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शिखर तक संघर्ष (Crusader or Conspirator? P C Parakh भाग 2) // प्रकाश चन्द्र पारख

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प्रकाश चन्द्र पारख की पुस्तक - Crusader or Conspirator? by P C Parakh का हिन्दी अनुवाद

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अनुवादक - दिनेश माली

भाग 1 

1. आंध्रप्रदेश कैडर: प्रथम सोपान का श्री गणेश

जीवन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। जीवन में कभी मैं आईएएस बनूँगा, ऐसा मैंने सोचा न था। रूड़की विश्वविद्यालय (वर्तमान आईआईटी, रूड़की) से सन् 1966 में एप्लाइड जियोलोजी में एम.एससी. करने के उपरान्त मैं एक ऐसे चौराहे पर खड़ा था। कौन-सा रास्ता मुझे जीवन के गंतव्य स्थान पर ले जाएगा? मैं उसे तलाश करने लगा। इधर संघ लोक सेवा आयोग से जियोलोजिस्ट पद के लिए कोई वैकेन्सी नहीं निकल रही थी, मैंने उच्च अध्ययन जारी रखने के लिए पी.एचडी. ज्वॉइन कर ली। दो-तीन महीने ही हुए होंगे कि नेशनल मिनरल डेवलमेंट कोरपोरेशन में जियोलोजिस्ट के तीन पदों की वैकेन्सी निकली। उसका आवेदन मैंने भरा। बड़ों का आशीर्वाद, भाग्य और परिश्रम रंग लाया, मेरा उसमें चयन हो गया। एनएमडीसी ज्वाइन करने के बाद एक साल की फील्ड ट्रेनिंग शुरू हुई,पहली पोस्टिंग मिली बस्तर के बेलाडिला खदान की आयरन माइन्स में। चार महीने बाद अगली पोस्टिंग खेतड़ी (राजस्थान) में हुई। उस समय वहाँ अरावली पर्वतमाला में तांबे की खोज का कार्य चल रहा था। एक साल की ट्रेनिंग खत्म होते-होते नेशनल मिनरल डेवलपमेन्ट कोरपोरेशन में से विलग हो कर एक नई कंपनी हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड का जन्म हुआ। नेशनल मिनरल डेवलपमेन्ट कोरपोरेशन के विभाजन के बाद अधिकारियों को दोनों कंपनियों में बाँट दिया गया। मेरा और मदान का अलाटमेंट हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में हुआ। मदान के पिताजी सरकार में डिप्टी सेक्रेटरी रह चुके थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि अगर उनका बेटा आईएएस बन जाता है तो वह न केवल उच्च स्तरीय जीवन जी सकता है वरन् उनकी सामाजिक मान-मर्यादा में भी चार चाँद लग जाएंगे। बस, पिता की ख्वाहिश की छोटी-सी चिनगारी बेटे के भीतर महत्त्वाकांक्षा की अग्नि बनकर धधकने लगी। एक से भले दो, सोचकर मदान ने मुझे भी इस परीक्षा में बैठने के लिए प्रेरित किया।मदान की प्रेरणा से मैंने भी इस परीक्षा में बैठने का निर्णय लिया।तत्पश्चात मैंने भी इस परीक्षा में बैठने का निर्णय लिया और तदनुरूप विषयों का मन ही मन चयन करने लगा। फिजिक्स और मैथेमेटिक्स से संपर्क टूटे हुए काफी अर्सा बीत चुका था, जियोलोजी के इर्द-गिर्द झाँकने पर मुझे मेरे स्वभाव के अनुरूप जियोग्राफी एवं इतिहास विषय ज्यादा ठीक लगे। जबकि मदान की अभिरुचि कुछ और थी। ज्यादा अंक स्कोर करने के चक्कर में मैथेमेटिक्स और रसियन लेंग्वेज का उसने चयन किया, जियोलोजी के अलावा। किस्मत की बात ही कहिए, हम दोनों ने खूब मेहनत की, मगर मेरा आईएएस में चयन हो गया और मदान का नहीं। कुछ साल हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में काम करने के बाद मदान आस्ट्रेलिया चले गए और वहाँ अपनी एक्स्प्लोरेशन कंपनी खोल दी। आईएएस की परिवीक्षा प्रशिक्षण पूरा करने के उपरांत आंध्रप्रदेश में आईएएस प्रोबेशनर के रूप में मेरे व्यवसायिक कैरियर का पहला सोपान प्रारंभ हुआ। मेरे कई दोस्त आज भी पूछते हैं,"मैं आईएएस क्यों बनना चाहता था?" आज भी मेरा जबाव यही होता है, " मैंने यह देखा कि इस नौकरी के फलक की ज्यामिति बहुत बड़ी एवं विस्तृत थी,जबकि दूसरी नौकरियों में ऐसा नहीं हैं। भले ही, दूसरी नौकरियों में पैसे ज्यादा मिलते हो, मगर एक गरीब दिहाड़ी मजदूर से लेकर धन-कुबेर उद्योगपति तक और गाँव के एक सरपंच से लेकर देश के प्रधानमंत्री के साथ काम करने का अवसर केवल इसी नौकरी में मिल सकता है। सही मायने में यह नौकरी अतुलनीय हैं। जहाँ केन्द्र और राज्य सरकार के साथ अलग-अलग विभागों में काम करने का अवसर मिलता हैं। मैं नेशनल मिनरल डवलपमेन्ट कॉरपोरेशन में अलग हुई माइनिंग कंपनी हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड की नौकरी छोड़कर इस सर्विस के प्रथम सोपान पर आरूढ़ हुआ था और इस नौकरी के अंतिम सोपान में मेरी पोस्टिंग कोयला मंत्रालय के सचिव के पद पर हुई,जिसके अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम फैलाने वाली बड़ी माइनिंग कोल कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड आती है। यह विचित्र संयोग था कि मेरे व्यवसायिक जीवन के पूर्वार्द्ध में जिसे छोड़ा, जीवन के उत्तरार्द्ध में उसे पाया। स अकादमिक पृष्ठभूमि ने मुझे बहुत शीघ्र ही कोल इंडस्ट्री को बहुत नजदीकी से सूक्ष्मतापूर्वक समझने में मदद की।

