रविवार, 20 अगस्त 2017

कहानी // क्रोध // अंकुश्री

अनीस नियाजी की कलाकृति

बड़ा साहेब के आने की खबर मिलते शनिचरा बेचैन हो गया. अभी दस बज रहा है. साहेब दो बजे आयेंगे. यानी साहेब के आने में अभी चार घंटा बाकी है. वह सोचने लगा. चार-पांच तरह की सब्‍जियां, सूप, चटनी, सलाद, रोटी, चावल, दाल आदि बनाना होगा. वह तैयारी में लग गया. पानी बोझने के बाद वह चूल्‍हा जलाने लगा. अरे, लकड़ी तो फाड़ी हुई है ही नहीं. कुल्‍हाड़ी उठा कर वह जल्‍दी-जल्‍दी लकड़ी फाड़ने लगा.

साहेब के आगमन की बात सुन कर शनिचरा उनके भोजन की तैयारी में लग गया था. उसे यह भी याद नहीं रहा कि वह पिछले तीन दिनों से बीमार है और इस दौरान उसने कुछ खाया तक नहीं है.

शनिचरा की बीबी साहेब के आने की बात सुन कर बहुत खुश हुई. उसे जब पता चला कि साहेब नहीं, बड़ा साहेब आ रहे हैं तो उसकी खुशी आसमान चढ़ कर बोलने लगी थी. बड़ा साहेब के आने पर खाने-पीने की व्‍यवस्‍था ज्‍यादा अच्‍छी होती है. उसने शनिचरा से कहा, ‘‘जाओ ! जल्‍दी-जल्‍दी सब काम निपटाओ. मसाला पीसने और सब्‍जी काटने का काम मैं आकर कर दूंगी.’’ हर बार वह ऐसा ही करती थी. रेस्‍ट हाउस में जब कोई साहेब आ जाते थे, उसकी बीबी उसके कामों में पूरी सहायता करती थी.

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‘‘लेकिन आज हिम्‍मत नहीं कर रहा है.’’ रेस्‍ट हाउस में आने से पहले शनिचरा न बीबी से कहा था, ‘‘उठने पर सिर में चक्‍कर आ रहा है. लगता है, ऐसी हालत में कैसे काम कर सकूंगा.’’

‘‘साहेब आने वाले हैं इसलिये जाना तो पड़ेगा ही. उनके भोजन की व्‍यवस्‍था तो करनी ही होगी.’’ बीबी ने समझाते हुए धीरे से कहा था, ‘‘साहेब के आने से आज के भोजन की समस्‍या तो हल हो जायेगी.’’ और शनिचरा रेस्‍ट हाउस पहुंच कर काम में जुट गया था.

शनिचरा अनदिना में एक सांस में जितनी लकड़ी फाड़ लेता था, उतनी लकड़ी फाड़ने में आज वह बदहाल हो गया था. एक बार जब कुल्‍हाड़ी उठा कर वह लकड़ी पर वार करता था तो उसे लगता था कि कुल्‍हाड़ी का दूसरा वार लकड़ी पर नहीं कर सकेगा. लेकिन एक के बाद दूसरा, दूसरा के बाद तीसरा और फिर - - - इस तरह वह लकड़ी के कुंदे पर लगातार वार करता गया.

पौने दो बजे एक बार शनिचरा ने सारे कामों का मुआयना किया. उसने सब काम फीट-फाट कर दिया था. उसे संतोष हुआ कि समय से पहले ही उसने सारी तैयारियां पूरी कर ली है. सब्‍जी तैयार, दाल तैयार, मुर्गा तैयार, सब कुछ तैयार. आटा गुंथ कर रख दिया है और भात के लिये चूल्‍हे पर पानी भी तैयार है. साहेब के आते खौलते हुए पानी में चावल छोड़ देगा. दूसरे चूल्‍हे पर तवा रख कर फुलकी सेंक लेगा. पापड़ तो खाने के समय तला ही जाता है. इधर भात पसायेगा और उधर पापड़ के लिये तेल गरमा जायेगा.

