मंगलवार, 15 अगस्त 2017

समीक्षा की समीक्षा // “अँधेरे के खिलाफ ऊजाले की जिद” पर एक समीक्षकीय टिप्पणी // शेषनाथ प्रसाद

                   

    यह समीक्षा-लेख वाणी प्रकाशन से सुधीश पचौरी के संपादकत्व में प्रकाशित पत्रिका ‘वाक्’ के मार्च 16, अंक 22 में छपा है. इस समीक्षा के  लेखक हैं एक शोध-छात्र जगन्नाथ दूबे. दूबे ने इस लेख में राजेश जोशी के काव्य-संकलन ‘जिद’ की समीक्षा की है. लेकिन इसमें जोशी की काव्य-प्रकृति खुल नहीं पाई है. समीक्षक एक शोध-छात्र हैं पर वह इसमें अपनी शोध-दृष्टि का उपयोग करते नहीं दिखाई देते.

    समीक्षक इस समीक्षा में अनुभव करते हैं कि हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो मानवीयता के लिए भयानक संकट का समय है. वह यह भी अनुभव करते हैं कि यह संकट....कवि या कविता की तरफ से पैदा किया गया संकट नहीं है. यह संकट सत्ता की ओर से....पैदा किया जा रहा संकट है. लेकिन उनका ध्यान इस ओर नहीं गया कि भारत के एक वाद-बद्ध साहित्यकार-समूह, जो ऐसी ही बातें करता है, को प्रभावित करने वाले सार्त्र कहते हैं- Hell is the other people. माओ का सिद्धांत है  First we should choose who is Our friend avd who is our enemy (माओ का यह वक्तव्य तब का है जब वह चीनी-सत्ता को च्युत करने की तैयारी कर रहे थे). समीक्षक ने सत्ता का जो सरलीकरण किया है उसमें ये भी आते हैं. ये अपने आप में एक सत्ता की हैसियत रखते थे. ये कितने खतरनाक वक्तव्य हैं, समीक्षक स्वयं समझ सकते हैं.

    कविता हमें मुक्त-हृदय करती है. मुक्त-हृदय? क्या हृदय से मुक्त जैसे मुक्त-काम- कामना से मुक्त? तब तो मनुष्य जी ही नहीं पाएगा. शायद समीक्षक का आशय हो हृदय पर पड़े भारों से मुक्त. जोशी के ‘जिद’ संकलन की कविताओं ने समीक्षक को कितना मुक्त-हृदय किया, यह तो वही जानें पर स्वतंत्रता आंदोलन के समय मैथिली शरण गुप्त की ‘भारत भारती’ ने इस देश के जन को खूब मुक्त-मन किया. मन्मथ नाथ गुप्त ने इसी के गीतों को गा-गा कर स्वाधीनता नामक मूल्यवान त्तत्व से यहाँ के जन को जोड़ा. मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता के मूल आशय को पाने के लिए प्रखर बुद्धवादी लोग आज भी सिर खपा रहे हैं. इस जनपक्षधर कवि का ‘जन’ कौन है मैं आज भी ढूँढ़ रहा हूँ. क्यों कि खेत खलिहान में रहने वाला या मजदूर वर्ग तो इसे समझने से रहा, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कवि ने भी इसे एक बार पढ़ कर अलग रख दिया, दुबारा पढ़ने के लिए नहीं उठाया.                                                                                

अँधेरे की बात-

    अब ध्यान फिराते हैं इस लेख के शीर्षक पर. इस शीर्षक में एक तरह से ‘जिद’ संकलन का मूल कथ्य समेटा गया लगता है. समीक्षक अनुभव करता है कि राजेश जोशी अँधेरे समय में उजाला दिखाने वाले कवि तो हैं ही, अँधेरे का पर्दाफाश भी करने वाले कवि हैं. उजाला फैलाने और अँधेरे का पर्दाफाश करने के लिए वह ‘जिद’ ठाने हुए हैं. वह अपनी बात अंधेरा और उजाला का मानवीकरण कर रखते हैं.