सभी प्रदेशों को अपने-अपने स्टेट कैडर का आवंटन हुआ, मेरा अलाटमेंट आंध्रप्रदेश के लिए हुआ। आंध्रप्रदेश में सात अधिकारियों का अलाटमेंट हुआ था जिसमें केवल एक आंध्रप्रदेश का था बाकी छ राजस्थान,उत्तरप्रदेश और ओड़िशा से थे। हम सभी नॉर्थ इंडिया से थे तो मुझे अपनी दूसरे साथियों की तरह अज्ञात भाषा और अज्ञात सांस्कृतिक परिवेश में अपनी जिंदगी गुजारने की चिंता होने लगी। क्या पूरी तरह से अलग तरह से सांस्कृतिक परिवेश वाले हम सफलतापूर्वक अपने कार्य का निष्पादन कर पाएँगे? मसूरी की ट्रेनिंग खत्म होने के बाद और डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग शुरू होने के पहले हमें एक महीने हैदरवाद में सचिवालय और विभिन्न निर्देशालयों की ट्रेनिंग करनी थी। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी (पॉलिटिकल) श्री वल्लीयाप्पन ने हैदराबाद में हमारे प्रशिक्षण प्रभारी थे। उन्होंने हमारी प्रशिक्षण में बहुत ही दिलचस्पी दिखाई और सहयोग प्रदान किया। वे मिलनसार,हंसमुख और जिन्दादिल इंसान थे। कब पूरा महीना गुजर गया, पता ही नहीं चला। उनके चेहरे की ओजस्विता और मंद-मंद मधुर मुस्कान के भीतर हमारे सांस्कृतिक विच्छिन्नता के दु:ख-दर्द यूँ पिघल गए जैसे प्रचंड धूप में हिमालय से बर्फ। उनसे मिलना मात्र हमारे लिए किसी दर्द निवारक दवाई से कम नहीँ था।इसके अतिरिक्त,एक बार आईएएस ऑफिसर्स ऐसोसियशन के वरिष्ठ अधिकारियों ने हमें चाय पर बुलाया। इस बैठक ने हमारे भीतर आंध्रप्रदेश के प्रति काफी सौहार्द्र व सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न किए। ऐसा लगने लगा कि हम अलग-अलग नहीं,वरन् किसी अच्छी तरह गूँथी हुई विशिष्ट कम्यूनिटी के सदस्य हैं।

हमें प्रोटोकॉल के अनुसार गर्वनर, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से मुलाकात करनी होती थी। आज भी याद है उस समय श्री के. ब्रह्मानंद रेड्डी मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उसके कार्यालयी निवास स्थान में मिलाने के लिए सुबह 10 बजे का हमें समय दिया गया। निश्चित समय पर हम सभी तैयार होकर उनके ऑफिस पहुँचे। खुले दिल से श्री रेड्डी ने हमारी आवभगत एवं अभिवादन किया। हमारे साथ कम से कम आधा घंटा समय उन्होंने बिताया। हमारी पृष्ठभूमि की जानकारी लेने के साथ-साथ उन्हें हमसे क्या उम्मीद हैं, इसी विषय पर विशद चर्चा की। आज भी एक हृदयस्पर्शी बात उनकी मुझे अच्छी तरह याद है जब हम उनसे विदा ले रहे थे। ‘‘आज से आप न तो राजस्थान के हो न उत्तरप्रदेश, न बिहार और न ही ओड़िशा के आज से आप सभी का राज्य आंध्रप्रदेश हैं। इसका और इसकी जनता के विकास का भार आपके कंधों पर है, जो आपकी योग्यता, कर्मठता और अथक परिश्रम पर निर्भर करता हैं। मुझे आशा ही नहीं वरन् पूर्ण विश्वास हैं कि आप सभी मेरी उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। अगर आपको कोई समस्या या दिक्कत आये तो आप मेरे पास कभी-भी बेहिचक आ सकते हैं। मेरे घर के दरवाजे आपके लिए चौबीस घंटे खुले हैं।’’

मुख्यमंत्री के इन प्रतिश्रुति मूलक शब्दों ने हमारा मनमोह लिया था और आंध्रप्रदेश को दत्तक राज्य के रूप में स्वीकार करने आने वाली चिंताओं से कोसों दूर कर दिया था। क्या तत्कालीन मुख्यमंत्री का यह नेशनल आउटलुक नहीं था? प्रांतीयवाद की संकीर्ण भावना से ऊपर उठकर क्या इस जमाने के नेताओं में ऐसी सोच पाई जाती हैं? आंध्रप्रदेश में काम करना मेरे लिए किसी परम सौभाग्य से कम नहीं था, इस राज्य के जिस हिस्से में जिस हैसियत से मैंने अपना काम किया, मुझे वहाँ की जनता-जर्नादन, मेरे स्टॉफ, साथियों,राजनेताओं का मुझे भरपूर सहयोग एवं सम्मान प्राप्त हुआ।

2.सब कलेक्टर आसिफाबाद : पहली-पहली अनुभूति

जैसे ही मेरा जिला प्रशिक्षण पूरा हुआ, वैसे ही मेरी पोस्टिंग आदिलाबाद जिले के एक सब-डिवीजन में कर दी गई। सब-डिविजन का मुख्यालय था आसिफाबाद। आबादी रही होगी लगभग सात हजार। इस सब डिवीजन के विधायक एवं पंचायत समितियों के अध्यक्ष काफी शिष्टजन थे। उन्होंने कभी भी प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं किया, न ही किसी भी प्रकार की गलत मांगें उठाई।

