गुरुवार, 31 अगस्त 2017

लाल पान की बेगम - फणीश्वर नाथ रेणु

संजुलता साहू की कलाकृति

दृश्य:- 1

बिरजू:- माँ, एक शकरकंद खाने को दो ना।

माँ: - एक दो तमाचा मारती है

ले ले शकरकंद और कितना शकरकंद लेगा?

बिरजू मार खाकर आँगन में लोट रहा है, सारा शरीर मिट्टी से गंदा हो रहा है।

माँः- चँपिया के सिर भी चुड़ैल मंडरा रही है, आध आँगन धूप रहते जो गई है सहुआइन की दुकान छोवा गुड़ लाने, सो अभी तक नहीं लौटी, दीया बाती की बेला हो गई। आए आज लौट के जरा।

बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह रहकर कूद फाँद कर रहा था, बिरजू की माँ बागड़ पर मन का गुस्सा ढ़ूँढ़कर निकाल चुकी थी, पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ। बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा। बागड़ को मारने के लिए वह मिट्टी का छोटा ढेला उठा चुकी थी।

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मखनी फुआ:- क्यों, बिरजू की माँ , नाच देखने नहीं जाएगी क्या?

माँ:- बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया हो तब न फुआ।

गरम गुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई और बिरजू की मां ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया। बिरजू ने लेटे ही लेटे बागड़ को एक डंडा लगा दिया।

माँ:-ठहर तेरे बप्पा ने बड़ा हथछुट्टा बना दिया है तुझे। बड़ा हाथ चलता है लोगों पर ठहर।

मखनी फुआ:- पनभरनियों से जरा देखो तो इस बिरजू की मां को! चर मन पाट का पैसा क्या हुआ है? धरती पर पाँव नहीं पड़ते! इनसाफ करो! खुद अपने मुँह से आठ दिन पहले सक ही गाँव के अली गली में कहती फिरी है, हाँ, इस बार बिरजू के बप्पा ने कहा है, बैलगाड़ी पर बिठाकर बलरामपुर का नाच दिखा लाउँगा, बैल अपने घर है , तो हजार गाड़ी मँगनी मिल जाएगी। सो मैंने अभी टोक दिया, नाच देखनेवाली सब तो औन पौन कर तैयार हो रही है, रसोई पानी कर रही है। मेरे मुँह में आग लगे, क्यों मैं टोकने गई! सुनती हो , क्या जवाब दिया बिरजू की माँ ने?

अर- र्रे - हाँ - हाँ! बि-र - रज्जू की मैं--या के आगे नाथ औ- र्र पीछे पगहिया न हो, तब्ब ना - आ - आ।

जंगी की पुतोहूः- फुआ - आ ! सरवे सित्तलमिंटी के हाकिम के बासा पर फूल छाप किनारीवाली साड़ी पहन के यदि तू भी भंटा की भेटी चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दु-तीन बीघा धनहर जमीन का परचा कट जाता! फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोनाबंग पाट होता, जोड़ा बैल खरीदता! फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ों पगहिया झूलती।

सूत्रधारः- जंगी की पुतोहू मुँहजोर है। रेलवे स्टेषन के पास की लड़की है।

तीन महीने हुए गौने की नई बहू होकर आई है और सारे कुर्मा टोली की सभी झगड़ालू सासों से एक आध मोरचा ले चुकी है,। उसकी ससुर जंगी दागी चोर है, सी किलासी है। उसका खसम रंगी कुर्मा टोली का नामी लठैत । इसीलिए हमेशा सींग खुजाती फिरती है जंगी की पुतोहू।

माँः- अरी चंपिया-या-या, आज लौटे तो मुड़ी मरोड़कर चूल्हे में झोंकती हूँ। दिन रात बेचाल होती जाती है। गाँव में तो अब ठेठर-बैसकोप का गीत गाने वाली पतुरिया पुतोहू सब आने लगी है। कहीं बैठके बाजे न मुरलिया सीख रही होगी ह-र-जा-ई-ई। अरी चंपि-या-या-या।

जंगी की पतोहूः- कमर में घड़ा संभालती है चल ददिया चल! इस मोहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है। नहीं जानती , दोपहर दिन और चैपहर रात बिजली की बत्ती भक भक कर जलती है।

सभी हँसती हैं।

मखनी फुआ:- शैतान की नानी।

सूत्रधारः- बिरजू की मां की आँखों पर मानो किसी ने तेज टॉर्च की रोषनी डालकर चैंधिया दिया। भक् भक् बिजली बत्ती। तीन साल पहले सर्वे कैंप के बाद गाँव की जलन डाही औरतों ने एक कहानी गढ़ के फैलाई थी। चंपिया के माँ आँगन में रात भर बिजली बत्ती भुक भुकाती थी। चंपिया की माँ आँगन में नाक वाले जूते की छाप, घोड़े की टाप की तरह। ----जलो , जलो! और जलो! चंपिया की माँ के आँगन में चाँदी जैसे पाट सूखते देखकर जलने वाली सब खलिहान पर सोनोली औरतें धान के बोझों को देखकर बैंगन का भुरता हो जाएँगी।

चंपिया गुड़ को चाटती हुई आती है, माँ तमाचा मारती है

चंपिया:- मुझे क्यों मारती है ए -ए- ए! स्हुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है- एँ-एँ-एँ।

माँ:- सहुआइन जल्दी सौदा नहीं देती की नानी,! एक सहुआइन की दुकान पर मोती झरते हैं, जो जड़ गाड़कर बैठी हुई थी। बोल, गले पर लात देकर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो कभी बाजे न मुरलिया गाते सुना! चाल सीखने जाती है, टीशन की छोकरियों से।

बिरजू:- ए मैया ,एक उँगली गुड़ दे दे, दे न मैया एक रत्ती भर।

माँः- एक रत्ती क्यों! उठाके बरतन को फेंक आती हूँ पिछवाड़े में, जाके चाटना। नहीं बनेगी मीठी रोटी। मीठी रोटी खाने का मन होता है।

उबले शकरकंद का सूप रोती हुई चंपिया के सामने रखते हुए

बैठ के छिलके उतार, नहीं तो अभी!

चंपिया:- मन ही मन माँ गालियाँ देगी पाँव फेलाकर क्यों बैठी है बेलज्जो।

बिरजू:- मैया मैं भी बैठकर शकरकंद छीलूँ?

माँ:- नहीं! एक शकरकंद छीलेगा और तीन पेट में। जाके सिद्धू की बहू से कहो, एक घंअे के लिए कड़ाही माँगकर ले गई तो फिर लौटाने का नाम नहीं। जा जल्दी।

चंपिया माँ से नजर बचाकर एक शकरकंद बिरजू की ओर फेंक देती है, बिरजू जाता है।

माँ:- सूरज भगवान डूब गए। दीया-बत्ती का बेला हो गई। अभी तक गाड़ी---।

चंपियाः- कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मैया। बप्पा बोले , मां से कहना, सब ठीक ठीक करके तैयार रहे। मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ।

माँ:- कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी मँगनी नहीं दी, तब मिल चुकी गाड़ी ! जब अपने गाँव के लोगों की आँखों में पानी नहीं तो मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी का क्या भरोसा! न तीन में, न तेरह में! क्या होगा शकरकंद छीलकर! रख दे उठाके।-- यह मर्द नाच दिखाएगा। बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच दिखाने ले जाएगा। चढ़ चुकी बैलगाड़ी पर, देख चुकी जी भर नाच----। पैदल जानेवाली सब पहुँचकर पुरानी हो चुकी होंगी।

बिरजूः- कड़ाही को सिर पर रखकर देख दिदिया, मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने से भी कुछ नहीं होता।

चंपिया:- चुप

माँ:- बागड़ को भगाती हुई कल ही तुझे पंचकौड़ी कसाई के हवाले करती हूँ राक्षस तुझे। हर चीज में मुँह लगाएगा। चंपिया, बाँध दे बगड़ा को। खोल दे गले की घंटी। हमेशा टुनुर टुनुर। मुझे जरा नहीं सुहाता है।

बिरजू:- झुनुर झुनुर बैलों की झुनकी, तुमने सु---।

चंपिया:- बागड़ के गले की झुनकी खेलते हुए बेसी बक बक मत करो।

माँ:- चंपिया ! डाल दे चुल्हे में पानी! बप्पा आए तो कहना कि अपने उड़नजहाज पर चढ़कर नाच देखने आएँ! मुझे नाच देखने का शौक नहीं! मुझे जगाइयो मत कोई! मेरा माथा दुःख रहा है।

बिरजूः- क्यों कर दी, नाच में उड़नजहाज भी उड़ेगा?

चंपिया:- इशारे से कहती है, चुप चाप रह मुफ्त में मार खाएगा बेचारा।

बिरजू:- चुपचाप, हम लोग नाच देखने नहीं जाएँगे? गाँव में ऐ पंछी भी नहीं है। सब चले गए।

चंपियाः- पलकों में आँसू आता है एक महीने पहले ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी, चंपिया छींट की साड़ी पहनेगी, बिरजू पेंट पहनेगा, बैलगाड़ी पर चढ़कर---।

बिरजूः- गाछ का सबसे पहला बैंगन जिन बाबा आप पर चढ़ाउँगा, जल्दी से गाड़ी लेकर भेज दो जिन बाबा।

माँ:- उँह पहले से किसी बात का मंसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को। भगवान ने मंसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना है, यह किस बात का फल दे रहे हो भोले बाबा। अपने जीते उसने किसी देवता- पित्तर की मान-मनौती बाकी नहीं रखी।सर्वे के समय जमीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थीं----। ठीक ही तो! म्हावीर जी का सेट तो बाकी ही है। हाय रे देव--! भूल चुक माफ करो बाबा! मनौती दुनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ। चोरी चमारी करने वाली की बेटी जलेगी नहीं। पाँच बीघा जमीन क्या हासिल की है बिरजू के बप्पा ने, गाँव की भाईखौकियों की आँखों में किरकिरी पड़ गई है। खेत में पाट लगा देखकर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी, धरती फोड़कर पाट लगा है, बैशाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे हैं पाट के पौधे!तो अलान तो फलान। इतनी आँखों की धार भला फसल सहे। जहाँ पंद्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ दसमन पाट कटा।पर तौल के ओजन हुई रब्बी भगत के यहाँ।

इसमें जलने की क्या बात है भला! बिरजू की बप्पा ने तो पहले ही कुर्मा टोली के एक एक आदमी को समझा के कहा था, जिनदगी भर मजदूरी करते रह जाओगे, सर्वे का समय आ रहा है। लाठी कड़ी करो तो दो चार बीघे जमीन हासिल कर सकते हो। सो गाँव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबू साहेब के खिलाफ खाँसा भी नहीं। बिरजू की बप्पा को कम सहना पड़ा है, बाबू साहेब गुससे से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गए। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया। आखिर बाबू साहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। मुझे मौसी कहके पुकारा, यह जमीन बाबूजी ने मेरे नाम से खरीदी थी। मेरी पढ़ाई्र लिखाई उसी जमीन की उपज से चलती है। और भी कितनी बातें। खूब मोहना जानता है उत्ता जरा सा लड़का। जमीदार का बेटा है कि ------- चंपिया बिरजू सो गया क्या? यहाँ आ जा बिरजू अंदर। तू भी आ जा चंपिया। भला आदमी आए तो एक बार आज।

दोनों आते हैं

माँः- ढिबरी बुझा दे --- बप्पा बुलाएँ तो जवाब मत देना, खपच्ची गिरा दे। भला आदमी रे, भला आदमी। मुँह देखो जरा इस मर्द का। बिरजू की माँ दिन रात मंझा न देती रहती तो ले चुके थे जमीन। रोज आकर माथा पकड़ के बैठ जाएँ, मुझे जमीन नहीं लेनी है बिरजू की माँ, मजूरी ही अच्छी। छोड़ दो जब तुम्हारा कलेजा ही थिर नहीं होता है तो क्या होगा । जोरू जमीन जोर के, नहीं तो किसी और के।

बिरजू के बाप पर बहुत तेजी से गुस्सा चढ़ता है। चढ़ता ही जाता है। बिरजू की माँ का भाग ही खराब है।जो ऐसा गोबरगनेश घरवाला उसे मिला। कौन सा सौख मौज दिया है उसके मर्द ने । कोल्हू के बैल की तरह खटकर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ। कभी एक पैसे की जलेबी भी लाकर दी है उसके खसम ने। पाट के दाम भगत के से लेकर बाहर ही बाहर बैल हट्टा चले गये।बिरजू की मां को एक बार नमरी लोट देखने भी नहीं दिया आँख से---। बैल खरीद लाए। उसी दिन गाँव में ढिढोंरा पीटने लगे, बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़कर जाएगी नाच देखने। दूसरे की गाड़ी के भरोसे नाच दिखाएगा।

माँ:- अपने आप से वह खुद भी कुछ कम नहीं , उसकी जीभ में आग लगे, बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच देखने की लालसा किस कुसमय में उसके मुँह से निकली थी। भगवान जाने! फिर आज सुबह से दोपहर तक किसी न किसी बहाने अठारह बार बैलगाड़ी पर पाच देखने जाने की चर्चा छेड़ी है। लो खूब देखे नाच! वाह रे नाच! क्ािरी के नीचे दुशाला का सपना। कल भोरे पानी भरने के लिए जब जाएगी, पतली जीभ वाली पतुरिया सब हँसती आएँगी, हँसती जाएँगी। सीाी जलते हैं दससे, हाँ भगवान दाढ़ीजार भी। दो बच्चों की माँ होकर भी वह जस की तस है। उसका घरवाला उसकी बात में रहता है। वह बालों में गरी का तेल डालती है। उसकी अपनी जमीन है, है किसी के पास एक घूर जमीन भी अपनी इस गाँव में। जलेंगे नहीं , तीन बीघे में धान लगा हुआ है है, अगहनी। लोगों की बिखदीठ से बचे, तब तो।

बाहर बैलों की घंटियाँ सुनाई पड़ीं।

माँ:- अपने ही बैलों की घंटी है , क्यों री चंपिया?

चंपिया और बिरजूः- हूँ-उँ-उँ।

माँः- चुप! शायद गाड़ी भी है, घड़घड़ाती है न?

चंपिया और बिरजूः- हूँ-उँ-उँ।

माँ:- चुप! गाड़ी नहीं है,। तू चुपके से टट्टी में छेद करके देख तो आ चंपी, भाग के आ चुपके चुपके।

चंपिया:- हाँ मैया, गाड़ी भी है।

बिरजू हड़बड़ाकर उठ बैठा। मां ने उसे सुला दिया । बोले मत। चंपिया गुदड़ी के नीचे घुस गई।

बाहर बैलगाड़ी खोलने की आवाज।

बाप:- हाँ! हाँ! आ गए घर। घर आने के लिए छाती फटी जाती थी। चंपिया-ह! बैलों को घास दे दे, चंपिया-ह!

बिरजू पूरे पाँच मिनट तक खाँसता रहता है।

बापः- बिरजू! बेटा बिरजमोहन! मैया गुस्से के मारे सो गई क्या?अरे अभी तो लोग जा ही रहे हैं।

माँ:- मन ही मन नहीं देखना है नाच! लौटा दो गाड़ी।

बापः- चंपिया-ह! उठती क्यों नहीं? ले , धान की पँचसीस रख दे।

धान के बालियों को ओसारे पर रखकर

दीया बालो।

मांः- डेढ़ पहर रात को गाड़ी लाने की क्या जरूरत थी? नाच तो अब खत्म हो रहा होगा।

बाप:- नाच अभी शुरू भी नहीं हुआ होगा,। अभी अभी बलरामपुर के बाबू की कंपनी गाड़ी मोहनपुर होटल बँगला से हाकिम साहब को लाने गई है। इस साल आखिरी नाच है। पँचसीस टट्टी में खोस दे। अपने खेत का है।

माँः- अपने खेत का ? पक गए धान?

बापः- नहीं, दस दिन में अगहन चढ़ते चढ़ते लाल होकर झुक जाएँगी, सारे खेत की बालियाँ। मलदहिया टोली पर जा रहा था, अपने खेत में धान देखकर आँखे जुड़ा गईं। सच कहता हूँ, पंचसीस तोड़ते समय उँगलियाँ काँप रही थी मेरी।

बिरजू ने एक धान लेकर मुँह में डाल लिया।

माँ:- कैसा लुक्कड़ है तू रे। इन दुश्मनों के मारे कोई नेम धरम जो बचे।

बाप:- क्या हुआ! डाँटती क्यों है?

माँ:- नवान्न के पहले ही नया धान जुठा दिया, देखते नहीं?

बापः- अरे! इन लोगों का सब कुछ माफ है, चिरई चिरमुन है ये लोग।

दोनों के मुँह में नवान्न से पहले नया अन्न न पड़े।

चंपियाः- धान को दाँतों में चबाकर ओ! इतना मीठा चावल।

बिरजू:- और गमकता भी है न दिदिया?

बाप:- रोटी पोटी तैयार कर चुकी क्या?

माँः- नहीं! जने का ठीक ठिकाना नहीं और रोटी बनती है।

बापः- वाह! खूब हो तुम लोग। जिसके पास बैल है ,उसे गाड़ी मँगनी नहीं मिलेगी भला? गाड़ीवालों को भी कभी बैल की जरूरत होगी। पूछूँगा! त्ब कोयरीटोलों वालों से।--- ले जल्दी से रोटी बना ले ।

माँः- देर नहीं होगी।

बापः- अरे, टोकरी भर रोटी तो तू पलक मारते बना लेती है, पाँच रोटियाँ बनाने में कितनी देर लगेगी?

बिरजूः- मैया बेकार गुस्सा हो रही थी न।

माँः- चंपी, जरा धैलसार में खड़ी होकर मखनी फुआ को आवाज दे तो।

चंपियाः- फुआ-आ! सुनती हो फुआ! मैया बुला रही है।

मखनी फुआः- हाँ फुआ को क्यों गुहारती है? सारे टोले में बस एक फुआ ही तो बिना नाथ पगहियावाली।

माँः- अरी फुआ! डस समय बुरा मान गई थी? नाथ पगहिया वालों को आकर देखो, दोपहर रात में गाड़ी लेकर आया है। आ जाओ फुआ! मैं मीठी रोटी पकाना नहीं जानती।

मखनी फुआ:- खाँसती हुई आई इसी से घड़ी पहर दिन रहते ही कुछ पूछ रही थी कि नाच देखने जाएगी क्या? कहती तो मैं पहले से ही अपनी अँगीठी यहाँ सुलगा जाती।

माँः- घर में अनाज दाना वगैरह तो कुद है नहीं । एक बागड़ है और कुछ बरतन-बासन । सो रात भर के लिए यहाँ तंबाखू रख जाती हूँ,। अपना हुक्का ले आई हो न फुआ?

