शनिवार, 5 अगस्त 2017

कहानी // पनही // सत्यनारयाण पटेल

ऋतु पटेल की कलाकृति

चार -पाँच दिन से भिड़कर पूरण ने एक जोड़ी पनही तैयार की थी। उसके बाप-दादा भी पटेलों के लिए पनही और पटलनों के लिए बाणा गढ़ते- गढ़ते ही मरे-खपे थे। यह पूरण का ख़ानदानी काम था। पनही में एक-एक टाँका बहुत मन से टाँकने के बाद पूरण उन्हें चमकाने में जुटा था।

पूरण की बाखल में पनही व बाणा और लोग भी गढ़ते थे। लेकिन पूरण के हाथों के हुनर की बात कु़छ  अलग ही थी। गाँव वाले कहते, पनही ढोर की खाल से नहीं, बल्कि हिरदे की खाल से गढ़ता है। खासकर गाँव के खास पटेल यानी मुखिया के पैरों को केवल पूरण के हाथों गढी़ पनही ही जँचती।  किसी और के हाथों गढी़ पनही पटेल को हड़की टेगडी़ (  पागल कुतिया )- सी दूर से ही भमोड़ने ( काटने ) दौड़ती। पूरण के बाखल वाले भी पूरण जैसी पनही गढ़ने की कोशिश करते, पूरण से पूछते और उसकी पुरानी ड़िजाइन की देखा-देखी गढ़ते भी। लेकिन वे उसके काम के आस-पास भी नहीं पहुँच पाते। पूरण की पनही तारों भरे आसमान में शुक्र की तरह क्षण में चीन्ही जा सकती थी। उस दिन भी उसने पटेल के लिए नई ड़िजाइन की पनही गढ़ी थी। देने जाने से पहले उन्हें चमका रहा था।

पटेल शौकीन मिज़ाज था। उसे एक सरीखा स्वाद लगातार नहीं भाता। ज़ायका बदलते रहना पटेल के स्वभाव का हिस्स था। वह खान-पान, रहन-सहन के तौर-तरीक़े ही नहीं, बल्कि खेती-बाड़ी में फ़सलों की क़िस्में उपजाने का ढंग, गाय- बैल व भैंस तक की नस्लें बदल-बदलकर ख़रीदता- बेचता। उसे नई-नई  व  ख़ूबसूरत चीज़ें भातीं। उसे चीज़ों की परख भी थी। पूरण यह सब जानता था इसलिए जब भी पनही की नई जोड़ी गढ़ता, बिल्कुल नई क़िस्म की ही गढ़ता।

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सबेरे से काम में भिड़े पूरण ने गरदन तक ऊँची नहीं की थी। एक जगह बैठे-बैठे कूल्हे जलने लगे थे। जब बीड़ी की तलब बेकाबू हो गई, तो उसने कान के पीछे खोंसा बीड़ी का अद्दा निकाला। अद्दे का मुँह हल्के से दबाया, फूँका और ओठों के बीच रखने से पहले अपनी बैराँ ( पत्नी ) पीराक से बस्ती ( चिंगारी ) माँगी।

पीराक चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी। उसने बग़ैर कुछ बोले अग्गुन में धरी एक पतली लकड़ी से चूल्हे के भीतर से चिंगारी खींची और हाथ से पकड़कर पूरण की ओर उछाल झट से अँगुलियाँ पानी में डुबायीं और फिर से रोटी पलटने लगी।

पीराक आख़िरी रोटी सेंकने के बाद टापरे से बाहर सेरी में जाकर एक टूटा टोपला नरेटी की रस्सी से बाँधकर ठीक करने लगी। पूरण बीड़ी पीकर फिर अपने काम में जुट गया।

पहले पूरण अपने लिए भी बढ़िया पनही गढ़ना और पहनना चाहता था। उसने अपने ब्याह की बखत एक जोड़ी पनही अपने लिए गढ़ी भी थी, जिसे कभी-कभार परगाँव या हाट बाज़ार जाते बखत गाँव से बाहर आडे़-छुपके पहनता और गाँव की सीमा लगते ही उतारकर थैली में रख लेता। इससे  पनही पहनने की हरस भी पूरी हो जाती थी और गाँव के पटेलों के सामने नीची जाति के लोगों का पनही नहीं पहनने के रिवाज का मान भी रह जाता था।

लेकिन एक बार ऎसा हुआ कि पूरण पीराक को पीहर से ला रहा था, गाँव की सीमा अभी काफ़ी दूर थी कि रास्ते में अनायास ही पटेल के सामने पड़ गया। पूरण को पनही पहना देख पटेल फूँफाया और मुँह भर गालियाँ बकीं। तब पटेल का मन तो हुआ कि वहीं पनही से मार-मार कर पूरण का कचूमर बना दे, लेकिन पटेल जल्दी में था। ज़्यादा कुछ न कर उस बखत पूरण को जाने दिया। साँझ को लौटते ही भरी पंचायत में पूरण को नाक रगड़कर माफी माँगने और पूरे गाँव में झाड़ू लगाने की सजा दी। उस दिन के बाद पूरण ने कभी पनही में पैर नहीं डाला।

पूरण का मन पटेल जैसे लत्ते-कपडे़ पहनने का भी होता, पर उसके पास धोती के केवल दो टुकडे़ थे, जिसे बदल-बदलकर पहनता। फतवी तो एक ही थी। फतवी में चिलडे़ ( कपड़ों में होने वाली जूँए ) पड़ जाते। जब चिलडे़ काँख में काटते वह मन लगाकर न काम कर पाता और न ही रात में चैन से सो पाता। इसलिए वह टापरे में रहते अक्सर फतवी नहीं पहनता था।

पूरण की बैराँ की दशा और भी ख़राब थी। उसके लुगडे़ में कई जगह थेगली लगी थी और पोलका छन-छन कर फट रहा था। एक जोड़ी कपड़ों की वजह से वह नदी पर नहाने नहीं जाती थी। टापरे पिछवाड़े भी नहाती तो अँधेरे में नहाती, ताकि आते-जाते या पटेलों के खेतों में काम करते लोग उघड़ा बदन न देख सकें। जब आठ-पन्द्रह दिन में लुगड़ा-पोलका धोना होता, रात में ही धोती। जिस रात अपने कपड़े धो देती, उस रात पूरण की धोती का एक टुकड़ा लपेट कर सोती।

पूरण और पीराक का एक ही छोरा था – पाँच बरस का परबत के लिए हमेशा पीराक थेगलियाँ जोड़ –जोड़कर कुछ न कुछ बना देती और यों पहनाती मानो एकदम नए कपड़े पहना रही हो। असल में उन्होंने परबत को कभी सपने में भी नए कपड़े नहीं पहनाए थे

पूरण  को पनही गढ़ने के बदले पटेल लोग जो अनाज देते, उसमें कभी पूरा पेट ही नहीं भरता था, कपड़ों की तो सोचना भी दूर ! जब पूरण व पीराक के कपड़े गलकर तार-तार हो जाते और बदन नहीं ढँक पाते, तब कोई दया दिखाता और पनही के बदले अनाज के साथ-साथ उतरन-पुतरन के कपड़े भी दे दिया करता, जिन्हें सुई-धागे से वे अपने नाप का बना लेते।