साहेब दो बजे आयेंगे. अभी दस मिनट देर है. सारी तैयारी पूरी हो चुकी है. देह का पोर-पोर टूटा जा रहा है. साहेब के आने के बाद फुरसत कहां मिल पायेगी. अभी मौका है, क्‍यों न एक प्‍याली चाय पी ली जाये. यह सोच कर उसने चाय चढ़ा दी.

लकड़ी की तेज आंच, एक प्‍याली चाय का पानी तुरंत खौलने लगा. चीनी और चाय की पत्‍ती डाल कर शनिचरा ने जल्‍दी-जल्‍दी चाय छान ली. कुछ खाना तो दूर, सुबह से उसके गले में एक घूंट पानी भी नहीं उतरा था. उसका गला सूख रहा था. चाय की प्‍याली हाथ में थामते ही उसके मुंह में पानी भर आया.

प्‍याली से गरमा-गरम धुंआ उठ रहा था. चाय की प्‍याली से उठ रहे धुएं में शनिचरा को अपनी बीबी और बच्‍चे का चेहरा दिखाई देने लगा. वह सोचने लगा कि गरमा-गरम चाय पीकर वह अपना सूखा हुआ गला तर कर लेगा. लेकिन उसके बीबी-बच्‍चे की भूखा से ऐंठ रही अंतड़ियों की गरमी और बढ़ गयी होगी. बीबी तो रेस्‍ट हाउस में आयी भी थी. लेकिन मसाला पीसने और सब्‍जी काटने के बाद वह वापस चली गयी थी. उससे गलती हो गयी. उसने यही चाय यदि उस समय बनायी होती तो बीबी को भी एक प्‍याली मिल गयी होती. जाड़े के भूखे पेट में गरमा-गरम चाय जाती तो बीबी को कुछ राहत मिलता. लेकिन काम में उलझे रहने के कारण उसे इस बात का खयाल ही नहीं रहा. साला काम भी अजीब बला है, जब तक निपट नहीं जाये, दिमाग कुछ सोच ही नहीं पाता.

एक बार उसने सोचा कि क्‍यों न चाय की यह प्‍याली बीबी को दे आये. लेकिन उसने फिर तुरंत सोचा कि नहीं, साहेब आ गये तो ? साहेब के आने पर उपस्‍थित नहीं रहने से सब किये-कराये पर पानी फिर जायेगा. नहीं, वह ऐसी गलती नहीं करेगा. बीबी के लिये चाय लेकर जाने की बात उसने दिमाग से झटक दी. उसने सोचा कि साहेब के खाने के बाद बचा-खूचा खाना अपने घर ले जायेगा तो बीबी-बच्‍चा दोनों के गले उतरेगा. साहेब के आने और खाने में अब देर ही कितनी है ?

हाथ में चाय की प्‍याली पकड़ वह अपनी बीबी-बच्‍चा के बारे में सोच रहा था. उसने अभी चाय पीनी शुरू नहीं की थी. बीबी के लिये चाय लेकर घर नहीं जाना है, यह फैसला करने के बाद उसने चाय पीनी शुरू की. उसने अभी हाथ की प्‍याली होठों से लगायी ही थी उसे मोटर का हॉर्न सुनायी पड़ा. उसके कान खड़े थे. वह चौकस था. हाथ की प्‍याली स्‍वतः होठों से हट कर जमीन पर चली गयी.

प्‍याली एक तरफ सरका कर वह किचन से बाहर निकल आया. रेस्‍ट हाउस के गेट पर एक कार खड़ी थी. वह गेट की ओर दौड़ पड़ा. कार की अगली सीट पर ड्राइवर था. पिछली सीट पर साहेब और मेम साहेब बैठे हुए थे. गेट खोल कर उसने साहेब और मेम साहेब को अदब के साथ झुक कर प्रणाम किया. लेकिन साहेब और मेम साहेब आपसी वार्तालाप में व्‍यस्‍त थे. वे शनिचरा को तो देख रहे थे, लेकिन उसके अभिवादन को नहीं दख सकें. अभिवादन की स्‍वीकृति नहीं मिलने के बावजूद शनिचरा को किसी तरह की झेंप नहीं हुई. साहेबों को किये गये अभिवादन की अस्‍वीकृति से वह अभ्‍यस्‍त हो चुका था.