आज भी मुझे अच्छी तरह याद है, जब मैं आसिफाबाद का सब-कलेक्टर बना था, उस समय आदिलाबाद के कलेक्टर हुआ करते थे एक अभिजात्य परिवार से संबंध रखने वाले मुस्लिम अधिकारी । उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान न तो मेरी तहसीलों के कार्यों का निरीक्षण किया और न ही दौरा। वे आखेट हेतु सिरपुर कागज नगर के अरण्यों में अवश्य आते थे, जो कि मेरे अधिकार-क्षेत्र में आता था। मैं अपने सब-डिवीजन के सारे क्रियाकलाप चलाने में पूरी तरह स्वतंत्र था।

उनका स्थानान्तरण हो जाने के बाद सब-ऑर्डिनेट रेवन्यू सर्विस के अधिकारी प्रोन्नत्ति पाकर आदिलाबाद के कलेक्टर बने।अपना पद भार ग्रहण करने के तुरन्त उपरान्त जिले के राजस्व अधिकारियों की एक समीक्षा बैठक बुलाई। इस बैठक में उन्होंने सभी अधिकारियों को ईमानदारी से कार्य करने की हिदायत दी। बैठक खत्म होने के बाद जब मैं उनसे औपचारिकतावश मिला तो उन्होंने मेरे सब डिवीजन के प्रस्तावित दौरे के बारे में बताया और मुझे यह भी कहा,‘‘आप अपने तहसीलदार से कह देना कि मेरे दौरे के दौरान किसी भी प्रकार की ज्यादा मेहमाननवाजी करने की कोई जरूरत नहीं हैं।’’

मेरी तीनों तहसीलों के मुख्यालयों में किसी भी प्रकार के अच्छे होटल या रेस्टोरेंट की सुविधा नहीं थी, जहाँ से उच्च अधिकारियों या मंत्रियों के लिए अच्छे खाने की व्यवस्था की जा सकती थी। उस समय किसी वीआईपी विजिट के दौरान खाने के सामानों की व्यवस्था रेवेन्यू इंस्पेक्टर करता था और एक प्रशिक्षित चपरासी खाना तैयार करता था। दौरे पर आये हुये अधिकारियों के साथ उनके निजी सचिव, दफेदार (मुख्य चपरासी) और ड्राइवर हुआ करते थे। कुछ अधिकारी अपने रहने-खाने की सुविधा के लिए अपने महंगाई भत्ते के अनुसार पैसे दे देते थे, मगर कुछ अधिकारी कुछ भी नहीं देते थे।अधिकारियों के आवभगत का सारा खर्च अधिकतर राजस्व अधिकारी के कंधों पर आ जाता था।

जैसे निर्देश मुझे कलेक्टर ने दिए थे, वैसे मैंने तहसीलदारों को बता दिया। कलेक्टर के पहले दौरे के समय में उनसे मिलने गेस्ट-हाउस गया। शाम को जब उन्हें रात्रि भोज परोसा गया तो देखकर में स्तब्ध रह गया। विविध व्यंजन परोसे गए थे, मैंने मन ही मन सोचा कि ऐसे राजशाही भोज की क्या जरूरत थी? कलेक्टर तो खुद मेहमाननवाजी में ज्यादा खर्च करने के लिए मना कर रहे थे तो तहसीलदार ने ऐसा क्यों किया? मैंने तहसीलदार से पूछा ‘‘जब कलेक्टर साधारण भोजन खाना चाहते थे मेरे कहने के बावजूद भी तुमने राजशाही भोजन की व्यवस्था क्यों कीं?’’ यह मेरी तरफ अभिज्ञता पूर्वक देखकर मुस्कुराते हुए कहने लगा ‘‘सर, 30 साल की नौकरी में मैंने ऐसे ही बाल सफेद नहीं किये हैं। कई कलेक्टरों को खाना खिला चुका हूँ। खाना बनाने से पूर्व हम पता लगा लेते है कि उनकी मनपसंद क्या हैं, फिर खाना तैयार करवाते हैं।’’ मैं यह सुनकर अवाक् रह गया कि किस तरह एक कलेक्टर अपने असली चेहरे को दूसरे मुखौटे से ढकते है और तहसीलदार अपने तजुर्बे के आधार पर उच्च अधिकारियों की जरूरतों के बारे में समझ लेते हैं। मेरे लिए यह एक नयी अनुभूति थी। पहली-पहली अनुभूति जिसमें भ्रष्टाचार के अंकुर फूटने की आशंका दिखने लगी। धीरे-धीरे हमें यह पता चला कि वह कलेक्टर भ्रष्टाचार में पूरी तरह से लिप्त है। पैसा बनाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते थे, चाहे वह किसी की पोस्टिंग का हो या चाहे किसी के ट्रांसफर का हो,चाहे किसी तरह का लाइसेन्स लेना हो। पैसा बनाना ही उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य बन चुका था।

एक दिन ग्राम अधिकारी संघ (विलेज ऑफिसर एसोसिएशन) के पत्र के साथ कलेक्टर की एक चिट्ठी मुझे मिली, जिसमें यह लिखा गया था कि ग्रामाधिकारियों के के वेतन से अनधिकृत कटौती की जा रही है। छानबीन करने पर तहसीलदार ने कहा, ‘‘यह बात एकदम सही है कि ग्रामाधिकारियों के वेतन से कुछ पैसा काटकर रखा जाता है। यह कटौती मंत्रियों और उच्च अधिकारियों के खर्चों की आपूर्ति के काम आती है। आप चाहें तो इसका सारा हिसाब-किताब मेरे पास है, देख सकते हैं।’’ जब मैंने उसके पास बना हुआ सारा हिसाब-किताब देखा तो यह देखकर हतप्रभ रह गया कि कटौती की हुई धनराशि का अधिकांश हिस्सा कलेक्टर की व्यक्तिगत जरूरतों की पूर्ति में व्यय किया गया था। आदिलाबाद जिले में कागज नगर ही ऐसा शहर था, जिसमें एक अच्छी बेकरी थी। मैंने इस हिसाब-किताब में देखा कि कागज नगर की बहुत सारी पर्चियाँ बेकरी उत्पादों एवं अन्य वस्तुओं की आसिफाबाद के तहसीलदार के नाम कटी हुई थी।

