शनिवार, 19 अगस्त 2017

पत्नी पीड़ितस्य व्यथानाम प्रथमोध्याय // अविनाश कुमार झा

जीवन अदलजा की कलाकृति

कहावत है "अप्पन हारल और बहुअक मारल" कोई किसी नहीं बताता। " भीतर के मार खायल वो ही जाने जो खाया है!" "जा हो बूड़बक मेहरारु से हार गये!" माना जाता है कि महिलाएं शारीरिक बल में कमजोर होती है पर यह " अर्धसत्य " है, ओमपुरी वाला नहीं!

तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जो  " महिला सशक्तिकरण" के "लहालोट " में गंवई बिजली के बल्ब की तरह भुकभुका रहा है।सो काल्ड मर्दवादी समाज में " पत्नी पीड़ित" मुखर और संगठित नहीं है। है तो ये विमर्श टाइप का विषय पर किसी" सो काल्ड वाद" न जुड़ पाने और किसी "दल "का समर्थन न मिल पाने के कारण " नेपलिया ट्रेन" की भांति धुकधुका कर चल रहा है। काफी पहले से ही कुछेक मर्द अपनी पत्नियों द्वारा प्रताड़ित होते आ रहे हैं। कहने का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि मर्द स्त्रियों पर जुल्म नहीं करते! बल्कि  क्विंटल के भाव में " महिला उत्पीड़न" हो रहा है पर क्या इससे महिलाओं को भी " टिट फार टैट" का लाइसेंस मिल जाता है?

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बेचारे इन पत्नी पीड़ितों के सूखे और उतरे चेहरों को देखो! क्या तुम्हें इनके पिलपिले शरीर" चमगादड़" जैसे ठेहुनिया काटे बैठे मरदूद पर दया नहीं आती। क्या पूरे पुरुष जाति के जुल्मों का बदला इन निरीहों से ले लोगे! यही चाहते हो कि मर्द आत्महत्या करते रहे हैं और महिलाएं जलाई जाती रही हैं। ये जो बड़े बड़े संन्यासी घर दुआर छोड़कर "घुड़मुड़िया" खाते रहे हैं ,एक प्रकार के पत्नी पीड़ित कहे जा सकते हैं।

फिल्मी संस्करणों में " हंटरवाली, बेरहम जालिम सास" से पीड़ित दामाद भी " स्त्री पीड़ित "की एक श्रेणी हैं। बड़ी छोटी कंपनियों और नौकरियों में यदि कि " जबरदस्त महिला बास" का पाला पर गया तो वो बेचारा दीन हीन ही जानता है कि क्या क्या झेलना पड़ता है। यह भी " स्त्री पीड़ितों" की एक श्रेणी है। कहते हैं" संघे शक्ति कलयुगे" पर इन बेचारों के संघ का तो सरकार भी रजिस्ट्रेशन करने से मना कर रही है क्योंकि " स्त्री विरोधी" का ठप्पा लग जाने का खतरा है। इन " पत्नी पीड़ितों " की व्यथा तो असहनीय है" बेचारा न घर का है न घाट का"!

वैसे समाज में यह लज्जा और शर्म की बात मानी जाती है । एक मैथिली गीत में दर्द उभरा है कि" हम्मर देह त घटल जाइअ , ओक्कर देह त बढल जाइअ"! उस बेचारे का खून सुखा रहा है खटते खटते पर मलकिनी का दिल नहीं पसीझता है। जल्दी से इसे कोई स्वीकारता नहीं है कि वो स्त्री पीड़ित है। यह बड़े साहस की बात होती है। लोग बाग उसे भले ही " हंसी" का पात्र बनाकर मजाक उड़ाये पर अंदर ही अंदर व्यथित होते हैं कि " काश उसमें भी यह साहस होता। वैसे आज के परिवेश में जब कोई भी पारिवारिक विवाद होता है तो सभी मर्द को ही दोषी ठहराते हैं और महिला के प्रति संवेदना जताते हैं। जैसे कि रोड एक्सीडेंट में गलती किसी की भी हो, मार बड़ी गाड़ी का ड्राइवर ही खाता है! " ढोल गंवार शुद्र पशु नारी, सब है ताड़न के अधिकारी" वाला समय बीत चुका है।

नारीवादियों ने इतना हल्ला मचाया है कि इसमें "पत्नी पीड़ितों" का दर्द नक्कारखाने में तूती के आवाज की तरह है। तभी तो वृद्धाश्रम , अनाथालय की तर्ज पर " पत्नी पीड़ित आश्रम " बन रहे हैं। यूँ तो दहेज विरोधी एक्ट और बलात्कार विरोधी कानून बनते हैं महिलाओं के संरक्षण के लिए पर इसकी प्रताड़ना के शिकार मर्द भला कहाँ जायें?  यह सत्य है कि इन पीड़ितों की संख्या अभी कम है या विभिन्न कारणों से काऊंटिंग नहीं हो पाया है पर भविष्य में बड़ी तेजी से बढ़ने की संभावना दिखती हैं। " आज तो गब्बर बहुत खुश हो रहा होगा कि नाच बसंती नाच!" पर वो दिन दूर नहीं जब गब्बर ता थैय्या कर रहा होगा"! जाके पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीड़ पराई"!

हंस लो आज ! जब विश्वप्रसिद्ध बेलनास्त्र और झाड़ू बम का प्रयोग प्रारंभ होगा तो बोलोगे " भैया सही कहे थे"! मर्दाना टाइप के जनाना से सात हाथ की दूरी बनाये रखियो और " अखिल भारतीय पत्नी पीड़ित संघ" के कार्यालय का पता गूगल बाबा पर सर्च करते फिरोगे।

"इति श्री मेवा खंडे पत्नी पीड़ितस्य व्यथानाम प्रथमोध्याय"।

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