रेस्‍ट हाउस के सामने कार लग जाने पर ड्राइवर ने डिक्‍की खोल दी. शनिचरा डिक्‍की का सामान रेस्‍ट हाउस के अंदर पहुंचाने लगा. उसके बाद उसने साहेब लोगों के लिये चाय बनायी. जब वह चाय लेकर रेस्‍ट हाउस में गया तब तक साहेब और मेम साहेब यात्रा के कपड़े बदल चुके थे. साहेब ने कुरता-पाजामा पहना था और मेम साहेब मैक्‍सी पहनी हुई थी. दोनों टेबुल के आमने-सामने की कुर्सियां पर बैठे थे.

चाय का ट्रे टेबुल पर रखते समय मेम साहेब ने शनिचरा को टोका, ‘‘खाना तैयार है ?’’

जवाब देने के लिये शनिचरा मेम साहेब की ओर मुखातिब हुआ. झिल्‍लीदार मैक्‍सी के अंदर से मेम साहेब की पूरी देह दिखाई दे रही थी. जब शनिचरा की नज़र उनके अंगों पर पड़ी तो वह शरमा गया. ऐसी निर्लज्‍ज पोषाक कि शरीर का अंग-अंग दिखाई पड़े ! छीः-छीः ! शर्म के कारण शनिचरा ने मेम साहेब की ओर से मुंह फेर लिया. साहेब की ओर मुखातिब होकर उसने कहा, ‘‘खाना तैयार है सा‘ब, लाऊं क्‍या ?’’

‘‘खाना लगाने की तैयारी करो !’’ मेम साहेब ने कहा, ‘‘चाय पीने के पांच मिनट बाद खाना ले आना.’’ मेम साहेब की बातें सुन कर भी शनिचरा इस बार उनकी ओर नहीं ताका.

चुपचाप आदेश स्‍वीकार कर शनिचरा किचन में आ गया. मेम साहेब की पारदर्शी पोशाक और उसके अंदर से झांक रहे उनके अंग अब भी शनिचरा की आंखों के सामने घूम रहे थे. क्‍या पोशाक बनाने के लिये उन्‍हें पारदर्शी के अलावा और कोई कपड़ा ही नहीं मिला ! यदि मेम साहेब ऐसी पोशाक पहनती हैं तो साहेब उन्‍हें क्‍यों नहीं मना करतें ! शनिचरा सलाद काट रहा था और मेम साहेब की पोशाक के बारे में सोचे जा रहा था. तभी किचन में, उसके माथे के ऊपर दीवाल में लगी घंटी घनघना उठी. घंटी की आवाज कान में पड़ते उसके हाथ का चाकू सलाद के प्‍लेट में आ गया और वह रेस्‍ट हाउस की ओर दौड़ पड़ा. साहेब ने खाना निकालने के लिये घंटी बजायी थी.

