलिए उसका वे बीफ बैन की तरह विरोध करते हैं। वैसे स्वभाव से वो पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन लेखकीय स्वतंत्रता का पुजारी बनने से उन्हें कोई गुरेज़ नहीं है।

वे हर समय लेखन कार्य में आकंठ डूब कर मुक्त कंठ से साहित्य सृजन में लगे रहते हैं इसलिए अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए उन्होंने समाज और साहित्य हित में राजनेताओं से गठबंधन कर रखा है।  स्वतंत्र लेखन की इस विधा को  वे अपने क्षेत्र के विधायक की मदद से बहुत ऊँचाईयों तक ले जाना चाहते हैं (उतनी ही ऊँचाई तक जहाँ तक पहुँचे हुए विधायक जी पहुंचे हैं)। हालाँकि इतनी ऊँचाई पर पहुँच कर वो जमीन से जुड़े हुए जनहित के मुद्दे कैसे उठाएंगे इस पर कोई जवाब ना देने के लिए लेखक जी स्वतंत्र हैं।

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बहुत सामयिक व्यंग्य, हर कोई बस की बोर्ड उठाए घूम रहा है अब ... लेकिन कलम की ताकत और की बोर्ड की ताकत मेल नहीं खा रही ... हर बात में स्वतंत्रता चाहिए तो लेखन में क्यों न हो ...👍

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