गुरुवार, 24 अगस्त 2017

राजा चक्रधर सिंह प्रणीत अनूठे संगीत नृत्य संबंधी पाँच चर्चित ग्रंथ // डॉ०बलदेव

जिबन ब्रत नर्जरी की कलाकृति

राजा चक्रधर सिंह प्रणीत अनूठे
संगीत नृत्य संबंधी पाँच चर्चित ग्रंथ:-
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नर्तन सर्वस्व / तालतोय निधि / तालबल पुष्पाकर / मुरजपरण पुष्पाकर / रागरत्न मंजूषा

राजा साहब जब कोई बोल या तोड़ा टुकड़ा या परणों का निर्माण करते तब पहले उसे रफ कॉपी में रिकॉर्ड करते। इसके बाद संगीतकारों के बीच उस पर गंभीर विचार विमर्श होता। कई कलाकार अपने अपने ढ़ंग से भाव प्रदर्शन से उस रचना को स्पष्ट करते। जिसमें ज्यादा खूबसूरती मिलती उसे भी अलग से दर्ज करते। इसके बाद राजा साहब अंत में स्वयं उसे तबले पर निकालते । जब संतुष्ट हो जाते और एक प्रकार से सभा में सहमति मिल जाती तब रचना पूरी मानी जाती ।राजा साहब के तबला वादन के साथ ही साथ कविगण उसे श्लोकबध्द करते और चित्रकार मुद्राओं का अंकन करते, यानी भाव प्रदर्शन , नर्तन, वादन के साथ ही साथ लेखन। जिस कवि का श्लोक तथा चित्रकार का चित्र सबसे अच्छा होता उसे फाइनल करते, रजिस्टर में दर्ज करवाते और लेखन कक्ष में भेज देते। पैलेस मैनेजर श्यामलाल जिन्होंने कि मोतीमहल के पहले तल्ले में लेखन कक्ष का चयन किया था, अपनी निगरानी में उसे चिंतामणी कश्यप से लिखवाते। चिंतामणी के सहायक लेखकों में जगदीश प्रसाद थवाईत और लोकनाथ पुरोहित नाम के दो और व्यक्ति थे। लेखन कक्ष में राजा साहब के छोड़ किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं थी।लेखकों से बाहर भी कोई व्यक्ति बात नहीं कर सकता था। ये लेखक अंतिम रूप दी गई और राजा साहब व्दारा टिक की गई रचनाओं को ब्लू ब्लैक इंक से ग्रंथ निर्माण के लिए लाए गए स्पेशल पेपर पर लेखनीबध्द करते। एक ब्लॉट भी नहीं पड़ने देते। चिंतामणी कश्यप को हेडक्लर्क का वेतन २० रूपए प्रतिमाह दिया जाता था। वे दरबार में राजा की मृत्युपर्यन्त रहे।

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नर्तन सर्वस्वमः-

नर्तन सर्वस्वम कथक के अंग उपांग का संपूर्ण ग्रंथ है। मजबूत काली जिल्द से बंधा यह ग्रंथ खासतौर पर कथक नृत्य का सबसे बड़ा और प्रमाणिक ग्रंथ है।इसके मुख पृष्ट पर सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ है- ऩर्तन सर्वस्वम।उसके नीचे राजा चक्रधर सिंह का नाम है तथा सबसे नीचे १९३८ ई० लिखा हुआ है। नर्तन सर्वस्वम का मुख्य आधार है भरतमुनि प्रणीत नाट्य शास्त्र, राजा सवाई प्रताप सिंह जयपुर व्दारा लिखित और २५ जून १९१० को प्रकाशित राधा गोविंद संगीत सार, श्री दुर्गाप्रसाद व्दारा प्रणूत संगीत दर्पण। किवंदती यह भी है कि नर्तन सर्वस्वम का असली आधार विशाखदत्त प्रणीत नर्तन रहस्यम है।
इसके श्लोक को संस्कृत भाषा में आबध्द करने वाले आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं- जानकी वल्लभ शास्त्री,व्याकरणाचार्य पंडित सदाशिव दास, साहित्याचार्य पं० भगवान पांडे तथा कवि भूषण।
दुर्लभ ग्रंथ नर्तन रहस्यम में १००० से अधिक पृष्ठ हैं। ३५० पृष्ठों की तो भूमिका ही है। इसे सबसे पहले सन १९३८ में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन इलाहाबाद में अवलोकनार्थ रखा गया था। रायगढ में जो भी विद्ववान आते राजा साहब सबसे पहले उन्हें इसी ग्रंथ को दिखाते थे। राजा साहब के निधन के बाद वह ग्रंथ छोटी रानी लोकेश्वरी देवी के पास सन १९७७ तक रहा। इसके बाद महाराज कुमार सुरेन्द्र कुमार के हाथों सौंप दिया गया तब से ग्रंथ उन्हीं के पास सुरक्षित है।