शनिचरा ने खाना लगा दिया. खा चुकने के बाद साहेब ने जूठा बरतन हटाने के लिये घंटी बजायी. शनिचरा भाग कर गया. उसने देखा कि मेम साहेब अभी हाथ-मुंह नहीं धोयी हैं. साहब बेसिन के पास खड़ा होकर हाथ-मुंह धो रहे थे. मेम साहेब बैठी-बैठी खाने के प्‍लेट में ही हाथ-मुंह धो रही थीं. प्‍लेट पर नज़र पड़ते शनिचरा हैरत में पड़ गया. मेम साहेब जिस प्‍लेट में हाथ-मुंह धो रही थीं उसमें बहुत सारा जूठा खाना भरा हुआ था. टेबुल पर रखे भोजन के सभी बरतन प्रायः खाली हो चुके थे. उन बरतनों का खाना मेम साहेब अपने प्‍लेट में ले तो ली थीं, मगर खा नहीं पायी थीं. मेम साहेब को अंचाते देख कर शनिचरा ठिठक कर खड़ा हो गया. उसने देखा कि मेमसाहेब प्‍लेट में हांथ तो धो ही रही थीं, कुल्‍ला भी उसी में कर रही थीं. खाने के प्‍लेट में कुल्‍ला करते देख कर शनिचरा का मन घृणा से भर गया.

जूठा बरतन हटाने के बाद किचन में आने पर शनिचरा ने राहत की सांस ली. काम निपटा कर स्‍थिर होते ही उसे भूख महसूस होने लगी. भूख से उसकी अंतड़ियां मरोड़ रही थीं. साहेब की सेवा में लगे रहने के कारण उसे भूख का अहसास तक नहीं हो पाया था. साहब और मेम साहेब को खिलाने के बाद उसे अपनी बीबी और बच्‍चे की चिंता सताने लगी. उसने जल्‍दी-जल्‍दी साहेब के ड्राइवर को खिला दिया.

सबके खा चुकने के बाद एक आदमी लायक खाना बच रहा था. यदि मेम साहेब जूठन में इतना खाना बेकार नहीं करतीं तो बचा हुआ खाना तीन आदमी के लिये बहुत था. खाना एक आदमी के लिये ही बचा है तो क्‍या हुआ ? उसी में बांट कर खा लेगा. बचा हुआ खाना घर ले जाने के लिये उसने एक प्‍लेट में निकाल लिया.

खाने का प्‍लेट लेकर शनिचरा रेस्‍ट हाउस के पिछले गेट से अपने घर जा रहा था. हाथ में खाना का प्‍लेट लेकर घर जाते हुए उसे संतोष हो रहा था. बीमारी के कारण पिछले तीन दिनों से उसके खाली पेट को आज खाना मिलेगा ही, दो दिनों से भूखे रह रहे बीबी-बच्‍चा को भी कुछ राहत मिल जायेगा. कल ही उसकी बीमारी खत्‍म हो गयी थी. आज उसे पत्‍य खाना था. लेकिन पथ्‍य की कोई व्‍यवस्था नज़र नहीं आ रही थी. वह खाने की कोई व्‍यवस्‍था के जुगड़ में ही था कि उसे साहेब के आने की सूचना मिल गयी थी और वह - - - -. अच्‍छा ही हुआ, साहेब के आ जाने से उसके पथ्‍य की भी व्‍यवस्‍था हो गयी और परिवार को भी कुछ खाने के लिये मिल जायेगा. खाना थोड़ा-सा ही है तो क्‍या हुआ ? खाली पेट के लिये बहुत बड़ा राहत हो जायेगा. और एक बात यह भी तो है कि साहेब लोगों का खाना स्‍वादिष्‍ट तो होता ही है, उसमें पौष्‍टिक तत्‍व भी पूरा हुआ करता है. आधा पेट ही सही, भूख से मरोड़ती हुई अंतड़ियां कुछ तो शांत हो जायेंगी. साहेब के दिन के खाना के लिये आये हुए सामानों में से थोड़ा-सा चावल और आटा बच गया था. चाय के साथ साहेब को देने वाले कुछ बिस्‍कुट भी बच गये थे. उसने बचा हुआ सामान अपने गमछा में बांध लिया था. तेज कदमों से वह चला जा रहा था.