उस दिन जब पूरण तैयारशुदा पनही लेकर बाहर निकला, पीराक की आँखें चौंधिया गईं। वह आँखों के आगे हाथ से छाँव करती बोली, “पनही असी चिलकी-री है कि पटेल अपनी मूँछ का काला-धौला बाल अलग-अलग गिन लेगो। आज बात करो जो, एक जोड़ी पनही का बदले एक सेर अनाज कम पड़े, थोड़ो-घणू बढ़यी दे तो नज, नी बढ़ावे तो अड़बी मत पड़जो। जसै-तसै घसरो (काम) चली रियो है।”

“घसरो तो कीड़ा-मकौड़ा, जन-जानवर को भी चले, पर…” पूरण ने पीराक से कहा नहीं, केवल सोचा, “ मैंने पनही गढ़ने में जो माथा –पच्ची की, उसके बदले पटेल की पृ्री फ़सल भी कम है। वह पेट भरने पुरता दे दे, यही बहुत है ।” पर प्रकट में पूरण बोला, “पहला पटेल को मन देखूँवाँ, नज रहा तो बात करूँवाँ।”

पूरण पनही की नई जोड़ी लेकर गाँव के नुक्कड़ पर चाय की गुमटी के सामने से गुजर रहा था। तभी देवा बा ने हाँक दी, “ऎ पूरण्या नीची घोग ( गरदन ) से कहाँ जा रहा है, याँ आ।”

गुमटी के पास बिछे तख़त पर देवा बा और उनके सरीखे फ़ुरसतिये ताश खेल रहे थे। उनाले ( गर्मी )  के दिनों में या घनघोर बरसाती झड़ी में ( जब खेतों में काम नहीं होता या किया नहीं जा सकता ) लोग ताश खेलते। जिन लोग की औलादों ने बड़े होकर खेती-बाड़ी का कामकाज सँभाल लिया था, वे देवा बा की तरह काम के झंझट से मुक्त हो चुके थे। हर मौसम में सबेरे से साँझ तक चौखड़ी, देहला पकड़ और छकड़ी जैसे ताश के खेल खेलते। एक –दूसरे को कोट देने पर चाय पीते-पिलाते,सेव-परमल खाते-खिलाते। ताश खेलने वालों के धूप व बरसात से बचाव के लिए तख़त के ऊपर तुअर की साँटी, बाँस की चिपट, मोम पप्पड़ आदि से बनाया टटर तना रहता। तख़त के ऊपर बैठे लोग, आते-जाते लोग को टोका-टोकी कर पूरे गाँव की रमूज ( सूचना-जानकारी ) लेते रहते। उस दिन भी देवा बा ने ऎसा ही कुछ सोच पूरण को हाँक दी थी और जब वह नजदीक आ गया, तब देवा बा ने पूछा, “ पनही किसके लिए ले जा रहा है ? ”

“पटेल साब का वास्ते बणई है हुजूर।” पूरण गरदन झुकाए हुए ही बोला। देवा बा ताश फेंटते - फेंटते अपने सामने बैठे भिड़ू की ओर बाईं आँख झपकाते बोला, “पूरण्या, पनही तो घणी ज़ोरदार दिखी री है। या जोड़ी म्हारे दी दे और अभी म्हारा बदन को यो कुर्तो तू ली ले, बोल मंजूर है।” 

पूरण कुर्ते का सुन न चौंका, न ललचाया और न ही पलकें उठाईं। एक बार उसने नई डिज़ाइन की पनही गढ़कर पटेल के पड़ोसी छगन को दे दी थी। जब पटेल ने छगन के पाँव में नई डिज़ाइन की पनही देखी, वह छगन से कुछ नहीं बोला, लेकिन उसके बाल सुलग उठे थे। उसने पूरण को बुलवाया और पनही से मार-मारकर बाबरा ( माथा ) फोड़ दिया था।

उसी दिन पूरण ने अपनी धोती के पल्लू में गाँठ बाँध ली थी कि नई डिज़ाइन की पहली जोडी पटेल को ही देगा, लेकिन उस बात को याद कर  लोग यदा-कदा छेड़ा करते और देवा बा ने भी शायद वही बात याद कर चुटकी ली थी। लेकिन पूरण गरदन ऊँची किए बग़ैर धीमे स्वर में बोला, “आप भी हुज़ूर मज़ाक़ उड़ाते हो, पूरा गाँव जानता है, नवी डिज़ाइन की पहली जोडी पटेल साब पहनते हैं।”

देवा बा ने ताश फेंटकर बाटँ दी और वह तुरूप छापने की ताक में था, पूरण की ओर देखे बग़ैर कहा, “चल जा पटेल को हो पहना दे।”

पूरण फिर पटेल के घर की तरफ़ बढ़ा और चलते-चलते रास्ते में पीराक की अनाज बढ़ाने की बात याद कर सोचने लगा, पीराक से कह तो दिया कि बात करूँवाँ, लेकिन पटेल ने कभी किसी हाली ( बंधुवा मजदूर ) व दाड़क्या ( छुट्टा मजदूर ) तक का पयसा-अनाज नहीं बढ़ाया। बाप-दादों के ज़माने से वही चला आ रहा है। बाक़ी के लोग भी पटेल की देखा-देखी ही देते हैं। पनही का अनाज बढ़ाने की बात सुन भड़क न उठे, वरना दूध के साथ में दोणी भी गई समझो।

पूरण इन्हीं ख़यालों में उलझता-सुलझता छगन के घर के क़रीब पहूँचा तो पटेल की सेरी में पटेल के सामने उसका हाली खड़ा दिखाई दिया, जिसे वह जाने किस वजह से या बेवजह गलियाँ बक रहा था।

पूरण को दूर से माजरा कुछ कम समझ में आ रहा था। वह थोड़ा और आगे बढ़कर छगन के घर के सामने इमली के झाड़ की ओट में बैठ गया, ताकि पटेल की नज़र में आए बग़ैर उसकी बात सुन सके। पटेल व हाली के बीच एक खाट भी बिछी थी, पर पटेल खाट पर नहीं बैठ रहा था। वह ग़ुस्से भरे क़दमों से आठ-दस क़दम आगे और इतना ही पीछे धम्म-धम्म चल रहा था। उसके पैरों में फून्दे डिज़ाइन की बोलने वाली पनहियाँ थीं। फून्दे पनहियों की नाथनों पर कभी दायें, कभी बायें दो चोटियों में गूँथे लाल रिबन के फूँदों की तरह झूलते। वह जब गालियाँ नहीं बकता, चुप रहता, उस क्षण पनहियों की आवज़ पूरण तक भी आती।