    समीक्षक ने इस समीक्षा-लेख का नाम रखा है, अँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद. तो समीक्षक को अपने लेख में इन दो बिंदुओं पर मुख्य रूप से फोकस रखना चाहिए था, यह अँधेरा क्या है और उजाला क्या है, जो नहीं रखा है.

    समीक्षक गोलमटोल शब्दों में कवि के अँधेरे की प्रतीति को सामाजिक अँधेरा कहते हैं. और इस सामाजिक अँधेरे को सत्ता द्वारा पैदा

किया मान लिए हैं. शायद अँधेरे के पर्दाफाश से उन्हें यह तथ्य मिला है.  

तो समाज में केवल सत्ता द्वारा पैदा किया ही अँधेरा है? और किस प्रकार के संकट और किस प्रकार के अनुभव उन्हें मिले, समीक्षक नहीं बताते.

    समीक्षक यह भी नहीं बताते कि यह सामाजिक अँधेरा है क्या. आज समाज भी अनेक है- दलित समाज, समाजवादी समाज, मार्क्सवादी समाज वगैरह. सबके अपने अँधेरे और सबके अपने उजाले हैं. इसे वह पाठक की समझ पर छोड़ देते हैं. (ऐसा कर समीक्षक का अपने दायित्व से बच लिकलना आसान है, आज के समीक्षकों में यह आम प्रवृत्ति दिखाई देती है.)

    कवि के अँधेरे को जानने के लिए मैंने इस संकलन की कविता अंधेरे

के बारे में कुछ वाक्य पर ध्यान जमाया. इसमें मुझे ये पंक्तियाँ मिलीं –

अँधेरे में सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि वह क़िताब पढऩा

नामुमकिन बना देता था।

    वैसे अँधेरे का काम ही क्या है. यह तो स्वाभाविक है.

    अँधेरा का यहाँ मानवीकरण किया गया है. अँधेरे ने जो भूतकाल में किया उसीका इसमें जिक्र किया गया है. वह “किताब पढ़ना नामुमकीन कर देता था” मतलब अब नहीं करता. समीक्षक यह नहीं बताता कि ‘था’ के प्रयोग से कवि का क्या प्रयोजन है. क्या ‘है’ के प्रयोग से वह प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता था. समीक्षक की पूरी समीक्षा ‘है’ में ही है,

    एक बात मेरी. मेरे जाने उजाले का न होना ही अँधेरा का होना है. किताबों पर पड़ती रौशनी जब हटती जाती है तब अँधेरा पसरता जाता है. यह तो कवि भी अनुभव करता है. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इसमें अस्तित्वहीन अँधेरे का क्या दोष. उसने क्या बुरा किया?

    इस किताब को बुद्धि के उजाले का प्रतीक कैसे माना जाए. किताब

तो खुद अन्य उजाले से प्रकाशित होने पर ही दिखती है.

    कवि का अगला कथन है-

पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या क़िताब (उजाला) से डरता था

    जिसका अस्तित्व ही उजाले के न होने से है वह शरारत क्या करेगा.

    इस कविता के पढ़ने पर अँधेरे का कोई स्पष्ट रूप नहीं उभरता. कवि इस अँधेरे के कई चेहरे का जिक्र करता है - 

लेकिन अँधेरे के अनेक चेहरे थे

         पॉवर-हाउस की किसी ग्रिड के अचानक बिगड़ जाने पर

         कई दिनों तक अन्धकार में डूबा रहा

         देश का एक बड़ा हिस्सा ।

    यह सामाजिक अंधकार तो नही है, तकनीक के फेल्योर से पैदा अंधकार है. ये पंक्तियाँ काव्यात्मक भी नहीं हैं. अँधेरे का मानवीकरण कर देने से ये काव्य-पंक्तियाँ नहीं बन जातीं. इससे क्या प्रतीकार्थ या लक्ष्यार्थ निकाला जाए. इस अँधेरे को दूर करने के लिए पावर हाउस के ग्रिड को ठीक करना ही काफी है जो एक इलेक्ट्रीशियन कर सकता है. वहाँ राजेश जोशी का उजाला या उसकी जिद क्या करेगी.