मखनी फुआः- फुआ को तंबाखू मिल जाए तो रात भर क्या पाँच रात बैठकर जाग सकती है। ओ हो हाथ खेलकर तंबाखू रखा है बिरजू की माँ ने, य वह सहुआइन, राम कहो! डस रात अफीम की गोली की तरह एक मटर भर तंबाखू रखकर चली गई गुलाब-बाग मेले और कह गई कि डिब्बा भर तंबाखू है।

बिरजू की मां चुल्हा सुलगाने लगी, चंपिया शकरकंद को मसलने लगी, बिरजू सिर पर अपने बाप को दिखलाने लगा

बिरजूः- मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने से कुछ नहीं होगा।

सभी हँसने लगे

माँः- ताखे पर तीन चार मोटे शकरकंद हैं, दे दे बिरजू को चंपिया, बेचारा शाम से ही----।

चंपियाः- बेचारा मत कहो मैया, खूब सचारा है, तुम क्या जानो, कथरी के नीचे मुंूह क्यों चल रहा था, बाबू साहब का।

बिरजूः- ही ही ही बिलैक मारटिन में पाँच शकरकंद खा लिया, हा हा हा।

सभी हँस पड़े

माँ:- एक कनवा गुड़ है। आधा दूँ फुआ?

मखनी फुआः- अरी शकरकंद तो खुद मीठा होता है, इतना क्यों डालेगी।

बैल दाना घास खाकर परस्पर देह चाटे, बिरजू की माँ तैयार हो गई, चंपिया छींट की साड़ी पहनी, बिरजू बटन के अभाव में पैंट में पटसन की डोरी बँधवाने लगा।

माँ:- उँहूँ इतनी देर तक भला पैदल चलने वाले रूके रहेंगे।

बिरजू की बप्पा बिरजू की माँ को एकटक देख रहा है। मानो नाच की लाल पान की ---------।

गाड़ी में बैठते ही बिरजू की माँ के देह में अजीब गुदगुदी लगने लगी।

माँ:- गाड़ी पर अभी बहुत जगह है, जरा दाहिनी सड़क से गाड़ी हाँकना।

बिरजूः- उड़नजहाज की तरह उड़ाओ बप्पा।

माँ:- जरा जंगी से पूछो न , उसकी पुतोहू नाच देखने चली गई क्या?

बापः- रोने की आवाज सुनकर अरे जंगी भाई काहे कन्ना रोहट हो रहा है आँगन में?

जंगी:- क्या पूछते हो , रंगी बलरामपुर से लौटा नहीं, पुतोहिया नाच देखने कैसे जाए? आसरा देखते देखते उधर गाँव की सभी औरतें चली गईं।

माँः- अरी टीशनवाली तो रोती है काहे ! आ जा झट से कपड़ा पहनकर सारी गाड़ी पड़ी हुई है। बेचारी!आ जा जल्दी।

सुनरीः- गाड़ी में जगह है ? मैं भी जाउँगी।

लरेना की बीबी भी आती है

माँः- आ जा! जे बाकी रह गई है , सब आ जाएँ जल्दी।

तीनों आती हैं बैल ने पिछला पैर फेंका।

बापः- साला! लताड़ मारकर लँगड़ी बनाएगी पुतोहू को।

सभी हँसते हैं

माँ:- रोटी देती हुई खा ले एक एक करके, सिमराहा के सरकारी कूप में पानी पी लेना। अच्छा अब एक बैसकोप का गीत तो गा तो चंपिया। डरती है काहे? जहाँ भूल जाओगी, बगल में मास्टरनी बैठी ही है।

बाप:- चल भैया ! और जरा जोर से! ग रे चंपिया , नही ंतो मैं बैलों को धीरे धीरे चलने को कहूँगा।

चंपिया:- चंदा की चाँदनी ----------।

बिरजू की माँ जंगी की पुतोहू को देखकर सोच रही है, गौने की साड़ी से एक खास किस्म की गंध निकलती है,

माँ:- मन ही मन ठीक ही तो कहा है उसने! बिरजू की माँ बेगम है, लालपान की बेगम! यह तो कोई बुरी बात नहीं। हाँ वह सचमुच लाल पान की बेगम है।

बिरजू की माँ के मन में अब कोई लालसा नहीं। उसे नींद आ रही है।

नाट्य रूपांतरण - सीताराम पटेल

कहानी // एक लेखनी की मौत // स्वराज सेनानी

हेमराज की कलाकृति

सुधाकर अपनी पहली साहित्यिक कृति के प्रकाशन के वक्त, बच्चा पैदा होने जैसे दर्द और कष्ट के सामान अनुभवों से गुज़र रहा था । कविताओं की अपनी पहली पुस्तक प्रकाशित करने की एक अजीब धुन सवार थी। उसे ज़रा भी आइडिया नहीं था कि ये सब कुछ कैसे होगा।

हमेशा की तरह उस ने प्रकाशन पर पैसे बचाने के आर्थिक विकल्प की जगह, बिना परेशानी वाला विकल्प, जो लेखकों को डिजाइन, विपणन और वितरण के लिए सलाह सहित कई विशेष सुविधाएं प्रदान करने वाले महंगे विकल्प को चुनने का दांव खेल डाला । वह प्रिंट में अपनी पुस्तक की कल्पना भी मुश्किल से कर पा रहा था ।

अनेक कठिनाई के साथ जब काम शुरू किया तो केवल 65 पृष्ठों लायक सामग्री ही उस के पास थी लेकिन फिर न जाने कैसे सिर्फ अगले 15 दिनों में 144 पृष्ठों की पुस्तक की सामग्री एकत्र हो गई । उसे बहुत यकीन नहीं था कि वह किसी को अपनी संग्रह के प्राक्कथन के लिए अनुरोध करेगा और कोई आसानी से तैयार भी हो जायेगा । अपने फेस बुक के मित्रों की सूची में से उनकी काव्य योग्यता और सराहनाओं के मद्दे नज़र, कई नाम उसके दिमाग में आये और जैसे तैसे उस के एक मित्र ने उस की मदद करने और ये जोखिम लेने का हौसला कर डाला । समय को गंवाए बगैर एक टेम्पलेट प्रस्तावना उस ने लिख कर भेज दिया। अब वह प्रस्तावना और उनकी प्रतिक्रियाओं का बहुत उत्सुकता से इंतज़ार कर रहा था ।

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जिन से उम्मीद की थी प्रस्तावना लिखने की उन की प्रतिक्रिया ने और थोड़ा मामले को उलझा दिया । उन का ख़याल था कि उन की काबिलियत इस क्षेत्र में नहीं है और इस कारण वह सहज महसूस नहीं कर पा रहे थे । उन्होंने एक बार फिर कोशिश की इस असहज प्रस्ताव से अपने आप को मुक्त करलें लेकिन सुधाकर ने उन्हें आसानी से जाने नहीं दिया । उन का कहना था कि “ मैं आपकी कविताओं की सराहना करता रहा हूँ , लेकिन मैं एक तरह से एक प्रस्तावना लिखने के लिए अपने आप को सर्वथा अयोग्य समझता हूँ “। वास्तव में यह एक महान सम्मान की बात है लेकिन फिर भी मैं अपने आप को इस योग्य नहीं समझता हूँ और पशोपेश में पाता हूँ” । बड़ी कठिनाई के साथ यह मसला सुलझा वैसे भी सुधाकर बाक़ी की सारी तैयारी कर चुका था और शीघ्र ही उन्हें पांडुलिपि प्रकाशक को भेजनी थी अगर प्रस्तावना लिखने वाला कोई नहीं होता तो किसी अन्य को राजी करने में और भी वक्त लगता और दरअसल वक्त ही तो सुधाकर के पास नहीं था । अब सुधाकर का धैर्य जवाब देने वाला था। वह चाहता था जैसे - तैसे किताब प्रकाशक तक पहुँच जाए ताकि आगे के कार्य सम्पादित किये जा सकें । वह अब इस से कम और अधिक कुछ भी नहीं चाहता था।

स्काईप का उपयोग कर वर्तनी की अशुद्धियों को दुरुस्त किया गया और कुछ वाक्यों में रद्दोबदल भी किए गए और प्रस्तावना के स्वरूप पर सहमति हो गई । वह दिन भी आ गया जब पांडुलिपि प्रकाशक को भेज दी गई ।

सुधाकर को तैयार पांडुलिपि पर सभी प्रकार का संदेह था; सामग्री प्रकाशन के योग्य थी भी कि नहीं? या वह एक भावनात्मक मूर्ख तो नहीं बन रहा है जो अपने परिवार और विरासत के बारे में बहुत ज्यादा सोच रहा था। जब कि इन दिनों कोई भी लोग अपने अतीत, माता-पिता और परिवार के इतिहास के बारे में ज्यादा भावनात्मक नहीं होते हैं। अब तो केवल पैसे से सभी का जुड़ाव है । पैसा लगा कर , अपने पैसे की वापसी तथा परिवार की महिमा, प्रतिष्ठा बहाल करने की कोशिश तथा परिवार के सदस्यों में भावनात्मक जुड़ाव की उम्मीद कोई भावनात्मक मूर्ख ही कर सकता था और उस ने यह जोखिम ले डाला था । पांडुलिपि भेजने के बाद बहुत मुश्किल समय था, कम नींद आती थी और रातें करवटों में कट जाती थीं. वह दिन भी आ गया जब उस ने कई बार मोल भाव करने के बाद किताब की छपाई से पहले प्रकाशक को भुगतान की अंतिम किस्त अंततः भेज दी ।

कल किताब प्रेस में चली जायेगी और उस के बाद यह वेब पर होगी और हर जगह लोग स्टालों पर उसे देखेंगे , दूर से देखेंगे, हाथ में लेकर पुस्तक का ब्लर्ब और लेखक का बायो पढेंगे और न जाने उन की क्या प्रतिक्रिया होगी। उसका दिल इन सवालों से भरा हुआ था और नींद का आंखों में कहीं दूर तक पता नहीं था। वह रात भर नींद के क्षणों के अलावा करवटें बदलता रहा । पुस्तक के बारे में उस की चिंता और उस की किस्मत सब शक के दायरे में थे । यहाँ मसला सिर्फ किताब का नहीं था लेकिन किताब के रूप में अगर अपने पूरे जीवन की विश्वसनीयता और उसकी साख दांव पर लगी हुई थी।

इन भावों में डूबते उतारते न जाने कब उस की आँख लग गई।

उसने अपने आप को पानी के एक पूल में पाया और देखा कि वह डूब रहा था। उस ने प्रयास किया कि वह पानी से बाहर आ जाए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ जोर से धड़का और एक धमाके के साथ एक कष्टदायी दर्द सीने के एक छोर से दूसरी छोर तक जैसे उस चीर कर निकल गया। एक झटके के साथ उस की चेतना खो गई। अब वह एक भावना विहीन स्थिति में अपने शरीर से बाहर निकल रहा था। वह विचारों और भावनाओं के लिए अभेद्य हो चुका था, वह बहुत हल्का होकर अपने नश्वर शरीर से परे हवा में तैरता हुआ आकाश में विलीन हो गया ।

अब भावनात्मक और भौतिक दुनिया और अपनी पुस्तक के साथ उस के सभी संबंध समाप्त हो चुके थे । पुस्तक की रिलीज और उस के भाग्य की प्रासंगिकता भी उस के लिए खत्म हो गई थी।

---स्वराज सेनानी

नीरजा हेमेन्‍द्र की कविताएँ

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नीरजा हेमेन्‍द्र

1-     ’’ परिवर्तन शाश्‍वत्‌ है ’’


कोहरे-सी घनीभूत
होती जा रही हैं भावनायें
तुम्‍हारी स्‍मृतियों के साथ
देने लगी हैं दस्‍तक
मेरे हृदय पटल पर
जीवन की समतल.....पथरीली...पगडिडयों पर
मार्ग में अनेक ऋतुयें मिलीं
मादक वसंत......वीरान पतझड़.....
ग्रीष्‍म की तपिश में खूब झुलसीं संवेदनायें
आहत हुआ हृदय स्‍याह रातों में.....
कोहरे भरी यह रात
उतरती जा रही है मेरे भीतर
मैं जानती हूँ
देखते ही देखते अन्‍धकार भर जायेगा
मेरे भीतर.....किन्‍तु आप्‍लावित नहीं कर सकेगा मुझे
भोर की लालिमा फैलने तक
इसे मैं रखूँगी तुम्‍हारी स्‍मृतियों के साथ
नैसर्गिक है परिवर्तन......शाश्‍वत्‌ है.....।

2-  ’’ सरकंडे की जड़ें ’’


जला दी गयीं
सरकंडों की जड़ों से
फूटने लगी हैं नन्‍हीं हरी कोपलें
अनेक ऋतुयें आयीं-गयीं
अनेक मौसम बदले
धूल-धूसरित पड़े
अस्‍तित्‍वहीन जड़ों को देखकर
सभी चले गये मुँह फेर कर
आज सरकंडों से फूट पड़ी हैं
सहसा नयी कोपलें
स्‍तब्‍ध हैं विपरीत ऋतुयें
उनकी जीवन्‍तता को देखकर
लहललाते सरकंडे.......
अस्‍तित्‍व के लड़ाई में विजेता
सरकंडे.......
बारिश, तपिश, आँधियाँ, शीत
आयेंगी-जायेंगी
सरकंडे अपनी जड़े जमाते रहेंगे
गहरी.....गहरी....और गहरी
सिर उठायेंगे गर्व से
विजेता बन कर।

3-    ’’ चुनौती तुम्‍हारे अस्‍तित्‍व को ’’


उगने लगी है चेतना
मन मस्‍तिष्‍क में
मेरी पहचान....मेरा अस्‍तित्‍व
अब तक अदृश्‍य हैं मुझसे
स्‍वयं को पाने के प्रयास में
मैंने की थी तुम्‍हारी आराधना....पूजन....अर्चन....
तुम अनदेखा करते रहे मुझे
तुमने ही तो सृजित किये थे धरती पर
हृदय,  प्रेम और संवेदनायें.....
गढ़े थे विकास और सभ्‍यताओं के नये आयाम
मैं तो अब तक आदिम युग में खड़ी हूँ
असभ्‍य प्राणियों के मध्‍य
जहाँ स्‍त्री भोग्‍या है.....मात्र अंग है
बर्बर पशुओं सदृश्‍य तथाकथित पुरूषों के लिए
जिन्‍हें सद्यःजन्‍मी बेटी भी मादा दिखती है
कहाँ है तुम्‍हारी सृजित....विकसित सभ्‍यतायें
उनमें विचरते विकास पुरूष
कहाँ हो तुम....मेरे ईश्‍वर.....मेरे प्रभु.....
तुम हो भी या नही.......
मुझे मेरे अस्‍तित्‍व से परिचित कराओ
मुझे भी विकास के सोपानों से
सभ्‍यताओं की ओर ले चलो
मेरे प्रभु!
तुम भी अस्‍तित्‍व विहीन तो नही
मेरी ही भाँति......।

4-      ’’ बौद्धकालीन खंडहरों में तुम ’’


आज तुम पुनः उतर आये हो
मेरी स्‍मृतियों में
तुम्‍हारे साथ चलते-चलते
उन बौद्धकालीन खंडहरों में
मैंने पा लिया था जीवन तत्‍व
दूर-दूर तक विस्‍तृत नर्म हरी दूब पर
तुम्‍हारे साथ-साथ चलते-चलते
मैं पहुँच जाती थी
सूरजमुखी के पुष्‍पों से भरे खेतों में
युवा दिनों के मेरे सहयात्री
तुमने जब भी मेरी भावनाओं को छुआ
मैं झुकती गयी महामानव के चरणों में
तुम्‍हारी परछाईयों के साये में
मैं बनती गयी प्रतिरूप प्रेम का
उन दिनों सभी ऋतुयें
परिवर्तित हो गयी थीं वसंत में
शीत ऋत में वृक्षों से गिरते पत्‍ते
भूमि पर बिछा देते मखमली कालीन
तुम्‍हारे हाथों को थामे हुए, मैं
गुनगुनी धूप में निकल पड़ती
खूबसूरत क्षणों को अपने भीतर
आत्‍मसात्‌ कर लेने के लिए
मैं....मेरे कॉलेज के दिन...
तुम और पुस्‍तकें......
आज तुम पुनः उतर आये हो
मेरी स्‍मृतियों में...।

5-    ’’ सुबह होनी ही है ’’


अभी-अभी तो हुआ था सवेरा
भोर की लालिमा फैली थी
चारों दिशाओं में
सूर्य का रंग चटख होकर
बिखर गया है मध्‍याह्न तक
पक गये हैं
खेतों में बोये गये गेहूँ के दानें
साँझ उतरने लगी है खेतों में
खलिहानों से समेट लिये गये हैं दाने
गाँव में उठ रहा है धुआँ
पकने लगे हैं दाने
अँधेरा घिरने से पूर्व
पुनः बिखेर दिये गये दाने
खेतों में नये दानों का अंकुरण
नस्‍लें लेकर जाती हैं
पीढियां दर पीढियां आगे
भयक्रान्‍त न होना तुम कभी भी
अँधेरे से.....साँझ से....सूने खेतों से.....
तुम उठोगे और सवेरा होगा।

6-   ’’ प्रथम प्रेम का रंग ’’


वसंती हवाओं के साथ
खिल उठे हैं पुष्‍प सेंमल के
एक परिचित-सा स्‍पर्श
एक जानी पहचानी-सी आहट
बिखरने लगी है हवाओं में
अन्‍तराल पश्‍चात्‌ ये हवायें लेकर आयी हैं
कुछ विस्‍मृत-सी स्‍मृतियाँ.....
कुछ युवा दिन.....और तुम्‍हें.....
सेंमल के पुष्‍पों की भाँति
रक्‍ताभ हो उठा है
जीवन का ये वियावान मौसम
स्‍मरण हैं मुझे अब भी वो क्षण
जब समेट लिया था तुमने
मेरा प्रेम अपनी मुटि्‌ठयों में
कुछ इसी प्रकार रक्‍ताभ हो उठी थीं ऋतुयें
मेरे चारों ओर बिखर गया था
प्रेम का लाल रंग
धूप भरे पथ पर चलते-चलते
प्रेम का वो रंग
यद्यपि फीका पड़ने लगा है किन्‍तु....
मेरे प्रथम प्रेम की अभिव्‍यक्‍ति का वो रंग
कच्‍चा नही था
सूर्यास्‍त के क्षितिज को
अब भी सुनहरा कर देता है
प्रेम का वो रंग.....।
                        नीरजा हेमेन्‍द्र