यह बोलने वाली पनहियाँ भी पूरण ने ही गढ़ी थीं। पूरण ने इनके तलवों के बीच बबूल का एक-एक बीज ऎसा जमाया था कि इन्हें पहन जब पटेल चलता, तब इनसे फूटता स्वर कानों में मिठास घोलता था, लेकिन उस दिन पनहियों से किसी के दम घुटने का स्वर निकलता सुनाई पड़ रहा था। पूरण यह सब देख-सुन सोचने लगा, चौघड़िया खराब लगता है। पटेल ख़ूब खीझा हुआ है। अभी पनही भी ख़राब बता सकता है, जाऊँ कि नहीं जाऊँ।

पूरण का डाँवाडोल मन एक जगह नहीं टिक रहा था। पनहियाँ गढ़ने में उसने अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। देवा बा ने भी पनहियों को अच्छी बताया था, लेकिन उसने मन ही मन बुदबुदाया – भरोसा की भैंस पाड़ा भी जण सकती है। वो एक पनही हाथ में उठा देखने लगा – इस बार उसे पनही की नाथन पर टँके फूल पीराक की आँखें लगे। पनही का ऊपरी हिस्सा जिसके नीचे पाँव का पँजा रहता, वह पूड़ी-सा दिखा। पनही की कमर का कटाव देख, वह मुग्ध हो गया और पैर की एड़ी ढँकने वाला भाग देख फिर पीराक आँखों में उतर आई। लेकिन पनही के तलवे में एड़ी व पँजों के नीचे ठुकी नाल छूकर पूरण काँप उठा, पिछली बार नाल से फूटा बाबरा याद हो आया। फिर जैसे भीतर से ही किसी ने हिम्मत बँधायी – पनहियाँ खराब नहीं हैं, बल्कि जँचने पर पटेल अनाज भी बढ़ा सकता है।

उसने आख़िरी बार पनहियाँ औंधी- चीती कर धैर्य  से देखीं और हिम्मत भरे क़दम पटेल के घर की ओर बढ़ाता ख़ुद से बोला, “अब जो होगा,सो होगा।”

पटेल ख़ाट पर बैठा चाय पी रहा था। पूरण उसके नज़दीक पहूँचा और झुककर हाथ जोड़ता बोला, “पगे लागूँ हुज़ूर।”

“हूँ, बना लाया, देखता हूँ खड़ा रह ज़रा।” पटेल कप-बस्सी खाट के नीचे धरकर बोला। खाट पर बैठा पटेल चाय के बाद हथेली पर तमाखू – चूना रगड़ने लगा। अच्छी तरह रगड़कर ऊपर-ऊपर की बड़ी पत्तियाँ चिमटी में लीं और बारीक को हथेली से झटकारा। फिर बड़ी पत्तियों को बाएँ गलफ़े में दबाया और तमाखू  वाली हथेली जाँघ पर पोंछी।

पटेल का मुँह जल्दी ही तमाखू के रस व थूक से भर गया। उसने दाँतों के बीच से पिचिर्रर्र कर थूका, कुछ छींटे पनही पर गिरे। पनही भी पटेल की और थूक भी पटेल का, लेकिन जब थूक पनही पर गिरा तो पटेल ने पहले पनही और फिर पूरण की ओर यूँ घूरा जैसे पूरण से कोई अपराध हो गया हो। पूरण ने घूरने का मतलब समझा और पनही पर पड़ा थूक झटपट फतवी से पोंछ दिया।

थूक पोंछना अनदेखा कर पटेल बोला, “ला, पनहियाँ दे, पैर डालकर देखूँ ज़रा।”

पटेल पैर डालने से पहले एक पनही हाथों में लेकर परखने लगा। उसे पनही की नाथन पर टँके फूल पटेलन के कानों के सुरल्ये लगे। एड़ी में ठुकी नाल छूकर बरबस ही मुँह से निकला, “खींचकर किसी को मार दो तो जीव निसरी जाए।”

पनही की सिलाई व तलवों के टाँके देख बुदबुदाया, “साले ने टाँके ऎसे ग़ज़ब टाँके जैसे ज्वार के दाने चिपका दिए।” फिर पनही धीरे से धरती पर धर पहनी तो पटेल के चेहरे पर उभरे सुख से लगा, जैसे मखमल से गढ़ी पनही पहन ली है।

पूरण आशंका से भरा, पनही जाँचते-परखते पटेल के चेहरे पर बनती-बिगड़ती सिलवटों को समझने की कोशिश कर रहा था। वह कभी पटेल की मूँछ, कभी आँखें देखता और सोचता, पटेल क्या बोलेगा, कोई खामी न बता दे। लेकिन पटेल को कोई खामी नज़र नहीं आई और वह गदगद होता बोला, “छिनाल का पूरण्या, तू है तो कारीगर को मूत, इमे कोई दो राय नहीं।”

पटेल को ख़ुश देख, पूरण के मन में पीराक की कही बात टाँगें पटकने लगी। उसने हिचकते-हिचकते अनाज बढ़ाने की बात कही, लेकिन अपनी बात कहते ही उसके मन में आया कि यूँ ही कहा, पटेल ख़ुश है, वैसे भी कुछ न कुछ देगा ही। वह ख़ुद पर खीझा, घड़ी भर सबर नहीं कर सका।

पटेल ने अनाज बढ़ाने का सुना तो उसकी लम्बी नाक भट्टी में तपे हल का लाल कुश्या बन गई। आँखें फैलकर पाड़े की आँखों के बराबर हो गई। पनही से पैर ऎसे झटककर बाहर खींचे जैसे पैरों में बिच्छू ने डंक गचा दिया हो और तन्नाकर बोला, “बता दी अपनी जात। एक सेर अनाज कम पड़े, तो क्या एक जोड़ी पनही का मणभर लेगा ? कुछ भी करो, तुम ढेड़ियों का पेट नहीं भरता।  सालों की नेत (नियत ) ही खराब है। हमारे ढोर मरने पर तुम्हें खाल मोफ़त में मिलती है। खाने को मांस मिलता है। ढोरों के हड्डे बेच पइसे झोड़ते हो, फिर भी एक सेर अनाज कम पड़ता है ? ऎसी क्या सोना की पनही गढ़कर लाता है, और भोसड़ी सोना की भी गढ़ी होय तो उमे दियो बालाँगा ? ”

पटेल के जी में जो आया अंट-शंट बकता रहा। इतना गंदा-भद्दा कि पूरण के कान लाल हो गए। पूरण को उम्मीद न थी कि ख़ुश दिखता पटेल अचानक भुर्राल्या ( चक्रवात की तरह ग़ुस्सा ) हो जाएगा। पटेल के ग़ुस्से से हड़बड़ाए पूरण ने सोचा, “अब क्या करूँ ? कह दूँ, हुज़ूर आफ़त पड़ी री थी तो कह दिया। नहीं बढ़ाना चाहो तो मत बढ़ाओ। पर भुर्राल्या मत होओ, म्हारो छोटो-सो छोरो है, दया करो माई-बाप।”

जब यही सोचा हुआ कह्ने को पूरण ने मुँह खोला, तो मुँह से निकला, “ढोर घीसने के काम में इतरो ही तमारे नज़र आवे तो तम करो, म्हारे नी करनू है।” और तेज़-तेज़ क़दमों से टापरे की ओर बढ़ चला।

पूरण की बात पटेल का कलेजा छेद गई। उसे उम्मीद न थी कि पनही गढ़ने वाला उसे ऎसा जवाब देगा। वह तत्काल कुछ करता, तब तक पूरण जा चुका था। पटेल के भीतर आग लगी थी, तभी सामने उसका ग्वाल आ गया। ग्वाल क़स्बे से साइकिल पर रखकर खली का बोरा लाया था, उसने पूछा, “हुज़ूर यो थैलो काँ धरूँ ?”

