गुरुवार, 10 अगस्त 2017

शब्द संधान // घुटने का दर्द // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

डॉ. रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति

कई सप्ताह से बाएँ घुटने में दर्द रहता है। इससे चलना फिरना मुहाल हो गया है। डाक्टर को दिखाया तो सबसे पहले उसने मेरी उम्र पूछी। उम्र सुनते ही वह मुस्कराया। बोला, घबराइए नहीं। इस उम्र में अक्सर ऐसी समस्याएँ आ जाती हैं। जाती नहीं हैं। ज्यादह दर्द हो तो दर्द निवारक दवा लेलें। ठन्डे पानी से सेंक कीजिए। कुछ दिनों बाद मैं डाक्टर से दुबारा मिला। बताया कि ठन्डे पानी से सेंक का कोई फ़ायदा नहीं है। बोले, गरम पानी से सेंक करके देखिए। और अब मैं कभी गरम और कभी ठन्डे पानी से सेंक करता हूँ। ज्यादह दर्द होता है तो दर्द निवारक गोली भी खा लेता हूँ। दर्द से समायोजन कर लिया है। जाएगा तो है नहीं। वह तो अच्छा है दर्द घुटने का है, दांत का नहीं है। वरना दांत का दर्द ! बाप रे ! दांत के दर्द में तो आदमी खुद ही दर्द हो जाता है। समझ ही नहीं पाता है कि मैं दर्द हूँ कि दर्द मेरे दांत में है।

जब से पता चला है कि घुटने का मेरा दर्द स्थाई मेहमान है, मैं घुटने पर सोच-विचार शुरू कर दिया है। घुटना, जैसा कि हम जानते ही हैं इंसान की जांघ और टांग के बीच का जोड़ है। अगर यह घुटना न हो या इसमें कोई दोष आ जाए तो आदमी न खडा हो सकता है न चल सकता है। बहुत छोटे बच्चों के घुटने अ- विकसित होते हैं शरीर का भार नहीं उठा पाते। इसीलिए न खड़े हो पाते हैं न चल पाते है। ‘घुटनों के बल’ चलते हैं। ‘घुटने घुटने’ चलते हैं।

गर्मियों में लोग अक्सर “घुटन्ना” पहनते हैं। घुटन्ना घुटने तक का पाजामा होता है। घुटने तक की पैंट “हाफ-पैंट” कहलाती है। अब तो फैशन के मारे लोग (स्त्री और पुरुष,दोनों ही) घुटनों से भी ऊपर के छोटे “शॉर्ट्स” पहनने लगे हैं।

आदमी चिंतन करते समय तरह तरह की मुद्राएं बनाता है। कुछ लोग सर खुजलाते हैं तो कुछ लोग ठोंड़ी पर उंगली रखते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो जब सोच में पड़ जाते हैं, ‘घुटनों में सर करके’ बैठ जाते हैं। इसमें हताशा और चिंता दोनों ही झलकती हैं।

अपनी आत्मीयता दिखाने के लिए सम्बंधित व्यक्ति के ‘घुटने से लगकर बैठना’ एक आम बात है। पर हार जाने पर हम दुश्मन के आगे अपने ‘घुटने टेक देते’ हैं।

जब से पता चला है, घुटने का मेरा दर्द जाएगा नहीं, तो ऐसे में, इसके बारे में किसी से कहना-सुनना बेकार है। अन्दर ही अन्दर घुट के रह जाता हूँ। जैसे बुढापे का अपना मज़ा है, अन्दर ही अन्दर घुटने का भी अपना ही मज़ा है ! मज़े ले रहा हूँ।

कुछ लोगों के उम्र के साथ सर के बाल उड़ जाते हैं। कुछ फैशन के चलते ऐसे भी हैं जो जानबूझकर अपने बाल ‘घुटवा’ लेते है। सर सफाचट करवा लेते हैं। ज़रूरी नहीं, ‘ये घुटे हुए लोग’ हों - चालाक और काइयां। ये सहज या ज़रूरत के मारे भी हो सकते हैं।

