रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

“खोई हुई परछाई”--शौकत शोरो के कहानी संग्रह में कहानियों के किरदार अपने जज़्बात के आईने में…..! // देवी नागरानी

साझा करें:

जीवन तो एक सिलसिलेवार संघर्ष है,  एक जंग है. यह वह लड़ाई है जो लड़ते हुए भी कोई जीत नहीं पाया है. पर इस जद्दोजहद के दौरान आशावादी विचारों ...

clip_image002 clip_image004 clip_image006

जीवन तो एक सिलसिलेवार संघर्ष है,  एक जंग है. यह वह लड़ाई है जो लड़ते हुए भी कोई जीत नहीं पाया है. पर इस जद्दोजहद के दौरान आशावादी विचारों वाले योद्धा प्रयास करते हुए अंधेरी सुरंगों से रोशनी को ढूंढ ले आने की कोशिश करते हैं और क़ामयाब भी होते हैं.

पर इसके लिए सोच में ठहराव जरूरी है!

पानी में हलचल हो तो अपना अक्स भी साफ दिखाई नहीं देखा जा सकता. सुख के झोंके, दुख की आंधियाँ मौसम के बदलाव के साथ तब्दील होकर आती जाती है. समय के साथ समस्याएं आएंगी, समाधान ढूंढने पड़ेंगे. सर्दी होगी तो हीटर का या ब्लैंकेट का बंदोबस्त करना होगा, और गर्मी में एयर कंडीशनर व् पंखे की जरूरत पड़ती है यह भी सोचना पड़ेगा.

कहते हैं जब तक पानी हमारे पावों के नीचे से नहीं गुजरता तब तक हमारे पैर गीले नहीं होते!

तो आइए आज इस मंच पर हम सिंध के अदीब श्री शौकत शौरो जनाब की कहानियों के संग्रह खोई हुई परछाई (रात का रंग-सिंधी में) दिन की रोशनी में देखें,  सुनें और ज़ायका लें.

संध्या कुन्द्नानी ने इस संग्रह का अनुवाद हिंदी में ’खोई हुई परछाई’ के नाम से किया और उसे मंज़रे-ए-आम पर स्थापित किया है. इस संग्रह में 46 कहानियाँ हैं और मैंने उनमें से कुछ कहानियों के विशिष्ठ किरदारों में औरत और मर्द किरदार की तन्हाई और धरती के दर्द को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है.

संग्रह में लिखी भूमिका में श्री हीरे शेवकानी जी ने कई कहानियों का विश्लेषण करते हुए उन्हें Low key symphony की लहरों के साथ तुलना की है.

शब्दों में भी शब्द संगीत होता है! पर उस संगीतात्मक लय को सुनने के लिए शोर में भी खामोशी की आवाज़, उस आवास की गूंज को सुनने की दरकार है. यह वह आवाज़ है जो हमें खुद से, उस ताकत से जोड़ती है जिसके हम अंश है. उस Low key symphony का आनंद लेने के लिए बहुत सारे और माध्यम भी है जो हमारे लिए हमारे भीतर हैं, और वही हमारी रहबरी करने के लिए अधीर हैं.

क्या कभी किसी ने बाहर से अंदर का रास्ता पाया है?  अपने अंदर उतर कर वह symphony सुनना इंसान के बस में है. शर्त फिर भी वही, सोच में ठहराव् ! थिरता की अवस्था.!

इसी कड़ी में एक कड़ी जोड़ते हुए श्री जगदीश लछानी जी ने जनाब शौकत हुसैन की कहानियां को अंतः चेतना प्रवाह (literature of stream of consciousness) के प्रभाव की बात की है.

मैं भी इस बात से सहमत हूँ, कि बहुत सी कहानियों में पराएपन, तन्हाई और ज़हनी संघर्ष के दौर में बेदिली और बेबसी का इज़हार है. इंतहाई निराशाजनक मायूसी के माहौल से गुजरते हुए एक थका हारा इंसान जीवन से हार मानते हुए अपने सभी हथियार फेंक देता है, ऐसे जैसे जीवन में बहुत कुछ खोने के बाद कुछ भी न बचा हो.

मैंने इस विषय के लिए संग्रह से खास कहानियों के किरदारों को सामने लाने की कोशिश की है. काली रात-लहू की बूँदें, सुरंग, दर्द की लौ, गुम हुई परछाई व् भूखा सौन्दर्य.

काली रात लहू की बूँदें, कहानी पढ़ते मुझे लगा कि कहानी का किरदार अपनी ही सोच के जाल में कैदी होकर अपने ज़हनी यातना भोगता है. डर, तनहाई, नफ़रत के बावजूद वह एक खौफनाक मुस्कान चेहरे पर लिए, अपनी प्रेमिका को दहशत भरे अंदाज में डराने का प्रयास करता है. और खुद को तसल्ली देते हुए सोचता है-’ वह निश्चित ही समझती होगी कि मैं दिमाग का संतुलन गँवा बैठा हूँ.’ यहां भी किरदार अपनी ही सोच की कैद में उलझा हुआ है.