“थारी माई की उकपे धर दे, चोर का मूत ढेड़िया मालम नी है, हमेशा थैलो काँ धरे है।” पटेल बोला और ग्वाल की पीठ पर सड़-सड़ दो-तीन पनही जड़ दी।

पटेल जब अपनी सेरी में भुर्राल्या हो रहा था, छगन अपने घर में बैठा-बैठा खाना खा रहा था। उसके कानों को पटेल की आवाज़ अस्पष्ट-सी छू रही थी, जिससे छगन यह तो समझ गया था कि पटेल किसी पर भुर्राल्या हो रहा है, लेकिन किस पर और क्यों ? यह उसे सम्पट नहीं पड़ी थी। वह खाने के बाद पटेल के ओसारे में आया, तब तक हाली, पूरण, ग्वाल जा चुके थे। पटेल अकेला खाट पर बैठा था। छगन माहौल में अजीब क़िस्म कि गर्माहट महसूसता दबे सुर में बोला, “राम-राम काका ”

पटेल ने झुलसाए शब्दों में जवाब दिया, “राम –राम , आ बैठ छगन।” छगन छ: फुटे लम्बे-चौड़े डील-डोल के अलावा गाँव में पटेल की बराबरी का किसान था। पटेल-सा रोबीला और मनमौजी  नहीं, पर काले दिल का ज़रूर वो हरे-भरे झाड़  के गोड़ में छाँछ डाल कब सुखा दे, पता ही नहीं चलता। वो साँझ-सवेरे फ़ुरसत मिलते ही पटेल के पास आकर बैठ जाता। वे एक-दूसरे के परिवार,ग्वाल और हाली तक की बातें आपस में करते। दोनों की उम्र में दस-बारह बरस के फ़र्क़ के बावजूद उनके बीच घी-गाकर-सा हेत ( प्रेम ) था। पूरण और बाखल के लोगों की नज़र में वे बबूल के ऎसे  काँटे थे, जिनके मुँह दो और कमर एक  थी।

छगन अपने कुर्ते की जेब से जर्दे की डिबिया निकाल खाट पर बैठा और हथेली पर जर्दा मसलता पटेल की ओर देखने लगा। पटेल कहीं खोया हुआ लग रहा था। उसके भाल की कुछ ज़्यादा ही सिकुड़ी रेखाओं के पीछे भी कुछ सुलगता-सा महसूस हो रहा था।

“कोई उलझन है काका”, छगन ने पूछा।

“ढ़ेड़िये ज़्यादा मुँहज़ोर हो गए हैं छगन, आजकल आग मूत रहे हैं और अंगार खा रहे हैं,  इनकी जल्दी ही कोई टाँणी  करना पड़ेगी।“ छगन की हथेली से चिमटी भर जर्दा लेकर अपने गाल और गलफ़े के बीच धरकर बोला।

“ या बात तो साँची है काका, जिसे देखो वो अवँलाता ( ऎंठता ) है, टाँणी नहीं की तो वो दिन दूर नहीं, जब ढेड़िये हमारे माथे पे मूतेंगे।” छगन ने अपने निचले होंठ व दाँतों के बीच जर्दा दबाने के बाद, सहमति में मन भर का माथा हिलाते हुएा कहा।

“आज ही… तू ज़रा अपनी बलन के छोरों को बुला।” पटेल ने शब्दों को चबाया।

“ज़रा धीरपय से काम लो काका, काम असो करो कि खेत से डूंड खोदई जाए और न बख्खर की पाज टूटे न बोठी होये।” छगन ने कुछ सोचते हुए कहा।

पूरण ताव-ताव में पटेल से जो कह आया था, उससे ख़ुद बहुत डरा हुआ था। वह न टापरे में बैठ पा रहा था, न दूसरी पनही गढ़ने को सोच पा रहा था। अपनी ग़लती और पटेल के ख़ौफ़ के संबंध में सोचते-सोचते पसीने से भीग रहा था। ऎसी हालत में उसे कच्ची भीत पर माँडने माँडती पीराक के हाथ, गोबर की बजाय कीचड़ में सने नज़र आए और उसे समझ ही नहीं आया कि पीराक कीचड़ से भीत पर क्या कर रही है ?

पूरण को देख पीराक ने दु:ख व चिंता से उबराते हुए हाथ धोए, पानी का गिलास लायी। अपने सोच में गुम पूरण ने गिलास ठीक से पकड़ा नहीं और गिलास उसके हाथ से छूट पड़ा। आँगन में फैला पानी पूरण को ख़ून दिखा और वह चीख़ने लगा।

पीराक ने धूजते हाथों से पूरण क माथा छुआ, वो तप रहा था। उसे बुख़ार आ गया था। पूरण को जब कभी बुख़ार आता, उसे बुरे-बुरे सपने आते। कुछ भी बड़बड़ाता। कभी पीराक के सीने में मुँह छुपाता, कभी हाथ में राँपी लेकर सोता। कभी भैंसे पर सवार यमराज को अपनी ओर आता देखता और पीराक से कहता, “यमराज के भैंसे को मार उसकी खाल ( चमड़े ) से पटेल के लिए पनहियाँ बनाऊँगा।” कभी उसे भैंसे पर यमराज की जगह पटेल ही नज़र आता और वह डरकर बचाओ-बचाओ चिल्लाता और पीराक की छाती में मुँह गड़ाता। पूरण उस दिन भी ऎसी ही अजीबो-ग़रीब हरकतें कर रहा था।

पीराक के लिए यह सब नया नहीं था। वह इससे पहले भी पूरण को ऎसा करते देख चुकी थी, लेकिन उस दिन पूरण कुछ ज़्यादा ही भयावह हरकतें कर रहा था। घबराकर वह पड़ोसियों के टापरों पर गई, लेकिन कोई नहीं था। सब दाड़की ( मजदूरी ) गए थे। सोयाबीन की कटाई का सीजन था। लोग ढूँढ़े नहीं मिल रहे थे। पूरण साँझ तक छादरी पर लेटा रहा और पीराक पानी गालने का गलना भिगा-भिगाकर पूरण के करम पर धरती रही।

रात पड़े पूरण को देखने व मिलने उसके दो-तीन पड़ोसी आए। पूरण की बात सुन-समझ उसे ढाँढ़स बँधाया कि अब जो कह दिया, सो कह दिया। आख़िर कोई कब तक चुप रहे, एक न एक दिन तो बोलना ही पड़ता है, ज़्यादा फ़िकर मत कर, पूरी बाखल वाले तेरे साथ हैं, आगे जो होगा, सब मिल कर निपटेंगे।