--

परिचय-

जन्‍म- कुशीनगर, गोरखपुर ( उ0 प्र0 )

शिक्षा- एम.ए.( हिन्‍दी साहित्‍य ), बी.एड.।

संप्रति- शिक्षिका ( लखनऊ, उ0 प्र0 ) ।

अभिरूचियां-पठन-पाठन, लेखन, अभिनय, रंगमंच, पेन्‍टिंग, एवं सामाजिक गतिविधियों में रूचि।

प्रकाशन-

काव्‍य संग्रह - 1- ’’स्‍वप्‍न’’,

2- ’’मेघ, मानसून और मन ’’

3- ’’ भूमि और बारिश ’’

4- ’’ ढूँढ कर लाओ ज़िन्‍दगी ’’

कथा संग्रह- 1- ’’अमलतास के फूल ’’

2- ’ जी हाँ, मैं लेखिका हूँ

3- .....और एक दिन

उपन्‍यास- ’’ अपने-अपने इन्‍द्रधनुष ’’

सम्‍मान -- उत्‍तर प्रदेश हिन्‍दी संस्‍थान द्वारा प्रदत्‍त सर्जना पुरस्‍कार, विजयदेव नारायण साही नामित पुरस्‍कार। फणीश्‍वरनाथ रेणु स्‍मृति सम्‍मान। कमलेश्‍वर स्‍मृति कथा सम्‍मान । साहित्‍य में योगदान हेतु 2017 का लोकमत पुरस्‍कार माननीय मुख्‍यमंत्री उत्‍तर प्रदेश श्री योगी आदित्‍य जी महाराज के कर कमलों द्वारा।

हिन्‍दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं कथाबिंंब, कथा समय, अमर उजाला, जनसत्‍ता, वागर्थ, कादिम्‍बनी, अभिनव इमरोज, सोच विचार, नई धारा, आजकल, नेशनल दुनिया, अक्षर-पर्व, अंग चम्‍पा , किस्‍सा, सुसंभाव्‍य, जनपथ, माटी, सृजनलोक, हरिगंधा( हरियाणा साहित्‍य अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका), राष्‍ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्‍स लखनऊ, डेली न्‍यूज एक्‍टिविस्‍ट लखनऊ, साहित्‍य दर्पण, बाल वाणी (उत्‍तर प्रदेश हिन्‍दी संस्‍थान द्वारा प्रकाशित पत्रिकायें ), अपरिहार्य, शब्‍द सरिता, प्रगति, रेल रश्‍मि, इत्‍यादि में कवितायें, कहानियाँ, बाल सुलभ रचनायें एवं सम सामयिक विषयों पर लेख प्रकाशित। रचनायें आकाशवाणी व दूरदर्शन से भी प्रसारित।

संपर्क- ’’नीरजालय ’’ 510/75

न्‍यू हैदराबाद, लखनऊ- 226007

उ0प्र0

बुधवार, 30 अगस्त 2017

अजीत कौर से इंटरव्यू - वीणा भाटिया व मनोज कुमार झा

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जब तक दलित-वंचित महिलाओं का संघर्ष सामने नहीं आता तो ऊंचे तबकों की महिलाओं का फेमिनिज्म बेकार है

ये आजादी हमें आसानी से नहीं मिली है। हमने बहुत कुछ खोया है। हमने अपने बच्चों को खोया है। हमें आजादी की कीमत समझनी होगी और इसकी कद्र करनी होगी।

  1. आपको साहित्य के क्षेत्र में काफी प्रसिद्धि मिली, साथ ही सम्मान भी। फिर ख़ुद को खानाबदोश कहने के पीछे आपका क्या मतलब है?

उ. इसके पीछे एक कहानी है। दरअसल, मेरी जिंदगी खानाबदोश की तरह ही थी। मेरे हसबैंड की एक महबूबा थी। जब वो कहीं चली जाती थी तो मुझे बुला लेता था और जब वो आ जाती थी तो मुझे पीहर भेज देता था। 13 साल तक उसने मुझे फुटबॉल बनाए रखा। मेरे तीन बच्चे थे। तीनों बच्चों के साथ कभी मैं इधर चली आती थी तो कभी उधर। बाद में ऐसा सिलसिला हुआ कि छह महीने हसबैंड के पास और छह महीने पीहर। इसी से मैंने खुद को खानाबदोश कहा।

  1. आपने वक़्त के एक लम्बे दौर को देखा है, सत्ता की हर आतताई गतिविधि का खुल कर विरोध किया है। आज देश में जो साम्प्रदायिक माहौल बनाया जा रहा है, इसका दूरगामी परिणाम क्या हो सकता है?

उ. ख़ौफनाक...(रुक जाती हैं) साम्प्रदायिकता बहुत ख़ौफनाक चीज है। इस मुल्क में बहुत सारी कौमें हैं, बहुत सारी ज़बाने हैं, सारे मिल-जुल कर नहीं रहते। मुल्क में सबको जगह मिलनी चाहिए, सबको सम्मान मिलना चाहिए। ख़ौफनाक दहशत बढ़ती ही जा रही है। ये बहुत दुखद बात है। (रुक कर) ये आजादी हमें आसानी से नहीं मिली है। हमने बहुत कुछ खोया है। हमने अपने बच्चों को खोया है। हमें आजादी की कीमत समझनी होगी और इसकी कद्र करनी होगी।

  1. आजकल आप क्या लिख रही हैं?

उ. अभी कुछ भी नहीं लिख रही हूँ। मेरी एक किताब आने वाली है ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ किताब घर प्रकाशन से। पढ़ भी नहीं पाती। बीमार रहती हूँ। मेरी आँखों में परेशानी है। खून जम जाता है। इंजेक्शन लगवा रही हूँ। मेरी अक्खां न जवाब दे दीत्ता। अब क्या करूँ। बस यही लगता है कि ज्यादा लिख नहीं पाई। और लिखने की इच्छा बची ही रह गई।

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4. आपके लेखन में दलित-उत्पीड़ित-वंचित तबकों का संघर्ष भी सामने आया है, फिर आपको फेमिनिस्ट क्यों कहा जाता है ?

उ. मेरा फेमिनिज्म में यकीन रहा है, पर मैं वैसी फेमिनिस्ट नहीं हूँ जो हर बात में पुरुषों का विरोध करते हैं। मैं विचारों से फेमिनिस्ट हूँ। मेरी नज़र में फेमिनिज्म का मतलब है अपने अंदर मजबूती लाना, न कि हर मामले में पुरुषों का विरोध करना। दलित-वंचित तबकों में औरतों की हालत ज्यादा खराब है। मैं शुरू से ही उनकी जिंदगी को देखती रही, उनकी पीड़ा को समझती रही। इसलिए मेरे लेखन में उनका जीवन और संघर्ष आया है। मेरा मानना है कि साहित्य में उनका संघर्ष सामने आना चाहिए। जब तक दलित-वंचित महिलाओं का संघर्ष सामने नहीं आता तो ऊंचे तबकों की महिलाओं का फेमिनिज्म बेकार है।

5. सार्क एकेडमी ऑफ आर्ट एंड कल्चर संस्था की स्थापना के पीछे मुख्य प्रेरणा क्या रही ? फिलहाल, इसकी क्या गतिविधियाँ चल रही हैं ?

उ. इसके पीछे हमारा मकसद पड़ोसी मुल्कों के लेखकों-संस्कृतिकर्मियों को एक साथ जोड़ना और एक मंच पर लाना था। हम इसमें कामयाब भी हुए। यह संस्था बेहतर काम कर रही है, मैं बीमार रहती हूँ, इसलिए अब समय नहीं दे पाती, पर यह संस्था आपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। यह आठ मुल्कों की एकमात्र संस्था है, जहाँ सारे लेखक और कलाकार मिलते हैं। अपने विचार साझा करते हैं। सार्क के जरिए ही हमने राइटर्स वीज़ा हासिल करना आसान बनाया। यह एक बड़ी बात है।

6. कहा जाता है कि जगजीत सिंह की सफलता के पीछे आपका हाथ रहा है। उनसे जुड़ा कोई एक वाकया साझा करें।

उ. वेस्टर्न टीवी के ज्ञान वचानी मुझे जानते थे। एक दिन वो मेरे पास आए और जगजीत सिंह का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जगजीत सिंह उनके बड़े अच्छे दोस्त हैं और बहुत अच्छी ग़ज़ल गाते हैं। फिर मैने कहा कि जगजीत सिंह को मेरे घर लेकर आओ, मैं भी सुनना चाहूँगी। फिर जगजीत सिंह तबला-हारमोनियम लेकर मेरे पास आ गए। मैंने सुना। सचमुच बहुत अच्छा गाता था। इसके बाद मैंने उसका प्रोग्राम करवाने के लिए कमानी ऑडिटोरियम बुक करवाया। तब उन्हें कोई जानता नहीं था और पोस्टर लगे प्रोग्राम के तो कोई आने को तैयार नहीं था। ऑडिटोरियम में 600 सीटें थीं, पर सिर्फ 20 सीट बुक हुई। टिकट बिक नहीं रहे थे। जब मैं लोगों से कहती कि जगजीत सिंह ग़ज़ल गाएँगे, आप लोग आओ, तो लोग कहते कि सिख ग़ज़ल नहीं गाते, वे तो कीर्तन करते हैं। मैं बहुत परेशान थी कि क्या होगा। दिलीप कुमार मेरे दोस्त थे। मैंने उनसे आने को कहा कि उससे कार्यक्रम सफल हो जाएगा। उन्होंने मेरी बात नहीं टाली। फिर हमने बैनर लगवाए कि दिलीप कुमार आ रहे हैं। कमानी दोगुना भर गया। जगह नहीं रही। दिलीप कुमार मंच पर आए तो कहा कि मैंने अजीत कौर जैसी औरत नहीं देखी जो अपने पैसे खर्च कर नये लोगों को मौका देती हैं। मैंने ऐसे बहुत से लोगों को देखा है जो स्थापित कलाकारों को प्रमोट करने के नाम पर पैसा बनाते हैं। फिर उन्होंने कहा कि आज तक मैंने खुले मंच पर नहीं गाया। पर आज गाऊँगा। फिर पहली ग़ज़ल दिलीप कुमार ने गाई और बाद में जगजीत सिंह ने। बहुत सफल रहा प्रोग्राम। आज भी लोग याद करते हैं। जगजीत सिंह का पहला रिकॉर्ड मैंने ही बनवाया था एचआईवी से। फिर तो हमारा मिलना-जुलना बढ़ता गया। अर्पणा की एग्जीबिशन जहाँ-जहाँ होती, वह आता था। आख़िर में कुवैत एयरपोर्ट पर मुलाक़ात हुई। वह परफॉर्मेंस दे कर आ रहा था और हम जा रहे थे।

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7. पंजाबी के कुछ नये कथाकारों के बारे में बताएं जिन्हें आपने हाल में पढ़ा हो और जिनके बारे में आपको लगता है कि वे बढ़िया लिख रहे हैं ?

उ. मैं अब तो पढ़ नहीं पाती, पर पहले पढ़ती रही हूँ और चर्चा सुनती रहती हूँ। इनमें जितेन्द्र हालत, जसबीर राणा, बलविंदर सिंह बराड़, बलजिंदर नसराली, हरप्रीत सिख, तरसपाल कौर, गुरमीत घड़ियालवी, सुखजीत, हरजिंदर हटवाल, गुरदयाल और तलविंदर सिंह बहुत बढ़िया लिख रहे हैं। इनसे मुझे काफी उम्मीदें हैं।

8. देश के विभाजन को आपने नजदीक से देखा, क्या भारत-पाकिस्तान के संबंधों में सुधार आ सकता है?

उ. हाँ, मैंने वह सब देखा और अब उसकी याद भी मुझे बहुत परेशान कर देती है। ये विभाजन बहुत गलत हुआ। यह राजनीतिक वजहों से हुआ। सच तो ये है कि दोनों मुल्कों की संस्कृति सांझी है, लोग एक हैं। जहाँ तक दोनों देशों के संबंधों में सुधार का सवाल है तो मुझे लगता है कि आम लोगों के बीच संबंध खराब हैं ही नहीं। यह बड़े और राजनीतिक स्तर पर है। इसके पीछे सत्ता का स्वार्थ है। मैं जब पाकिस्तान गई थी तो वहाँ अनारकली बाजार में जाना हुआ। वहां हमारे साथ आर्ट और कल्चर से जुड़े लोगों का स्वागत हुआ और उन्हें तोहफ़े दिए गए। मुझे दो तोहफे दिए गए। मैंने पूछा कि दूसरा किसलिए तो वो बोले अर्पणा के लिए। मैंने पूछा कि आप कैसे जानते हैं उसे। उन्होंने कहा कि हम भारत के हर बड़े और अच्छे कलाकार को जानते हैं। आज तो माहौल बहुत खराब हो रहा है। पाकिस्तान के कलाकारों को भारत में काम नहीं करने दिया जा रहा है। इस तरह तो संबंध और खराब होंगे।

9. अंतिम सवाल। विभाजन के वक़्त की त्रासदी की वो कौन-सी घटना है जो आज भी याद आने पर आपको विचलित कर देती है

उ. मैं बहुत छोटी थी तब जब शोर सुना विभाजन वाला। उस समय लाहौर ही सेफ समझा जाता था। पेशावर ती तरफ जम कर क़त्लेआम मचा था। बेटे-बेटियों की गर्दन कटवाई जा रही थी। लड़कियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ हो रहा था। मेरी माँ मुझे लाहौर के रिफ्यूजी कैम्प में लेकर गई। वहाँ जाते ही देखा कि सारी औरतें रो रही हैं, कुछ बोल रही हैं कि उन्होंने इज्जत बचाने के लिए अपनी लड़कियों को कुएँ में फेंक दिया। अभी तक मैं वह सब नहीं भूल पाई हूँ जो मैंने लाहौर के रिफ्यूजी कैम्प में देखा। इसके बाद अप्रैल-मई का महीना था, लाहौर में भी दंगे शुरू हो गए। मैंने अपनी आँखों से लोगों का क़त्ल होते देखा। बहन-बेटियों की इज्जत लुटती देखी। बार छत पर खड़ी थी। मैंने देखा कि एक आदमी को तीन-चार लोग तलवारें लिए घेरे आ रहे हैं। उन्होंने उसे तलवार मारी और वह एक लंबी चीख के साथ वहीं गिर गया। खून फैल गया। उसकी चीख मुझे आज तक सुनाई पड़ती है और मैं आँखें बंद कर सोचने लग पड़ती हूँ। अब भी जब यह सब याद आता है तो मेरी हड्डियों में खून लगता है कि जम गया हो। ऐसे बुरे दिन फिर ना आएँ।

Email – manojkumarjhamk@gmail.com

Mobile – 7509664223

कविता गीत ग़ज़ल आदि // डॉ. कुसुमाकर शास्त्री

सतीश छादर की कलाकृति

जंजीरा
१ -   घर के सब लोग बिलाय गये ,
                   कहु, कौन सहायकबाहर के।
हर के हरि ने जब मात-पिता ,
            दुख-दर्द दिये दुनिया भर के।
भर के अति सुन्दरता उसमें ,
                   सब व्यर्थ किया कंगली करके ।
करके अपमान मनो निकली,
                   टुक मांगन  बाहर वो घर के ।

२ - घटके घट फोड़ दिये , पथ , रोक ,
                         डटे , न हटे ,मटके  पट के।
पट के गुन चीर दिये , चुरियाँं ,
                   कर की, कचबन्ध पड़े लटके'।
लटके सब सीपज भंग हुये ,
                  बिखरे ब्रज बाल कहे  नटके |
नट केलि वृथा , हट छोड़ हमें ,
               रसिया  रस के , बसिया घट के ।

                         गजल
अपने गले का हार है , विषधर ही क्यों न हो ?
दिल ने नगर बसाया है , खुद बेघर ही क्यों न हो ?
क्यों नहीं बिजली भरे , बादल की तड़प से ,
नन्दन सा खिलखिला उठे , ऊसर ही क्यों न हो ?
जो बोझ बनकर जिन्दगी की चाल रोक दे ,
उसको उतार फेंकिये , वह सर ही क्यों न हो ?
हर तम की पीठ फेर दी , मतहीन सा खड़ा,
मालिक से भी बड़ा हुआ , नौकर ही क्यों न हो ?
जब दिल पिघल कर स्फुरित अधरों से झर पड़ा ,
'सम्पूर्ण  महाकाव्य'  है  अक्षर  ही  क्यों न  हो?
रोया.  तो   रुदनशील,.  चुपाने   लगे   मुझे ,
सीधा उपाय मिल गया , दुःख कर ही क्यों न हो ?
चोटें उगलवा लेती हैं पत्थर से   रोशनी ,
कुछ तो चमक मिल जाती है ,नश्वर ही क्यों न हो ?
जिसका वजूद सिद्ध हो ,तर्कों के सहारे ,
उसको न सर झुकाऊँगा, ईश्वर ही क्यों न हो ?


