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पखवाड़े की कविताएँ

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रमेश शर्मा.. दोहे रमेश के रक्षा बंधन पर ------------------------------------------------ उत्साहित है हर नगर ,शहर गली बाजार ! रक्षा बंधन क...

माधुरी जैन की कलाकृति

रमेश शर्मा..

दोहे रमेश के रक्षा बंधन पर
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उत्साहित है हर नगर ,शहर गली बाजार !
रक्षा बंधन का पुनीत, आया है त्यौहार !!

फीका फीका सा लगे,   राखी का त्यौहार !
जी अस टी के साथ में , आया जो इस बार !!

बहना का तो प्यार है, भाई का विश्वास !
राखी की इस डोर में, रिश्तों का अहसास !!

राखी का त्योहार है,,,,सजने लगी दुकान !
हर बहना के हाथ में, दिखता है मिष्ठान !!

कन्या भ्रूण का कोख में, करते है सँहार !
खतरे में लगने लगा, बहनों का त्यौहार !!

हो जाता है कोख में, कन्या भ्रूण सँहार !
कैसे होगी भावना, राखी की साकार !!

कन्याओं के साथ में, किया हुआ खिलवाड़ !
दुनिया को ही एक दिन , देगा सकल उजाड़ !!

बेटे को इज्जत मिले, बेटी को दुत्कार !
रक्षाबंधन का वहां, रहा नहीं फिर सार !!

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    -हरिहर झा


कैसे लिखूँ मैं कविता
   
सुबह से दिमाग मेरा, खोया है इस समीकरण में
शक्ति कपूर है बैठा , केटरिना के चीरहरण में
ऐसे में गीत क्या गाऊँ, डूब गई ओजस्विता  
कैसे लिखूँ मैं कविता।  
कुछ ऐसी फिल्मी हवा चली, आया विलेन पड़ी तालियाँ
छेड़ेगा, रेप करेगा, माँ बहन की  सुने गालियाँ 
चोली के पीछे क्या है, वाह रचना के रचयिता!
कैसे लिखूँ मैं कविता 
चली पवित्र रिश्तों पर भौंडी सी तुकबन्दी
लाज शरम की बैंड बजा दी, गाली ऐसी गंदी
ड्राइंग रूम में बेटी, आँख झुकाये सब कुछ सहे पिता
कैसे लिखूँ मैं कविता
कहा गीत लिख दो, जिसके भाव, शब्द हों तीखे
बच्ची से करवाने नखरे, कॉल-गर्ल  सरीखे
देख छिछोरी हरकत, शरमाये ठर्रे की मादकता
कैसे लिखूँ मैं कविता
मेघों को दूत बना कर , कविता एक बनाई
बादल कहें माफ करो, वाट्स अप पर लिख दो भाई
आग विरह की छोड़ो अब तो रोज नया इक रिश्ता
कैसे लिखूँ मैं कविता

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सुशील शर्मा


प्रणाम विषधरों

सभी विषधरों को प्रणाम को प्रणाम करता हूँ।
उन सभी सांप सपोलों को नमन है।
जिनके अस्तित्व को कभी
मेरे व्यवहार से चोट पहुंची हो।
आप सभी विषधर दिखने
में बहुत मासूम दिखते हो।
इंसानी चेहरा लिए आप
सभी देवदूत जैसे लगते हो।
कोई लकदक सफेद कुर्ता पहने है।
कोई तिलक चंदन लगाए है।
कोई जालीदार टोपी पहने है।
कोई समाजसेवी के वेश में है।
कोई सरकारी नौकरी
का नकाब लगाए है।
कोई सफल व्यापारी है।
कोई काला लबादा ओढ़े
न्याय को बचा रहा है।
कोई शिक्षा के मंदिर में बैठा है।
इन विभिन्न स्वरूपों में आप
सभी विषधर समय समय
पर अपने असली रूप में आकर
हम सभी को कृतार्थ करते हैं।
हमें याद दिलाते हैं कि हर तरफ
सिर्फ आप जैसे विषधरों का ही
  निष्कंटक साम्राज्य व्याप्त है।
जब तक आपके स्वार्थ
सिद्ध होते है तब तक आप
विभिन्न रूपों में शांति से
जनता की सेवा करते रहते हैं।
जैसे ही किसी ने आपके रास्ते की
रुकावट बनने की कोशिश की
वैसे ही आप अपने
सहस्त्र फनों से उस को
तहस नहस कर पुनः
विभिन्न रूपों में समाज सेवक
का साधुरूप धारण कर लेते हैं।
आपके सपोलें चमचों के रूप में
आपका आतंक चारों ओर
प्रतिष्ठित करने में व्यस्त रहते हैं।
आज नागपंचमी के दिन मैं आप
को नमन करता हूँ।
मुझसे जाने अनजाने में
कोई गलती हो गई हो तो आप उसे
सहज में लेकर भूल जाएं।
मैं आपके आतंक को फैलाने में
आपकी भरपूर सहायता करूँगा।
आखिर मैं भी आपकी
तरह विषधर में परिवर्तित होता मनुष्य हूँ।