मैंने अपनी छानबीन कर यह रिपोर्ट कलेक्टर को भेज दी, जिसमें वह विशेष टिप्पणी भी दर्ज की - जब तक दौरा करने वाले अधिकारियों/मंत्रियों के आदर-सत्कार का बोझ तहसीलदार के कंधों पर डाला जाएगा, बिना किसी अनुमोदित ऑफिसियल फंड के, तो पैसों की अवैध कटौती का कारोबार ऐसा ही चलता रहेगा। कलेक्टर ने मेरी रिपोर्ट का कोई जवाब नहीं दिया।भले ही,मेरी माँ का जीवन चरित्र मुझे अधोगामी नहीं होने दे रहा था, मगर मन में कहीं न कहीं विद्रोह की सूक्ष्म भावना घर करने लगी थी। मैं अपनी शक्ति, सामर्थ्य, अनुशासन, न्याय, संवेदना और भावना जैसी सुकोमल शब्दावली को अपने हृदय-कक्ष में संजोकर अपने आप को तैयार कर रहा था,अनिश्चित भविष्य की अंधेरी गुफाओं में उनकी मशाल बनाकर फूंक-फूंककर कदम रखने की।

मेरे दूसरे कलेक्टर थे श्री आर.के.आर. गोनेला। भारत सरकार में अंडर सेक्रेटरी के पर पर काम करने के बाद अभी-अभी स्टेट कैडर में लौटे थे। पिछले कलेक्टर से एकदम विपरीत। ईमानदार, निष्ठावान और नियम मुताबिक काम करने वाले। एकदम अलग इंसान। आते ही निजी काम के लिए वाहनों पर प्रतिबंध लगा दिया था उन्होंने। नतीजा यह हुआ, आदिलाबाद का ऑफिसर क्लब खाली रहने लगा। क्योंकि किसी भी अधिकारी के पास अपना निजी वाहन नहीं था। उन्होंने कभी स्थानीय तहसीलदारों से अपनी आवाभगत नहीं करवाई। जब कभी बाहर किसी होटल से अपना खाना मंगवाया तो उन्होंने उसके अपने पैसे दिए। काश! हमारे देश में सभी अधिकारी ऐसे हो जाते।

एक बार रिव्यू-मीटिंग के लिए रेवन्यू बोर्ड के एक मेंबर आए। जिले के दूसरे सब डिवीजन मुख्यालय ‘निर्मल’ में जिले के सारे राजस्व अधिकारियों की बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक के लंच हेतु कलेक्टर ने सभी भाग लेने वाले अधिकारियों को लंच के लिए अपना-अपना योगदान देने के लिए निर्देश दिए थे ताकि तहसीलदार को खर्च उठाने की जरूरत न पड़े।

रेवन्यू बोर्ड के मेम्बर लंच से कुछ समय पहले पहुँचे और अपने कमरे में सीधे चले गए। उन्हें शराब का शौक था और खाने से पहले एक दो पैग जरूर उन्हें चाहिए। एक दो पैग लेने के बाद उन्होंने हमारे साथ लंच किया। लंच में खूब सारे शाकाहारी और मांसाहारी व्यंजन बने थे। लंच लेने के बाद वह सोने चले गए। अपराह्न के बाद उन्होंने रिव्यू-मीटिंग शुरू की, जो मेरे हिसाब से आंधे घंटे से ज्यादा नहीं चली होगी।

कलेक्टर के निजी सचिव बंसीलाल इस व्यवस्था के प्रभारी थे। मेम्बर के चले जाने के बाद मैंने बंसीलाल से पूछा, ‘‘बंसीलाल जी, जब कलेक्टर ने कंट्रीब्यूटरी लंच के निर्देश दिए तो आपने ऐसे शाही लंच का आयोजन क्यों किया?’’ बंसीलाल के चेहरे की मुस्कराहट यह साफ बता रही थी मानों उनके लिए यह सवाल निरर्थक था। विरक्त होकर वह कहने लगा, ‘‘सर, कलेक्टर साहब नए-नए है। उन्हें प्रैक्टिकल अनुभव नहीं है। उन्हें अपने सीनियर ऑफिसरों से डील करना मालूम नहीं है। मैं जानता हूँ कि श्री सिन्हा को स्कॉच और अच्छा खाना बेहद प्रिय है।

अगर उन्हें स्कॉच और स्वादिष्ट लंच नहीं दिया जाता तो यह रिव्यू-मीटिंग आधी रात तक चलती और एक-एक अधिकारी से ऐसे सवाल पूछे जाते कि उनकी परफोरमेंस की खाल उधेड़ दी जाती। इससे ज्यादा वह और कुछ कहते, मैंने उन्हें चुप रहने के संकेत कर दिए। तहसीलदार और बैठक से संबंधित जिले के विभागों के अधिकारियों से अपने वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों के आराम हेतु सुविधा उपलब्ध करवाने की उम्मीद की जाती है। शायद ही ऐसे कुछ वरिष्ठ अधिकारी और मंत्री होंगे,जो अपनी आवभगत पर खर्च हुए पैसों का भुगतान करते होंगे। मुख्यमंत्री और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों के दौरे के समय अनेक-अनेक समर्थक और पार्टी मेम्बर बिन-बुलाए मेहमानों की तरह आ धमकते हैं। उनके खाने-पीने की व्यवस्था के लिए कोई ऑफिशियल बजट नहीं होता है। इसलिए यह देखा गया है कि मुख्यालय में सबसे ज्यादा भ्रष्ट अधिकारी को तहसीलदार बनाया जाता है ताकि वीआईपी लोगों के दौरे के समय उनकी आवाभगत की समुचित व्यवस्था हो सके।