हालाँकि पूरण के भीतर की धुक-धुकी मिटी नहीं थी। वह भीत से टिका बैठा, पीराक और परबत की ओर टुकुर-टुकुर देख रहा था। कुछ महीने बीत गए थे। किसी हाली और दाड़क्या की पिटाई नहीं हुई। पूरण से भी किसी ने कुछ नही कहा। किसी का ढ़ोर-डंगर नहीं मरा। किसी पर मूठ ( एक तरह टोना-टोटका ) मारने का आरोप नहीं लगा। एक तरह से सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा।

सुख पूजा का दिन नज़दीक था। जब भी गाँव में सुख पूजा की जाती, तब गाँव भेरू को रँगा जाता, नारियल चढ़ाया जाता, अगरबत्ती लगाई जाती और उसके ऊपर दो खंभों में टाँणा ( एक लंबी रस्सी में लाल कपड़े में नारियल आदि ) बाँधा जाता। टाँणे के नीचे से सभी ढोर-डंगर निकाले जाते। सुख-पूजा ढोर-डंगरों की सलामती के लिए हर साल की जाती। जब तक टाँणे के नीचे से सभी के ढोर-डंगर न निकल जाते, तब तक गाँव में किसी के घर में चूल्हा नहीं जलता।

पूजा के बाद पहले पटेल के घर के ऊपर धुआँ उठता, फिर और लोगों के घरों में  भी चूल्हे सुलगाए जाते। अगर किसी और के घर के ऊपर पटेल के घर से पहले धुआँ उठता नज़र आता तो उसे दंडित किया जाता। हालाँकि जिन लोगों के यहाँ स्टोव थे और जिन्हें उठते ही चाय पीने की आदत थी, वे बड़ी फ़जर में दूध-दुहने के वक़्त ही दूध-चाय उबालकर पी लेते थे।

देवा बा को उठते ही दो कप चाय लगती और नहीं मिलती तो उनका दिन आगे नहीं सरकता। वे घंटे-घंटे पर चाय पीने के आदी थे। गुमटी के तख़्त पर ताश खेलते रहने और चाय पीते रहने से यह आदत पड़ गई थी।

सुख पूजा की सुबह देवा बा के चौथे छोरे की बैराँ ने स्टोव जलाने की ख़ूब कोशिश की, लेकिन स्टोव नहीं जला, ख़राब हो गया था। बहू ने चूल्हे पर चाय उबाल दी और देवा बा ओसारी में खाट पर बैठा चाय पी रहा था।

छगन ने देवा बा के घर के ऊपर धुआँ उठता देख, झट से पटेल को भी बताया था। उसी बखत छगन सहित दो-तीन लोगों को साथ लेकर पटेल देवा बा से बोला, “आप बुजुर्ग ऎसा करेंगे, तो गाँव में कौन नियम-क़ायदे मानेगा। आपको पंचायत का दंड भरना पड़ेगा।”

देवा बा देव-दाड़म और पूजा-पाठ को अंधविश्वास और लोगों को ठगने के धंधे से ज़्यादा कुछ नहीं मानते थे। वे न कभी मंदिर जाते और न ही गाँव में होने वाले भजनों, कथाओं,गरबों आदि में जाते। सुख पूजा के दिन टाँणे नीचे से अपने ढोर-डंगर भी नहीं निकलावाते। अब जो ये ढ़ोंग-धतूरा नहीं मानता, उसके लिए कैसा नियम और कैसा क़ायदा ?

देवा बा ने यही बात पटेल और उसके साथ आए लोगों को समझाने की कोशिश की,लेकिन पटेल मानने को तैयार नहीं था।  उसका कहना था –आप नहीं मानते,न मानें,गाँव के और लोग तो मानते हैं। आपको गाँव के नियम – क़ायदों का ख़याल रखना पडे़गा। और वह देवा बा से दंड भरवाने की ‘ घई ’ ( जिद ) पकड़ने लगा।

देवा बा को पटेल से कोई डर – धमक तो थी नहीं, न ही वह खेती – बाड़ी, पैसे – कौड़ी या जाति में पटेल से कम था। उसका परिवार भी काफ़ी  बड़ा था। वह अड़बी पड़ जाए तो पटेल से पटेली भी छीन सकता था। लेकिन उसे यह सब पसंद नहीं था। जब लाख समझाने पर भी पटेल नहीं मान रहा था, तब देवा बा खाट पर से उठा और अपनी धोती की एक काँछ ऊपर उठाकर बोला, “ लो उखाड़ते बने तो उखाड़ लो।”

पटेल और उसके साथ आए लोगों को तूती – सा मुँह लेकर लौटना पड़ा था।

सुख पूजा के दिन पटेल और छगन टाँणे के नीचे खड़े होते।एक के पास दूध और दूसरे के पास गोमूत्र की बाल्टी  होती। एक तरफ़ से ढ़ोरों पर नीम की डाली से दूध और दूसरी ओर से गोमूत्र छींटते। सुख पूजा के तीन-चार दिन पहले गाँव में डोंडी फिरवा दी जाती, ताकि लोग पहले से तैयारी कर लें, क्योंकि पूजा के दिन धार नहीं चलाई जाती। ढोरों का निराव एक दिन पहले काटकर रखना पड़ता। घर में सब्जी-भाजी भी काटकर रखते या फिर उस दिन ओसरा बनाते। ओसरा यानी बेंगन, भिन्डी आदि को सूखा कर रख लेते, और जब इनका सीजन नहीं होता। जब हरी साग पैदा नहीं होती, तब सूखी साग को पहले भीगा लेते, ताकि वह फिर से हरी हो जाए और फिर पका लेते।  जिनको ओसरे नहीं बनाने होते, वे दाल-बाटी भी बनाते। कुछ भी ऎसा करते, जिससे धार न चलानी पड़े। सुख पूजा के दिन धार न चलाने का नियम था। इसलिए भूल से भी न तोड़ना होता था, यदि कोई तोड़ता तो फिर खामियाजा भी भोगता।

एक बरस पूरण से यह भूल हो गई। उसे याद नहीं रहा और सबेरे-सबेरे ही पनही गढ़ना शुरु कर दिया। जब पीराक ने टोका, “ आज धार चलाना बंद है।” तो घबरा गया। वह दौड़कर पटेल के पास गया और सब कुछ सच-सच बता दिया। पटेल ने सारी बात सुन-समझ कहा, “पूरण्या तूने नियम तोड़ा, पाप किया, लेकिन अनजाने में किया और उसका पछतावा भी है तुझे। तू ऎसा करना कि दो बरस तक मेरी और गाम के महाराज की पनही मोफत में गढ़ना, ताकि तेरा पाप घट जाए और तुझे नरक का मुँह न देखना पड़े।”

जब भी सुख पूजा होती, ऎसे तमाम नियम-क़ायदे होते और उनका पालन करवाया जाता। लोग पालन करते भी। देवा बा सरीखा तो बिरला ही होता।