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पूजा डालमिया


चाहती हूँ मैं

तुझी से बस तुझी से,
           प्यार करना चाहती हूँ मैं।
तेरी बाहों में जीना,
          और मरना चाहती हूँ मैं।।

मुहब्बत चीज़ क्या है,
           ये ज़माने को दिखाना है।
तेरी चाहत में अब हद से,
            गुजरना चाहती हूँ मैं।।

तुझे मिलने से पहले तो,
              मेरी बेरंग थी दुनिया।
तेरे ही रंग में अब खुद को,
              रँगना चाहती हूँ मैं।।

मेरे हमदम तुम्हारी प्रीत का,
              अब थाम कर दामन।
मिले जो ज़ख्म दुनिया से वो,
             भरना चाहती हूँ मैं।।

सुना है इश्क़ न आसान,
               'पूजा' आग का दरिया।
ये दरिया आग का अब,
               पार करना चाहती हूँ मैं।।

पूजा डालमिया


                  प्रेम

प्रेम तो बस प्रेम है,
इसके रूप अनेक है।
देखो जानो और समझो तो,
हर रिश्ते में प्रेम है।।

किसान का लहलहाती,
फसल देख खुश होना प्रेम है।
जवान का अपने देश के लिए ,
शहीद होना प्रेम है।।

माँ का स्वयं गीले में सोकर,
बच्चे को सूखे में सुलाना प्रेम है।
पिता का खुद की जरूरतों से समझौता कर
बच्चों की ज़रूरत पूरी करना प्रेम है।।

बहन का भाई की कलाई पर,
रक्षा सूत्र बाँधना प्रेम है।
भाई का बहन को,
रक्षा का वचन देना प्रेम है।।

राह में चलते हुए,
गिरते को उठाना प्रेम है।
किसी के दुःख में,
उसका साथ निभाना प्रेम है।।

मेघ देख मयूर का,
झूम कर नृत्य करना प्रेम है।
नदियों की सागर से ,
मिलने की लगन प्रेम है।।

श्री राम का शबरी के,
झूठे बेर खाना प्रेम है।
मीरा का विष का ,
प्याला पीना प्रेम है।।

रस पीने को भँवरे का,
फूल पर बैठना भी प्रेम है।
महसूस करो तो चारों,
ओर प्रेम ही प्रेम है।।

पूजा डालमिया


                        द्वंद

अपने अंतर्मन के द्वंदों से जूझ रही हूँ मैं।
आज स्वयं से एक प्रश्न पूछ रही हूँ मैं।।

क्या लेकर आई थी मैं क्या लेकर जाऊँगी।
क्यों सुख ऐश्वर्य के साधन ढूँढ रही हूँ मैं।।

सुख में हँसना दुःख में रोना न मेरी पहचान।
ये तो जीवन के पहलू क्यों भूल रही हूँ मैं।।

जन्म मरण है शाश्वत सत्य इनसे बचना कैसा।
न जाने क्यों मौत से डरकर भाग रही हूँ मैं।।

अपना पराया कौन यहाँ वक़्त हमें दिखलाता।
फिर भी दुविधा में जाने क्यों झूल रही हूँ मैं।।

जाने सब इस दुनिया में एक है राम रहीम।
क्यों'पूजा'मंदिर मस्जिद झाँक रही हूँ मैं।।
आज स्वयं से एक प्रश्न पूछ रही हूँ मैं।।

पूजा डालमिया


                   दीदार

याद है मुझे
आज भी वो
हसीन शाम
जब मुझे हुआ था
तुम्हारा दीदार
पहली बार!

हाँ याद है मुझे
तुम्हारी तिरछी
नज़र का वार
जब हुई थी नज़रें
दो से चार
पहली बार!

जी चाहा
तुम्हारी नशीली
आँखों में
डूब जाने को
तुम्हारी दिलकश
अदाओं ने दिया
आमंत्रण
करीब आने को
तब लगा था
शायद यही है प्यार
पहली बार!