मैं सोच रहा था, क्या यह परंपरा नई-नई शुरू हुई है? ऐसा नहीं हैं। यह परंपरा काफी समय से चली आ रही हैं। देश के आजाद होने से पहले से ही चली आ रही है। तब कोई क्यों आवाज नहीं उठाता? हम ही शासक बनकर अपनी जनता का शोषण कर रहे हैं। हम सभी अपनी-अपनी जगह भ्रष्टाचार के महायज्ञ में जनता से लूटे हुए धन की आहुति दिए जा रहे हैं। कब तक चलेगा यह सब कुछ, हर कोई जानता हैं देश आजाद हुए 70 साल बीत गए मगर कुछ भी तो परिवर्तन नहीं हुआ। किसी ने भी तो सिस्टम के खिलाफ आवाज नहीं उठायी और हम सभी अधिकारी इस परंपरा को निभाने के आदी हो गये। यही नहीं, सन 1881 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के अपने नाटक-प्रहसन 'अंधेर नगरी' में ऐसी ही तत्कालीन परिपाटी की ओर संकेत किया था ,पाचक चूरन की वक्रोक्ति के माध्यम से। कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:-

चूरन अमले सब जो खावै,दूनी रिश्वत तुरंत पचावै।

चूरन सभी महाजन खाते,जिससे जमा हजम कर जाते।

चूरन खाते लाला लोग,जिन को अकिल अजीर्ण रोग।

चूरन खावें एडिटर जात,जिनके पेट पचे नहीं बात।

चूरन साहब लोग जो खाता,सारा हिन्द हजम कर जाता।

चूरन पुलिस वाले खाते,सब कानून हजम कर जाते।

ले चूरन का ढेर,बेचा टके सेर।

मेरा कार्यभार संभाले हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था,मगर मुझे अपने तहसील में हो रहे छोटे-छोटे भ्रष्टाचार संबंधी जानकारियाँ अवश्य होने लगी। परन्तु मेरे आधे सेवाकाल तक मुझे पता तक नहीं चला कि मेरा ऑफिस भी छोटे-छोटे भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ चुका था। आसिफाबाद सब-डिवीजन के सब-कलेक्टर के रूप में मुझे ‘आर्म्स एक्ट’ के अन्तर्गत कुछ हथियारों के लाइसेंस देने के अधिकार आदिलाबाद कलेक्टर द्वारा डेलीगेट किए गए थे।एक दिन एक आदमी मेरे पास शिकायत लेकर आया और बोला,‘‘सर,एक महीना हो गया। मुझे अभी तक मेरी गन का लाइसेंस नहीं मिला।’’

मैंने छानबीन की तो पता चला कि वह फाइल पन्द्रह दिनों से ऑफिस के टाइपिस्ट के पास पड़ी हुई थी। विस्तार से जानकारी करने पर पता चला कि हर आर्म्स लाइसेंस पर 100 रु. वसूल किए जाते थे जो हेड-क्लर्क, डीलिंग क्लर्क, टाइपिस्ट और चपरासी में बाँट लिए जाते थे। इस बार टाइपिस्ट उस रिश्वत का ज्यादा हिस्सा लेना चाहता था, मगर दूसरे लोग अपना हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं थे। टाइपिस्ट अपने हिस्से से खुश नहीं था,इसलिए उस फ़ेल को अपने पास पेंडिंग रख लिया।

उस टाइपिस्ट के खिलाफ रिश्वतखोरी का आरोप सिद्ध नहीं होने के कारण उसके खिलाफसमुचित कार्यवाही नहीं कि जा सकी। और उसको भ्रष्टाचार के कदाचार के अंतर्गत सजा मिलने के बजाय “कार्य कि उपेक्षा/अवहेलना” की साधारण सजा मिली। सरकार के सभी विभागों में इस तरह का संस्थागत भ्रष्टाचार व्याप्त हैं। कौन उसे उखाड़ना चाहेगा? जब सभी को अपना-अपना हिस्सा मिल जाता हैं तो कौन निरासक्त भाव से निर्मोही होकर पैसों का परित्याग करेगा? घर आती हुई लक्ष्मी को ठुकराने के बारे में कोई सोच सकता है? मनुष्य की लालच-लोभ की प्रवृत्ति उसे भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल देती हैं,जो भ्रष्टाचार करने के अनिच्छुक है, वे धीरे-धीरे समय के साथ या तो इस ‘संस्थागत भ्रष्टाचार’ का हिस्सा बन जाते हैं या फिर उन्हें मुख्य धारा से दूर करके किसी निर्वासित वैतरणी में पटक दिया जाता है ,अपने आपको कोसने के लिए। अक्सर ऐसा भी होता है कि उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही भी की जाती है, किसी-किसी को जालसाजी के हथकंडों में फँसाने का कुप्रयास भी।

दु:ख इस बात का है कि हमारी आपकी आँखों के सामने देखते,सुनते,अनुभव करते हुए किस तरह भ्रष्टाचार रूपी सुरसा अपना बदन विस्तारित करती चली जाती है,मगर हम कुछ नहीं कर पाते। सोचने लगते है कि कब ऐसा हनुमान आएगा जो इस सुरसा का अंत कर पायेगा? इसका उत्तर समय के गर्भ में अभी भी अनुत्तरित है।

3. वाणिज्यिक कर : कामधेनु

मैंने इस अध्याय का नाम ‘कामधेनु’ इसलिए रखा कि यह एक ऐसा विभाग था, जिसमें लोग अंधाधुंध पैसा बना रहे थे।