पूर्वांचल में मेरे बचपन में एक प्रकार का लोकगीत  ('बिरहा') गाया जाता था।यह लोकगीत प्राय: एक अकेला व्यक्ति गाता था। मेरे एक मित्र के चाचा इस प्रकार के गीत गाया करतेथे।उन्हीं के आग्रह पर कुछ प्रयास किया था।उन्हीं को समर्पित हैं ये गीत  -----.    
  - शिव स्तुति -
 
धन धन हो अड़ भंगी , जेकर जग में ना केव संगी,
                  बेड़ा तोहईंं  प्रभु कइल्य वोकर पार ।
तीन लोक नाथ  बस्ती में तू  बसउल्य,
अपना बीरान सुनसान में सिधउल्य,
शीश पर जटा जूट मुकुट बनउल्य,
गरवा के बीच मुण्ड माल लटकउल्य,
सिरवा पे चाँद गंगामाई तू बसउल्य,
शेरवा कै चाम बीच कमर झुलउल्य,
बूढ़े बरदवा पे नाथ चढ़ि धउल्य,
भुतवा परेत बैताल सँग  नचउल्य,
अपने शरीरिया पे खाक रमउल्य,
राजा कैदुलारी सुकुमारी कहाँ पउल्य,
इन्द्र के इन्द्रासन धन कुबेर के दियउल्य,
लाख हूं करोड़न कै विपद हटउल्य,
                 बेड़ा प्रभु    तोहईं कइल्य वो कर पार।
. कहै 'कुसुमाकर', सारी दुनिया बा चाकर,
भगवन, लाज तोहरे हाथे बा हमार।
               ०x० X०x
२ -भइया सब पर समया आवै,
                                   केवल चीन्है और चिन्हावै,
  जिनघबरायs एहि के देखि मोरे भाय .।
'दशरथ' पे समया आइल ,'राम' गइलैं बनवाँ ,
ओनके बन जातै एनकर निकलल परनवाँ,
'रामजी' पे आइल भयल 'सीता' के हरनवाँ,
'लछिमन' के बन बीचे लागल     शक्ति बनवाँ,
  राजा 'शिवि' पे समया आइल काटे निज तनवाँ,
'हरिश्चन्द्र' बिक डोम के हाथे माँगैलैं कफनवाँ,
'ईसा' शूली पर चढ़आपन छोड़लैं परनवाँ,
'गाँधी' गोली  खायके मरलैं दिल्ली दरम्यनवाँ,
'सरमद' के शरीरिया से उतारल गइलैं चमवाँ,
'सुकरात' के जहर पियउलैं समया के करनवाँ,
'मन्सूर' कै बोटी-बोटी कइलैं सारा तनवाँ,
ई तो हौ पुरान सुना नयका दस्तनवाँ,
मरलैं देश खातिर लेकिन पउलैं,ना कफनवाँ,
बनि गइलैं यहि देशवा कै मालिक बेईमनवाँ,
अबहीं देखा खेल का-का आवा ला समनवाँ ,
                   जिन घबराय एहि. के देखि मोरे भाय ।
कहैं 'कुसुमाकर' बिचारी, सारी दुनिया अनारी,
            समया कै  बा सारे जग ऊपर राज।
                         
                          + + * + +
३-दुर्दिन समइया,देखा कोई ना सहइया,
             बाबू बनले कै सारा संसार।
जब ले तोहरे पास भइया पैसा-कौड़ी होई,
नेह नाता जोड़ै खातिर दौड़ी सब कोई,
जब ले खर्च करबा तबले संगी सब होई,
पैसा घटि जाई ना दिखाई मुँह कोई,

बार छोड़िहैं नाऊ,  धोबिन कपड़ा न धोई,
रान औ' परोसी ताना मारी सब कोई,
भाई -भौजाई, सास-ससुर नहीं कोई,
घर कै मेहरियौ न तोहरे खातिर रोई,
दुर्दिन समइया बिरलै साथी तोहरा होई,
जग की हलतिया देखि,हँसीं हम कि रोईं,
भाग कै लिखल कबतक अँसुवन से धोईं,
बनले कै सारौ बनल चाहै सब कोई,
बिगरे कै केव ना बनाला बहनोई,
                          बाबू बनले कै सारा संसार।
'कुसुमाकर' अब आलस त्यागा,
                   बहुत सोये गाफिल जागा,
                           अपने हाथ में सँभारा पतवार।
)(.              )(.                   )(.              )(
मेरे अति सम्माननीय भाई साहब श्री ऋषि त्रिपाठी जी 'घनश्याम दास शिवकुमार विद्यालय'के लब्ध प्रतिष्ठ अध्यापक हैं। पठन-पाठन के अतिरिक्त वाद्यवादन में भी पारंगत हैं। उन्हें मैं आदर केसाथ
'भाई सा'ब'कहता हूँ। उन्हीं के प्रति  दो छन्द जो कभी लिखे गये थे,आज उन्हीं को , क्षमा याचना सहित ,समर्पित हैं----

           परिचय  एवं   कंघा
सुबह से शाम तक करके भ्रमण नित,
                 अजब है चाल औ' गजब परवाज है।
पुस्तकों के पढ़ने का शौक है सुहाना और,
                 तबला ,पखावज परम प्रिय साज है।
'घनश्यामदास' के हैं लोक प्रिय शिक्षक वो,
                  'मुल्लाकट' दाढ़ी पर सबको ही नाज है।
कहे'कुसुमाकर' हमेशा जिन्हें भाई सा'ब,
          . हैं वो त्रिपाठी और नाम ऋषि राज है।
पहले पहल एक कंघा खरीदा आज,
           जिसको दिखाने मेरे घर तक आयेथे।
आधे से भी ज्यादा जब फसल तबाह हुई,
           तब कहीं गोड़ने के लिए सुधियाये थे।
पुरुवा बयार बड़ी तेज तर्रार बहे,
             काले-काले मेघ आसमान पर छाये थे।
कहे'कुसुमाकर' हुई जो    बरसात   आज,
           नये-नये कल्ले देखा कई उग आये थे।
           ---
          
परन्तु 'सबै दिन जात न एक समान' । एक दिन भाई साहब का वह प्यारा दुलारा कंघा कहीं खो गया,फिर क्या होता है,देखिये--
(मान्य भाई साहब से क्षमा याचना सहित)

कंघे को हमारे लग गई किसकी ए दृष्टि,
             सृष्टि की अनोखी चीज जाने कहाँ खो गई?
इतना सहेज औ' सँभाल रखते थे जिसे,
             डर जिसका था वही बात रात  हो गई '।
'कुसुमाकर'सुनके हँसेंगे सबलोग. सोच,
            आफत में जानआज हाय मेरी हो गई।।
लगता है कंघा नहीं,भाग्य मेरा खो गयाहै,
             तन मन रोया, मेरी रूह तक रो गयी है।
       +++.               +++.            +++
बस एक कंघा से जो तनिक लगाव रहा ,
            उसके बिछोह से ही हाय पछता रहा।
मेरी आज दशा जो है कहते बने है नहीं.
           हँस रहा, रो रहा , न आ रहा , न जा रहा ।
'कुसुमाकर' धन्य हैं वो लोग संसार माहि,
                दिल लगा खुश होके देखो बतला रहा।
मेरा तो है खाना पीना सोना दुश्वार हुआ ,
             संसार देखो खुश हो-हो आज गा रहा।
             X०x                X० x            X०x
            
    स्वर्गता पत्नी को , क्षमा याचना सहित,
कुछ कुण्डलिया समर्पित -----
   
बीबी मुझको मिल गयी,बड़ी तेज तर्रार।
आधा  सिर गंजा किया, जूता चप्पल मार।
जूता चप्पल मार,यार कुछ समझ न आवै।
बिन बादल बरसात   या कहो गाज गिरावै।
कह 'कुसुमाकर'  हाय, सुनो मम खोट नसीबी,
बरु रड़ुवा रहि जाय,मिले ना ऐसी बीबी।।१।
पत्नी ऐसी बलवती मिली मुझे है यार।
बात-बातपर वह सदा,लड़ने को तैयार।
लड़ने को तैयार लगे यहिया की काकी ।
मम पुरखा तरि जायँ,नहीं कुछ बरकत बाकी।
कह 'कुसुमाकर'हाय, कटेगी आगे कैसी।
बरुरड़ुवा रहि जाय,मिलै ना पत्नी ऐसी।।२।
होत भोर ही नेवतती,पूर्वज ,दादा, बाप।
एक साँस में अनगिनत ,दे जाती अभिशाप।
दे. जाती अभिशाप,न हम कुछ भी कह पाते।
नारिसशक्तीकरण  ,सोच कर चुप रह जाते।
कह'कुसुमाकर'हाय,  न कुछ कर सकूँ शोर ही।
नाकन दम ह्वैजाय,रे ककुवा होत भोर ही।३।
कुण्डलिया के छन्द सी ,बिनु नागा डटि जाय।
सुबह-शाम निशि-द्यौस ही,गुरूमन्त्र दोहराय।
गुरूमन्त्र दोहराय,न छिनहूँ हार मानती।
रुकने का तो जैसेे वह ना नाम जानती।
कह 'कुसुमाकर'हाय, भाड़ में जाय सँवलिया
बैठी कछनी काछ,मार करके कुण्डलिया।४।
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               पराये तो खैर पराये होते हैं,वे भला करें या बुरा करें पर उसका उतना बुरा नहीं लगता। परन्तु जब(तथाकथित)अपने,अपनापन, छोड़कर परायापन अपना लेते हैं तो बहुत खल जाता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ-
विधना ने जाने किस बस्तु से बनाया- उन्हें,
          'बिना शान धरे लगती हैं धारदार-सी।
वाक्चातुरी तो देखते ही बनती है बन्धु,
            रात- दिन जीभ चला करती कटार- सी
दिन तो किसी न किसी भाँति कट जाता पर,
            उनके समक्ष रात- लगती पहार -सी।
नये-नये तर्ज की गुलाबी गालियों को गूँथ,
            स्वागत में रहती खड़ी हैं लिये हार सी।
++.            ++.         ++.            ++.      ++
जेठ की दुपहरी- सी तपती हुई है प्रीति,
              मीठा बोल स्वागत वो करते जहर से।
निद्रा माँ की गोद में तनिक सुख चैन मिले,
            इन्तजार  शाम का करूँ मैं दोपहर से।
ऐसे अपने न मिलैं  जग माहि किसी को भी,
         'बिनती यही है मेरी विधि, हरि ,हर से।
सपनों को देख अपनों  ने साथ छोड़ दिया,
         जोड़ दिया गाँठ मेरी बेशक कहर से।
     
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.               प्यारे-प्यारे तारे
                              हिमांशी यादव

           ओ बोलो- बोलो- तारे,ओ प्यारे-प्यारे तारे।
क्या राज छिपा है  तुममें,
यह कोई जान न पाये,
तुम आसमान में टिम-टिम-
कर क्या बतलाते हमको  
कभी पास हमारे आकर,
खेलो सँग हमारे।
ओ नन्हें-नन्हें तारे , ओ  प्यारे-प्यारे  तारे।
                                
                    ब्रजगाँव
जहाँ राधा-कृष्ण ने कदम रखे बार-बार,
         जादूमयी रेणु आज हुई उस ठाँव की।
जहाँ बजा बाँसुरी रचाई रास मोहन ने,
           नन्दन भी सम ना कदम्बन की छाँव की।
मञ्जु मरालिका-सी तरी करे भव पार,
           महिमा सुनाती कृष्ण नाम के प्रभाव की।
रमना-विरमना पड़ेगा यमुना के तीर,
            करना उपासना है  'गर ब्रजगाँव की।
xx                XX            XX           xx
ब्रजबीथिन माहि फिरै रसिया,
                     बँसिया निसि द्यौस बजावतु है।
  सुन के उस बाँसुरी की धुनि को,
                    अपनो मन भी उमगावतु है।
सखि छोड़ चलो गृह काज सबै,
                'कुसुमाकर' चैन नआवतु है।
नन्दलाल विहाल किये हमका,
              वह गोधन गावतु आवतु है।
()++++++()++++(+)++++()+++++()
द्रौपदी औ' गनिका, गज,गीध,
                     अजामिल सों तुम तारन हारे।
गौतम तीय तरी तुम ते
                     प्रह्लाद को कष्ट हरे तुम भारे।
और अनेकन को 'कुसुमाकर',
                 देखते ही भवपार उतारे।
तेरो कहाय के हौं दु:ख पावत,
              क्या तुम पाछिलि बानि विसारे।
                    + +++()++++

व्यंग्य // समय, परिस्थिति और भाईलोग // कुबेर

सोमेश सोनी की कलाकृति

समय और परिस्थिति दोनों अभिन्न मित्र हैं।

एक दिन, समय जब आराम करने जा रहा था, उसके मोबाइल की घंटी बजने लगी। उसने फोन रिसीव किया। फोन परिस्थिति का था। समय ने हुलसते हुए कहा - ’’देखा! अनुमान कितना सही होता है, मेरा। दिल के मामलों में ऐसा ही होता है।

जरूर, जरूरी और महत्वपूर्ण बात होगी, अन्यथा इस समय वह फोन नहीं करता।’’फिर दोनों में बातें हुई, एकदम संक्षिप्त।

इस संक्षिप्तता ने समय को चिढा दिया। उसने कहा - ’’धत्! बस इतना ही पूछना था कि मैं घर पर हूँ या नहीं।’’ आराम करना स्थगित कर वह मित्र की प्रतीक्षा करने लगा।

प्रतीक्षा भी संक्षिप्त रही।

दुख-सुख की बातें करने के लिए मनुष्य बनना जरूरी होता है। परिस्थिति को मनुष्य के रूप में देखकर समय का मन करुणा से भर उठा। उसके चेहरे के भावों को वह पढ़ नहीं सका।

दुआ-सलाम के बाद परिस्थिति ने कहा -’फूल देखे थे अक्सर जनाजों में मैंने,कल गोरखपुर में फूलों का जनाजा देखा।’

’’वाह! क्या बात है?’’ समय ने दाद देते हुए कहा - ’’शायर कब से बन गये?’’

’’मैं क्यों शायर बनने लगा? शायर बनकर क्या फायदा? औकात नामक कोई चीज होती भी है, शायरों के पास? इसे अखबार में पढ़ा था। गुलजार नामक किसी व्यक्ति का है।’’

’’गुलजार के बारे में ऐसी बातें करते हो?’’

’’क्यों? शायर ही तो है, कोई भाई-वाई तो नहीं? .... अच्छा, सुन। खुशखबरी है।’’

’’खुशखबरी?’’

’’हाँ! यहाँ के भाई लोगों को जानते हो न?’’

’’हाँ, हाँ ... क्यों नहीं। उन्हें कौन नहीं जानता होगा। सभी भय खाते हैं उनसे।’’

’’हाँ! सभी भय खाते हैं उनसे। तुमसे तो कुछ होता नहीं। मैं भी काफी तनाव में रहता था। सब तो उनकी दरबार में हाजिरी लगाते हैं। कल से मैंने भी लगाना शुरू कर दिया है। अपना सब कुछ उन्हें अर्पित कर दिया है। आरती करके आ रहा हूं अभी - ’तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो .....।’ देखा, आरती का असर। सारा भय, सारा टेंशन जाता रहा।’’

समय के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गयी।

समय के चेहरे पर मुस्कान देखकर परिस्थिति को अचरज हुआ।

समय ने पूछा - ’’पर ये सब सूझी कैसे तुम्हें?’’

’’चैनलवाले और अखबारवाले आजकल काम की बड़ी-बड़ी चीजें परोस रहे हैं। नहीं पढा़ क्या - ’बन के हादसा, बाजारों में आ जायेगा।जो न होगा, अखबारों में आ जायेगा।चोर उचक्कों की करो कद्र, कि मालूम नहीं,कौन, कब, कौन सी सरकार में आ जायेगा।’है न काम की बात?’’

सुनकर समय के मुस्कान की रहस्यमयता और गाढ़ी हो गई। उसका चेहरा और अधिक रहस्मय लगने लगा।

परिस्थिति को कुछ समझ में नहीं आया। उसे उलझन होने लगी - ’भाई लोगों के दरबार में कहीं इसने भी तो ...... ।’’

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प्रतीति (व्यंग्य)-प्रदीप कुमार साह

मीना सिंह की कलाकृति

अपने चारों तरफ घेरा बनाए खड़ी तमाशाई भीड़ को देखते हुए मदारी अपना डमरू जोर-जोर से बजाने लगा. वैसा करते हुए मदारी को जब महसूस हुआ कि सभी तमाशाई का ध्यान उसकी तरफ आकृष्ट हो गया तब जमूरा को संबोधित करते हुए पूछा,"जमूरा, गौर से देखकर बताओ कि हमारे चारों तरफ घेरा बनाए खड़ी यह कैसी भीड़ है?"

मदारी के प्रश्न सुनते ही जमूरा दो पंजे पर खड़ा हो गया और दोनों अगला पंजा को अपने चेहरा से टिका दिया. फिर पंजे के उंगलियों को मोड़कर कुछ पोला-वृत्ताकार अजीब आकृति बनाते हुए और अपनी आँखें अधिक फैलाते हुए उस आकृति को अपनी आँखों के सामने तक ले आया तथा अपना सिर अर्ध-वृताकार परिधि में दो-चार बार अपने दाँया-बाँया घुमाया.

जमूरा के उस अजीबो-गरीब करतब के संबंध में तब मदारी भाष्य किया,"अच्छा, सभी दर्शक हैं." भाष्य-पश्चात मदारी पुनः अपना डमरू बजाने लगा और कुछ समय तक डमरू बजाने के पश्चात पुनः जमुरा से प्रश्न किया," किंतु वह सब देखना क्या चाहते हैं?" तब जमूरा एक-दो बार अपनी जगह पर कूद-कूदकर संकेत किया कि वह सब खेल देखने के इच्छुक हैं.

तब मदारी बोला,"साहब लोगों, अभी-अभी जमूरा बताया कि आप सभी दर्शक-दीर्घा हैं और जमूरा के करतब देखने के इच्छुक हैं. यदि वह तथ्य बिलकुल सत्य है तब करतल ध्वनि से कृपया जमूरा का प्रोत्साहन कीजिए." मदारी के आग्रह पर सभी जमकर करतल ध्वनि उत्पन्न किये. जमूरा का उत्साहवर्धन करने पर मदारी ने सबका धन्यवाद व्यक्त किया.

अब डमरू बजाते हुए मदारी जमूरा से पूछा,"जमूरा, सभी दर्शक तुम्हारे उत्साह वर्धन हेतु प्रयत्न किये, अब तो अपना करतब उन्हें दिखाओगे न?" जमूरा अपना सिर हिलाकर अपनी सहमति का संकेत किया. तब मदारी अधिकाधिक तेज आवाज में अपना डमरू बजाते हुए बोला,"साहब लोगों, जमूरा अपना करतब दिखाने तैयार है तो पुनः हो जाये जोरदार करतल-ध्वनि."

मदारी के वैसा कहते ही जोरदार सामूहिक करतल ध्वनि हुई. तब मदारी बोला,"मेहरवान-कद्रदान, जमूरा दर्शक को अपना करतब दिखाता है क्योंकि उसे भी मालूम है कि लोगों को कुछ वैसा प्रतीति कराया जाये जो रोजमर्रा से विचलित उनके मन को शांत करा सके. सबके मन को सुख और प्रसन्नता की अनुभूति हो. तत्पश्चात उसे भी पारिश्रमिक का लाभ प्राप्ति हो."

थोड़ा ठहर कर मदारी पुनः बोला,"दर्शक और पाठक भी सदैव उदार, साहसी और संयमी होते हैं तथा अच्छा-बुरा के परीक्षण में सदैव समर्थ होते हैं. पुनः वह एक भीड़ मात्र के रूप कदापि नहीं होते, क्योंकि वह मूलतः सामान्यजन उर्फ़ जनता-जनार्दन हैं. पुनः प्रत्येक सामान्यजन एक कर्तव्य निष्ठ नागरिक के साथ-साथ एक दर्शक-परीक्षक भी हैं जिनकी नजर से कुछ भी छिपता नहीं है."