दिल ने कहा शायद
इसी से बंधेगी
तेरी जीवन डोर
क्या यही है
मेरा चाँद और
मैं इसकी चकोर?
मैं आना चाहती थी
तुम्हारे पास
और
करना चाहती थी
इज़हार
पहली बार! हाँ  पहली बार!

किन्तु यही सोचकर
त्याग दिया विचार
कहीं उसने कर दिया
इंकार
तो सपने टूट कर
हो जाएँगे तार तार
पहली बार!

पर तभी
दिल में जगी
उम्मीद की आस
आँखों में चमका
एक विश्वास
जब जाते जाते
तुम्हारी आँखों
में देखा
प्यार का इकरार
पहली बार !

हाँ मुझे आज
भी याद है
वो तुम्हारा दीदार
पहली बार !पहली बार!
---
संघर्ष

मानव जीवन क्षण प्रतिक्षण
संघर्षों से है भरा हुआ
निज जीवन में सफल हुआ न
जो है इनसे डरा हुआ

माना राह कठिन मंजिल की
लेकिन चलना ही होगा
देख ज़ोश उस राही का
संकट को टलना ही होगा
जीवन की ये बगिया तेरी
काँटों से है भरी हुई
नई तरंग ले फूल चुनो तुम
आस तेरी क्यों मरी हुई
देख जरा वो कंचन भी तो
आग में तप कर खरा हुआ
मानव जीवन ......

दृढ निश्चयी राही बन कर
गर आगे बढ़ते जाओगे
सुखी भविष्य और सफलता
फिर निश्चित ही पाओगे
दुर्गम पथ को सुगम बना कर
उस पर चलना सीख ले तू
जीवन नैया हाथ में तेरे
पार उतरना सीख ले तू
मानव होकर न कर्म करे
जिंदा रहकर वो मरा हुआ
मानव जीवन......

क्या तुमने कभी अंधेरों को
दीपक से लड़ते देखा है
हाँ हमने सभी परिंदों को
आकाश में उड़ते देखा है
समझौता इक जहर है इसको
पीना जिसने सीख लिया
संघर्षों से लड़कर जीवन
जीना जिसने सीख लिया
उसके जीवन का हर इक क्षण
खुशियों से फिर हरा हुआ
मानव जीवन......

पूजा डालमिया


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-ऋषि के.सी.


एक नई कहानी ,सुनाता हूँ मैं,
एक नई कहानी,सुनाता हूँ मैं,
रहता  वो  डूबते सागर में ,
एक नई....................मैं ।
चिड़िया-सी कहानी है  उसकी ,
उड़ता वो-फिरता जीवन की ,तालाश  में,
एक नई...................मैं।
अपने भी  थे उसके ,सपने  भी थे उसके,
पंखों में उड़न  भरी  भी उसने ,
रास्ते  में चलता  भी था और  गिरता  भी था,
बदनामी को  वो चुपचाप  सह  जाता  था ,
परन्तु सबका  मान  बढ़ाता था। 
एक नई...........................मैं ।
अपना  खुदा  भी था और उससे  जुदा भी था ,
कहने से  वो कतराता  भी था,
और हृदय  में उसको  बसाता  भी था,
आज भी कहानियों  में ,उसको ढूंढता  भी था ,
किस्मत का संदेश,मानता  भी था वो उसको,
अंत में सीखा  गई ,दोस्ताना  उसको,
रह गई आखिरी  ख़्वाहिश,कहने को उसको ,
याद करता  रहेगा, जीवन के  पथ पर उसको ,
नहीं पसंद करता वो ,अफसाना  उसका ,
सिर्फ सपनों  में ,ढूंढ़ता  था उसको ,
यही जीवन_का_सार ,बताता  हूँ मैं ,
एक नई कहानी, सुनाता हूँ मैं ,
एक नई कहानी ,सुनाता हूँ मैं ।


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शर्वरी चतुर्वेदी


मैं देखती हूं,
लाचार मां को ।
लुटा देती हूं,
अपने सारे प्यार ।।
भूल जाती हूँ,
दिन की तमाम बाते ।
कि किस सहेली ने,
किये थे कमेन्ट पास ।।
कि किन लोगों ने,
ईर्ष्या से देखा मुझे खुशहाल।
किसने मुंह बिचकाये,
और कौन देखना चाहता है मुझे हताश।।
किसकी आखों में,
कौन सा रंग था बाहर आने को आतुर।
भूल जाती हूँ कि,
आज का दिन कैसे गुजर गया था ।।
पुनः ऊर्जावान हो जाती हूँ,
मां की की बेबसी देखकर ।
फिर तैयार हो जाती हूँ,
योद्धा सी संघर्ष  करने को खुशहाल।।
अपने  ,
निर्णय पर अटल सन्तुष्ट ।
अपने में मग्न,
अपने सपनों को साकार होते हुए देख खुश।।