सन् 1975 की शुरूआत में, मैं डिप्टी कमिश्नर (कॉर्मशियल टैक्सेज) बना। मेरे प्रभार में चित्तुर और कडप्पा जिले शामिल थे। चित्तुर जिले की सीमाएं तमिलनाडु और कर्नाटक से लगती है। आंध्रप्रदेश के वाणिज्यिक कर विभाग ने अंतर-राज्यीय सीमाओं पर चेक पोस्ट खोल रखे थे। ये चेक पोस्ट भ्रष्टाचारियों के लिए कामधेनु का वरदान समझी जाती थी, इसलिए मैं अक्सर उनका औचक निरीक्षण करता था। ऐसे ही एक औचक निरीक्षण में मैंने देखा कि उस चेक पोस्ट से बहुत सारी शराब से लदी हुई ट्रकें जा रही थी। यह चेक-पोस्ट तमिलनाडु की सीमा पर बना हुआ था। जब मैंने वहाँ का रिकार्ड देखा तो पता चला कि पांडिचेरी से शराब लादकर वे ट्रकें उस चेक पोस्ट से होते हुए यानम जा रही थी। कहाँ पांडिचेरी, कहाँ चित्तुर? पांडिचेरी के रास्ते में चित्तुर सीधा नहीं पड़ता था। कुछ तो गड़बड जरूर थी। यानम एक छोटा-सा गाँव है।अगर वहाँ का हर आदमी पानी की जगह शराब पीता हो तो भी इतनी शराब की खपत वहाँ होना असंभव था। दाल में कुछ तो काला जरूर था।

इस कालेपन को उजागर करने के लिए मैंने अपनी रणनीति बनानी शुरू की, पांडिचेरी से आने वाली शराब की प्रत्येक खेप पर नजर रखने के लिए एसिस्टेंट कॉमर्शियल टैक्स ऑफिसर को अपने निर्देश दिए।अगली बार कोई भी शराब का ट्रक इस चेक पोस्ट से गुजरे तो उसका पीछा कीजिए। जहां भी वह ट्रक अनलोड होता है,मुझे तत्काल खबर करें। तीन-चार दिन बाद ही आधी रात को मुझे खबर मिली,"सर, यानम जाने वाली खेप चित्तुर में खाली की जा रही है।’’

मैं स्वयं टाऊन पुलिस स्टेशन से स्टेशन हाऊस ऑफिसर और दो कांस्टेबलों को लेकर अंनलोडिंग साइट पर पहुँचा और देखा कि ट्रक खाली की जा चुकी थी। कुछ लोग शराब की पेटियों को पगडंडी से पास के किसी गोदाम में ले जा रहे थे। मैंने वह गोदाम सील करवा दिया। दूसरे दिन मैंने छानबीन शुरू की। चित्तुर के चेक पोस्ट से पार हुए शराब के सारे कंसाइनमेंटों की सालभर की लिस्ट मैंने मंगवाई।इस लिस्ट के साथ मैंने एक अधिकारी को ईस्ट गोदावरी डिस्ट्रिक्ट के यानम बार्डर पर बनी इंटरस्टेट चेक-पोस्ट के रिकॉर्डों से सत्यापन करने के आदेश दिए। उस अधिकारी ने सत्यापन के बाद बताया कि लिस्ट में लिखी गई कोई भी शराब की खेप यानम बार्डर से पार ही नहीँ हुई है। अब साफ हो गया था, यानम के नाम पर ट्रक वालों ने झूठे चालान कटवाए हैं। एक्साइज ड्यूटी और सेल-टैक्स की चोरी के लिए यह सब किया जा रहा था,अर्थात् पांडिचेरी की शराब आंध्रप्रदेश के विभिन्न जिलों में बेची जा रही थी।

अब आंध्रप्रदेश में शराब कहाँ-कहाँ बेची जा रही थी, इसका पता लगाना असंभव था।किन्तु पांडिचेरी के किन-किन शराब विक्रेताओं से शराब आंध्रप्रदेश में आ रही थी, यह मालूम करना सहज था। कानून के अनुसार इन विक्रेताओं को आंध्रप्रदेश में ‘‘कैजुअल ट्रेडर’’ माना जा सकता था।

पूरे मामले की तहक़ीक़ात करने के लिए मैं स्वयं पांडिचेरी गया। पांडिचेरी पहुँचकर मैं सीधे वहाँ के मुख्य सचिव श्री एम. पार्थसारथी से मिला और मैंने उनसे आंध्रप्रदेश के इस मामले की तहक़ीक़ात में सहयोग का अनुरोध किया। श्री एम. पार्थसारथी असम कैडर के साफ छवि वाले आईएएस अधिकारी थे।बातचीत से मुझे लगा कि इस मामले में मुझे पांडिचेरी सरकार से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि पांडिचेरी में शराब व्यवसाय राजस्व का मुख्य साधन था। आंध्रप्रदेश और पांडिचेरी में टैक्स रेट में बहुत ज्यादा अंतर होने के कारण यह अवैध कारोबार पनप रहा था।

जैसा कि मैंने पहले बताया कि उन ट्रेडर्स पर, जिनके व्यापार के लिए आंध्रप्रदेश में कोई रजिस्टर्ड जगह नहीँ थी,मगर वे दूसरी जगह से आंध्रप्रदेश में अपना सामान बेचने के लिए लात थे, उन्हें केजुअल ट्रेडर्स मानकर उन पर सेल्स-टैक्स लगाया जा सकता था। इसलिए मैंने चित्तुर चुंगी-नाका के रिकॉर्ड के आधार पर पांडिचेरी के उन ट्रेडरों का टैक्स असैसमेंट करने के लिए ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर दिया। इस नोटिस के खिलाफ ट्रेडरों ने मद्रास हाइकोर्ट में पीटिशन दायर की। मद्रास हाइकोर्ट की सिंगल जज ने उस शो-कॉज पर स्टे दे दिया। बहुत मेहनत के बाद मैंने वह स्टे ऑर्डर हटवाया, तो फिर उन ट्रेडरों ने दो न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष अपील दायर की। इस पीठ ने फिर से स्टे ऑर्डर जारी कर दिया।

