व्यंग्य // प्रेस की पवित्रता और अनिवार्य नागरिक संवेदनशीलता // अमित शर्मा (CA)

त्रकारिता एक पवित्र पेशा है। पवित्रता का यह चोला असामाजिक, अराजक  और आपातकालीन तत्वों से इसकी रक्षा करने के लिए इसे पहनाया गया है। पवित्रता के चोले में लिपटी पत्रकारिता मुझ जैसे सात्विक लोगों को और भी ज़्यादा  पवित्र लगती है। रोज़ सुबह अख़बार आते ही मैं उसे भगवान की तस्वीर के पास रखकर, प्रणाम कर ही उसे पढ़ना चालू करता हूँ। न्यूज़ चैनल लगाते ही पहले एंकर को प्रणाम करता हूँ, फिर न्यूज़ देखता हूँ। देश का सामान्य नागरिक होने के नाते इस पवित्र पेशे की पवित्रता बचाने की बचाने की "भयंकर" कोशिश करता हूँ ताकि "अभयंकर" की कृपा से लोकतंत्र का यह चौथा  स्तंभ मज़बूती से फासीवादी और अलोकतांत्रिक ताकतों से "उचित मूल्य" पर लोहा लेता रहे ताकि खंभे को जंग लगने से  बचाकर उसकी दीर्घजीविता सुनिश्चित की जा सके।

जागरूक नागरिक होने के नाते मैं पत्रकारिता के प्रति काफी संवेदनशील भी हूँ। कुछ दिन पहले मेरी बाइक एक न्यूजपेपर वाले की साईकिल से टकरा गई थी, लड़ने पर उतारू न्यूजपेपर वाला तभी शांत हुआ जब मैंने उसे यह समझाया की यह उस पर नहीं बल्कि पत्रकारिता(प्रेस) पर हमला है। पत्रकारिता की पवित्रता को लेकर मैं इस कदर भावुक हूँ कि मुझे डर लगता है कही अख़बार के टुकड़े पर समोसा-कचौरी रख कर खाने पर मुझ पर पत्रकारिता का अपमान करने का केस ना दर्ज़ हो जाए।  "प्रेस" (इस्तरी) के लिए दिए गए कपडे भी जब वापस अख़बार में लिपटे हुए आते हैं तो वो भी मुझे "प्रेस"(पत्रकारिता) का अपमान लगता है। अगर गलती से मैं न्यूज़ चैनल बदलकर दूसरा चैनल  लगा लूं तो मीडिया की आवाज़ दबाने की गिल्ट फ़ीलिंग आने लगती है।

पत्रकारिता की पवित्रता केवल कहने और सुनने का विषय नहीं है, अनगिनत स्टिंग ऑपरेशन की अग्निपरीक्षा में निखर कर यह पवित्रता सोना बन चुकी है। विज्ञापनों की व्यवसायिकता और मिडिया हाउसेस के अवैध राजनैतिक प्रेमाचार भी इसकी पवित्रता को भंग नहीं करते हैं बल्कि वो इसकी पवित्रता अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक अंग बन चुके हैं। व्यवसायिक हित पत्रकारिता की स्वतंत्र आवाज़ को दबाते नहीं बल्कि वो तो पत्रकारिता की आवाज़ को बुलंद करने के लिए माइक का काम करते हैं। पत्रकारिता की कमीज़ पर भले ही कितने ही दाग क्यों ना हो लेकिन फिर भी हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है की वो इससे तमीज़ से पेश आए। पत्रकार और पत्रकारिता हमारे हितों की आवाज़ उठाते है तो हमारा इतना फ़र्ज़ तो बनता ही है की हम इनके नखरे अपने मज़बूत कंधों पर उठा ले।

एक सभ्य समाज बनाने के लिए चौथे खंभे को असभ्य होने की आज़ादी मिलना ज़रूरी है। मीडिया के योगदान के सामने अभिव्यक्ति की आज़ादी बहुत छोटी और तुच्छ चीज़ है। जब तक हम मीडिया को दूसरी संस्थाओं और कानून से ऊपर नहीं रखेंगे तब तक हम भारत जैसे विशाल देश में लोगों की आवाज़ बनने वाले इस पवित्र पेशे की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं कर सकते ।

देश की फासीवादी और अलोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई ताकते मीडिया की इस स्वतंत्रता को नष्ट करना चाहती है ।इसी सिलसिले में हाल ही में  एक निजी न्यूज़ चैनल के मालिक के घर पर आर्थिक गड़बड़ी जैसे गैर-ज़रूरी मामलों में सरकारी तोते से लाल मिर्ची खाकर छापे पड़वाए गए। ज़ुल्म की इंतिहा तो तब हो गई जब लाल मिर्ची खाकर भी छापे मारने से पहले तोते ने लाल-सलाम नहीं बोला।

यह केवल न्यूज़ चैनल के मालिक के घर पर छापा नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की स्वतंत्र सोच पर छापा जो न्यूज़ चैनल देखकर अपनी सोच बनाता है। देश के हर नागरिक को इस आपातकाल के खिलाफ अपने फेफड़ों से विरोध की आवाज़ निकालनी चाहिए। आखिरकार एक मीडिया संस्थान जो 24*7 दबे कुचले लोगों पर होने वाले अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाता है उसे छोटे मोटे घोटाले और आर्थिक अपराध करने की स्वतंत्रता नहीं दी जाएगी तो वो लोकतंत्र पर अपने द्वारा किये गए उपकार की कीमत कैसे वसूलेगा।

लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ का तिया-पांचा हो इससे पहले लोकतंत्र के अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ अर्थात न्यायपालिका को बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए पत्रकारिता को कानून हाथ में लेने की अधिकृत अनुमति दे देनी चाहिए ताकि एक हाथ में कानून और दूसरे हाथ में अभिव्यक्ति की आज़ादी होने से शक्ति संतुलन बना रहे जो कि इस चतुर्थ स्तंभ के टिके रहने के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा सभी ज़िम्मेदार और जागरूक नागरिकों का भी कर्तव्य है की लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ को लोकतंत्र का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनने से बचाए।

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