गुरुवार, 10 अगस्त 2017

धर्मेंद्र निर्मल की कविताएँ

रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति

1.    आओ कुछ करने चलें हम

मिलेगी मंजिल रख विश्वास
आओ कुछ करने चलें हम ।
कुछ न कर सकने के गम से
अच्छा कुछ करने चले हम।।

बैठ मुंडेर खुजाना छोड़
सस्वर चहक चलाए डैने।
खातिर निज नव धवल सदी में
नवल सूरज लाने के बहाने।।

चलो, उड़ान भरने चलें हम।।

जग जयकार चकित करता
समता देख हार मनकों की।
रगड़े खींचे खरोंचे कहीं
टूटे, फूटी हँसी तिनकों की।।

स्नेह जतन करने चले हम।।

सोने की चिड़िया पर कब से
बैठे हैं बाज लगाए घात।
भोग बिलाव दबे पाँव, मन
पर करता प्रतिपल आघात।।

स्व-वितान बनने चलें हम।।


2.    हो लाल तुम्हीं

रणबांकुरों बजाओ भेरी
उठो माँ की रखनी है लाज।
झुके न सर कभी अपना
टूट पड़ो तुम बनकर गाज।।

चाहो तो यह प्राण समर्पित
जग के सारे सुमन समर्पित।
ललकारो हे सिंहो ! तुम पर
जन जन शक्ति वचन समर्पित।।

ज्यों दादाजी ऐंठी मूँछें
दो मरोड़ दुश्मन के गर्दन।
साँप का शीश मसल दे बानर
पलक झपकते कर दो मर्दन।।

धरती पुलकित हो जाएगी
अंबर गर्वित हो जाएगा।।
देख तुम्हारा रण कौशल
संसार चकित हो जाएगा।।

भाल तुम्हीं भारत माँ के
हो ढाल तुम्ही भारत माँ के।।
विंध्य हिमालय की छाती
हो लाल तुम्हीं भारत माँ के।।


3. हर युग में तेरी गोद मिले

जाते जीवन अर्पण करने
शीश झुका, दो सुमन चढ़ा लूँ।
हो सके लौट न पाउँ रण से
पद रज तिलक भाल चढ़ा लूँ।।

लोहे सा अभेद बने छाती
करूँ कीट सा मैं अरि मर्दन।
दहले दसों दिशा नभ-धरती
करूँ घोर जब सिंह गर्जन।।

हो मस्तक शिखर गगनभेदी
उत्सर्ग हो बन जीवन निर्झर।
हूँ चरणों का मैं दास तेरा
हो धन्य विलीन यह प्राण सिकर।।

माँ, युग युग जग विख्यात रहो
अग्रणी तेरा वन उपवन खिलें।
युग युग सत्कर्म करूँ यही
हर युग में तेरी गोद मिले।।

4¬¬. आओ कबड्डी खेलें

आओ कबड्डी खेलें।
आओ कबड्डी खेलें।।

जोश है जवान है
उमंग है उफान है
मौसम भी मेहर बान है
कुछ उधर हो लो
कुछ इधर हो लें

इस विस्तृत मैदान में
हमारी कबड्डी के लिए
दायरा निश्चित है।
दाँव पेंच में दक्ष
जो भी हो पक्ष
जीत संभावित है।।

यह बाउण्ड्री है
इसी के भीतर ही
सबको रहना है।
एक खिलाड़ी की हार
होगी दल की हार
इस सिद्धांत पर चलना है।।

दर्शकों की नजर में
कितना भी गिर जाएँ
मन से नहीं गिरना है।
गिर ही पड़े तो
ध्यान रहे कि
बाहर नहीं गिरना है।।

गिरे या गिराए गए
कारण कुछ भी हो
खेल से निकासी होगी।
मैदान संभालेंगे
बाकी बचे दिग्गज
समय पर वापसी होगी।।