अँधेरे का एक चेहरा यह-

       लेकिन इससे भी बड़ा अँधेरा था

       जो सत्ता की राजनीतिक ज़िद से पैदा होता था

       या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले

       ग़ुलाम दिमाग़ों से !

    लगता है यहाँ समीक्षक की शोध-दृष्टि नहीं पड़ी है. कवि इस कविता में अँधेरे को पैदा करने वाली सत्ता की राजनीतिक जिद की बात करता है, अँधेरे के खिलाप उजाले की जिद की नहीं. इस कविता में अँधेरे को तोड़ने के लिए उजाले को जिद करते नहीं दिखाया गया है. मेरे देखे राजनीतिक सताएँ अँधेरा नहीं फैलातीं वरन् उजाले के केन्द्रों को ध्वस्त करती हैं और अँधेरा पाँव पसार देता है. गुलाम हों या आजाद उनमें अँधेरा नहीं फैलाया जाता, उनके पास उजाला पाने की जो युक्ति है उसे छीन लिया जाता है. क्योंकि वस्तुतः उजाले का ही अस्तित्व है अँधेरे का नहीं.

    राजनीति ने आज के समाज में बहुत अँधेरा पैदा किया है. इसमें कोई दो राय नहीं. यह उसने मनुष्य की स्वतंत्रता (उजाला) छीन कर किया है. दो उदाहरण सामने ही है, रूस के नोवेल पुरस्कार निजेता साल्झेनित्सिन और चीन के विचारक ल्यु श्याबाओ का. इन दोनों को सत्ता के सामाजिक विचार से भिन्न मत रखने के कारण जेल के भीतर डाल कर लेखन जगत और विचार जगत में अँधेरा पैदा किया गया. समीक्षक सत्ता द्वारा अँधेरा पैदा करने का उदाहरण कबीर और मुक्तिबोध के साथ किए गए सत्ता के व्यवहार को बताते है. वह भूल गए हैं कि सिकंदर लोदी धर्मांध था. उसने हाथी के पैर तले कबीर को कुचलवा कर अपने धर्म को ऊपर करना चाहा था. इससे कोई अँधेरा पैदा होता तो वह धार्मिक अँधेरा होता सामाजिक नहीं. किंतु वह यह अँधेरा पैदा कर नहीं सका. और मुक्तिबोध कोई इतिहासविद नहीं थे. कुछ इतिहासकारों के आधार पर उन्होंने विद्यार्थियों के लिए आर्य संस्कृति का जो चित्र खींचा था वह सर्वस्वीकार्य नहीं था. इसपर प्रतिबंध से कौन सा अँधेरा फैला? प्रतिबंध तो प्रेमचंद के सोजे वतन पर भी लगा था. अब रोमिला थापर आर्यों का इतिहास इक्ष्वाकु से मानती हैं, इसे कौन मानेगा.

    कवि के अनुसार इस राजनीतिक जिद से एक बौद्धिक अँधेरा भी पैदा होता था -  

एक बौद्धिक अन्धकार मौक़ा लगते ही सारे देश को

हिंसक उन्माद में झोंक देता था ।

सहृदय जन को यहाँ कुछ सोचने का अवसर मिलता है. यह बौद्धिक

अँधेरा है क्या, समीक्षक तो इसे स्पष्ट नहीं करते. मेरी समझ से सोच विवेक को अपहृत कर लेना ही बौद्धिक अँधेरा है. तो इसके उलट सोच विचार को पैदा करना ही उजाला प्रदान करना होगा. यह तो कृत्रिम ढंग से किया जा सकता है, शैक्षणिक जैसी विधियों से. कवि इस कविता में यह उजाला परदा को हटा कर या बंद कर करता है (आगे वे पंक्तियाँ उद्धृत की गई हैं). यह उजाला पहले से ही स्वतंत्र उपस्थित है.