उस बरस सुख पूजा के तीन-चार दिन पहले गाँव में भयानक संकट आया हुआ था। पटेल ही नहीं, बल्कि हर किसान पर जैसे दु:ख के बादल फट पड़े थे। हरेक के कोठों में ढोर-डंगर महुए की भाँति टपटप टपक रहे थे और किसी को कुछ समझ़ नहीं आ रहा था।

छगन ढोरों की बीमरियों के मामले में अच्छा-खासा जानकार था। वह गाभिन गाय-भैंस का बाखरु बैठालने, पेट में बछड़ा उलझ जाए तो सुलझाने और ढोरों को डाम देकर ठीक करने में माहिर था। यानी वह बग़ैर भणा-गुणा ( पढ़ा-लिखा ) ढोरों का डॉक्टर था। लेकिन जब गाँव के अच्छे-भले निराव खाते, चरते बागोलते ढोरों का गला सूजने, गले से घर्र-घर्र की आवाज़ आने लगी और अचानक गिरकर मरने लगे, तब छगन भी कुछ नहीं समझ पाया। क़स्बे वाले डिग्रीधारी डॉंक्टर ने कहा, “ शायद गलघोंटू ह़ै ” और वह एक तरफ़ से सभी ढोरों को सुई खोंसने भिड़ गया। फिर भी क़ाबू पाते-पाते गाँव के लगभग आधे ढोर-डंगर लुढ़क गए।

पूरण उन दिनों भी बीमार था। जब से पटेल से कहा-सुनी हुई, वह कभी पूरी तरह ठीक नहीं रहा। जब ढोर-डंगर मर रहे थे, उसी दौरान एक दिन पूरण अपने टापरे पीछे बैठा बीड़ी पी रहा था। वह बरसात का दिन था। पीराक टापरे पीछे के खाळ ( बरसाती नाला ) किनारे मेहँदी गाड़ रही थी, ताकि बरसात के पानी से खाळ ज़्यादा चौड़ा न हो। परबत भी वहीं गीली मिट्टी से पनहियाँ गढ़ने का खेल खेल रहा था। तभी टापरे के सामने किसी ने हाँक लगाई, “पूरण्या, जलूका काँ मरी गयो ! ”

पूरण ने पटाक से छगन की आवाज़ पहचान ली और दौड़ता, हकबकाता टापरे के सामने आ गया। पूरण को देख छगन अपनी आँखें छोटी-बड़ी करता बोला, “ पूरण्या, तू घर में आराम से पड़ा-पड़ा पाद रहा है और उधर हमारे ढोर-डंगर लुड़कते जा रहे हैं, डॉकटर का कहना है, अगर फटाफट मरे ढोर नहीं हटवाए तो कोई बड़ी बीमारी भी फैल सकती है। तू सीधा माजना से अपनी जात वालों को लेकर जल्दी आ, न आया तो फिर पटेल का सुभाव तो तू जाणे है।”

छगन को जो कहना था, वह कह गया। पूरण चिंता में पड़ गया। मौक़े पर मिले दो-तीन लोगों को बात बताई तो वे बिदक गए। उनमें से मंगू ने कहा, “ पूरण दा, तू चौमासा की पनही-सा लचर-लचर मत करे। उनके ढोर उनको ही घीसने दे।”

पूरण समझ नहीं पा रहा था, लोगों को कैसे समझाए। उसी की वजह से लोगों ने पटेलों के ढोर न घीसने का तय किया था। वही टूटकर लोगों को ढोर घीसने का कहेगा, फिर कल उसकी किसी बात पर कैसे भरोसा करेंगे ? लेकिन लोगों से बात तो करनी पड़ेगी। गाँव में देवा बा सरीखे लोग भी रहते हैं, जो सुख-दु:ख में मदद भी करते हैं। पटेल के कारण गाँवभर से दुश्मनी मोल नहीं ली जा सकती। छगन तो धमकाकर भी गया है और वह कोई कोरी धमकी नहीं है। अभी चार दिन पहले ही पड़ोसी गाम के पटेल ने एक जवान छोरे को झाड़ पर लटकावा दिया। कोई कहता है, पटेल के यहाँ ग्वाल था और उसके संबंध पटेल की राँडी छोरी से थे। कोई कहता है, पटेल के संबंध ग्वाल की कुँआरी बहन से थे और वह पेट से थी। उसने अनाज में रखने की गोली खाकर जान दे दी। इसी बात के पीछे पटेल व ग्वाल में ख़ूब खरी-खोटी कहा-सुनी हुई और ग्वाल ने पटेल के ढोर चराने से मना कर दिया था।

सचाई क्या थी, ये तो मरने वाला या मरवाने वाला ही बता सकता है, लेकिन मरा तो ग्वाल ही है। अगर हम ढोर घीसने नहीं जाएँगे और पुरानी बात पर अड़े रहेंगे, तो यहाँ का पटेल क्या हमारी पूजा करेगा ? ढोर तो घीसने पड़ेंगे। ठीक है, थोड़ी घणी कहा-सुनी हो गई, लेकिन हमेशा के लिए ख़ानदानी काम से मुँह थोड़े फेरा जा सकता है। ऎसी बखत में अगर उनकी मदद नहीं करेंगे, तो वे गाँव में रहने देंगें ? पूरण के मन में चलती यही सब बातें उसने अपने पड़ोसी और उस बखत बाखल में जो भी मिला, उसे समझाने और राजी करने की कोशिश की। थोड़ी माथा-पच्ची और चक-चक के बाद मंगू,गेंदा, गंगू सहित आठ-दस लोगों को राजी भी कर लिया और वे लोग ढोर घीसने की रस्सी, बाँस आदि सामन लेकर गाँव में पहुँचे।

पटेल के घर सामने उन लोगों का हुजूम जमा था, जिनके कोठों में एक-एक दो-दो ढोर मरे पड़े थे। ख़ुद पटेल की मुर्रा भैंसें, जर्सी गाय मरी थी, जिससे पटेल दु:खी ही नहीं, बल्कि पृ्रण सहित बाखल वालों पर भयानक ग़ुस्सा भी था, जो ख़बर देने के बावजूद काफ़ी देर से पहुँचे थे।

पूरण को घूरते हुए पटेल छूट बोला, “ आ गया तू, तेरी तो घणी लम्बी नाक थी। मेरे आगे दाल न गली तो ढोरों पर टोने-टोटके शुरू कर दिए। अब ढोरों की खाल ( चमड़े) से पनही का घाट पूरा करेगा ?”

पटेल की बात सुन पूरण के साथी गंगू, मंगू, गेंदा आदि मन ही मन पटेल की माँ – बहन एक करने लगे और पृ्रण भय और आश्चर्य से गूँगा बना खड़ा था। कुछ देर बाद जब बोलने का सोचा तो लगा जैसे ज़बान काठ हो गई, फिर भी बहुत ही हिम्मत व मुश्किल से भर्राय्र सुर में बोला,  “हम टोना-टोटका नहीं जानते, और जानते भी तो ढोरों पर क्यों करते ? ढोरों ने हमारा क्या बिगाड़ा ?”