वैसा कथन कहने के पश्चात मदारी जोर-जोर से डमरू बजाने लगा. थोड़ी देर तक डमरू बजाते रहने के पश्चात पुनः बोला,"मेहरबान-कद्रदान साहब-लोगों, उक्त विचार से जो सहमत होते हैं और अपना पारिश्रमिक लाभ ईमानदारी से प्राप्त करते हैं, वह संभवत: जमूरा कहलाता है. वह पारिश्रमिक प्राप्ति हेतु छल-बल प्रयोग से गलत प्रतीति करवाने के भ्रमित पथ पर कदापि अग्रसित नहीं होते.

वह सदैव उस तथ्य को अमल में लाते हैं कि रहो सीधा-सदा, निभाओ बाप-दादा. वह किसी सुयोग्य पतित की भाँति प्राणहरण-भय की प्रतीति कराते नहीं फिरता. संभवत: भयादोहन करना उसके प्रकृतिनुरूपक पेशा नहीं हैं. अपितु पतितपावन के नर-वेश में निर्बाध विचरण करते हुए संभवतः संपूर्ण जगत को जन्म-मृत्यु-मोक्ष के भवबंधन के भवभय से स्वांगवश भी अवगत कराते नहीं!"

"मदारी, यह अनाप-शनाप क्या बके जा रहे हो?"तभी किसी दर्शक ने मदारी को टोका. तब मदारी बोला,"साहब लोगों, यह किसी मदारी द्वारा कल्पित कथन नहीं है, बल्कि वह सांसारिक वास्तविकता है जो सदियों से स्वयं दृष्टिगोचर है. संसार में एकमात्र जमूरा का वह अधिकार है कि वह ईमानदारी से पारिश्रमिक अर्जित करे. पुनः अपने कर्तव्यपालन में वह कभी मर्यादाहीन नजर भी नहीं आता."

तत्पश्चात डमरू बजाते हुए मदारी पुनः बोला,"वैसे तो वह तथ्य स्वयंसिद्ध ही है कि सच्चाई, कर्तव्यनिष्ठा इत्यादि वृहत सद्गुण के अनुपालन का एकमात्र अधिकारी जमूरा है, चाहे वह किसी भी स्वरूप में हो. वह स्वरूप किसी माता-पिता का हो सकता है जो आजीवन तो अपने संतान के हित संरक्षण में तत्पर रहते हैं किंतु अपनी वृद्धावस्था उन्हें संतान से उपेक्षित रहकर गुजारने पड़ते हैं.

वह कृषि-कर्मरत अन्नदाता कृषक, मजदूर या राष्ट्रीय सुरक्षा में तत्पर सैन्य बल अथवा वर्तमान में कुछेक शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी इत्यादि के स्वरूप भी में हो सकते हैं. वह संसार संचालन के मजबूत आधार तो नि:संदेह हैं, किंतु उसके भाव सदैव मामूली प्रतीत होते हैं. जैसे प्रेम-भाव से संपूर्ण संसार का मजबूती से समन्वय होता है किंतु उसका मान्य भाव पतला-धागा तुल्य निर्धारित है.

तथापि प्रेम के संबंध में उपरोक्त तथ्य से वाकिफ रहने के पश्चात भी रोजमर्रा के व्यक्तिगत कार्य निपटाते हुए कभी प्रेम नामक निरीह चीज-वस्तु की चिंता कभी नहीं व्यापता. वास्तव में हमारा अटल विश्वास उस निरीह वस्तु पर अधिकाधिक आश्रित है और वह कभी हमारा विश्वासघात नहीं करता. वह सिलसिला सदियों से अनवरत जारी है. निःसंदेह तब जमूरा उसी श्रेणी का कोई प्राणी है.

किंतु सामान्यजन को अपनी उस कमजोरी पर तनिक भी लज्जा अथवा क्षोभ नहीं आना चाहिये. उस परिस्थिति से निवृत्ति हेतु थ्री इडियट के मुख्य किरदार के वक्तव्य से कुछ सीख लेनी चाहिये कि अपना दिल भी न स्वभाव से बड़ा डरपोक होता है, बात-बेबात डरता रहता है. इसलिये दिल को हमेशा समझाना चाहिये कि ऑल इज वेल. पुनः दिल तो बच्चा है सरीखे नगमा गुनगुनाना भी कामयाबी दे सकता है.

नाना पाटिकर के डॉयलॉग तो याद हैं न कि सौ में अस्सी बेईमान, फिर भी मेरा देश महान? डॉयलॉग को दुहराने से तत्समय मन के क्षोभ निःसंदेह काफूर हो जायेंगे. होकर मजबूर मैं चला जैसे सदाबहार नगमे पुनः भुलाया जा नहीं सकता. उसे गुनगुनाते हुए प्रतीति कीजिए कि मानसिक क्षोभ के संसार से आप शीघ्रता से बाहर आ रहें हैं. संभवतः अब कामयाबी आपके कदम में लोटपोट रही होगी.

श्रीमानों, यदि अब भी संदेह हो कि इतने उपाय के बावजूद मानसिक ताप से कदाचित निवृत्ति नहीं पाया जा सकता और बात प्रतीति करने-करवाने से संबंधित ही चल पड़ी है तब एक कारगर उपाय बताना अभी शेष है. किंतु उपाय से पहले यह जानना अधिक उचित होगा कि प्रतीति क्या चीज-वस्तु है? किंतु आदिकाल से अनेक ग्रंथ उसकी महत्तादि बताते-बताते अंतत: नेति-नेति कहने-रटने लगे.

तब उसके स्थूल रूप पर ही विचार हो!...तो उसके शाब्दिक आकार लघु हैं. श्रवण में वह पूर्णतः मधुर है. उच्चारण में अतिशय सुकोमल प्रतीत होता है तथा लिंग निर्धारण से वह स्त्रीलिंग है.वह शब्द प्रकृति की प्यारी सखी प्रतीत होता है और उससे प्रकृति के समान ही विस्तृत भाव-बोध होता है. पुनः शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन हो और समानार्थी में अंग्रेजी शब्द न हो, वह एक बड़ी भूल नहीं है क्या?"

अपने वक्तव्यांत में प्रश्न चिन्ह का प्रयोग करते हुए मदारी जोर-जोर से अपना डमरू बजाने लगा. किंतु कुछ समय तक डमरू बजाने के पश्चात स्वयं ही अगले वक्तव्य से शनैः शनैः उस रहस्य से पर्दा भी उठाने लगा,"तो, फीलिंग-परसेप्शन इत्यादि अंग्रेजी शब्द को प्रतीति या प्रतीति करना के समानार्थी समझ सकते हैं, परंतु 'प्रतीति कराना' वास्ते 'फील गुड' शब्द एकमात्र उपयुक्त समानार्थी प्रतीत होता है.

किंतु उस शब्द से जमूरा सदैव अनभिज्ञ होता है, क्योंकि वह शब्द जनप्रतिनिधि और कुछेक पत्रकार के शब्दकोश ही में उपलब्ध हैं जिसका प्रयोग करना भी वह ही बखूबी जानते हैं. प्रमाणतः वर्षो से कश्मीर में कुछ समस्याएं हैं. किंतु आजादी प्राप्ति के सात दशक तक देश को कश्मीर समस्या के कारण का पता नहीं चला. वह तो धन्य है कि सरकार मुफ़्ती द्वारा देश के समक्ष महती रहस्योद्घाटन हुआ.

खैर, जब देश को वह रहस्य पता चल ही चुका है कि कश्मीर समस्या आतंकी सरगनाओं की शरण स्थली पाकिस्तान के बड़े भाई चीन द्वारा प्रायोजित है, तब समस्या का उपचार भी निःसन्देह संभव है. जैसे महीने से राज्य में शांति-व्यवस्था कायम रखने में अक्षम पड़ी ममता सरकार को तभी यह महसूस हुआ कि उसके राज्य में भी चीन प्रायोजित अस्थिरता है और वह शांति-व्यवस्था बहाली में सक्षम हुई.

अभी मीडिया में इस विषय पर भी चर्चा जोर-शोर से चल रही है कि भारत पर चीन प्रायोजित पानी बम का अटैक हुआ है और भारत का एक सूबा उससे बुरी तरह प्रभावित है. यह दीगर बात है कि ठीक तभी चीन के प्रायोजित पानी बम अटैक की पहुँच से दूर सूबा-ए-बिहार भी अप्रायोजित भीषण बाढ से बुरी तरह प्रभावित है. यह तथ्य भी दीगर है कि वहाँ तभी अन्य कारणवश सूबा के सत्तापक्ष-विपक्ष परेशान हैं.

उत्तर प्रदेश में खतौली के पास कलिंग उत्कल एक्सप्रेस पटरी से उतर गई. प्रारंभिक जांच में पता चला कि ट्रेन के ड्राइवर को ट्रैक की मरम्मत की जानकारी नहीं देने की लापरवाही थी. किंतु साथ-साथ यह कयास भी लगाया जाता रहा कि ट्रेन हादसा के पीछे आतंकी के हाथ हो सकते हैं. दुर्घटनास्थल से हथौड़ा, रिंच-पाना मिलने से संबंधित खबर सुनकर तो सामान्य जन-मानस अजीब-अजीब कयास लगाये.

कहने लगे कि चीन समर्थित होने से अब आतंकियों के तौर-तरीका भी बदलकर किफायती और अधिक घातक हो गये. अब वह गोला-बारूद की जगह प्राथमिकता से थोड़ा सा धन खर्चकर और थोड़ी सी भावनात्मक लगाव की झाँसा देकर कुछेक भारतीय को बहकाते हैं. फिर, उससे हथौड़ा मारवा-मारवाकर रेल पटरी उड़ाते हैं. उससे कम खर्च में अधिकाधिक भारतीय जान-माल का नुकसान होता है.

खैर, यह दीगर बात है कि देश में व्याप्त नौकरशाही भी उसी नक्शे कदम पर चलता हुआ प्रतीत होता है और ऑक्सीजन की कमी से गोरखपुर में देश के साठ-सतर नौनिहाल को असमय ही संसार से अलविदा कहना पड़ता है. दूसरी तरफ तभी डेरा प्रमुख राम रहीम की चरण पादुका बनी नौकरशाही हरियाणा राज्य भी में असमय ही साठ लोगों की जीवन लीला लीलने में सहायक-भूमिका में नजर आती है.

अब छोड़िये भी जनाब! मेरे देश भारत में तो रोज भिन्न-भिन्न मुद्दे पर चर्चा में प्रति घँटा समस्या का समाधान रहित निष्कर्ष निकलते हैं. तब देशवासी को महती तरस भी आता है, किंतु उस तरस का केंद्र-बिंदु तो केवल राष्ट्रीय राजकुमार तक सीमित होती है. किंतु जनसामान्य और नेतागीरी की हैसियत की प्रतीति तो प्रत्यक्षत: उत्तरप्रदेश के सीधे-सादे स्वास्थ्य मंत्री गोरखपुर दुर्घटना-समय ही में करा पाते हैं.

वर्षों से देश के कई हिस्से उग्रवाद से पीड़ित हैं. यद्यपि देश के गरिमामय संविधान के माकूल वैकल्पिक उस तत्व के पास कुछ भी परिकल्पित संविधान नहीं, तथापि वह दंभ भरते हैं कि देश के संविधान से लोगों का शोषण होता है क्योंकि भ्रष्ट नौकरशाही और लचर राजनैतिक इच्छा-शक्ति उसे पंगु बनाये हैं. तब क्रियान्वयनहीन महती संविधान किस काम का और क्रियान्वयनयुक्त उग्रवादी विचार ही अनुचित क्यों?

किंतु यह तथ्य सदैव अनुत्तरित रहता है कि जब गरिमामय संविधान 'जहाँ बहुपक्ष अपनी-अपनी बात रख सकते हैं' से देश का हित नहीं सधता और वह टालमटोल की रवैया अपनानेवाली नौकरशाही पर नकेल नहीं कस सकता तब एक अपिपक्व अथवा उग्रवादी विचार वह कार्य पूरा कैसे करेगा? तब नौकरशाही खत्म होगी या नौकरी पेशा वर्ग और पद ही? यदि कुछ कानून हुआ तो अनुपालन का तरीका क्या होगा?

सबसे अधिक विचारणीय तथ्य तो यह है कि एक विध्वंसक विचारधारा समाज में सृजनात्मकता कहाँ से लाएगी? सृजनात्मक विचारधारा रहित समाज क्या एक सृजनात्मक-सभ्य-सामाजिक व्यक्ति या समाज अथवा देश का निर्माण कर सकता है? फिर सृजनात्मकता से रहित क्या किसी भी सभ्यता के पर्यायरूप किसी समाज और देश का अस्तित्व हो सकता है? संभवत: तब उग्र विचारधारा समर्थक मौन हो जाए.

किंतु इतना तो स्पष्ट आवश्यक है कि प्रत्येक पंथ और विचारधारा उसके प्रतिनिधि पर आश्रित हैं. फिर एक व्यक्ति प्रतिनिधित्व तभी कर सकता है जब उसके रग में खून की जगह राजनीति दौड़ती हो अर्थात वह दूसरे को फिल गुड कराने में दक्ष या सक्षम हो. तभी देश में वैसी विचारधारा पनपते हैं और विकसित हो पाती हैं. क्योंकि सार्थक जवाब भले उनके पास न हो, किंतु उक्त विचारधारा पनपने के समुचित कारण हैं.

किंतु मेरे मेहरबान-कद्रदान, वैसे सभी तथ्य पर विचार करना छोड़ना ही उचित है. क्योंकि उस तथ्य के विचारण योग्य समझ तो हमें प्राप्त नहीं हैं, न समय. अतः हम प्रथम मुद्दे पर ही वापस आते हैं और जानते हैं कि हमारे पास मानसिक ताप से निवृत्ति का अंतिम उपाय क्या है? एक क्षण अपनी आँखें बंद कीजिए और धारणा कीजिये कि जमूरा ही माता-पिता, हमारे पूर्वज या उनके चिर ऋणी कोई सगा-संबंधी हैं.

पुनः धारणा कीजिए कि इष्ट ने हमारी सुख-सुविधा और भलाई के लिये उनकी अवैतनिक नियुक्ति किये हैं. पुनः कर्तव्यनिष्ठा, सच्चाई इत्यादि वृहत सद्गुण के अनुपालन का एकमात्र अधिभार भी उन्हें ही प्राप्त है. वैसा करना उनका नैतिक कर्तव्य है और उसके प्रतिफल का उपभोग करना तथा उनके विपरीत कर्म करना आपके नैतिक कर्तव्य हैं. सुनिश्चित कीजिए कि आपके दुःख दूर करने हेतु वह बेहद अचूक उपाय हैं.

(समाप्त)

साहित्य में विज्ञान लेखन // सुशील शर्मा

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विज्ञान उन सभी मनोवृत्ति के तरीकों को जुटाता है जो कि सारभूत रूप में संवेदनाओं और मनोभावों के विपरीत है। विज्ञान के कड़े नियमों का अनुराग और निष्ठा, मित्रता, सौन्दर्य शास्त्र के अनुभवों वेदना और हर्ष की भावनाओं, बुद्धि और मनोवृत्ति, खुशी और करूणा, उदारता, प्रतिष्ठा, आत्म-सम्मान, मृदुता, सहानुभूति, शिष्टाचार की बहुलता, उत्तेजना व लगनशीलता आदि का कोई भी मूल्य नहीं हैं । अब प्रश्न उठता है कि ये सारे भाव साहित्य के अभिन्न अंग हैं तो फिर किसी साहित्य को विज्ञान साहित्य की कोटि में रखने की कसौटी क्या हो? क्या केवल वैज्ञानिक खोजों, उपकरणों, नियम, सिद्धांत,परिकल्पना, तकनीक, आविष्कारों आदि को केंद्र में रखकर कथानक गढ़ लेना ही विज्ञान साहित्य है?विज्ञान साहित्य का लक्ष्य बच्चों के मनस में विज्ञान-बोध का विस्तार करना है, ताकि वे अपनी निकटवर्ती घटनाओं का अवलोकन वैज्ञानिक प्रबोधन के साथ कर सकें। वैज्ञानिक खोजों, आविष्कारों का यथातथ्य विवरण विज्ञान साहित्य नहीं है। वह विज्ञान पत्रकारिता का विषय तो हो सकता है,विज्ञान साहित्य का नहीं। कोई रचना साहित्य की गरिमा तभी प्राप्त कर पाती है, जब उसमें समाज के बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण की भावना जुड़ी हो। विज्ञान लेखन को खासकर हिंदी में जो आदर मिलना चाहिए था, वह अभी नहीं मिल सका है।

ऐसा इसलिए भी है कि भारतीय साहित्यकार इस विधा को शुरू से ही गम्भीरतापूर्वक न लेकर इसे फंतासी, अजीबोगरीब कहानियों, जादू टोने, बच्चों की कहानियों के इर्द-गिर्द एक हाशिये का साहित्य ही मानते रहे और इसे उच्च स्तरीय, मानव समाज के करीब के साहित्य की श्रेणी से अलग हल्का-फुल्का साहित्य मानने के सहज बोध की अभिजात्य सोच से ग्रस्त रहे हैं।

आधुनिक विज्ञान लेखन

मेरी शैली ने (1789-1851) ``फ्रेन्केन्टाइन´´ के रूप पहली विज्ञान फिक्शन को जन्म दिया।पश्चिमी विज्ञान कथा का वास्तविक शंखनाद प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक, कवि, एडगर एलन पो द्वारा ``बैलून होक्स´´ के रूप में 1844 ई में किया गया था। इस कथा के कारण एडगर एलन पो प्रथम विज्ञान कथाकार के रूप में चर्चित ही नहीं हुए वरन् अमेरिकन विज्ञान कथा पत्रिका ``अमेजिंग स्टोरीज´´ के विश्व ख्याति प्राप्त विज्ञान लेखक एवं इस पत्रिका के संपादक हयूगो गन्र्सबैक ने उन्हें `` फादर ऑफ साइन्टीफिक्शन´´ माना था। वास्तव मं इसी शब्द का संशोधित रूप ही ``साइंस फिक्शन´´है । प्रख्यात डेनिश कथाकार हैंस एंडरसन ने बच्चों के लिए परीकथाएं लिखते समय अद्भुत कल्पनाओं की सृष्टि की थी। एच.जी. वेल्स की विज्ञान फंतासी 'टाइम मशीन' भी रचनात्मक कल्पना की देन है। तदनुसार 'विज्ञान गल्प' ऐसी काल्पनिक कहानी को कहा जा सकता है, जिसका यथार्थ से दूर का रिश्ता हो, मगर उसकी नींव किसी ज्ञात अथवा काल्पनिक वैज्ञानिक सिद्धांत या आविष्कार पर रखी जाए।

