शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

लघु-हास्य-व्यंग्य : कंजूस - कुछ किस्में // अशोक जंघेल

मालती शर्मा की कलाकृति

स्वार्थी-कंजूस - इस श्रेणी में वैसे कंजूसों को शामिल किया जा सकता है जो कि अपने परिवार के सभी सदस्यों के सामने अपनी आर्थिक तंगी का रोना रोते रहते हैं किंतु, अपने शौक पूरे करने के लिए अपनी कंजूसी (आर्थिक-तंगी) छोड़कर पैसा पानी की तरह बहाते रहते हैं। अर्थात ऐसे कंजूस “स्वयं-हितायः स्वयं-सुखायः” के सिद्धांत पर चलते हैं।


टुच्चे-कंजूस - विगत कई वर्षों से मँहगाई की मार से टुच्चे-किस्म के कंजूसों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। ऐसे कंजूस अपनी “टुच्चागिरी” की कला से थोड़ा-थोड़ा करके भी बहुत कुछ बचा लेते हैं। अथवा जोड़ लेते हैं। उदाहरण विक्रेता से मोलभाव करने के बाद भी खुल्ले पैसे (रूपये) न होने का बहाना बनाकर अथवा बाद में दे देने का झूठा शपथ वाक्य बोलकर अपनी “टुच्चागिरी” से पैसे बचा-बचाकर कंजूस बन जाते हैं।


मुफ्तखोर कंजूस - ऐसे कंजूसों की हमेशा ही मुफ्त में अथवा मुफ्त के दामों में (सस्ते में) खाने-पीने और लेने की आदतें पड़ी होती हैं। इन कंजूसों का एक ही सिद्धांत होता है, ”राम-नाम जपना और पराया माल अपना” या फिर “खाएँ-पिएँ और खिसकें।”


पैतृक-कंजूस - ऐसे कंजूसों को कंजूसी के जीवाणु (जीन्स) उन्हें विरासत में ही मिलते हैं। पैदा होने के बाद से ही उन्हें कंजूसीपने की घुट्टी परिवार वालों द्वारा पिला दी जाती है। जो कि बाद में दूध के रूप में (मलाई मारने की कला के साथ) उनकी पूरी जिंदगी चलती रहती है। ऐसे कंजूसों पर अपनी जाति-विशेष एवं भौगोलिक स्थिति का भी विशेष प्रभाव पड़ता है।


सिद्धांतवादी-कंजूस - ऐसे कंजूस अपने कुछ विशेष संशोधित अथवा आधे-अधूरे सिद्धांतों का पालन करते हुए अपनी कंजूसपंतियों का नमूना पेश करते रहते हैं, जैसे - दहेज अथवा रिश्वत देना पाप है (लेना नहीं)। सादा-जीवन यानी कि फटेहाल रहना (उच्च विचार नहीं रखना) चाहिए।


ओवर स्मार्ट कंजूस - इस प्रकार के कंजूसों में कुछ निम्न प्रकार की मानसिक व्याधियाँ पाई जाती हैं, जैसे- ऐसे कंजूस सदैव ही अपने अहंकार एवं घमंड में चूर होते हुए स्वयं को बुद्धिमान और दूसरों को एकदम मूर्ख, अनपढ एवं गंवार समझते हैं। ऐसे कंजूस अपने आपको दरियादिली और दूसरों को कंजूसपने की हद में रहने वाला समझते हैं। ऐसे कंजूस अपने आपको ‘मितव्ययी’ होने का ढोंग करते हुए दूसरों को भी अपने जैसा बनाने की कोशिशें करते रहते हैं। ऐसे कंजूस अपने आपको ‘तीस मार खाँ; यानी कि ‘ओवर-स्मार्ट’ समझते हैं और अपनी कंजूसपंती छिपाते रहते हैं।


Ashok janghel | Ashokjanghel1992@gmail.com

नोट: यह हास्य-व्यंग्य  http://www.rachanakar.org पर उपलब्ध संपर्क फ़ॉर्म गैजेट के द्वारा भेजा गया था

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