पटेल बात पकड़ अपने ढंग से अर्थ गढ़ने में माहिर था। वह जमा हुए लोगों और जवान छोरों को उकसाने के अंदाज़ में बोला, “सुना, क्या बक रहा है, ढोरों पर टोना-टोटका क्यों करे ?  उन्होंने क्या बिगाड़ा ? मतलब हम पर करेंगे ? हमने एक जोड़ी पनही के बदले अपनी जायदाद इनके नाम नहीं लिखी, इसलिए अब हमारा मांस खाएँगे और हमारी खाल उधेड़ कर पनही बनाएँगे।”

“ यानी महीने भर पहले देवा बा का छोरा…” छगन को जैसे किसी राज़ का पता चल गया। वह अचरज से आँखें फैलाता बोला, “वह जामण की डगाल फटने से गिरा था, डगाल को इन्होंने ही मूठ मारी होगी !”

“और क्या ?” पटेल ने छगन के सुर में सुर मिलाया, लेकिन मन ही मन बुदबुदाया, किस करम खोड़ले का नाम ले लिया। वह वहीं खड़ा है, कहीं सफाई न देने लगे, और पटेल ने देवा बा की ओर झूठी मुस्कान से देखा, उसकी आँखों ने जैसे देवा बा से कहा-तुम हमसे मिलकर नहीं चलते, फिर भी हम कितना ध्यान रखते हैं।

देवा बा अभी थोड़ी देर पहले ही आकर भीड़ में खड़ा हुआ था। उसने वही बात सुनी-समझी थी, जो उसके पोते के संबंध में कही थी। उसने पटेल की झूठी मुस्कान को कोई तवज्जो नहीं दी और पटेल की आशंका के अनुरूप ही बोला, “जामण का झाड़ ही कच्चा होता है। उसकी डगाल भड़ से फट जाती है। फिर मेरा पोता भी कम नहीं था। वह अपनी गलती से ही गिरा और मरा। उसे किसी ने मूठ-ऊठ नहीं मारी। ’’

देवा बा की बातों से पूरण की हिम्मत बढ़ गई। वह पटेल को भरोसा बाँधने के लिए पीराक और परबत की सौगंध खाता बोला, “हुज़ूर हम काम के अलावा कुछ नहीं जानते ” वह रस्सी और बाँस दिखाता बोला, “ अब भी ये लेकर ढोर घीसने ही आए हैं।”

“ख़बर देने के कितनी देर बाद आया है तू ?” पटेल ने देवा बा की बात व मौजूदगी को अनदेखा किया और पूरण को घूरता बोला, “तू क्या समझता है, तेरे बग़ैर हमारे ढोर कोठे में ही सड़ते रहेंगे ?”

पटेल ने वहाँ ख़डे नई उम्र के छोरों को भाँपने की नज़र से देखा – उनका ख़ून उबाल खा रहा था, छोरों ने बचपन से नीची जाति के लोगों को पटेलों के आगे झुकते देखा था, इसलिए उन्हें भी पूरण का बोलना हजम नहीं हो रहा था। पटेल ने गर्व से गरदन हिलाई और छोरों में जोश भरता बोला, “हमारे एक से एक कलदार छोरे हैं, मरे ढोरों को बैलगाड़ी में, टैक्टर में भरकर गाँव बाहर फेंक देंगे और जला भी देंगे, ताकि…” पटेल बाखल वालों पर हिकारत भरी नज़र घुमाता बोला, …“ तुमको ढोरों की खाल, मांस और हड़के तक न मिल सकें।”

“ तो फेंकने दो हम क्यों आधी रोटी पे दाल लाँ…” पूरण का पड़ोसी गंगू बेधड़क होता पूरण से बोला।

पूरण, देवा बा और पटेल की बातों से छगन को लगा, पटेलों के छोरों को ही ढोर घीसने पड़ेंगे और उसकी आँखों के सामने अपने छोरों का ढोर घीसने का दृ्श्य उभरा। उसने सोचा, ढोर घीसने की बात आस-पास के गाँवों में बसे पटेलों को मालूम होगी। गाँव भर की नामोसी होगी। इस गाँव में कोई पटेल अपनी छोरी नहीं ब्याहेगा। यहाँ की छोरी को अपनी बहू या बैराँ नहीं बनाएगा। गाँव की औड़क ही, ‘ढोर घीसने वाले पटेलों का गाँव’, पड़ जाएगी। छ्गन ने पटेल को हाथ पकड़ भीड़ से एक तरफ़ ले जाकर अपना सोचा बताया और कहा, “ अपन ढोर-वोर नहीं घीसेंगे।” 

“देख छगन, अगर अपनी जात वालों को ढोर घीसने की नौबत पड़ी भी तो, अपन थोड़ी घीसेंगे। अपनी जात में भी कई ग़रीब-ग़ुरबे हैं। पइसा देंगे, तो वे घीसकर फेंक आएँगे।”

“गरीब हैं  तो क्या वे ढेड़ियों का काम करेंगे ?” छगन बोला।

“सब करेंगे छगन, जात पइसे से बड़ी थोड़ी है ?” पटेल बोला।

“ नहीं-नहीं, अपनी जात वालों का ढोर घीसना ठीक नहीं। अपन ऎसा कुछ करें कि ढोर ढेडिये ही घीसें और माथा भी नहीं उठावें।” छगन बोला।

पटेल भी यही चाह रहा था, लेकिन उसके  पाँसे उलटे पड़ रहे थे। वह झुँझलाया, “ तू देख तो रहा है, ढेड़िये रत्तीभर झुकने को राजी नहीं। पूरण्या तो लेण पर आ गया है, पर उसके साथ आए लौंडे, उनकी क़द से लंबी ज़बान है।”

“ तो ज़बान के छोटी करने का बारा में सोचो, छोटी जात से ज़बान लड़ई के क्यों अपनो मान घटावाँ ?” छगन बोला।

जब छगन और पटेल के बीच ये बातें हो रही थीं, तभी उधर देवा बा का बड़ा छोरा आया। उसने देवा बा को भीड़ से अलग ले जाकर कहा, “क्यों इनी टेगड़ा लड़ाई में टेम खराब करो, अपना घर चलो। यहाँ और किसी से कुछ खरा-खोटा बोलने में आ जाएगा। अपने ढोर तो हम चारों भाई खाळ में फेंक आए।” देवा बा अपने छोरे के साथ घर चले गए।

पृ्रण ने गेंदा, गंगू, मंगू आदि  अपने साथियों को समझाना चाहा, “ अड़बी मत पड़ो, अपना तो करम में ही ढोर घीसनो लिख्यो है।” लेकिन पूरण के साथी पटेलों के मन माफ़िफ झुकने को तैयार न थे, वह उन्हें न समझा सका।

“तो ढोर नहीं घीसोगे ?” वापस भीड़ में लौटे पटेल ने उन्हें घूरते हुए पूछा।

“घीसेंगे, पर पहला अनाज या पइसा ठहरा लो, आप कहें तो ढोर की खाल और हड़के भी लौटा देंगे।” पूरण के मुँह खोलने से पहले उसके पीछे से मंगू की आवाज आई।