भीड़ में इंसान कभी अपने आप को तन्हा समझे, कभी बेवस और कभी लाचार होकर खौफ का शिकार बने तो समझना चाहिए कि उसकी हालत ठीक नहीं. या तो वह अपने वश में नहीं, या बहुत ज़्यादा ज़ख्मी है- भले ही वह अपने मन में कितने भी ठहाके क्यों न लगा ले. जब वही ठहाका बाहर निकलता है तो खोखले झुनझुने की तरह बजने लगता है. किरदारों के और कई जज्बे इसी तरह लफ्जों से झांकते हुए अपने आप को व्यक्त कर रहे हैं. जैसे-

‘खुले दिल से हंसते-हंसते ठहाका लगाना एक खुशी और बेफिक्री को ज़ाहिर करता है. उसके विपरीत दूसरा ठहाका होता है, जो अंदर की पीड़ा को छुपाने के लिए लगाया जाता है. यह भी एक कारण है मायूसी का…..!

मायूसी इंसान को अपने भीतर समेट लेती है, और वह अपने आप में ही सिकुड़ जाता है- उसे न किसी का साथ भाता है, न मज़ाक, न मुस्कान. इन हालत में इज़ाफा तब ज्यादा होता है जब वह बेरोज़गारी की चादर से अपने आप को ढक लेता है. उम्मीद और आसरे सभी बेमतलब के जान पड़ते हैं, बेबसी मुंह उठाकर चिढ़ाने लगती है. रिश्ते सब सौदे बन जाते हैं... लगता है जिंदगी जिंदगी नहीं सौत बन गई है!

सुरंग कहानी मैं भी शौकत शोरो का पात्र बाहरी आन- बान का मालिक है,  भले ही उसकी जेब खाली हो, पर जबरदस्ती मुस्कुराने पर उसका बस है. नौकरी बाकी नहीं बची, ऑफिस का अदना कर्मचारी हमदर्दी जताता है- पर जनाब के तेवर इस उद्धरन में देखिए---

‘यह बेवकूफ क्या समझता है? नौकरी न होने के कारण मैं पागल जैसा हो गया हूँ?” यह है जिंदगी जहां इंसान की ज़हनी हालत शायद जीवन में मात पर मात हासिल मिलने के कारण बेवजूद हो जाती हैं. फिर बात वहीं आ कर खत्म होती है जहां से शुरू हुई-कि इंसान अपने ही ज़हनी विचारों का कैदी है’.

दर्द की लौ कहानी में भी दोनों मर्द और औरत किरदार यकसी हालत में होने के कारण एक जैसा दर्द सहते है, पीड़ा के पुल पार करते हैं. फ़क़त इतना ही नहीं, पाठक भी उन किरदारों के साथ हमसफर होकर उनके हर अहसास में शरीक होता है, वही अहसास जीता है, वही पल भोगता है.

उसी तार से बुनी हुई है यह कहानी, जहां आशिक अपनी महबूबा रूबी से बिछड़ने के बाद तन्हाई का शिकार हो जाता है. उलझे हुए धागों की तरह उसके विचार उसे सिनेमा हॉल की ओर वक्त काटने के लिए धकेल कर ले जाते हैं. जीवन से बेज़ार आदमी के विचार भी निराले होते हैं, मौत उसे बहुत करीब नज़र आती है. तन्हाई उसका मुकद्दर बन जाती है, जब साथ देने के वादे पूरे नहीं हो पाते, या निभाए नहीं जाते. कारण जो भी हो. अपने नज़रिए से मर्द किरदार देखिए क्या सोचता है ……!

‘ वादे झूठी गारंटी की तरह है. वादों की भला क्या अहमियत. रूबी और मैने कितने वादे किए, क्या हुआ?  आज उनका तालुक बीते हुए कल सा है. हमारा प्यार जो कल सच था आज उसकी कोई मायने नहीं. कल जो सब कुछ था, आज कुछ भी नहीं.”

कहानी वही जो अपने आपको किरदारों के माध्यम से लिखवाती जाए और एक प्रवाह में बहते हुए झरने के समान कल कल बहती जाए. जिंदगी के खुरदरे रास्तों पर चलते चलते शौकत शोरो की कहानियों के किरदार भी कभी लड़खड़ाते हैं, तो कभी गिर कर संभाल उठते हैं. कभी मौन में सिसकते हैं, तो कभी बीच रास्ते में ठहाका लगा कर अपने खोखले वजूद पर आंसू बहाते हैं.