    किंतु सत्ता हमेशा बौद्धिक अँधेरा ही पैदा करती हो ऐसा नहीं है. सत्ता ने कला, विचार-विवेक के क्षेत्र में भी योगदान दिया (उजाला पैदा किया) है, कलाकारों को सहयोग देकर. मनुष्य के सर्वांग को प्रकाशित करने वाले गौतम बुद्धों के उजाले पर तत्कालीन सम्राटों ने प्रतिबंध लगा कर अँधेरा पैदा करने की कोशिश नहीं की. वे उस उजाले को उनसे छीन भी कैसे सकते थे. मिनांडर ने तो नागार्जुन से बाकायदा शास्त्रार्थ किया था. राजपूत कला, मुगल कला जैसी कलाएँ भी सत्ता द्वारा विकसित हुईं हैं.

    कृत्रिम उजाला अँधेरे को दूर नहीं कर सकता. क्यों कि उसका होना न होना अधूरे व्यक्तियों के हाथ में होता है. जैसे कलबुर्गी मूर्तिपूजा को अंधविशास मान कर उसे जन से दूर करना चाह रहे थे. जबकि उन्हें जानना चाहिए था कि मीरा ने परमात्म तत्व के अनुभव के लिए मूर्ति को ही माध्यम बनाया था. और इस अंधविश्वास को मिटाने के लिए वह मूर्तियों की उपेक्षा करने की सीख देते थे. कहते थे कि मूर्तियों पर तो मूता जा सकता है. (यह समाचार उस समय के हिंदू दैनिक में छपा था.) मजा यह कि वह सामाजिक उजाले के पैरोकार थे.

अब उजाले की बात.

    समीक्षक के अनुसार कवि उजाला दिखाने वाला और अँधेरे का पर्दाफाश करने वाला कवि है. .

कविता अंधेरे के संबंध में कुछ वाक्य में राजेश जोशी ने रौशनी का भी जिक्र किया है-

रोशनी के पास कई विकल्प थे

      ज़रूरत पडऩे पर जिनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता था

      ज़रूरत के हिसाब से कभी भी उसको

      कम या ज़्यादा किया जा सकता था

      ज़रूरत के मुताबिक परदों को खीच कर

      या एक छोटा सा बटन दबा कर

      उसे अन्धेरे में भी बदला जा सकता था

    कवि की रौशनी (उजाला) विकल्पों वाली है. इसका इस्तेमाल (शब्द पर ध्यान दें) किया जा सकता है, वह भी जरूरत के मुताबिक. यह रौशनी हमारे हृद-मन को प्रकाशित करने वाली नहीं, टार्च की रौशनी-सी है. क्या यही रौशनी अँधेरे (कवि ने इसे किसी गढ़ अर्थ में लिया है) को हटाने की जिद किए हुए है?

    मैं सोच में पड़ गया हूँ कि कविता में रौशनी (उजाले) के उजाले ने जिद कर रखी है तो उस जिद का जिक्र कहाँ है. यहाँ तो अवरोध हटाओ, अँधेरा गायब. अवरोध खड़ा कर दो अँधेरा हाजिर. यह अवरोध खड़ा करने वाला कौन है. केवल सत्ता? कबीर के उजाले को कोई सत्ता नहीं रोक सकी थी. आज के दिन सत्ता की एक बड़ी ताकत अमरीका (निक्सन का) ने ओशो को जहर दिया, उन निहत्थे को बाईस देशों तक खदेड़ा, वहाँ ठहरने के लिए उतरने नहीं दिया, उन्हें उनके अपने देश में रहने के लिए उसने तब अनुमति दी जब राजीव सरकार ने यह स्वीकार कर लिया कि किसी से उन्हें मिलने नहीं दिया जाए. प्रकांतर से समाज से काट दिया जाए. क्या ओशो के प्रकाश को रोका जा सका? उनके प्रकाश ने तो कोई जिद भी नहीं की. निक्शन की ज्यादती इसलिए नहीं थी कि दुनिया में अँधेरा पैदा करना है. वह इसलिए थी कि कहीं उनकी सिखावन ईसाइयत के ऊपर न हो जाए. वह स्वयं एक क्रूसेड (धर्मयुद्ध) की अगुआई करना चाह रहे थे. दुनिया में हैरी पॉटर के बाद सबसे अधिक बिकने वाली उन्हीं की प्रकाशप्रकीर्णक पुस्तकें है. उनकी पुस्तकों को छापने के लिए आज वह बाजार लालायित है, जिस बाजार को अन्यों के साथ समीक्षक भी कोसता है. बाजार अपने हानि-लाभ को जरूर देखता है. किंतु पुस्तक में कुछ जीवनदाई है तो उसे भी अंगीकार करता है. फणीशवर नाथ रेणु के मैला आँचल को प्रकाशक ओमप्रकाश ने खोज कर छापा था.