रेस्‍ट हाउस के पिछले गेट से निकल कर शनिचरा अभी बीस कदम ही बढ़ा होगा कि उसके कानों में मोटर के हॉर्न की आवाज सुनाई पड़ी. आवाज रेस्‍ट हाउस के मेन गेट की ओर से आयी थी. शायद साहेब कहीं जा रहे थे. वह झटके से पीछे मुड़ गया. लेकिन तभी उसका ध्‍यान अपने हाथ के प्‍लेट की ओर चला गया. हाथ में खाना से भरा प्‍लेट लेकर साहेब के पास जाना ठीक नहीं होगा. यह सोच कर उसने अपने गमछा से प्‍लेट को ढंक दिया अैर प्‍लेट रास्‍ते से थोड़ा हटा कर रख दिया. गमछे में बंधा चावल, आटा और बिस्‍कुट उसने गमछा के दूसरे छोर से अच्‍छी तरह ढंक दिया.

दौड़ कर गया तो देखा कि साहेब का मोटर मेन गेट से बाहर खड़ा है और ड्राइवर गेट बंद कर रहा है. साहेब कहीं जा रहे थे. साहेब के साथ मेम साहेब भी बैठी हुई थीं.

शनिचरा पर नज़र पड़ते साहेब ने इशारे से उसे अपने पास बुलाया. अभी वह साहेब के पास पहुंच भी नहीं पाया था कि साहेब उसे डांटने लगे, ‘‘ड्राइवर इतनी देर से हॉर्न बजा रहा है और तुम्‍हारा कहीं पता नहीं है. रेस्‍ट हाउस में चौकीदारी करनी है तो ठीक से काम करो. - - - ’’ शनिचरा हाथ जोड़े खड़ा था. वह रोज के पगार पर काम करता था. वह पगार भी उसे कई महीने से नहीं मिल पाया था.

मोटर स्‍टार्ट हो चुका था. लेकिन शनिचरा के दिमाग में अब भी साहेब की बातें घूम रही थीं. बड़ा साहेब ठहरे, अगर इनकी नाराज़गी का थोड़ा-सा भी आभास यहां के किसी साहेब को हो गया तो नौकरी बचाना मुश्किल हो जायेगा. शनिचरा की नज़र से साहेब का मोटर ओझल हो गया था. वह रेस्‍ट हाउस की ओर चल पड़ा. साहब पता न कब तक आवें. यह सोच कर वह जल्‍दी-जल्‍दी रेस्‍ट हाउस का दरवाजा बंद करने लगा.

जब वह रेस्‍ट हाउस के पिछले गेट पर पहुंचा तो सामने का नज़ारा देख कर उसे काठ मार गया. खाना के प्‍लेट पर एक कुत्‍ता झुका हुआ था. उसका गमछा भी प्‍लेट के पास नहीं था. ज्ञोड़ी दूर पर रेस्‍ट हाउस का नाला बहता था. शनिचरा ने देखा कि उसका गमछा नाले में लटक रहा था. लटके हुए भाग में ही चावल, आटा और बिस्‍कुट बंधा हुआ था.

प्‍लेट का खाना तो कुत्‍ता खा ही गया, गमछा में बंधा चावल, आटा और बिस्‍कुट भी बेकार हो गया. यदि साहेब के मोटर का हॉर्न सुनाई नहीं पड़ता तो खाना से भरा प्‍लेट और गमछा में बंधा सामान छोड़ कर वह हरगिज नहीं जाता, नहीं खाना और खाने का सामान बरबाद होता. उसे साहेब पर क्रोध आ रहा था. उसका मन कर रहा था कि वह मोटर का पीछा करते हुए अभी जाये और साहेब का मुंह नोच ले. मोटर का पीछा करने जैसा दुभर काम भी संभव हो सकता था. मगर साहेब का मुंह नोचना ? इसके बाद उसका क्‍या होगा ? यह सोचते उसका सारा क्रोध साहेब से हट कर कुत्‍ते पर आ गया. दांत पीसते हुए वह उस पर झपट पड़ा.

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अंकुश्री

प्रेस कॉलोनी, सिदरौल,

नामकुम, रांची(झारखण्‍ड)-834 010

E-mail : ankushreehindiwriter@gmail.com

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