आठ साल बाद मैं एक बार फिर से वाणिज्यिक कर विभाग में उच्च पद पर पदासीन हुआ, मैंने देखा कि तब तक वह स्टे वैसे ही लगा हुआ ही था।यह है हमारी न्याय व्यवस्था! जब कोई अधिकारी किसी घोटाले को उजागर कर अपने राज्य की मदद करना चाहते हों, तो न्याय-तंत्र सही तथ्यों को जानने की कोशिश किए बगैर उस पर स्टे दे देता हैं। कई साल लग जाते हैं उस स्टे को हटवाने में, और अवैध व्यापार सबकी आँखों के सामने फलता-फूलता नजर आता हैं। ऐसे केसों के निपटान में अधिक विलम्ब होने के कारण राज्य के राजस्व की अत्यधिक क्षति होती है।

मगर किसे परवाह है? न सरकार को, न ही न्याय-तंत्र को? किसका दिल दु:खता है? केवल जागरूक नागरिक का अथवा जागरूक अधिकारी का? मगर दोनों की अपनी सीमाएँ निर्धारित होती हैं इस वजह से विकराल भ्रष्टाचार की अग्नि-विभीषिका सभी को भस्मीभूत करते हुए आगे बढ़ती चली जाती है।

हालांकि मद्रास हाइकोर्ट के आदेश के कारण मैं विगत वर्ष का टैक्स वसूल तो नहीँ कर पाया, मगर पांडिचेरी से अवैध शराब का वितरण बंद होने के कारण आंध्रप्रदेश में शराब व्यवसाय से राजस्व बढ़ने लगा। इस रैकेट का किंग-पिन कांग्रेस के एक सीनियर लीडर थे। वे मेरा ट्रांसफर करवाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री वेंगलराव के पास पहुँचे। यह बात मुझे मुख्यमंत्री के निजी सचिव श्री प्रकाशराव ने बताई थी और कहा कि श्री वेंगलराव ने उस नेता की इस अनावश्यक मांग के लिए बहुत फटकारा। ऐसे भी कुछ मुख्यमंत्री हुआ करते थे जो स्वयं राजनैतिक दबाव सहनकर ईमानदार और स्वाभिमान अधिकारियों की रक्षा करते थे।

मेरा दूसरा कार्यकाल शुरू होता हैं इसी विभाग में दूसरे रूप में। श्री के.चक्रवर्ती की नई बनी इनफोर्समेंट विंग के ज्वाइंट कमिश्नर के पद पर इस बार मेरी पोस्टिंग हुई थी। श्री चक्रवर्ती वाणिज्यिक-कर के कमिश्नर थे और मैं उनका सहयोगी। बाद में श्री चक्रवर्ती ने आईएएस के पद से त्यागपत्र देकर श्री साईं इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन में रजिस्ट्रार के पद पर जॉइन कर लिया। इंफोर्समेंट विंग का मुख्य उद्देश्य खुफिया जानकारी इकट्ठा करना, संदिग्ध जगहों का मुआइना करना, संबंधित सामग्रियों का अध्ययन कर काले कारोबारों वाले बिजनेस परिसरों में मुस्तैदी से छापा मारना था। कमिश्नर श्री के. चक्रवर्ती ने मुझे मेरी मनपसंद के अधिकारियों को इस विंग में शामिल करने की अनुमति प्रदान की। मैं जानता था वाणिज्यक-कर विभाग में शत-प्रतिशत सत्य निष्ठा वाले अधिकारियों को पाना बहुत मुश्किल था, क्योंकि इस विभाग में भ्रष्टाचार पूरी तरह से सुनियोजित एवं संस्थागत ढाँचे का रूप ले चुका था। टैक्स के वार्षिक आंकलन के समय मुहमांगी रिश्वत देना एक आम बात थी। ईमानदारी की परिभाषा यहाँ बदल चुकी थी। जो अधिकारी अपने हिस्से की रकम से संतुष्ट हो जाता हो और अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर जबरदस्ती वसूली नहीँ करता हो, वह अधिकारी ईमानदार की श्रेणी में गिना जाता हैं। किस प्रकार से हमारे समाज ने अपने स्वार्थ के निहित कारणों से रिश्वत को अपरोक्ष रूप से मान्यता दे दी हैं। ईमानदारों की व्यापक परिभाषा में संस्थागत रिश्वतखोरों की सिंडीकेट भी शामिल कर दी गई हैं।ऐसी अवस्था में इनफोर्समेंट विंग के लिए ईमानदार अधिकारियों का चयन करना काफी मुश्किल काम था। मैंने मेरे बैचमेट श्री एम.सी. महापात्र से इस मामले में मदद ली। वे कमिश्नर के सेक्रेटरी थे। उनसे व्यक्तिगत पूछताछ, अधिकारियों के गुप्त प्रतिवेदनों की जाँच के आधार पर मैंने एक तालिका बनाई।और उसे आधार बनाकर नई विंग का गठन किया। देखते-देखते उस विंग ने ईमानदारी, दक्षता और उत्साह पूर्वक काम करते हुए एक विशिष्ट ख्याति अर्जित की। यह विंग किसी जगह मुआइना करने तथा छापा मारने से पूर्व अनेक खुफिया जानकारियाँ लेती थी,आँकड़ों की जाँच करती थी और व्यापार-पद्धति की विस्तृत जानकारी के बाद अति सावधानी पूर्वक अपनी गोपनीय योजना बनाती थी।

