शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

कहानी // सबक // शालिनी मुखरैया

अनीस नियाजी की कलाकृति

“ रामदीन ,यह सारा सामान कार के पीछे वाली सीट पर रख देना” गुप्ता जी ने अपने ड्राइवर को आदेश दिया।

इस बार तो गुप्ता जी मानो पूरा बाज़ार ही खरीद लाए थे।

लाएँ भी क्योँ ना, जबसे उनकी मलाईदार विभाग मेँ पोस्टिंग हुई थी तबसे मानो उनकी चाँदी हो गयी थी , जम कर लक्ष्मी की वर्षा हो रही थी। पूरे विभाग मेँ सबको पता था कि गुप्ता जी जम कर कमाई कर रहे हैँ इसलिये पीठ पीछे चर्चाएँ चल रही थीँ ,सामने तो कोई मुँह खोलता ना था। मगर गुप्ताजी भी जान कर अनजान बने रहते थे। कोयले की दलाली मेँ हाथ काले होने से आज तक कोई बचा है क्या भला ? और फिर जब देने वाला मेहरबान हो भला हमेँ लेने से क्या परहेज़।

गुप्ता जी कभी अपनी ईमानदारी के लिये जाने जाते थे ,मगर आती हुयी लक्ष्मी अच्छे अच्छोँ का ईमान बदल देती है। कभी कभी गुप्ता जी के मन मेँ ख्याल आता भी तो वह उसे परे झटक देते थे।

”बाबूजी दीये ले लीजिये ,बस बीस रुपये के पचास हैँ “ एक मैले कुचैले कपड़े पहने लड़के ने उनकी विचारोँ की श्रँख्ला को विराम दिया।

“चल हट , कहीँ और जा कर दे इन्हेँ” , गुप्ता जी ने घृणा भरे स्वर मेँ उसे झड्प दिया।

“ ले लीजिये न बाबूजी “ लड़के का गिड़गिड़ाता हुआ स्वर था।

”आप जैसे साहब हमारे दीये खरीद लेँगे तो हमारी भी दीवाली मन जायेगी”

गुप्ता जी के मन मेँ भी कुछ उत्सुकता जाग उठी तो पूछ बैठे “ अच्छा कितने के दीये बेच दिये तुमने”

”साहब , पूरे 500/- के अब तक बेच चुका हूँ , कुछ और बिक जायेँगे तो 50 रु के पटाखे भी ले आऊँगा”

उस लड़के ने उत्साह मेँ अपने सारे खर्चों का हिसाब गुप्ता जी को समझा दिया।

कितनी उमँग थी उसके मन मेँ , इतने कम रुपयोँ मेँ भी उसने इस त्यौहार को मनाने का पूरा इंतज़ाम अपने मन मेँ सोच रखा था। गुप्ता जी मन ही मन हैरान थे कि लोग किस तरह से अभावोँ मेँ भी खुशियोँ का साधन निकाल ही लेते हैँ।

“अच्छा ये लो 100 रु , इसके पटाखे खरीद लेना” गुप्ता जी ने एक नोट उस लड़के की ओर बढ़ाया। शायद उनके भीतर का इंसान जाग उठा था।

“साहब कितने दीये दूँ”

उस लड़के ने अपने सारे दीयोँ का हिसाब करना शुरू कर दिया। एक साथ तो किसी ने इतने रुपयोँ के दीये लिये ही नहीँ थे। उसकी बौखलाहट उसके चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती थी।

“नहीँ मुझे दीये नहीँ चाहिये , मुझे इनकी जरूरत नहीँ है “गुप्ता जी का स्वर था।

“ तो साहब फिर मैँ पैसे नहीँ ले सकता “ उस मैले – कुचैले कपड़े पहने लड़के ने गुप्ता जी को वह सौ का नोट लौटा दिया। गुप्ता जी अवाक थे कि ऐसा भी कोई करता है भला , आती हुई लक्ष्मी को जाने देता है !!!

”निरा बेवकूफ है ये लड़का , आखिर क्या बात है “ गुप्ता जी अपने मन मेँ बुद्बुदाये।


“ नहीँ साहब , मैँ ईमानदारी से कमाये पैसे से ही दीवाली का त्योहार मनाना चाहता हूँ , एक दिन ऐसा भी आयेगा जब हमारे भी दिन फिरेँगे” यह कह कर वह लड़का मुड़ कर चला गया।

गुप्ता जी को ऐसा महसूस हुआ कि किसी ने भरे बाज़ार मेँ उनके मुँह पर तमाचा मार दिया हो। गाड़ी की सीट पर पडा सामान उन्हेँ मुँह चिढ़ाता प्रतीत हो रहा था। वह स्वयँ अपने से निगाह नहीँ मिला पा रहे थे।

एक अनपढ , मैले कुचले कपड़े पहने लड़का उन्हेँ ईमानदारी का सबक जो सिखा गया था।

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शालिनी मुखरैया

विशेष सहायक

शाखा मेडीकल रोड ,अलीगढ

03.08.2017

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