इस तू तू मैं मैं में
परस्पर प्रत्येक को
टाँग खींचने का अधिकार है।
इस सिद्धांत पर
दोनों ही दल का
बराबर अधिकार है।।

निर्णायक औपचारिक
नगण्य भूमिका में
निर्णय जरूर होंगे।
अपनी सर्वोपरि
तुती होगी वरना
लात घूसे होंगे।।

हार और जीत है
सिक्के के पहलू दो
जिधर से ले लें।
व्यक्तिगत भेद भूल
सिद्धांत के बल पर
एक दूसरे को झेलें।।

आओ कबड्डी खेलें।
आओ कबड्डी खेलें।।


5. अक्षर ज्ञान
अक्षर अक्षर दीप जलाएँ
आओ अंधकार मिटाएँ।।
इमली की खटास भूलाकर
ईख सी मीठी बोली पाएँ।।
उल्लू जीवन से उठे हम
ऊपर चढ़ते जाना सीखें
ऋषि मुनिगण आदर पाएँ।

एक से इक्कीस हो जाए
ऐसा पथ निर्माण करें।।
ओखली में सिर न धरे
औरत का सम्मान करें।।
अंगूठे का चिन्ह मिटाएँ
अहा ! जीवन उल्लास भरे।

कमल सा मन रखें कोमल
खबर रहे कीचड़ न मिले।
गमले में सही पर दे खूश्बू
घर घर स्नेह गुलाब खिले।।
अङगा चङगा गङगा नहाए।

चटक मटक से दूर रहे
छप्पर में भी होती खुशियाँ।
जबरन नहीं सताता है दुख
झरनों सा हो जीवन बढ़िया।।
अ उँआ से पीछा छुड़ाए

टटोलो भलीभांति परखो
ठगे जाओगे वरना जग में।
डर को मन से फेंक निकाल
ढँकता है रस्ता पग पग में।।
बाण बचन के सोंच चलाएँ

तलवार से लो जीवन में सीख
थका कौन सहारे लड़ते।
दया दान सिखाता सागर
धर्म कर्म इसी से बढ़ते ।।
नर नारी सम दर्जा पाए।

पत्तों से हवा दवा मिले
फल मीठा देते हैं पेड़।
बरसाता बादल को खींच
भरे भू गोद संवारे मेड़।।
ममता भरी छाँव दे जाए

यमराज अशिक्षा है यारों
रस्सी की जकड़न भारी।
लड़ना नहीं पढ़ो बढ़ो
वक्त से वरना दुनियाँ हारी।।

षब्दों को देखो सँवार
षडदर्शन की है गहराई।
सत्य सदा जीता है जग में
हम भारतीय भाई भाई।।

क्षमा करेंगे क्षमा मिलेगा
त्रस्त करेंगे त्रस्त रहेंगे।
ज्ञानी बन बाँटेंगे ज्ञान
श्रम से भाग्य सँवारेंगे।।

अक्षर जोड़े मात्रा लगाए
शब्दों का संसार बनाएँ।
हिंदुस्तान की जान है हिंदी
हिंदी की हम शान बढ़ाएं।।

6. आ बाँधू तुम्हें राखी

आ बाँधू तुम्हें राखी ।
बाँधू भैया तुम्हें राखी।।

जीवन किस्मत का पासा है,
सदा रहोगे आशा है,
सुख दुख में मेरे साथी।।

कदम कही डगमग डोले,
कंधे के नीचे आ हौले,
बन जाओगे बैसाखी।।

फँस जाउँ किसी उलझन में,
दुनिया के विशाल गगन में,
दोगे दिशा दिखा झाँकी।।

बाँध रही मैं स्नेह पूरित,
करती रहे नित अंकुरित,
प्रेम ह्रदय में राखी।।

सुसज्जित हुई कलाई,
कच्चे धागे में भाई ,
उर निधि सौगात राखी।।    


धर्मेन्द्र निर्मल
ग्राम पोस्ट कुरूद भिलाईनगर जिला दुर्ग
मो.नं. 9406096346

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