तालबल पुष्पाकर :-
सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार यह ग्रंथ भी अपूर्ण लिखा गया है। इसके लिए तबले के बोल परन रफ में बना कर तैयार हैं।१९४६ में राजा साहब की आज्ञा से खम्हार ऑफिस में कार्य करना पड़ा । हो सकता है इस ग्रंथ को जगदीश थवाईत जी ने तैयार किया हो।
तालबल पुष्पाकर की रफ कॉपी मझले कुमार के पास अब भी उपलब्ध है। इसे तुलसी राम देवांगन, महेन्द्र प्रताप सिंह और प्यारे लाल श्रीमाल ने खुद अपनी आँखों से देखा है और इनके बीरे में कई जगह जिक्र भी किया है।
इल ग्रंथ में राजा साहब ने तबले के इतिहास पर शुरू में प्रकाश डाला है । तबले की उत्पत्ति ताल और बल से मानते हैं। तालबल पुष्पाकर के अनुसार ताल तो एक है राकेन्दु ताल जिसे त्रिताल कहा जाता है, पर यहाँ उपभेद २०५७ बतलाए गए हां।यहाँ कायदा,रेला,पेशकार और तिहाइयों का भी सुन्दर वर्णन हुआ है ।वास्तव में तालबल पुष्पाकर तबला पर ही केन्द्रित ग्रंथ है।


तालतोय निधि:-
तालतोय निधि शायद भारतीय नृत्य संगीत का संबसे बड़ा ग्रंथ है। इसका कुल वजन ३२ किलो है। इस ग्रंथ को १९३८ में शुरू किया गया था जो कि माघ स० १९९७ बंसत पंचमी ,शनिवार , तारीख १/२/१९४१ को पूरा हुआ था। सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार इसमें एक से लेकर २८४ मात्राओं तक के ताल आबध्द है। इसके तालों के बोल संस्कृत और हिन्दी दोनों में लिखे गए हैं। इसमें तालों के बोल, तालांग दून,चौगुने रेला एंव परण चक्र के अंदर लिखे गए हैं। इसमें १७,१९ जैसे विषम मात्रा के भी ताल हैं। राजा साहब ने उस्तादों को पर्याप्त धन देकर ,उन्हें खुश करके उनसे एक एक बोल प्राप्त किए थे। कहा जाता है नत्थू खां ने राजा के सामने बुलबुल परण से बुलबुल को चहकाया था। वह परण भी इस ग्रंथ में शामिल है । कुछ विशिष्ट तालों के नाम हैं -- सवारी ताल, सरस्वती ताल,सप्तमुख ताल,सन्तिपाल ताल, दशमुख ताल, कलिंग ताल, लक्ष्मण विलास ताल आदि।


मुरजपरण पुष्पाकर:-
यथां नामं तथा गुणं के मुहावरे को चरितार्थ करने वाला तीसरा ग्रंथ है- मुरज परण पुष्पाकर । यह पखवज के बोल,परणों का खजाना है। इसमें ताल,परण,अंग,अणु, द्रुत, लघु, गुरूओं का विस्तार से वर्णन है। इस ग्रंथ को लिखने में तीन वर्ष (१८४३-१९४५) लगे। दरबार के नर्तक और वर्तमान में उनके शिष्यगण इसी ग्रंथ के बोल,परणों पर अधिकाँशतः नृत्य किया करते हैं। यह हरी और लाल जिल्दों की दो खण्डों में लिखा गया था ।
उसका हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है ।


रागरत्न मंजूषा:-
रागरत्न मंजूषा में १२०० राग-रागनियों का वंशवृक्ष सहित वर्णन है। इसकी पाण्डुलिपि शायद पंडित भूषण संगीताचार्य ने बनाई थी, राग रत्न मंजूषा संगीत पारिजात,अभिनव राग मंजरी जैसे प्रसिध्द ग्रंथों के आधार पर तैयार की गई थी।लेकिन सुलेखक चिंतामणी कश्यप बतलाते हैं यह ग्रंथ भी पूरा लिखा नहीं गया है सिर्फ राग के प्रकार गीत,सरगम आदि रफ में तैयार किया गया है । जैसा कि मझले कुमार बतलाते हैं उनके पास जीण-शीर्ण कापी है, उसमें भूषण महाराज के हस्ताक्षर है। इसमें राग और ३६ रागिनियों के अंग उपांगों का वर्णन है इस ग्रंथ का आधार राग विबोध, रागमाला आदि ग्रंथ है।

(विस्तार से जानने के लिए देखें:- रायगढ का सांस्कृतिक वैभव:- लेखक डॉ०बलदेव)
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