कुछ घरेलू दवाइयों को घोटकर,पीसकर बच्चों को लिए “घुट्टी” बनाई जाती है जो ज़रूरत पड़ने पर रोग के अनुसार उन्हें पिला दी जाती है। और वे स्वस्थ हो जाते हैं। लेकिन हम बड़े लोगों को भी “घुट्टी पिलाने” से बाज़ नहीं आते। ‘घुट्टी पिलाएं’ या ‘पट्टी पढाएं’ बात एक ही है।

परीक्षा के समय अक्सर बच्चे बिना समझे ही अपने पाठ रट डालते हैं, याद कर लेते हैं। ‘घोट लेते हैं’ और ज्यों का त्यों अपनी उत्तर पुस्तिका में लिख आते हैं। अच्छे नंबरों से पास भी हो जाते हैं।

होली के समय हर एक को मस्ती सवार रहती है। जो लोग शराब आदि नहीं पीते, ठंडाई में भांग घोटने लेने से तो वे भी बाज़ नहीं आते। भांग जितनी ही अधिक घोटी जाती है, कहते हैं, उतनी ही चढ़ती भी है।

घुट घुट के मरना और घुट घुट के जीना भला कौन चाहता है ? पुरुष प्रधान समाज में आज भी बहुतेरी स्त्रियाँ घुट घुट के जीती हैं, और घुट घुट के ही मर जाती हैं। लेकिन अब धीरे धीरे तस्वीर बदल रही है। मुगले आज़म के एक गाने ने समाज पर बड़ा प्रभाव डाला है। “प्यार किया तो डरना क्या ? मौत वही जो दुनिया देखे, घुट घुट के यूं मरना क्या ?” इसमें हमें आज की नारी का बेख़ौफ़ रवैया और जिंदादिली दिखाई देती है।

बहरहाल, ‘घुटना’ पैर का हो, या, मन ही मन ‘घुटना’ क्यों न हो, कभी न कभी वह दर्द का वाहक तो बन ही जाता है।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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  1. सही में, दर्द शारीरिकी हो या भावना का दर्द तो है ही दोनों का समायोजन ही कारण पड़ता है।बढिया लेख।

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  2. दर्द में घुटना अच्छा नहीं होता, घुटना बंद कमरे में, आग लगी हो और कमरा बंद हो, डर के मारे या ठीक से सांस नहीं ले पाने के कारण भी संभव है। दर्द सहने का तरीका है उसे अपना लेना, पर उससे दर्द कम भी तो नहीं होता। प्यार पा नहीं पाने पर घुटना घुटना कर जिंदा लाश की तरह जी लेते हैं। अच्छा विश्लेषणात्मक लेख। भाषा ज्ञान वर्धक आलेख। धन्यवाद।

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  3. दर्द में घुटना अच्छा नहीं होता, घुटना बंद कमरे में, आग लगी हो और कमरा बंद हो, डर के मारे या ठीक से सांस नहीं ले पाने के कारण भी संभव है। दर्द सहने का तरीका है उसे अपना लेना, पर उससे दर्द कम भी तो नहीं होता। प्यार पा नहीं पाने पर घुटना घुटना कर जिंदा लाश की तरह जी लेते हैं। अच्छा विश्लेषणात्मक लेख। भाषा ज्ञान वर्धक आलेख। धन्यवाद।

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  4. आपकी यह शैली मुझे प्रभाकर माचवे जी की याद दिलाती है। वे भी इसी तरह के साहित्यिक व्यंग्य लिखा करते थे। जब कोई अपने वाले के पक्ष में उसकी गलती होने पर भी तरफदारी करे तो उसके लिए मालवी में एक कहावत है "घुटना तो अपने पेट की तरफ ही मुड़ता है।"
    एक श्रेष्ठ रचना पढ़वाने के लिए आभार!

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