“मांस भी ले लेना !” गेंदा बोला।

पूरण के पीछे से आई मंगू व गेंदा की आवाज़ों ने पटेल के माथे पर पत्थर का-सा प्रहार किया। वह तिलमिला उठा। पटेल से इस तेवर में ढेड़ियों को बातें करते देख, वहाँ खड़े पटेलों के जवान छोरों की मुट्ठियाँ कसा गईं। छोरे दाँत पीसते, कचकची खाते अपने को जब्त किए पटेल की ओर देख रहे थे, लेकिन जब पटेल ने उनकी ओर देखा, तो यों देखा कि फिर उन्हें किसी आदेश या इशारे की दरकार न रही। उन्होंने पूरण और उसके साथियों की सूखी पसलियों पर घन सरीखे मुक्कों और लातों की झड़ी लगा दी।

पटेलों के तीन-चार छोरे, जिनके घर नज़दीक थे, घर में से कुल्हाड़ी, फर्सी, बल्लम लेकर उन पर टटके, तो उन्होंने जान बचाकर अपनी बाखल की ओर दौड़ लगा दी। छोरे कुछ दूर तक पीछा कर रूक गए और गालियाँ बकने लगे।

बाखल में साँझ उतर रही थी, लोग दाड़की से लौट रहे थे। पूरण, गंगू, गेंदा और मंगू वग़ैरह आदि हाँफते, घबराते बाखल में आए तो आसपास के लोग इकट्ठा हो गए। पीराक भी परबत को गोदी में उठाकर टापरे से बाहर आ गई। उसने सबके चेहरों पर एक नज़र ड़ाली, तो भीतर आशंका भर गई।

“क्या हुआ ?” उसने काँपते स्वर में गंगू से पूछा।

“ मार खाकर भाग आए और क्या हुआ ?” गंगू ने चिगांरी उगलते लहजे में जवाब दिया।

“ क्यों, अपने हाथ पटेल के पास गिरवी रख दिए थे ?” पीराक ने जैसे जले पर नमक मल दिया।

“ वे हमें ढोर समझ पीट रहे थे और पूरण दा हमारे हाथ पकड़ कह रहा था – वे ऊँचे लोग हैं, उन पर हाथ मत उठाओ !” मार यादकर गंगू के गाल जल उठे, आँखें छलछला गईं।

“ हम तो इसीलिए नहीं गए, अब क्या माजना रहा।” गेंदा का पड़ोसी बोला, जिसने पूरण के साथ जाने से मना कर दिया था।

“तुम क्यों जाओगे, पटेल के यहाँ हाली जो हो !” गेंदा ने कहा।

“ गेंदा तू मेरे मुँह मत लाग, हाली हूँ तो क्या हुआ ? और तुमने जाकर उनका क्या बिगाड़ लिया ?” भीड़ में से गेंदा का पड़ोसी बोला।

“ लड़ो, आपस में एक-दूसरे का माथा फोड़ दो, वहाँ पटेल के सामने जाते पाँव टूटते हैं।” पीराक ने कहा।

“ तू चुप कर, आदमियों के बीच चपर-चपर मत कर !” पूरण झुँझलाया।“ कहाँ हैं आदमी, यहाँ तो सब कीड़े-मकौड़े हैं। इनकी औलादें भी ऎसी ही होंगी। कभी नहीं भणेंगे, कभी पनही नहीं पहनेंगे। जिनगीभर उबाणे पगे ( नंगे पैर ) पटेलों की जी हुज़ूरी करेंगे।” पीराक जलती चिता हो गई।

“तू चुप करती कि नहीं !” पूरण चीख़ा।

पूरण की चीख़ से पीराक समझ गई। पूरण को औलाद के नहीं भणने ( पढ़ने ) और पनही नहीं पहनने का ताना चुभ गया। पीराक झेंपकर चुप हो गई, लेकिन उसका बदन जलता रहा। उसका सीना इस क़दर ऊपर-नीचे हो रहा था मानो  भीतर अंधड़ घुस गया है और अभी सीना फ़ाड़ डालेगा। उसकी बगल में गेंदा की माँ खडी़ थी। उम्रदराज औरत थी, वह बोली, “चुप तू कर पूरण, पीराक सची कहती है। तुम तो अपने बाप-दादाओं की तरह ढोर रहे। तुम्हारी औलादें भी ढोर रहेंगी। अरे तुम काहे के आदमी। ढंग से बैराँ का तन न ढाँक सको, पेट न भर सको, अपना हक़ तक न ले सको। अरे ऎसे दब्बू आदमी के साथ रहने से तो राँडी बैराँ भली।”

“ तुम लोगों के माथे कटवाओगी।” पृ्रण बेबस होता चीख़ा।

“ पटेल की पनही पर धरे माथे की क्या आरती उतारें, ऎसा माथा कट जाए तो भला”, पीराक भी अपने को और चुप न रख सकी।

पूरण को कुछ नहीं सुझ रहा था, वह चुप रहा। मंगू,गेंदा व गंगू भी उनकी बातों से सहमत होकर उनके सुर में सुर मिला रहे थे।

“ अभी तो ढोर कोठों में ही पड़े हैं, वे फिर आ सकते हैं।” मंगू ने कहा।

“हम नहीं जाएँगे।” गेंदा बोला।

“ वे आएँगे तो वापस न जा सकेंगे।” गंगू बोला और उसके सुर में भीड़ ने भी अपनी आवाज़ मिलाई।

“ मत घीसो, मुझे क्या पड़ी है ? जब बैराँ ही कहती है, पटेल की पनही पर धरा माथा कट जाए, तो भला, फिर मैं क्यों माथा झुकाऊँ ?”

पूरण बड़बड़ाता टापरे में चला गया। सब पूरण के टापरे की ओर देखने लगे। वह थोड़ी देर बाद निकला। उसके पाँव में वही पनही थी, जो ब्याह में उसने गढ़ी थी, जिसे पहनने पर पंचायत के सामने नाक रगड़ने और गाँव में झाडू लगाने की सज़ा भोगी थी। उसके हाथ में मरे ढोरों की खाल उतारने वाली एक-सवा फीट की छुरी थी। उसने बैठकर धार करने वाला पत्थर दोनों पाँवों से पकड़ा और उस पर छुरी घीसकर धार करता बोला, “ अब मेरा मुँह क्या देख रहे हो, जाओ टापरे में जो कुछ हो — लाठी, हँसिया लेकर तैयार रहो, पटेलों के छोरे आते ही होंगे और हाँ, उबाणे पगे मत आजो कोई।”

साँझ का सूरज पूरण के काले मुँह पर दमक रहा था और पीराक के साँवले गालों पर सुनहरी किरणें मटकी नाच रही थीं।

000

सत्यनारायण पटेल

एम-2 /199, अयोध्या नगरी

( बाल पब्लिक स्कूल के पास )

इन्दौर-452011

bizooka2009@gmail.com

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