भारत में विज्ञान लेखन

मूर्धन्य वैज्ञानिक सर जगदीश चन्द्र बसु द्वारा बंगाली की प्रथम विज्ञान कथा ``पालतक तूफान´´ 1897 ई. में भारत में प्रकाशित हुयी थी। बंगाली भाषा के, बंग्ला साहित्य की भाँति मराठी भाषा का भी साहित्य अतीव समृद्ध है परन्तु इस भाषा की प्रथम विज्ञान कथा `तरचेहास्य´ 1915 में प्रकाशित हुई थी। इन दोनों कथाओं में विज्ञान का संम्पुट था। `पलातक तूफान´ (तूफान पर विजय) सरफेस टेंन्शन पर आधारित थी तो तरचेहास्य (तारे का रहस्य) तारे के विज्ञान सम्मत पक्ष से संबंधित थी। हिंदी में विज्ञान गल्प लेखन की नयी सरणि निर्मित की। ‘पीयूस प्रवाह’ पत्रिका में 1884-88 के मध्य धारावाहिक रूप से इसका प्रकाशन हो चुका था। ‘आश्चर्यवृत्तांत’ विशुद्ध रूप से विज्ञान गल्प था जो तिलस्मी और जासूसी प्रभावों से सर्वथा उन्मुक्त था। हिन्दी की प्रथम लम्बी विज्ञान कथा ``आश्चर्य वृत्तान्त´´4 जो साहित्याचार्य पं. अम्बिकादत्त व्यास (1858-1900) द्वारा विरचित तथा उन्हीं के समाचार पत्र ``पीयूष प्रवाह´´ में 1884 से 1888 तक के अंकों में प्रकाशित होती थी।

विज्ञान के हिंदी लेखक -

देश में हिन्दी में विज्ञान लेखकों की कमी नहीं हैं परन्तु लेखकों के इस विशाल समुदाय का कोई राष्ट्रीय संगठन नहीं है।करीब 3500 से अधिक हिन्दी में विज्ञान लेखक हैं जिनमें 150 महिलाएं हैं तथा 8000 हजार से भी अधिक विज्ञान संबंधी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। हिन्दी में विज्ञान की पाठयपुस्तकें लिखने वाले और प्रतियोगिता वाली पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखते रहते हैं , वे हाई स्कूल से लेकर महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के परिसरों तक व्याप्त हैं। यह कहना मुश्किल है कि इनकी संख्या कितनी होगी किन्तु एक तरह से ये भी विज्ञान लेखक ही हैं। ' आज तक हिन्दी में विज्ञान लेखकों की कोई निर्देशिका भी प्रकाशित नहीं हुई ताकि लेखकों का आपसी पत्र व्यवहार अथवा सम्पर्क स्थापित करने का क्रम प्रारम्भ हो जाता। हर्ष की बात है कि हिन्दी भाषा में विज्ञान की पत्रिकाओं का अवश्य विस्तार हुआ है जो विज्ञान को लोकप्रिय बनाने की दिशा में सक्रिय हैं।

कुछ मुख्य पत्रिकाएं निम्नानुसार हैं:

विज्ञान (इलाहाबाद) , संदर्भ (होशंगाबाद) , स्रोत (भोपाल) , विज्ञान चेतना (जयपुर) , विज्ञान आपके लिए (गाजियाबाद) , सामयिक नेहा (गोरखपुर) विज्ञान भारती प्रदीपिका (जबलपुर)। इसके अतिरिक्त विज्ञान प्रगति , विज्ञान लोक , विज्ञान जगत , अविष्कार तथा विज्ञान गरिमा सिंधु आदि पत्रिकाएं भी उल्लेखनीय हैं।

वैज्ञानिक साहित्य में अपना बहुमूल्य योगदान देने वाले विज्ञान लेखन के पुरोधाओं को जैसे स्वामी सत्यप्रकाश , डॉ. गोरख प्रसाद , डॉ. फूलदेव सहाय वर्मा , डॉ. वृजमोहन , डॉ. निहालकरण सेठी , डॉ. शिवगोपाल मिश्र , गुणाकार मुले , डॉ. रमेश दत्त शर्मा आदि को कैसे भूला जा सकता है। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक साहित्य सृजन के अन्य सशक्त हस्ताक्षर हैं सर्वश्री प्रेमचंद श्रीवास्तव , गणेश कुमार पाठक , जगनारायण , डॉ. रमेश बाबू , राम चन्द्र मिश्र , विजय चितौरी , आइवर यूशियल , इरफान ह्यूमेन , राय अवधेश कुमार श्रीवास्तव , डॉ. दीपक कोहली , डॉ. डी.डी. ओझा , विश्वमोहन तिवारी , डॉ. विष्णु दत्त शर्मा , डॉ. देवेन्द्र कुमार राय ,देवेंद्र मेवाड़ी तथा डॉ. श्रवण कुमार।

विज्ञान लेखन का आधार

विज्ञान लेखन की कसौटी उसका मजबूत सैद्धांतिक आधार है। चाहे वह विज्ञान कथा हो या गल्प, उसके मूल में किसी वैज्ञानिक सिद्धांत अथवा ऐसी परिकल्पना को होना चाहिए जिसका आधार जांचा-परखा वैज्ञानिक सत्य हो। अपनी बौद्धिकता और कल्पना की बहुआयामी उड़ान के बावजूद आपेक्षिकता का सिद्धांत इतना गूढ़ है कि उसे बाल साहित्य में सीधे ढालना आसान नहीं है। मगर आइंस्टाइन के शोध से उपजी एक विचित्र-सी कल्पना ने बाल साहित्य की समृद्धि का मानो दरवाजा ही खोल दिया। आइंस्टाइन ने सिद्ध किया था कि समय भी यात्रा का आनंद लेता है। उसका वेग भी अच्छा-खासा यानी प्रकाश के वेग के बराबर होता है। अभी तक यह माना जा रहा था कि गुजरा हुआ वक्त कभी वापस नहीं आता। आइंस्टाइन ने गणितीय आधार पर सिद्ध किया था कि समय को वापस भी दौड़ाया जा सकता है। विज्ञान साहित्य-लेखन के लिए गहरे विज्ञान-बोध की आवश्यकता होती है। उन्नत विज्ञानबोध के साथ विज्ञान का कामचलाऊ ज्ञान हो तो भी निभ सकता है। वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न लेखक अपने परिवेश से ही ऐसे अनेक विषय खोज सकता है जो विज्ञान के प्रति बालक की रुचि तथा प्रश्नाकुलता को बढ़ाने में सहायक हों। तदनुसार विज्ञान साहित्य ऐसा साहित्य है जिससे किसी वैज्ञानिक सिद्धांत की पुष्टि होती हो अथवा जो किसी वैज्ञानिक आविष्कार को लेकर तार्किक दृष्टिकोण से लिखा गया हो। वैज्ञानिक लेखन की कुछ विशेषताओं का उल्लेख अगर हम करें जो विज्ञान लेखन के लिए बहुत जरुरी हैं वो निम्नानुसार हैं।

1. – वैज्ञानिक साहित्य की भाषा अधिक कठिन नहीं होनी चाहिए।

2. – उसमें अनावश्यक विवरण नहीं होने चाहिए।

3. – उसमें मूल सिद्धांतों की सही-सही और सटीक व्याख्या की जानी चाहिए।

4. – उसमें भाषागत स्पष्टता और गरिमा का निर्वाह किया जाना चाहिए।

5. – उसमें विषय को पर्याप्त उदाहरणों द्वारा पुष्ट किया जाना चाहिए।

विज्ञान की भाषा

विज्ञान में मौलिक लेखन कम हुआ है और संदर्भ ग्रंथ न के बराबर हैं। लोकप्रिय विज्ञान साहित्य सृजन में प्रगति अवश्य हुई है परन्तु सरल , सुबोध विज्ञान साहित्य जो जन साधारण की समझ में आ सके कम लिखा गया है। इंटरनेट पर आज हिन्दी में विज्ञान सामग्री अति सीमित है। विश्वविद्यालयों तथा राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों में कार्यरत विषय विशेषज्ञ अपने आलेख शोधपत्र अथवा पुस्तकें अंग्रेजी में लिखते हैं। वह हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषा में विज्ञान लेखन में रुचि नहीं रखते। संभवत: भाषागत कठिनाई तथा वैज्ञानिक समाज की घोर उपेक्षा उन्हें आगे नहीं आने देती। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली का कोश तैयार करने का बीड़ा उठाया हुआ है। वर्ष 1961 में संसद में पारित प्रस्ताव के मुताबिक सभी विषयों के लिए सभी भाषाओं में शब्दावली तैयार की जाएगी। वैज्ञानिक शब्दों में भिन्न अर्थों की गुंजाइश कम होती है। संस्कृत में व्याकरण और शब्द-निर्माण के नियमों में विरोधाभास नहीं के बराबर हैं। भाषा जानने वालों को संस्कृत शब्दों में ध्वन्यात्मक सौंदर्य भी दिखता है। पर आज भी संस्कृत उतनी लोक प्रिय भाषा नहीं बन पाई है । इस वजह से कोशिश हमेशा यह रहती है कि शब्दों के तत्सम रूप से अलग सरल तद्भव शब्द बनाए जाएं। शब्दावली ऐसी होनी चाहिए जो विज्ञान सीखने में मदद करे और विषय को रुचिकर बनाए। बीसवीं सदी के प्रख्यात भौतिकीविद रिचर्ड फाइनमैन ने अध्यापकों को दिए एक व्याख्यान में समझाया था कि शब्द महत्त्वपूर्ण हैं, उनको सीखना है, पर पहली जरूरत यह है कि विज्ञान क्या है, यह समझ में आए। ये दो बातें बिल्कुल अलग हैं और खासतौर पर हमारे समाज में जहां व्यापक निरक्षरता और अल्प-शिक्षा की वजह से आधुनिक विज्ञान एक हौवे की तरह है। अधिकतर वैज्ञानिकों के लिए विज्ञान महज एक नौकरी है। चूंकि पेशे में तरक्की के लिए हर काम अंगरेजी में करना है, इसलिए सफल वैज्ञानिक अक्सर अपनी भाषा में कमजोर होता है।

हिंदी में विज्ञान लेखन की शताब्‍दी पूरी हो चुकी है। जो यह कहा जाता है कि हिंदी में विज्ञान की पुस्‍तकें नहीं हैं तो यह झूठ है। विज्ञान के लगभग सभी विषयों पर हिंदी में सैकड़ों पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं। धीरे-धीरे विज्ञान शब्‍दावली का भी विकास हुआ। भारत सरकार के शब्‍दावली आयोग ने पारिभाषिक शब्‍दावलियां छापी हैं। इनमें वैज्ञानिक शब्‍दों की कमी नहीं है। हालाँकि उनमें कई शब्‍द कारखाने में बने शब्‍द जैसे हैं। उन्हें आम भाषा के शब्‍दों से बदला जा सकता है। लोक में जो शब्‍द प्रचलित हैं, उन्‍हें अधिक लेना चाहिए ताकि हर व्‍यक्ति उन्हें समझ सके।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली का हिन्दी में अब अभाव नहीं है परन्तु विज्ञान लेखक इसका समुचित उपयोग नहीं कर रहे हैं और तमाम लेखक स्वयं नित नए शब्द गढ़ रहे हैं। इस अराजक स्थिति के कारण वैज्ञानिक पुस्तकों की भाषा का मानकीकरण नहीं हो रहा है।हिन्दी में विज्ञान विषयक शोधपत्रों आलेखों को प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी के समकक्ष विज्ञान मंचों की स्थापना की आवश्यकता है क्योंकि ऐसे राष्ट्रीय मंचों का अभाव है जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार सम्मेलन आयोजित कर सकें और विज्ञान के बहुपृष्ठी चित्रात्मक शोधपत्रों का संकलन प्रकाशित कर सकें। पाठ्य-पुस्‍तकों में जो विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके लिए जो सहायक पुस्तकें हैं यानी उस विषय को समझने लायक जो लोकप्रिय शैली में लिखी गईं किताबें हैं, उन्‍हें निश्चित रूप से विद्यार्थियों को दिया जाना चाहिए। पाठ्य पुस्‍तकों के साथ ही उस विषय में लिखी रचनाओं के बारे में उसी पुस्‍तक में सूची दी जानी चाहिए। मान लीजिए कोई अंतरिक्ष के बारे में किताब है या सौरमंडल के बारे में किताब है, उसके साथ-साथ उन लोकप्रिय शैली में लिखी गई पुस्‍तकों का भी उसमें जिक्र किया जाना चाहिए कि बच्‍चो ये पुस्‍तकें हैं, इन्‍हें संदर्भ के रूप में पढ़ सकते हो। विज्ञान की गूढ़ बातों को रुचिकर बनाने की कला में दक्षता के अलावा सतत अध्ययन लेखक के लिए बेहद ज़रूरी है और मंच का होना भी। विज्ञान पर लिखने वाले अनेक लोग हैं, किंतु मंच न मिलने के कारण उनकी प्रतिभा सामने नहीं आ पाती महत्वपूर्ण बात यह है कि विज्ञान कथाएं लोगों को युग की जटिलता से आगाह करा सकती हैं, और उनकी प्रवृत्ति को मोड़ भी सकती हैं, विज्ञान कथाओं का सामाजिक उद्देश्य व्यापक एवं उत्तरदायित्व पूर्ण है, क्योंकि इनमें भविष्य का दर्शन किया जा सकता है.’ दरअसल विज्ञान-कथाएं विज्ञान के पाठकों के साथ ही विज्ञान न जानने वालों को भी अपनी ओर आकिर्षत करती हैं, इसलिए विज्ञान साहित्य की इस दिशा में विज्ञान के प्रचार की अद्वितीय क्षमता निहित है। हिंदी में विज्ञान-कथा विधा को यद्यपि एक शताब्दी से भी अधिक समय हो चुका है लेकिन साहित्य के क्षेत्र में अब भी इसकी मुकम्मल पहचान बाकी है। अच्छे साहित्य, विज्ञान हो या गल्प, का उद्देश्य समाज की भलाई, सुख समृद्धि में ही निहित नहीं होता है। वैज्ञानिक सोच विकसित करने तथा अंधविश्वासों के उन्मूलन के लिए साहित्य में विज्ञान को बढ़ावा देने की जरूरत है।

सन्दर्भ ग्रन्थ

1. "मीडिया व्यग्रता का नहीं, समग्रता का परिचायक हो" - ब्रजकिशोर कुठियाला, साहित्य अमृत, अगस्त 15, पृष्ठ 51

2. "विज्ञान पत्रकारिता" - शिवगोपाल मित्र, साहित्य अमृत, अगस्त 15,पृष्ठ 76

3. एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक बाल साहित्यकार सीमूर साइमन का कथन

4. हिन्दी में वैज्ञानिक साहित्य सृजन की स्थिति-डॉ. नवीन प्रकाश सिंह ' नवीन '

5. ‘मेरी विज्ञान डायरी’- देवेंद्र मेवाड़ी

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सबसे ज़्यादा बदनाम साहित्यकार - मनोज कुमार झा

सआदत हसन मंटो

बदनाम लेखक मंटो पर उनके जीवन काल में ही कई किताबें लिखी गईं। मुहम्मद असदुल्लाह की किताब 'मंटो-मेरा दोस्त' और उपेन्द्रनाथ अश्क की 'मंटो-मेरा दुश्मन'। मशहूर आलोचक मुहम्मद हसन अस्करी ने लिखा है, "मंटो की दृष्टि में कोई भी मनुष्य मूल्यहीन नहीं था। वह हर मनुष्य से इस आशा के साथ मिलता था कि उसके अस्तित्व में अवश्य कोई-न-कोई अर्थ छिपा होगा जो एक-न-एक दिन प्रकट हो जाएगा। मैंने उसे ऐसे अजीब आदमियों के साथ हफ़्तों घूमते देखा है कि हैरत होती थी। मंटो उन्हें बर्दाश्त कैसे करता है! लेकिन मंटो बोर होना जानता ही न था। उसके लिए तो हर मनुष्य जीवन और मानव-प्रकृति का एक मूर्त रूप था, सो हर व्यक्ति दिलचस्प था। अच्छे और बुरे, बुद्धिमान और मूर्ख, सभ्य और असभ्य का प्रश्न मंटो के यहां ज़रा भी न था। उसमें तो इंसानों को कुबूल करने की क्षमता इतनी अजीब थी कि जैसा आदमी उसके साथ हो, वह वैसा ही बन जाता था।"

इस विवरण से समझा जा सकता है कि मंटो कैसे उन किरदारों को अपने अफ़सानों में केंद्रीय भूमिका लाने में कामयाब हो पाए जो ज़िंदगी के सियाह हाशिये में गर्क थे। मंटो के किरदार तलछट में रहने वाले हैं, गटर में। बदबू, और सड़ांध मारते माहौल में रहने वाले लोग जिनका चरित्र बाहर से पूर्णत: घृणित दिखाई पड़ता है, पर जब हम उस किरदार के भीतर जाते हैं तो महसूस करते हैं कि वे पतित नहीं हैं, बल्कि मानवीय बोध और संवेदना से लबरेज हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि मंटो मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखते हैं, इस दृष्टि से वह महान मानवतावादी लेखक हैं। मंटो की रचनाओं के पढ़ने के बाद यह कहना कि वह प्रकृत यथार्थ का चित्रण करते हैं, सही नहीं होगा। वैसे, मंटो पर फ्रांसीसी प्रकृत यथार्थवादियों का प्रभाव है। पर मंटो में गहरी राजनीतिक अंतर्दृष्टि भी है। उनकी कई कहानियों में राष्ट्रीय आंदोलन के ऐसे जीवंत चित्रण हैं, जो आंदोलन की प्रकृति को निर्धारित करते हैं। मंटो की कई कहानियां विभाजन की त्रासदी पर हैं और उनमें स्पष्ट पॉलिटिकल टोन है। इस दृष्टि से मंटो अपने समय से काफी आगे नज़र आते हैं।

मंटो के समग्र साहित्य का संकलन करने और उनकी कई गुमशुदा रचनाओं को ढूंढ निकालने वाले ने 'सआदत हसन मंटो, दस्तावेज़-1' में लिखा है, "इस सृष्टि में अंधेरे और उजाले की लड़ाई कितने युगों से जारी है। मंटो ने इस लड़ाई का दृश्य उन आदमियों के कुरुक्षेत्र में भी देखा जो अंधेरों के वासी थे। हमारे परंपराबद्ध और नैतिक मूल्यों के टिमटिमाते दीये, जिन्होंने अंधे क़ानूनों को जन्म दिया था, उस अंधेरी दुनिया तक उन दीयों की रोशनी पहुंचने में असमर्थ थी। शायद इसीलिए मंटो उर्दू भाषा का सबसे ज़्यादा बदनाम साहित्यकार है, जिसे सबसे ज़्यादा ग़लत समझा गया। क़ानून अंधे थे, मगर वे आंखें जिनसे फ़िरंगी हुकूमत या ख़ुदा की बस्ती के तथाकथित बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नैतिक उत्तरदायित्व की झूठी और पाखंडपूर्ण धारणा का झंडा ऊंचा करने वाले कथा साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के चेहरे सजे हुए थे, क्या वे आंखें भी अंधी थीं? और वे साहित्य समालोचक, नैतिकता के वे प्रचारक जिन्होंने साहित्य को अपने विद्वेषों के प्रकाशन का एक आसानी से उपलब्ध माध्यम समझ रखा था, और जो लकड़ी की तलवारों से मंटो का सर क़लम करने की धुन में मगन रहे, आखिर वे क्या देख रहे थे? यह सवाल हमारा नहीं, और न ही नवयुग के सांस्कृतिक मूल्यों का है। यह सवाल मंटो की प्रताड़ित कहानियों, उन कहानियों के चरित्रों -'काली शलवार' की सुलताना और ख़ुदाबख्श और शंकर और मुख़्तार, 'धुआं' के मसऊद और कुलसूम, 'बू' के रणधीर और बेनाम घाटन लड़की, 'ठंडा गोश्त' के ईशर सिंह और कुलवंत कौर, 'खोल दो' की सकीना और सिराजुद्दीन और 'ऊपर, नीचे और दरम्यान' के मियां साहिब, बेगम साहिबा, मिस सिलढाना, डाक्टर जलाल, नौकर और नौकरानी - इन सबका है। और इस सवाल का रुख उन अदालतों या इंसाफ़ की कुर्सी पर बैठे हुए उन इंसानों की तरफ़ नहीं, जिन्होंने मंटो को मुजरिमों के कटघरे मे खड़ा किया, बल्कि उन सामाजिक विद्वेषों की तरफ़ है जो सच के अस्तित्व से इनकार करने के आदी थे। यह सच मंटो की अपनी कल्पना की उपज न था। यह सच हमारे सामाजिक ढांचे की देन था। मंटो ने सिर्फ़ यह किया कि इस सच पर चढ़े हुए गिलाफ़ अपने क़लम की नोक से चाक कर दिए..."