    राजेश जोशी की रौशनी का एक और विकल्प है –

    एक रोशनी कभी कभी बहुत दूर से चली आती थी हमारे पास

    एक रोशनी कहीं भीतर से, कहीं बहुत भीतर से

    आती थी और दिमाग को एकाएक रोशन कर जाती थी ।

    कवि यहाँ कुछ दार्शनिक-सा हो गया लगता है. समीक्षक ने इन, कहीं दूर से और कहीं भीतर से आती रौशनियों पर विचार ही नहीं किया है. ये कैसी रौशनियाँ (उजाले) हैं. सत्ता द्वारा पैदा किए गए अँधेरे का फाश करने, उसे दूर करने के लिए, उससे उलझने के लिए कवि के हाथ में जो उजाला है वह कैसा है, पर्दा हटाने से आने वाला या बटन दबाकर पैदा किया उजाला या इन दूर से और भीतर से आती रौशनियों का उजाला. इन अंतिम ऱौशनियों के उजाले का प्रभाव ऐसा है कि यह कवि के दिमाग को एकाएक रौशन कर देती थी (अब शायद नहीं करती). दिमाग तो किसी व्यक्ति का ही रौशन हो सकता है समाज का नहीं. तो फिर इससे सामाजिक अँधेरा केसे दूर हो सकेगा. समाज तो अनेक लोगों से बनता है. समाज के हर व्यक्ति पास ये ऱौशनियाँ आएँ तो ही तभी समाज रौशन हो सकता है, इस रौशनी को आने देने में या उसे आने से रोकने में सत्ता क्या कर सकती है. मुहम्मद साहब को ये रौशनियाँ उतरी थीं उनके विरोधी इसे रोक नहीं सके थे. इस उजाले को कवि फैलाता तो अँधेर को हटाने की ओर उसका एक कदम हो सकता था. किंतु कवि को केवल इन रौशनियों का अहसास भर है. केवल अहसास वाली रौशनी से न तो कोई विरोध सफल हो सकता है न कोई आंदोलन. वह भी कवि का एक शायर दोस्त उसके मन में एक शंका डाल देता है-

एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था

    वह शक ही नहीं करता था. वह-

           कहता था, उसे रेशा-रेशा उधेड़ कर देखो

           रोशनी किस जगह से काली है

रौशनी देने वाले स्रोत के जिस हिस्से से रौशनी नहीं आ रही हो वह हिस्सा काला दिख सकता है पर रौशनी किस जगह से काली है यह देखने की बात समझ के बाहर है. कवि के दोस्त कुछ अनूठी दृष्टि वाले है.  

    तो यह है कवि राजेश जोशी का उजाला जिसकी प्रकृति ही अस्थाई है. जो खुद ही एक बटन के सहारे अंधेरे में बदला जा सकता है वह किस दम के साथ अंधेरे के खिलाफ कोई जिद ठान सकता है.

