बुधवार, 16 अगस्त 2017

हमारे पाठक आशीष श्रीवास्तव की रचनाएं

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खोजती रहस्य पृथ्वी !!

अपने अंदर एक संसार लिये
घूम रही है पृथ्वी
अपनी ही धूरी पर
चन्द्रमा को लादे
लगा रही है परिक्रमा
सूरज की......
जैसे कर रही हो साधना...प्रार्थना
अपने अंदर के संसार को
बचाने की....
भाग रही है ऐसे जैसे
मिल गया हो,
अपने ही जैसा कोई ग्रह
मिलने को आतुर है या
बचने की कोशिश में
अपने से बड़े ग्रह से
पता नहीं किस बंधन में
बंधी है
चक्कर पर चक्कर लगाती
जैसे खोज रही हो
आकाशगंगा में अपने जैसा ही
गुम हुआ संसार कोई.....।


संसार

जितना बड़ा संसार
अपने अंदर लिये
घूम रही है पृथ्वी
उससे कहीं बड़ा
संसार उसका बाहर है।

वह घूम भी रही है तो
ऐसे कि
अंदर के संसार को
पता ही न लगे
जैसे पृथ्वी के भीतर
पल-बढ़ रहा है
एक पूरा संसार
वैसे ही हरेक प्राणी
का है अपना
बनाया हुआ एक संसार।



बंधन मुक्त

धीरे-धीरे तोड़ रहा है
जैसे संसार सारे बंधन
पृथ्वी भी धीरे-धीरे
तोड़ रही है अंतरिक्ष के बंधन

अपनी ही धुरी से खिसक
जा रही है सूरज के समीप
जैसे शुक्र और बुध
पहुंच गए सदियों की
अनवरत यात्रा कर....।
जैसे आज मंगल है,
पृथ्वी भी वैसी ही थी
जब मंगल आ जाएगा
पृथ्वी की स्थिति में
पृथ्वी कहलाएगी बुध
बृहस्पति हो जाएगा मंगल
मंगल बन जाएगा पृथ्वी
शुक्र समा जाएगा
सूरज में....।
चलता रहेगा यह चक्र
आखिर सूरज को भी तो
चाहिए ऊर्जा
गर न हो भरोसा तो
देख लो
दूसरी आकाशगंगाओं की प्रक्रिया।


जीवन

केवल सांसें रहते रहना ही
जीवन नहीं
जीवन तो इसके बाद भी है।
पृथ्वी केवल यही पृथ्वी नहीं
कई और पृथ्वी
इसके बाद भी हैं।
चन्द्र-सूर्य केवल
यही नहीं
कई और चांद-सूरज हैं।
संसार केवल
यही संसार नहीं
जल, थल, वायु का
और भी संसार है।
जैसे आकाशगंगा
सिर्फ हमारी ही नहीं
कई और आकाशगंगाएं भी हैं।
जरा निकल कर देखो
पृथ्वी के बाहर
नई जिंदगी तुम्हें
बुला रही है
किसी नए ग्रह पर....!



अकेला कहां हूं मैं....!

तुम गए तो लगा
अकेला हो गया हूं मैं
असफलता से डरता रहा
इसलिए कि हो जाउंगा
अकेला.....
पर आंखें बंद की तो
लगा अकेला कहां हूं मैं
प्रतिदिन सूरज मिलने
आता है, मुझसे
किरणों संग
चंद्र बतियाता है रात्रि में
मुझसे तारों संग
हवा हमेशा होती है साथ मेरे
जैसे पूर्वजों की अदृश्य
शक्ति घुली-मिली हो
जब शुभचिंतक नहीं होते
मेरे पास
तब भी एक पूरा संसार
मेरे आसपास होता है
यही तो मेरी
सफलता है....
मेरे उत्साह का कारण
मुझ पर बनी हुई है
प्रकृति की कृपा

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-- आशीष श्रीवास्तव
स्वतंत्र पत्रकार,  भोपाल
ashish35.srivastava@yahoo.in

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