एक और घटना उदाहरणीय है, जो यह दर्शाती हैं कि राजनैतिक, प्रशासनिक और सामाजिक वातावरण किस तरह किसी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर टैक्स-चोरी और कालेधन के संग्रह हेतु प्रेरित करता हैं। हैदराबाद का बेगम-बाजार अनाज, दाल और मसालों का मुख्य थोक बाजार हैं। हमारी विंग को गहन अध्ययन के बाद यह पता चला कि यहाँ पर इन सामग्रियों पर टैक्स की बहुत चोरी होती थी। अतः हमने इस क्षेत्र के कुछ बड़े व्यापारियों पर छापा मारा। छानबीन के बाद यह पता चला कि इन वस्तुओं पर बड़ी मात्रा में टैक्स चोरी किए जाने का हमारा संदेह बिलकुल सही था।

कुछ दिनों के बाद श्री किमती नामक एक बुजुर्ग अपने पुत्र की तरफ से मुझसे मिलने आए। उनके पुत्र दलहन का बडे व्यापारी थे। किमती ने यह स्वीकार किया कि हमारे टैक्स का आकलन और मांग सही थी। फिर भी शायद वह मुझे सिखाना चाहते थे कि अनाज व दालों का व्यापार कैसे किया जाता है। वह बोले, ‘‘मैं एक थोक विक्रेता हूँ। आजकल अनाज का व्यापार ईमानदारी से करते हुए पूरे टैक्स का भुगतान करना किसी लिए भी संभव नहीँ है। एक बैग पर मुनाफा मिलता है 2 रुपए। जबकि सेल टैक्स देना पड़ता है 20 रुपए। जब तक हरेक आदमी कानून के हिसाब से व्यापार नहीँ करता हैं तो किसी भी अकेले व्यक्ति विशेष के लिए पूरा टैक्स अदा करते हुए व्यापार करना संभव नहीँ है।’’

थोड़ा रुककर फिर बोले,‘‘जो टैक्स सरकार को अदा नहीँ किया जाता है, वह सारा व्यापारी के लिए मुनाफा नहीं हो जाता।अधिकतर ग्राहक बिना बिल के सामान खरीदना चाहते हैं ताकि टैक्स नहीं भर्ना पड़े।टैक्स चोरी का काफी हिस्सा सेल-टैक्स, इन्कम-टैक्स,सिविल सप्लाई,म्यूनसिपल कार्पोरेशन,पुलिस आदि के अधिकारियों को रिश्वत देने में खर्च हो जाता है ,अगर उनकी मांग पूरी नहीं की जाती है तो वे लोग सामान्य गलती को भी बढ़ा-चढ़ाकर जटिल बना देते हैं। इसके अतिरिक्त,कुछ गुंडा लोग और राजनेताओं को भी खुश रखना पड़ता है। सरकार के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे वे व्यापारियों को इन परेशानियों से बचा सके।एक व्यापारी लागातार इन तत्वों से लड़ाई करते हुए व्यापार में अपना अस्तित्व बचाए रख सकता है ? इसका आसान और शायद एक ही विकल्प है सिस्टम के साथ व्यापारी का समझौता करना और अपने फायदे के लिए इसका उपयोग करना।”

अपने झोले में से उन्होंने अखबार की कुछ कतरने निकाली और मेरे सामने रख दी। इन कतरनों पर सीमेंट स्कैंडल के बारे में लिखा हुआ था। तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री ए.आर. अंतुले से जुड़ा हुआ था वह मसला।

प्रश्न भरी निगाहों से मेरी तरफ देखते हुए वह पूछने लगा, ‘‘अब आप ही बताइए, एक छोटा व्यापारी घोर भ्रष्टाचार के वातावरण में ईमानदारी से अपना व्यापार करते हुए अपने टैक्स का भुगतान कर सकता है? जहाँ एक मुख्यमंत्री इतने बड़े भ्रष्टाचार में शामिल हो और उसके बावजूद भी प्रधानमंत्री उसका बाल भी बाँका नहीँ कर पा रहे हों, तो हमारे जैसे छोटे व्यापारियों की क्या औकात जो बड़े-बड़े मव्वालियों से... ... ... ..."

किमती के इस वक्तव्य ने मुझे भीतर से हिला दिया। मुझे लगा कि टैक्स-चोरी जटिल सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक समस्या है, जिसका हल मुआइना करना या छापा मारना नहीँ हो सकता है।उनके तर्कों से पूरी तरह सहमत होते हुए मैंने कहा कि रत्ती-भर भी मुझे इस बात में संदेह नहीँ है कि मैं अकेला टैक्स-चोरी को पूरी तरह या आंशिक रूप से रोक सकूँ। मगर इनर्फोसमेंट ऑफिसर होने के नाते मेरा एक कर्तव्य बनता है कि मैं जब तक इस कार्यालय का प्रभारी हूँ तब तक इसे रोकने के लिए भरसक प्रयास करूंगा। आपकी बातों में वजन होने के बावजूद भी टैक्स तो भरना ही पड़ेगा। मैं केवल पेनल्टी को पाँच गुणा से घटाकर एक गुना कर सकता हूँ, जो कि मेरे अधिकार क्षेत्र में हैं।’’

टैक्स चोरी करना वास्तव में आय बढ़ाने की अमिट भूख का परिणाम ही नहीँ है। यह दूसरी बात है टैक्स चोरी करने में लालच एक महत्त्वपूर्ण घटक है। एक व्यक्ति के अपने नियंत्रण से परे अनेक ऐसे जटिल कारण हैं जिसके कारण वह टैक्स चोरी करने पर विवश हो जाता है। अगर किसी देश की राजनैतिक प्रणाली काले धन पर निर्भर करती है, तो राजनेताओं की गिद्ध-दृष्टि उद्योग और व्यापार जगत से काला धन पैदा करने में लगी रहेगी। अगर ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार पूरी तरह व्याप्त होगा। तो वैधानिक क्लीयरेंस और अन्य सेवाओं को प्राप्त करने के लिए काले धन की आवश्यकता पड़ेगी। अगर टैक्स चोरी चारों तरफ फैली हुई होगी तो असमान प्रतिस्पर्धा की वजह से ईमानदार व्यक्ति व्यापार में टिक नहीँ सकता और कालाबाज़ारी बढ़ेगी।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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