इस 'दस्तावेज़' का पहला खंड समर्पित किया गया 'मोपासां के नाम सौ बरस पहले जिसके बस जिस्म को मौत आई थी।'

मोपासां भी दुनिया के बदनाम लेखकों में शुमार हैं।

मंटो ने खुद और अपने अफ़सानों के बारे में लिखा है, "ज़माने के जिस दौर से इस वक्त हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ़ हैं तो मेरे अफ़साने पढ़िए। अगर आप इन अफ़सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब यह है कि यह ज़माना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां हैं, वो इस अहद की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स को मेरे नाम से मंसूब किया जाता है, दरअस्ल मौजूदा निज़ाम का नुक़्स है-मैं हंगामापंसद नहीं। मैं लोगों के ख़्यालातो-जज़्बात में हेजान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहजीबो-तमद्दुन की और सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं...लोग मुझे सियाह क़लम कहते हैं, लेकिन मैं तख़्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक इस्तेमाल करता हूं कि तख़्ता-ए-सियाह की सियाही और ज़्यादा नुमायां हो जाए। यह मेरा खास अंदाज़, मेरा खास तर्ज़ है जिसे फ़हशनिगारी, तरक्कीपसंदी और ख़ुदा मालूम क्या-क्या कुछ कहा जाता है-लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमब़ख्त को गाली भी सलीक़े से नहीं दी जाती..."

अब इससे ज़्यादा एक लेखक और साफ़-साफ़ कह भी क्या सकता है! सौ बरस से ज़्यादा बीत गए जब मंटो साहब इस दुनिया में तशरीफ़ लाए थे। मक़बूल इंसान थे, बहुत जल्द ही ख़ुदा के प्यारे हो गए। महज़ 42 की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। एक छोटी-सी ज़िंदगी...और इस दरम्यान अदीबों की महफ़िलों से लेकर अदालतों के कठघरे और पागलखाने तक में नमूदार हुए। ज़िंदगी भुगतनी पड़ती है मानो जेल हो, पर मंटो ने ज़िंदगी को भोगा, देखा तहों के भीतर तक जाकर और दिखाने की पुरज़ोर कोशिश भी की...वो कड़वी सच्चाइयां जिन्हें देखकर भी हम देखना नहीं चाहते, मुंह फेर लेते हैं, पर ज़िंदगी की कड़वाहट तो खत्म नहीं होती। अपने-अपने जलवागाह हैं। मंटो कहते हैं ज़रा बाहर तो आइए जलवागाहों से, देखिए हक़ीक़त। जहां वो रोशनी डालते हैं, आंखों में चुभती है, तो क्या बंद कर लें आंखें या आंखों को फोड़ लें या फिर क्या करें?

यह दुनिया रोज़ बनती है। जैसे रोटी। दुनिया बनती रहेगी, बदलती रहेगी। सियाही बढ़ेगी या कम होगी, कह पाना मुश्किल है। पर ज़िंदगी के लिए, एक मुकम्मल ज़िंदगी के लिए जंग शायद खत्म न हो, क्योंकि समय का पहिया थमता और रुकता नहीं। मंटो का साहित्य समय से मुठभेड़ के दौरान आयद हुआ। 'समय से मुठभेड़' के क्रम में ही शायर अदम गोंडवी ने अपनी एक ग़ज़ल मरहूम मंटो को नज़र की है 'जिसके अफ़साने में ठंडे गोश्त की रूदाद है।'

email- manojkumarjhamk@gmail.com

मोबाइल नं. 7509664223

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

दानवीर सेठ किरोड़ीमल // बसन्त राघव // रायगढ़

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वर्तमान रायगढ़ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी है, औद्योगिक नगरी के रूप में इसका तेजी से विकास हो रहा है।छत्तीसगढ़ के पूर्वी सीमान्त पर हावड़ा-बाम्बे रेल लाइन का यह जीवन्त नगर है।इसका एक दिलचस्प इतिहास है राजा चक्रधर सिंह और दानवीर किरोड़ीमल लोहारीवाला के नाम पर इसे विश्व-विख्यात ख्याति मिली हैं , रायगढ़ राज्य की स्थापना सन् 1668 के आसपास महाराष्ट्र चान्दा से विस्थापित राजा मदन सिंह ने की थी। पहले बुनगा बाद में राजा ने नवागढ़ी में "सतखंडा" की नींव डाली और राज्य को विकसित किया। बीसवीं सदी के शुरू में राजा चक्रधर सिंह ने उसे साहित्य और संगीत के लिए विख्यात किया। रायगढ़ नगर की प्रसिद्धि में एक और अमिट नाम है दानवीर सेठ किरोड़ीमल लाहरीवाले का , सच्चे अर्थों में वे आधुनिक रायगढ़ नगर के शिल्पी हैं। अगर उनके योगदान को हटाकर देखें तो रायगढ़ एक व्यवसायिक सामान्य स्तर का शहर ही है। हालाकि वर्तमान में वह एक औद्योगिक नगरी के रूप में तेजी से विकसित हो रहा है।


             सेठ किरोड़ीमल ने यहां पहली बार अधिकाधिक मात्रा में स्कूल, काँलेज, पुस्तकालय, चिकित्सालय, बालमंदिर और बालसदन, भव्य मंदिर, धर्मशाला, कुआ-बावली और काँलोनियों का निर्माण कराया, इतना ही नहीं रायगढ़ शहर को औद्योगिक नगर के रूप में पहिचान दिलाने वाला प्रदेश का प्रथम जूटमिल रायगढ़ में उन्होंने ही स्थापित किया। सेठ किरोड़ीमल ने अपने बुध्दि-चातुर्य से यहां का माल कलकत्ता को भेजा। कठिन संघर्ष, व्यावसायिक बुध्दि के कारण उन्होंने अकूत सम्पत्ति प्राप्त की और अन्त में उसे जनता के हित में ही, सेवा कार्यों में लगा दिया। उनकी यह अप्रतिम सेवा उन्हें महान दानवीरों की श्रेणी में रख दिया, उनकी सेवाएं क्या कभी भुलाई जा सकती है ? 


           राजशाही खत्म होने के बाद सेठ किरोड़ीमल ने ही औद्योगिक नगर के रूप में रायगढ़ नगर की नींव रखी। सेठ किरोड़ीमल जैसे महादानी, समाजसेवक, विलक्षण व्यवसायी कौन थे, कहाँ से आए, उनका जन्म कहा हुआ, यह जानना बहुत दिलचस्प है। सेठ जी का जन्म हिसार (हरियाणा) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में 15 जनवरी 1882 को हुआ था। कम आयु में ही उनमें कुछ कर गुजरने की खाहिस जागी। वे  कलकत्ता आकर छोटे-मोटे व्यापार करते थे, जहां उनके भाग्य का सितारा चमका। प्रो. आर.के. पटेल के शब्दों में " व्दितीय विश्वयुध्द के दौरान 1936 से 1942 तक सेठ किरोड़ीमल जी ने जापान एवं मित्र राष्ट्रो को युध्द की विभीषिका से कराहती जनता के लिए भारी मात्रा में खाद्यान्न दिया। उनकी दृष्टि में मानवता की सेवा ही सर्वोपरि थी। उनके हृदय में युध्द के पक्ष-विपक्ष का भेद नहीं था। " मेरे पापा डाँ० बलदेव जब प्रोफेसर के.के तिवारी के आग्रह पर सेठ किरोड़ीमल के ऊपर एक लम्बा लेख रहे थे तब पं. लोचन प्रसाद पांडेय के बन्धु पं. मुरलीधर पांडेय ने उन्हें बतलाया था "भारत स्वतंत्र हुआ, जब अंग्रेज भारत छोड़कर विदेश जा रहे थे , तब हुकमरानों को कलकत्ता में एक यादगार पार्टी दी गयी थी उसके प्रबन्धक थे श्री किरोड़ीमल , इससे प्रसन्न होकर अधिकारियों ने उन्हें कम्पनी के व्यवसाय में कुछ परसेंट का लाभ तय कर दिया था, इससे उन्होंने प्रभूत राशि कमाई। कठिन संघर्ष, व्यवसायिक तीक्ष्ण बुध्दिमत्ता ने ही उन्हें रायगढ़ आने के लिए उत्प्रेरित किया था। यहाँ उनका कारोबार बढ़ा और दिन दूनी रात चौगुनी कमाई होने लगी। उन्हें यहां सबकुछ मिला, पर वे निःसंतान थे अस्तु अब उनका ध्यान परोपकार की ओर लगा।
             सेठ किरोड़ीमल ने परोपकार के लिए अनेक महती कार्य किये हैं। कुछ प्रमुख इस प्रकार है:- अविभाज्य मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री रविशंकर शुक्ल एवं सेठ पालूराम धनानिया की प्रेरणा से उन्होंने रायगढ़ में 7 मार्च 1946 को गौरीशंकर मंदिर का शिलान्यास पं. शुक्ल के हाथ करवाया था। 13 मार्च 1946 को उन्हीं के हाथों "सेठ किरोड़ीमल धर्मादा ट्रस्ट" की स्थापना कराई गई। रायगढ़ में ही नहीं उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों जैसे दिल्ली, मथुरा, मेंहदीपुर, (राजस्थान),  भिवानी(हरियाणा), पचमढ़ी, रायपुर, किरोड़ीमल नगर आदि नगरों में अनेक धर्मशाला एवं रैन बसेरा का निर्माण कराया जो कि उनके लोकापकारी कार्यों का जीवन्त उदाहरण है, देश का प्रसिद्ध झूला- मेला की शुरुआत भी उन्होंने गौरीशंकर मंदिर से की थी। यह संगमरमर पत्थर से निर्मित विशाल मंदिर है, इसका शिल्प पूर्णतया राजस्थानी है। इसके गर्भगृह के दीवालों पर सत्यम् के चित्र लोगों को पौराणिक गाथाओं की याद दिलाते हैं।


             रायगढ़ की बात चलती है तो मुझे सन् 1975 की याद आती है। उस समय हम लोग धर्मजयगढ़ में रहते थे और वही से जन्माष्टमी के दिन झूला मेला देखने के लिए सपरिवार रायगढ़ आये थे । उस समय पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ लग रहा था (आज भी झूलामेला में वही हाल रहता है) । झूलामेला देखने छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के अन्याय शहरों से लाखों श्रध्दालु आये हुए थे, आज भी भक्तों की संख्या लाखों में होती है और भीड़ इतनी रहती हैं, कि स्टेशन से लेकर मंदिर तक आने में कहीं भी पांव रखने की जगह नहीं रहती। मैं दो वर्ष पहले भी रायगढ़ आया था। पापा जी घर में नहीं थें। बीमार हालत में अकेले मम्मी ने मुझे के. जी. हास्पिटल रायगढ़ में भर्ती कराया था। यहीं मेरा निःशुल्क इलाज हुआ था। एक जुलाई 1947 को सेठ किरोड़ीमल ने महात्मा गांधी नेत्र चिकित्सालय का लोकार्पण राजर्षि पुरूषोत्तमदास टंडन से करवाया था, (वे पं. मुकुटधर पांडेय के मित्रों में थे) नेत्र चिकित्सालय के समीप ही असर्फी देवी महिला चिकित्सालय है सेठ किरोड़ीमल जी ने अपनी पत्नी के नाम से इसका निर्माण कराया था। इसका उद्घाटन भी पं. रविशंकर शुक्ल ने ही किया था। यह आधुनिक एक्सरे मशीनों से सर्वसुविधायुक्त अस्पताल था। यहाँ निःशुल्क इलाज किया जाता है। पहले अस्पताल का सारा खर्च ट्रस्ट व्दारा उठाया जाता था।


          शिक्षा के क्षेत्र में सेठ जी अत्यंत उदार एवं जागरूक थे। मेरे जीवन की एक घटना मुझे याद हैं, वह आर्दश बाल मंदिर से जुड़ा हुआ है, नवाकुवरों की शिक्षा के लिए इसे भी सेठ जी ने ही शुरु किया था। इसके एक प्रखंड में कथक नृत्य (ताडंव पक्ष) की शिक्षा पं. फिरतू महाराज यहाँ की बालिकाओं को वर्षों तक देते रहे। सन्  1975-76 की बात है पापा जी जब स्थानातरण में कोड़ातराई आए, तब उन्होंने अपना निवास रायगढ़ में रखा। उन्होंने स्कूल में दाखिला के लिए मुझे इसी बालमंदिर में लाये, वहाँ के वयोवृद्ध बोड़े, गुरुजी मेरा गठिला शरीर देखते ही, बिना कुछ जवाब सवाल के कह दिया, यह लड़का कमजोर है, यहाँ नहीं ले सकते, पिता जी दुखी हुए , बोले "बिना सवाल-जवाब के जांचे-परखे आपने ऐसा कैसे कह दिया? क्या आपको पहलवानी कराना है। स्काउट मास्टर के नाम से प्रसिद्ध बोड़े सर के मन में चाहे जो रहा हो, जो भी परिस्थिति रही हो, उन्होंने मुझे भर्ती नहीं किया। मुझे सरस्वती शिशु मंदिर में दाखिला मिला, नटवर हाईस्कूल से मैंने मैट्रिक और किरोड़ीमल विज्ञान कला महाविद्यालय से अपने बड़े भाई शरद के साथ हिन्दी में एम.ए तक की डिग्री ली। इस तरह मैं इस शहर से जुड़ा रहा। नटवर स्कूल रायगढ़ के सामने खेल का बड़ा मैदान था, जो अब  कई प्रभावशील लोगों व्दारा काट छाट कर छोटा कर दिया गया है। खैर...... यह स्कूल और मैदान पंतगबाजी, जालीदार भवन भी सेठ जी की ही कृपा का फल हैं।


          रायगढ़ में आचार्य विनयमोहन शर्मा, कविवर रामेश्वर शुक्ल अंचल जैसे नामी-गरामी विव्दान प्राचार्य के रूप में कार्य कर चुके है । पं. प्रभुदयाल अग्निहोत्रि जैसे संस्कृत के महापंडित भी प्रोफेसरी कर चुके है। इस विद्यालय से पं. मुकुटधर पांडेय और जनकवि आनंदी सहाय शुक्ल से भी गहरा सम्पर्क रहा है।
            रायगढ़ के जिस कोने पर चले जाइये उनके यादगार के रूप में कई इमारतें सेठ किरोड़ीमल के नाम पर ही मिलेंगी। लेकिन छत्तीसगढ़ ,मध्यप्रदेश, बिहार और उड़ीसा में तथा अन्यान्य जगहों पर सेठ किरोड़ीमल के नाम पर ईमारतें खड़ी हैं यदि पाँलिटेक्निक काँलेज रायगढ़ की चर्चा न की जाय तो इस लेख का उद्देश्य अधूरा रह. जायेगा। सेठ किरोड़ीमल ने रायगढ़ में मध्यप्रदेश के प्रथम पाँलिटेक्निक काँलेज का निर्माण कराया था, जो कि आकार में किसी छोटे मोटे विश्वविद्यालय का स्मरण कराता है। छत्तीसगढ़ - मध्यप्रदेश का पोलिटेक्निक कालेज होने की वजह से यहां अब तक लाखों इंजीनियर तैयार हो चुके हैं, यहाँ विश्व प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री  डाँ० आर.जी. बुलदेव भी प्रथम प्राचार्य के रूप में सेवा दे चुके है। सेठ  किरोड़ीमल ने इस काँलेज की स्थापना सन् 1955 में की थी। इसका उद्घाटन देश के प्रथम राष्ट्रपति डाँ०राजेंद्र प्रसाद ने किया था। समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार एवं पुरातत्ववेत्ता पं. लोचन प्रसाद पांडेय ने की थी। इसका परिसर पेड़-पौधों से घिरा हुआ है रंग -बिरंगे फूल पौधे इसकी शोभा बढ़ाते हैं। इसके तीन खंड है जिसमें शताधिक कमरे है और जहां मौखिक, प्रैक्टिकल के साथ प्रायः सभी विषयों की पढ़ाई होती हैं। पिछले पचास पचपन वर्षोँ में यहाँ लाखों इंजीनियर निकल चुके हैं, और देश के विभिन्न भागों में सेठ किरोड़ीमल का नाम राष्टव्यापी कर चुके हैं। इसी बिल्डिंग में एक आँडिटोरियम भी हैं, जिसमें शहर तथा दूसरे शहरों के कवि, लेखक एवं कलाकार शिरकत करते हैं।