    कहा जा सकता है कि उक्त कविता में अंधेरे और उजाले के बिंब खड़े किए गए हैं. तो मैं इतना ही कहूँगा कि कबीर के पास भी एक उजाला था, स्थिर प्रकृति का. उस उजाले को जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने एक काव्य-बिंब खड़ा किया, लुकाठी और घर का. यह लुकाठी उजाले का पुंज प्रज्ज्वलित करती हुई लकड़ियों की ढेरी में से निकाल ली गई एक जलती हुई लकड़ी है, जो किसी घर (अंधेरा) को जला कर उजाला पैदा कर सकती है. (उजाला आता है तो अँधेरा स्वतः हटता जाता है, इसे अँधेरे का जलना कहा जा सकता है). उजाले और अंधेरे के ये कबीर के बिंब बहुत स्वाभाविक हैं. हमारे बोध में सहज रूप से उतर जाते हैं.

अब उजाले की जिद की बातः

    समीक्षक ने अपनी समीक्षा में यह साफ नहीं किया है कि कवि के पास उजाला कौन सा है और उजाले की जिद की बात करने लगता है.  कवि की ‘जिद’ शीर्षक से लिखी दो कविताओं में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता. द्वीतीय ‘जिद‘ कविता में निराशा कवि के पीछे पड़ी हुई है. कवि मीटिंग का बहाना बनाकर उससे पीछा छुड़ाना चाहता है. यह कह कर कि तुम वही बातें कहोगी जो अन्य कहते हैं. वे (अँधेरे के) विरुद्ध एजेंडा बनाते हैं, किसी उद्यान में मीटिंग करते हैं, समाचार बनाकर छपवा देते हैं. लेकिन उनपर भी कभी कभार उदासी छा जाती है. प्रथम ‘जिद’ कविता से पता चलता है कि वे विरोध के लिए अपनी जेबें निचोड़ते हैं, पोस्टर बनाते हैं, प्रदर्शन करते हैं. पर यह सब तो शासन से कुछ माँगने के लिए किया जाता है. ऐसे विरोध को समीक्षक कवि के उजाले की जिद मान लेता है. हालाँकि कवि ने कविता में इस विरोध को अन्यों द्वारा किया जाता बताया है. यह जिद कवि की है, कैसे कहा जा सकता है. क्या यह जिद है भी?

    समीक्षक कवि को बेचैनी से भरा एक संबेदनशील कवि कहते हैं. गजब की बेचैनी और संवेदनशीलता है इन कवि में. वह इतना बेचैन हैं कि अपनी ‘गुरुत्वाकर्षण’ कविता में न्यूटन से गुरुत्वाकर्षण के अपने नियम को वापस ले लेने का उनसे गुहार करते हैं. क्योंकि पृथ्वी फिसल रही है (अगर यह अनुभूति है तो कवि अनोखी अनुभूति वाले कवि हैं). क्या नियम वापस ले लेने से पृथ्वी का फिसलना बंद हो जाएगा? न्यूटन एक वैज्ञानिक थे. वैज्ञानिकों के आविष्कार को मनुष्य जाति का आविष्कार माना जाता है. पर यह कवि सीधे उससे अपना पिंड छुड़ा लेते हैं- न्यूटन तुम अपना..नियम वापस ले लो...राषट्राधयक्षों की जबान कब फिसल जाए कोई नहीं कह सकता. जहाँ तक संवेदनशीलता का प्रश्न है, इन पंक्तियों से कौन सी संवेदनशीलता संप्रेषित होती है. मेरे जाने कविता में संवेदनशीलता पिरोना होता है.

    समीक्षक बहुपठित लगते हैं, शोध-छात्र हैं. कवि की बेचैनी और संवेदनशीलता के संभवतः उदाहरणस्वरूप ही ये पेक्तियाँ उद्धृत की हैं.

      अँधेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे

      और उसे अपनी नियति मान लेते थे

      कुछ ज़िद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में

      जो कहते थे कि अँधेरे समय में अँधेरे के बारे में गाना ही

      रोशनी के बारे में गाना है ।

वो अँधेरे के समय में अँधेरे के गीत गाते थे

अपनी वेचैनी में कवि पीछे मुड़ कर (‘थे’ की अभिव्यंजना) देखता है. वहाँ उसे बहुत से लोग डरे हुए दिखते हैं जो अँधेरे को अपनी नियति मान लिए हैं. कुछ जिद्दी लोग भी दिखे जो जिंदगी को हार बैठे थे और अँधेरे का गीत गाने में ही अपनी सुरक्षा समझते थे, अँधेरे के बारे में गाना ही वे रौशनी के बारे में गाना मानते थै. यह किन लोगों की तरफ ईशारा है, भारतीय लोगों की या पश्चिमी लोगों की तरफ? मैथिली शरण गुप्त ने तो अतीत के अँधेरे में हुए उजाले की और उसे प्रयोग करने वालों के गीत अपने समय के अँधेरे में गाए थे, और निराला ने भी. इन लोगों ने अँधेरे के बारे में गीत गाकर उजाले का गीत समझने को नहीं कहा था.

    अँधेरे के बारे में गाना रौशनी के बारे में गाना कैसे है, समीक्षक ने इसको स्पष्ट करने में रुचि नहीं ली है. अँधेरे के बारें गाना, मेरी समझ से अँधेरे की सत्ता को मानकर उसकी जुगाली करना ही है. यह भारतीय मनीषा की जातीय प्रकृति नहीं है. फिर राजेश जोशी को इसका इलहाम कहाँ से हुआ. जरा इन पंक्तियों पर गौर करें-

क्या अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जाएँगे

       हाँ, गाए जाएँगे

       अँधेरे वक्त में भी अँधेरे के गीत गाए जाएँगे। ---  बर्तोल्त ब्रेखत       

(वसुधा, मार्च-17)

    बर्तोल्त ब्रेख्त जर्मनी के कवि और नाटककार थे. बीसवीं सदी के जर्मनी के संदर्भ में उन्होंने यह कविता लिखी थी. आश्वित्ज कैंप के उत्पीड़न से वहाँ का एक चिंतक इतना निराश हो गया था कि उसने कविता लिखने की ही मनाही कर दी थी जबकि हिरोशिमा-नागासाकी की तबाही से जापान ने हिम्मत नहीं हारी. संभव है ब्रेख्त ने सोचा हो अँधेरे के गीत में अँधेरे को दिखाते हुए उसमें चतुराई से जागरण की ध्वनि लपेट कर गाया जाए. हो सकता है उन्हें अपने जर्मनी देश के लिए ऐसा करना ही उपयुक्त लगा हो. जर्मनी के अवाम की नब्ज उनमें धड़कती थी. लेकिन इस अँधेरे के गीत को उजाले का गीत तो नहीं कहा जा सकता. कवि के लिए भारतीय संदर्भ में भारतीय अवाम की नब्ज को अपने हृदय में धड़कने देना चाहिए. अब इक्कसवीं सदी के भारत के संदर्भ में उक्त पंक्तियों का अनुभव कितना उपयुक्त बैठता है. देखने की बात है. जापानियों के उत्साहावेग को हम क्यों नहीं कोट करते?

    समीक्षक यह नहीं समझा पाए हैं कि उजाला और उजाले की जिद से इन पंकतियों का क्या ताल मेल है.

पुनश्चः

    यह शोध करने योग्य है कि राजेश जोशी का अँधेरे और उजाले का चिंतन उनके अपने चिंतन की उपज हैं या ब्रेख्त से लिया गया है.

मेरा ध्येय राजेश जोशी के ‘जिद’ कोव्य-संकलन की समीक्षा करना नहीं, जगन्नाथ दूवे की समीक्षा पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखनी थी. आज की आलोचना में आलोच्य की विवेचना की क्या पद्धति है यही जानने की मेरी अभिप्सा थी. क्योंकि अक्सर पढ़ने को मिलता है कि आज की आलोचना अपने पूर्व स्तर से च्युत हो गई है. मैंने इस समीक्षा में अनुभव किया कि संकलन में जो कहा गया है उसपर ध्यान न टिकाकर उसके माध्यम से समीक्षक अपनी बातें कहने में अधिक रुचि रखते है.

आलोचना ऐसी होनी चाहिए जिससे उस पुस्तक को पढ़ने में पाठक की रुचि जगे.

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