यह भी एक अजीब इत्तेफाक है, कि 45 कहानियों के संग्रह में, कहानियां जो मेरे हिस्से में आई हैं, उनमें से बहुत सी कहानियों के पात्र अपनी ही ज़हनी हालात के तंग किले में कैद लगे. लगभग abstract माहौल! वही तन्हाई वही घुटन, वही मायूसी!

बस बेबसी में विचारों के किले को बनाना और फिर उन्हें डाह देना, इस मायूसी के सिवा उनके पास अगर कुछ बचा है तो बस सिर्फ आंखों में आब जो इस बात का गवाह है कि यादें कैसे उनके जहन से लिपटी हुई हैं, मन की दीवारों से चिपकी हुई हैं.

हद से ज़्यादा एहसास और जज्बाती होने की वजह से आदमी अपने आसपास के माहौल में खुद को बिचारा, कमजोर, व् कायर करार कर देता है. subject to self pity....!

लगता है तन्हाई और दुख को एक दूसरे से जुदा करना नामुमकिन है, क्योंकि ऐसे दौर में न तो शख्स को अपने विचारों पर और न ही खुद पर कोई अख्तियार होता है.

ये है मन की पीड़ा और उसकी याचना के स्वर ! उन्ही की रौ में बहते हुए मैंने भी उनकी पीड़ा महसूस की, कुछ पलों के लिए जी. इसे मैं दिल का दर्द कहूं, या धरती का दर्द कहूं... सोच में हूँ... ! नारी का हृदय भी तो धरती के समान विशाल होता है, जिस में हर रंग के संस्कार और भाव भरे हुए रहते हैं.

शौकत शोरो के लेखन में भाषा का सौंदर्य, शब्दों का रख-रखाव, और गुफ्तार की शैली भी अति सुंदर और निखार भरी है. साथ में दर्ज किये हुए मुहावरे, personification, alliteration, transferred epithet....बखूबी इस्तेमाल किये गए हैं.

खोई हुई परछाई कहानी में से कुछ उद्धरन चिन्ह, भाषा के सौंदर्य को अभिव्यक्त करते हुए पाए गए हैं उन्ही में से कुछ यहाँ दर्ज है...

रस्ता सुनसान और खामोश है

जैसे कोई कहे कि मैं मौन पहाड़ी पर शोर भरा मंजर देखने के लिए खड़ा था!

पहाड़ी मौन …

रास्ता सुनसान और खामोश….

शोर में मंज़र का देखना और सुनना

बचपन में हमें उस्ताद सिखाया करते थे-

I slept on a restless pillow ...

मेरी बेचैनी तकिए को ट्रान्सफर की गई!

यह याद आज भी ज़हन से चिपकी हुई है.

फिर आगे गुम हुई परछाई का एक अंश-

रास्ता अनंत है और पाँव हैं पत्थर के….! सुंदर अभिव्यक्ति!

पत्थर के विशिष्ट लक्षण पैरों पर ट्रांसफर किये गए हैं.

बेहद सुंदर और निखार लाने वाली भाषा पाठक को सरोबार करती है इसमें कोई शक नहीं.

आगे लिखा है--

घुटनों के ढक्कन भी पत्थर के हैं, और टांगों में जान ही नहीं.

ऐसा क्यों होता है? कब होता है? जब इंसान के ज़हन में अंधेरा बस जाता है, दिल दिमाग के सभी रोशनदान बंद हो जाते हैं. शौकत के शब्दों में--

कितना अंधेरा है अपने आप को नहीं देख सकता…. नीचे.. नीचे.. और नीचे.. चारों तरफ से दबाव है!’

बेबसी की हालत में अंधेरा वजूद का हिस्सा बन जाता है. परछाई का कहीं नामोनिशान नहीं होता. बस किरदारों में एक अप्रतिमता देखने को मिलती है. वही मनोस्थिति, वही बेचारगी...!

दोनों मर्द और औरत किरदारों की तन्हाई उनकी गुप्तार के माध्यम से शिद्दत से महसूस की जा सकती है.

बाकी धरती का दर्द... दामिनी के दर्द में देखा जा सकता है. नारी की वेदना आज भी किताब के खुले पन्नों की तरह सामने है. आज के हालत हमारे आस-पास ही मंडराते हैं.

गुरबत एक लाचारी, भूख एक नासूर!

यह दर्द नारी के हिस्से में आता है. अलग अलग परिस्थितियों की शिकार औरत, कभी बच्चों के लिए खुद को कुर्बान करती है, तो कभी बीमार पति की दवा दारु के लिए दूसरे मर्द की रखैल बनकर रहती है.

- पेट की भूख उससे वह सब कुछ कराती है, जिसे देखकर यकीनन धरती के सीने में भी दरारें पड़ती होंगी. सीता माता भी धरती में समा गई, पर फिर राम के आगोश में नहीं जा पाई.