              जनचेतना के अग्रदूत सेठ किरोड़ीमल ने सभी सुविधाओं से युक्त एक पुस्तकालय की भी स्थापना 1954-55 में की थी, इसका निर्माण नेत्र चिकित्सालय और बूजी -भवन (धर्मशाला)के बीच किया था। इस पुस्तकालय का परिवर्धन पालूराम धनानिया कामर्स काँलेज के प्राचार्य श्री नंदलाल शर्मा ने बड़ी निष्ठा से किया था, खेद है रख रखाव के अभाव में वह प्रायः सभी विषयों की पुस्तकों का विशाल ग्रंथालय भी दीमकों का आहार हो गया। धर्मशाला में ठहरने वाले यात्रियों के लिए ट्रस्ट की ओर से भोजन - पानी की व्यवस्था रहती थी, खेद है, इसका उपयोग व्यावसायिक परिसर के रूप में किया जा रहा है। सेठ जी व्दारा निर्मित काँलोनियों में वर्षों से काबिज में से कुछ लोग स्थाई रूप से कब्जा कर चुके हैं।


             आधुनिक रायगढ़ के इस महान शिल्पी का देह पतन 2 नवम्बर 1965 को हुआ था, पर यंश काया रुप से वे आज भी हमारे बीच जीवित है। ऐसे महान  धर्मवलम्बी  सेठ किरोड़ीमल का नाम समाज व्दारा क्या कभी भुलाया जा सकता है, रायगढ़ उनका सदैव ऋणी रहेगा।
                                    बसन्त राघव
              पंचवटी नगर, बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़

सोमवार, 28 अगस्त 2017

कहानी // मैं लड़की नहीं हूँ क्या? // अमिताभ वर्मा

निरोद नलिनि बेहरा की कलाकृति

शाम हौले से अपना पल्लू समेट रुख़सत हो चुकी थी। रात को जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने में देर थी। सुरेखा अपने कमरे में थी, दुतल्ले पर। छोटा-सा एक कमरा। तीन तरफ़ बिखरा दीवारों-दरवाज़ों का मायाजाल; एक तरफ़ एक झरोखा। यही उसकी मनपसंद जगह थी। उसका बिस्तर इसी झरोखे से सट कर लगा था। खिड़की का पर्दा हवा के झोंकों में इठलाता; पर्दे में टँकी नन्ही-नन्ही घंटियाँ टुनटुनातीं। बिस्तर से सुरेखा को आसमान में टिमटिमाते तारे और उनसे अठखेलियाँ करता चाँद दिखता।

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पास-ही आले पर रखे रेडियो पर एक गीत बज रहा था। सुरेखा आँखें मींच कर गीत सुनने लगी। अचानक मधुर स्वर लहरी को कर्कश ध्वनि ने डँस लिया। शोर में गीत का वजूद गुम हो गया। शोर, जो कई आवाज़ों के मेल से बना था। लोहे के लोहे से टकराने की आवाज़। शीशा छनछना कर टूटने और किर्च-किर्च बिखरने की आवाज़। सड़क के पत्थरदिल सीने पर फ़ौलाद के घिसटने की आवाज़। और फिर, कोई आवाज़ नही - सन्नाटा! दिल दहला देने वाला सन्नाटा! सुरेखा घबराई। उठी। खिड़की से नीचे सड़क की ओर झाँका।

सड़क पर जुगनू-ही-जुगनू बिखरे थे। उसे विश्वास न हुआ। ध्यान से देखा। वे काँच के टुकड़े थे जिन पर लैम्प पोस्ट की रोशनी चमक रही थी। एक ओर एक स्कूटर ढुलका पड़ा था। दूसरी ओर पड़ा था एक शरीर। बस, एक शरीर। ज़िंदा या मुर्दा, मालूम नहीं। सुरेखा थोड़ी देर ताकती रही। शायद कोई सड़क से गुज़रे। शायद वह शरीर हिले। पर नहीं। न कोई सड़क से गुज़रा; न सड़क पर पड़े लावारिस जिस्म में कोई हरकत हुई।

सुरेखा को अहसास हुआ - यह एक सड़क दुर्घटना थी। एक ऐसी दुर्घटना जिसमें आहत करने वाला सुनसान रास्ते का फ़ायदा उठा कर फ़रार हो गया था। सुरेखा लपक कर नीचे उतरी। भाई घर नहीं लौटा था। माँ-बाबूजी को बताया। इससे पहले कि माँ-बाबूजी ठीक से समझ पाते, सुरेखा सड़क पर थी। बाबूजी भी लपकते हुए आए। वे ज़ख़्मी को पलटने की कोशिश करने ही वाले थे कि सुरेखा ने चेतावनी दी - ’’नहीं! न उसे हिलाइए, न उठाइए। गर्दन या पीठ में चोट हो सकती है, बाबूजी!’’

गनीमत थी कि अजनबी ने हेलमेट पहना हुआ था। वह अचेत था। सुरेखा फिर बोली, ’’बाबूजी, प्लीज़! टॉर्च ... ’’ आधे रास्ते आई माँ पलट कर वापस गईं और टॉर्च ले आईं। सुरेखा ने अजनबी के मुँह में दो उँगलियाँ डाल कर मुँह के अन्दर इकट्ठा चीज़ें निकालीं - एक अदद पूरा दाँत, दाँत का आधा टुकड़ा, और ख़ून का थक्का। अजनबी के गालों से रक्त बह रहा था।

सुरेखा फिर बोली, ’’एक जग पानी! सैवलॉन!’’

थोड़ी देर बाद अजनबी सुरेखा के ड्राइंग रूम में था। मुश्किल से बोल पा रहा था, पर ठीक था। कुछ इशारों से, कुछ डायरी की मदद से, और कुछ बोल कर उसने बताया कि उसका नाम अक्षत है, वह पी एच डी का छात्र है, और छात्रावास में रहता है। सुरेखा का भाई, विनय, अक्षत को छात्रावास छोड़ आया।

मध्यमवर्ग के शान्तिप्रिय परिवार के लिए यह घटना टी वी सीरियल से ज़्यादा अहम थी। उस रात सोने तक इसी घटना की चर्चा होती रही। और होता रहा बखान सुरेखा की समझदारी का। जैसे वह एम ए की छात्रा न हो कर एम बी बी एस की छात्रा हो, या फ़्लोरेंस नाइटिंगेल हो! सुरेखा बिस्तर पर लेटी तो ज़रूर, पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। पास थे ख़याल, जीवन की नश्वरता के। जीवन जैसे माला हो मनकों की। मनकों के आकर्षण पर तो सब रीझते हैं, पर डोर की कमज़ोरी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

दुर्घटना को दो दिन बीत गए। बात आई-गई हो गई। बचे, तो सड़क पर स्कूटर घिसटने के दाग़। सुरेखा ने विनय से पूछा, ’’उस लड़के को देखा था जिसका एक्सिडेंट हो गया था?’’

’’हाँ! क्या हुआ उसे?’’ विनय उल्टा पूछ बैठा।

’’अरे, मैं ये पूछ रही हूँ कि फिर जा कर देखा था उसे हॉस्टल में?’’

’’पागल हो क्या? उसके दोस्त-वोस्त होंगे, वार्डन-शार्डन होंगे - देख ही लेंगे। हमने पहले ही ज़रूरत से ज़्यादा कर दिया है उसके लिए।’’ विनय लापरवाही से कॉलर ठीक करता हुआ बोला।

बाबूजी, माँ, दोनों सुन रहे थे। सुरेखा की बात उन्हें ठीक लगी। विनय को जाना पड़ा अक्षत को देखने। वापस आया तो बोला, ’’माँ! उसका गाल तो फ़ुटबॉल की तरह फूल गया है। बुख़ार भी है।’’

’’दवा-दारू चल रही है या नहीं?’’ माँ ने पूछा।

’’दवा तो चल रही है, दारू के बारे में पता नहीं!’’ विनय शरारत से बोला। फिर सुरेखा की तरफ़ अर्थपूर्ण नज़रों से देखता हुआ बोला, ’’हम सबको धन्यवाद दे रहा था। ख़ास तौर पर दीदी को।’’

सुरेखा को थोड़ा गुस्सा आया, पर चुप रही। माँ को सब्ज़ियाँ काटती छोड़ वह ऊपर चली गई, अपने कमरे में। विनय बाहर निकल गया दोस्तों में। सुरेखा काफ़ी देर बाद नीचे उतरी, जब माँ ने खाना खाने के लिए आवाज़ दी। चुपचाप खाना खाया, एक-आध ज़रूरी बात की, और चली गई वापस अपनी शरणस्थली, अपने कमरे में।

गुमसुम रहना न जाने कब से सुरेखा का स्वभाव बन चुका था। बाबूजी, माँ, विनय - सब इस बात से वाक़िफ़ थे। कब, कौन-सी बात सुरेखा के जी को छू जाएगी, कहना मुश्किल था। एक बार उदास हो जाए तो पूरा दिन, और कभी-कभी तो कई दिन लग जाते थे उसे सामान्य होने में। उसके स्वभाव की गुत्थियाँ सुलझाने में सब पस्त हो जाते, हार जाते। सच पूछिए, तो अब सबने यह प्रयास ही छोड़ दिया था। तनहाई ही हमदर्द थी, हमराज थी सुरेखा की। बाक़ी साथी जैसे कोई था ही नहीं।

एक सुबह सुरेखा नहा कर खिड़की के पास खड़ी थी। नीचे नज़र गई, तो देखा, कोई ऊपर की तरफ़ ही ताक रहा है। एक फूला, काला गाल; एक गोरा पिचका गाल लिए अक्षत उसे देख रहा था।

सुरेखा को देख कर अक्षत ने हाथ हिलाया। शायद कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से, क्योंकि मुँह विकृत कर दायें हाथ को बायें से तुरत थाम लिया अक्षत ने। उसने कुछ ऐसा मुँह बनाया, कि सुरेखा को हँसी आ गई। सीढ़ियाँ उतरते समय भी उसके होठों पर हँसी खिल रही थी। अक्षत ड्राइंग रूम में आ चुका था। बाबूजी और विनय भी वहीं थे।

सुरेखा ने छूटते ही पूछा, ’’कहिए! कैसे हैं?’’

’’बस, आपकी दया से बच गया उस दिन, वरना ... ’’ अक्षत कृतज्ञता से बोला।

’’ऐसी कोई ख़ास चोट तो नहीं लगी थी आपको। बस, मुँह पर एक खिड़की खुल गई।’’ सुरेखा ने शरारत से कहा।

’’एक दरवाज़ा भी!’’ अक्षत के नहले पर दहला जड़ते ही सब हँस पड़े।

थोड़ी देर बाद अक्षत चला गया।

सुरेखा ने चहकते हुए कहा, ’’माँ, देखा? अक्षत कितना ठीक हो गया है!’’

माँ ख़ुश थीं। बाबूजी भी। पर, सुरेखा को विनय की आँख में एक विचित्र भाव दिखाई दिया। एक ऐसा भाव जो पहले कभी नहीं दिखा था।

शाम को अक्षत का फ़ोन आया। अगली शाम को भी। फ़ोन रखने के बाद माँ की निगाहें सवालिया सी लगीं सुरेखा को। निर्विकार थे तो सिर्फ़ बाबूजी। वह थोड़ा सिटपिटाई। थोड़ा गुस्सा भी आया। न जाने किस पर। हर कोई अपनी जगह ठीक था। हर प्रतिक्रिया तर्कसम्मत थी। पर उसे न जाने क्यों कटघरे में खड़ा कर जाती थी। हाल ये हो गया, कि अक्षत का नाम आते ही सुरेखा के चेहरे का रंग बदल जाता।

एक दिन सुरेखा ने बड़ी देर तक बात की फ़ोन पर। माँ ने सुनने की, हावभाव भाँपने की कोशिश की। सुरेखा कभी ख़ुश होती, खिलखिलाती, और कभी संजीदा हो जाती। कभी देर तक चुप रहती, मानो डेड रिसीवर थामे हो। माँ की समझ में कुछ न आया, तो वे वापस जुट गईं अपनी दिनचर्या में।

थोड़ी देर बाद सुरेखा उतर कर आई, बाहर जाने को तैयार। माँ चौंकीं, ’’कहाँ जा रही हो सुरी?’’

’’अक्षत के पास।’’ सुरेखा ने छोटा-सा जवाब दिया।

’’अक्षत के पास? कोई ख़ास बात है क्या?’’

’’हाँ!’’

जवाब इतना संक्षिप्त था कि कि माँ सकपका गईं। कुछ अंदेशा-सा हुआ उन्हें। लेकिन बोल सिर्फ़ इतना भर सकीं, ’’जल्दी आ जाना, बेटा।’’

सुरेखा ने, पता नहीं, सुना भी या नहीं। माँ को सीने में दर्द-सा महसूस हुआ। सुरेखा को गए पाँच मिनट भी न हुए थे कि वे घड़ी देखने लगीं। बार-बार। हिसाब जोड़तीं, सुरेखा को गए कितना समय हुआ। थोड़ी देर बाद विनय भी आ गया। वैसे तो उसे घर के कामकाज से कोई सरोकार न था, पर आज माँ से पूछ बैठा, ’’माँ! सब ठीक तो है?’’

माँ बेचारी क्या कहतीं! दिल-ही-दिल में सोचने लगीं, ’’लड़की इतनी बड़ी हो गई। इनकी समझ में तो कुछ आता नहीं। इतना कहा कि अच्छा लड़का देख कर शादी तय कर दी जाए, पर कहाँ? अब न जाने कहाँ गई है! कुछ कर न बैठे। अगर कर लेगी, तो क्या मुँह दिखाऊँगी सबको? फूल जैसी बच्ची, इतने प्यार में पली, और अब ... ’’ माँ रुआँसी हो गईं।

खाने का समय गुज़र गया था। विनय खाना खा चुका था, बाबूजी खाना खा रहे थे। माँ कभी पतीलों को देखतीं, कभी घड़ी को। बाप-बेटे दोनों को ही बताया था कि सुरेखा किताब ख़रीदने गई है, शायद देर से लौटे। पर कब तक यह रहस्य छुपातीं कि सुरेखा अक्षत के पास गई है बाहर जाने के कपड़े पहन कर, शायद कभी न लौटने के लिए!

कदमों की आहट से माँ की तंद्रा टूटी। हड़बडा कर उठीं। बाबूजी के हाथ में कौर धरा रह गया। दरवाज़े से अंदर आने वाला पहला कदम अक्षत का था। उसके पीछे थी सुरेखा।

अक्षत के नमस्कार का ठीक से जवाब नहीं दे पाए माँ-बाबूजी। सुरेखा सकुचाते हुए बोली, ’’अक्षत आशीर्वाद माँगने आए हैं।’’

’’किस बात का?’’ माँ ने सहज होने की असफल चेष्टा के साथ पूछा।

’’शादी का!’’

’’शादी?’’ बाबूजी, माँ चैंक गए। विनय भी बगल के कमरे से आ गया, पाजामे बनियान में।

’’हाँ, शादी!’’

’’पर, तुम ... ’’ माँ-बाबूजी के ऊपर जैसे कोई बम फट पड़ा था।

’’माँ! अक्षत का यहाँ कोई है नहीं। उस घटना के बाद से हमें ही अपना समझने लगे। तो बस, शादी का आशीर्वाद लेने हमारे ही घर आ गए।’’

माँ-बाबूजी सकते में थे। ख़ामोश रहे। अक्षत भी असमंजस में था। सुरेखा ने ही बात आगे बढ़ाई, ’’माँ, बहू को तो बुलाइए! कब तक बाहर खड़ी रहेगी बेचारी?’’

’’हाँ, हाँ ... ’’ माँ तपाक से बाहर निकलीं, जहाँ शर्म से दोहरी एक युवती खड़ी थी।

माहौल ऐसे बदल गया, जैसे अंतिम गेंद पर छक्का जड़ हारा मैच जीत लिया गया हो! काफ़ी देर तक ठहाके, खिलखिलाहट गूँजती रही। फिर युवती बोली, ’’सुरेखा जी, आपको कैसे धन्यवाद दूँ! आपने रात के समय एक ऐसे शख़्स की मदद की जो आपके लिए अजनबी था। अगर समय पर मदद न मिलती, तो शायद ये दुर्घटना एक हादसे में बदल जाती। बाद में भी आपने अक्षत का खयाल रखा, सिर्फ़ इंसानियत के नाते। संवेदनशील होने की वजह से। आपके और अक्षत के सामीप्य का कुछ दूसरा अर्थ भी निकल सकता था। शायद आप कुछ झंझावातों से भी गुज़री हों, पर ... ’’

’’यह सब आपको कैसे मालूम?’’ सुरेखा ने मासूमियत से पूछा।

’’मैं लड़की नहीं हूँ क्या?’’ युवती मुस्कराई। बाबूजी और अक्षत भी। माँ की आँखों में बादल घुमड़ रहे थे। सुरेखा विनय की आँखों में न देख पाई।

उसकी आँखें नीची जो थीं।

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लेखक परिचय -

अमिताभ वर्मा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रौद्योगिक संस्थान से खनन अभियांत्रिकी में स्नातक हैं। उन्होंने निजी क्षेत्र की विभिन्न कम्पनियों में पैंतीस वर्ष कार्यरत रहने के बाद 2016 में अवकाश ग्रहण किया। वे आकाशवाणी से बतौर समाचार सम्पादक और समाचार वाचक सम्बद्ध रहे हैं। उनके तेरह-तेरह एपिसोड के दो धारावाहिक नाटक - बाल-श्रम के विरुद्व ’अब ऐसी ही सुबह होगी’ तथा कन्या-संरक्षण पर ’नन्ही परी’ - आकाशवाणी पर प्रसारित हुए। वे सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के टेलिविज़न तथा रेडियो कार्यक्रमों में अभिनय तथा पटकथा लेखन द्वारा योगदान करते रहे है। उनकी रचनाओं का संकलन, ’कृतिसंग्रह’, बहुत सराहा गया। उन्होंने एक अंग्रेज़ी पुस्तक, ’स्टेइंग इन्सपायर्ड’, भी लिखी है। अभी हाल में उनकी ई-बुक - कहानी-संग्रह ’उसने लिखा था’ - प्रकाशित हुई है।