पौराणिक साहित्य का पुनर्प्रस्तुतीकरण // यशवंतकोठारी

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पिछले कुछ वर्षों में पौराणिक साहित्य की तरफ फिर ध्यान दिया गया है। इन रचनाओं का पुनर्लेखन हो रहा है,धारावाहिक बन रहे हैं, फ़िल्मी उद्योग भी ध्यान दे रहा है। सबसे बड़ी बात विदेशी रचनाकार भी भारतीय पौराणिक साहित्य की और आ रहे हैं। मेक्स मुलर के बाद पीटर ब्रुक्स के महा भारत ने सबका ध्यान खींचा है। रामानंद सागर की रामायण ,व् चोपड़ा की महाभारत चर्चित रही थी। कन्हयालाल मुंशी जी की कृष्णावतार की सीरीज भी काफी पढ़ी गयी थी। नरेंद्र कोहली की राम कथा, महासमर भी चर्चित रहे। यह परम्परा टी वी पर भी खूब चली। खूब फिल्में बनी । बाद में कुछ समय के लिए अन्तराल आ गया।

लेकिन अंग्रेजी में अमिश त्रिपाठी, अशोक बेंकर, देवदत्तपटनायक जैसे लेखकों ने भारतीय पौराणिक साहित्य को वापस लिखना शुरू किया और नए पाठक व् दर्शक पैदा हुए। प्राचीन साहित्य को नया आयाम मिला।

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टेक्नोलॉजी के सहारे नए धारावाहिक बनाये जा रहे है ,जिनको नयी पीढ़ी पसंद कर रही है। कुछ दशक पहले बने धारावाहिक या फिल्मे आज के टेक्नोलॉजी के सामने बहुत कमजोर व् हलके दीखते हैं। अस्त्र शास्त्रों के नए रूप सामने आरहे हैं, जो दिव्य व् भव्य लग रहे हैं । तकनीक के कारण धरती फट जाती है ,आकाश में उड़ जाते हैं । इन पौराणिक घटनाओं के प्रस्तुतीकरण से पहले एक छोटा सा डिस्क्लेमर दे दिया जाता है और निदेशक प्रोडुसेर अपने हिसाब से रचना को प्रस्तुत कर देता है। यहीं से यह प्रश्न पैदा होता है की क्या पौराणिक साहित्य महज़ कथाएं है या ये कभी वास्तविकता थे। इन रचनाओं पर वाद विवाद हो खुले मन से विवेचना हो यह तो ठीक लेकिन इनको तोडा मरोड़ा जाये, इनको व्यावसायिकता केलिए तोड़ मरोड़ कार पेश किया जाये यह कहाँ तक न्यायोचित है। देवासुर संग्राम से शुरू होकर ये गाथाएं आर्यों, द्रविड़ों तक आती हैं। त्रि देव, देव ,असुर, राक्षश ,यक्ष, किन्नर , आदि की नयि- नयी कल्पनाएँ सामने आ रही हैं। स्वर्ग लोक, सूर्य लोक,भूलोक,अलका पूरी,पाताल लोक ,आदि कल्पनाएँ नईं नहीं है, लेकिन इनका प्रस्तुतीकरण विचित्र है। नयी टेक्नोलॉजी ने यह सब संभव किया है। महिला सशक्तिकरण का असर भीं रचनाओं में देखने को मिल रहा है, एक धारावाहिक में नारी पात्र पुरुष पति के छाती पर पांव रख देती है।

पुराणों,उपनिषदों ,गीता ,भा गवत को आधार बना कर नए ढंग का लेखन , प्रस्तुतीकरण हो रहा है ,जिसे पसंद भी किया जा रहा है।

यह एक विराट सभ्यता का संक्रमण कल है जिसके अंतिम परिणम क्या होंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता । राम, कृष्ण दुर्गा आदि केवल पौराणिक पा त्र ही नहीं है वे जन मानस को दूर दूर तक प्रभावित करते हैं। यहीं स्थिति अन्य धर्मों के पा त्रों पर भी लागू होती है।

सवाल ये नहि है की क्या दिखाया जारहा है,या क्या लिखा जारहा है, सवाल ये है इन सबके समाज , परिवार, देश पर लम्बे समय के बाद क्या असर होगा।

एक तर्क यह है की लम्बे समय तक बार बार लिखे जाने पर ही यह साहित्य आज इस परिश्क्र्त रूप में हमारे सामने हैं, और आज के युग के अनुरूप इनका लेखन ,प्रस्तुतीकरण जनहित में ही होगा। धार्मिक दृष्टि से ना भी सोचे तो भी नयीपीढ़ी को जो विजन देकर जाना चाहते हैं उस पर विचार ही अभीष्ट है। समय के साथ साथ देवी देवताओं की देह की कल्पनाएँ की गईं । चार हाथ या शक्तियों का पुंज बनाया गया , असुरों से बार बार युद्ध किया गया, हर बुराई का जवाब दिया गया । गुण दोषों के आदर पर लेख् न हुआ । ऋषि मुनियों ने आवश्यकता के अनुरूप सुधार किये। ये सुधार जारी रहे, लेकिन एसा ना होकी इन रचनाओं का मूल भाव ही तिरोहित हो जाये कहीं एसा ना हो की कोई सिरफिरा लेखक-निर्देशक किसी पौराणिक पात्र को मोबाइल का प्रयोग करते या चेटिंग या जींस में दिखा दे।

अरेबियन नाइट्स ,केटेंब्री टेल्स भी भारतीय साहित्य के अनुरूप ही विकसित हुयी है,प्रथ्वी के जन्म से ही यह सब चल रहा है, ,समुद्र मंथन से शुरू हुआ संघर्ष आज भी जारी है। पौराणिक साहित्य हमें मानव स्वाभाव को सम् झने की दिशा देते है,स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को भी समझाते हैं । इनको इतिहास न माने पर कथात्मकता तो इनमें है ही। हमें तथ्यात्मक भूल करने से बचना चाहिए।

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यशवंत कोठारी,86,लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर -३०२००२

म०-९४१४४६१२०७

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