किसी ने खूब कहा है-

मुझे कहां मालूम था सुख और उम्र की आपस में बनती नहीं

कड़ी मेहनत के बाद सुख को घर ले आया तो उम्र रूठ गई!

तरक्की के बावजूद शायद अग्नि परीक्षा आज भी औरत के हिस्से में ज्यादा पाई जाती है.

भूखा सौन्दर्य नामक कहानी में चार बच्चों की माँ ‘अनार गुल’ अपने छोटे बच्चे को दूध पिलाकर अपने खरीदार के कमरे में आकर पलंग पर लेट जाती है- एक बेजान बुत की तरह, फ़क़त सौ रुपयों की खातिर.

गुरबत उसकी लाचारी और बेबसी बन गई!

फिर वही बात- भूख जो कराये वह कम है.

पैसे की खनक क्या कुछ नहीं खरीद लेती...ये ज़मीरों की बातें हैं, सौदागरों के शहर में आए दिन देखने- सुनने को मिलती है.

कहानी में खरीदार का उस औरत से सवाल यह था-“तुम्हारा पति तुम्हें कैसे दूसरे मर्द के पास छोड़ देता है?”

“पेट, बाबू साहब, भूखे पेट के दोज़ख को भी भरना है.” औरत ने दुख भरे लहजे में जवाब दिया.

भूख के कितने ही स्वरुप सामने आते हैं. इंसान तो हांड-मास का पुतला, स्वार्थ की दहलीज़ पर अपने सुख के खातिर बेबसी के मजबूर किले में घुसकर, क्या कुछ नहीं लूटता है, सब जानते हैं.

इस तत्व पर कमलेश्वर जी की कलम खूब इन्साफ करती है “ ताज महल से ज़्यादा खूबसूरत परिवार नामक संस्था का निर्माण करने वाली औरत खुद उसी में घुट घुट कर दफ़न होती है, सबके लिये सुख और शुभ तलाश करती औरत अपने ही आँसुओं के कुँओं में डूबकर आत्महत्या करती है।“

इंसान का जिस्म है, ज़हन है, फिर भी वह बेबस है. उसके अंदर की महरूमियाँ निरंतर बहते हुए पानी की तरह रवां होती हैं. भला पानी के प्रभाव को भी कभी तिनका रोक पाया है?

जिंदगी को बेनकाब करना कितना कठिन है?

शब्दों में शायद अब उतनी ऊर्जा नहीं जो महसूस किए गए जज्बे को ज़ाहिर कर सके. किसी की आंखों में ख़ुशी की किरणें झिलमिलाती हैं तो किसी की आंखों में गम की तासीर देखी जाती है. महसूस किए हुए जज्बे फिर भी शब्दों में अधूरे ही रह जाते हैं.

एक संवेदनशील दिल, दूसरे दिल के दर्द को समझ पाती है महसूस कर सकती है. उन्वान की तहों में घुसकर किरदारों के साथ हमसफर होते हुए मैंने भी जो महसूस किया उसे शब्दों में अभिव्यक्त किया....!

जिस दिन से उस दिल के करीब से गुजरा हूँ मैं

अब तक उसी आग में ‘देवी’ जल रहा हूँ मैं

आखिर न कहकर एक नया आगाज कहूं तो बेहतर होगा…... हर कहानी अपने भीतर एक नई कहानी का अंकुर लिए हुए होती है, जो एक नया पौधा बन जाता है. कहानी दर कहानी यह सिलसिला चलता रहता है. साहित्य जगत में अनुदित साहित्य में सिंधी भाषा की कहानियों के किरदार भी अपनी भाषा, एवं जज्बों को ज़ाहिर करने में पीछे नहीं हटते, इस गंगो-जमनी धारा में अपना योगदान देने में पीछे नहीं हटते. आपसे, हमसे, और खुस से संवाद करते रहते हैं.....! बस....

देवी नागरानी

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3840,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2784,कहानी,2115,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,831,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,4,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1919,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: “खोई हुई परछाई”--शौकत शोरो के कहानी संग्रह में कहानियों के किरदार अपने जज़्बात के आईने में…..! // देवी नागरानी
“खोई हुई परछाई”--शौकत शोरो के कहानी संग्रह में कहानियों के किरदार अपने जज़्बात के आईने में…..! // देवी नागरानी
https://lh3.googleusercontent.com/-mpCU8YpncSM/WY_vp5ANFzI/AAAAAAAA6OE/hhfiZw07cj0iVGwcRwV_-nlHI6b72cktwCHMYCw/clip_image002_thumb?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-mpCU8YpncSM/WY_vp5ANFzI/AAAAAAAA6OE/hhfiZw07cj0iVGwcRwV_-nlHI6b72cktwCHMYCw/s72-c/clip_image002_thumb?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2017/08/blog-post_43.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2017/08/blog-post_43.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