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राजेश गोसाईं

१......चाह
वतन की राह में ,  कुर्बान लिख देना
इसकी चाह में , मेरी जान लिख देना
कोई पूछे.....दीवाने का पता.....
तिरंगा है जहाँ .....बता देना........
हो जाऊं खाक ...इस सर जमीं....
इक चुटकी अस्थि राख मेरी....
वहाँ पे सजा देना.....
सेवा में इक बार ....
जय हिन्द कह देना
राजेश गोसाईं
-----------
२....आजादी की बंसी
मेरे देश की धरती पे बजे.....
फिर से ये कान्हा की बंसी...
वीरों की भूमि पे हो खुशबु
जब शहीदों  के सुमन मुस्काते हैं
दुख दर्द दूर हो जाता है
सब सुख के मोती मिल जाते हैं
सुन के बंसी की मधुर ताने
हर धर्म के भाई गले लगे
बजते ही धुन मुरली की
यहाँ आजादी के मेले  सजे
मेरे देश की.....
मिलता है इस बंसी से बल
ये अमन चैन सुख देती है
फिर क्यों ना ये बजे धरती पे
जो सब दुख हर लेती है
जिस धरती पे कान्हा ने जन्म लिया
उसमें ही नेहरू गाँधी भगत मिले
जहाँ रास रचा के तूने ही सबका मन मोह लिया
रानी झांसी सुभाष के फिर वहाँ फूल खिलें
करके संहार कंस का तूने जगत का उद्धार किया
बंसी तेरी की जब  तान सजे
दुश्मन भी छोड़ मैदान भगे
मेरे देश.....
बंसी की धुन सुन के सेना भी यहाँ इतराती  है
लहराये तिरंगा ये हवा
जो शहीदों के चमन से आती है
रंग हरा भूमि का और पीला रंग तुझसे  खिला
रंग लाल केसरिया देश के वीर लालों से मिला
है अमन का रंग सफेद भारत का फूल ऐसा खिला
पहन के प्यार की खाकी मेरे वतन की शान  सजे
इस धरा की आन बान में ये बंसी सुबह शाम बजे
धरती आकाश -पाताल में  जयहिन्द सदा ही गान गूंजे
मेरे देश......
मेरे देश में बजे बजती रहे सदा आजादी की बंसी
मेरे देश .....
राजेश गोसाईं
---------
३.....लहू की फुहार
उठा लो बन्दूक तुम भी यार
मिल के चलो सरहद पार
के आया मौसम/सौभाग्य
कुछ करने का इस बार......
राखी वाले हाथों में बन्दूक उठायेंगे
लाज धरती माँ की हम बचायेंगे
हम है सीमा के पहरेदार
ले के बन्दूकें आज यार
अब तो करना है आर पार
के आया मौसम/सौभाग्य
देश सेवा का इस बार.....
जिन्दा रहने के दिन तो होते हैं चार
मरना देश के लिये मिलता है इक बार
मिल के चलेंगे सरहद पार
के आया मौसम/सौभाग्य
कुर्बानियों  का इस बार.......
सेना की टोली बोली
खेलेंगे खूब होली
मस्तों की टोली बोली
खेलेंगे खूब होली
चलेगी सरहद पे गोली....
होगी लहू की फुहार
के आया मौसम/सौभाग्य
रंगोली का इस बार........
जीत ही लेंगे हर बाजी
देश को देंगे हम आजादी
खेल मौत का है यार
फिर भी हम हैं तैयार
के आया मौसम/सौभाग्य
जीत का इस बार.......
मौत की नींद तो रोज आती है मगर
देश के लिये सोने का अलग है मजा
मिले प्यारी धरती की
यही  गोद सौ सौ बार
सर रख के सरहद पे हम
सो जायें बार बार
के आया ये मौसम/सौभाग्य बड़ा इस बार
राजेश गोसाईं
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४....हवा
हवा इधर चली हवा उधर चली
तूफानों का शोर बहुत हुआ
कुछ पेड़ कटे कुछ डाल टूटे
पंछियों का लहू बहुत गिरा
जो फूल गिरा मैदान मे
कोई तस्वीर बना कोई हार हुआ
कयामत का जब शोर थमा
आजाद फिर ये चमन हुआ
राजेश गोसाईं
---------
५.....तिरंगा
आओ मिल के लहरायें तिरंगा
हंस हंस के फहराये यह झण्डा
लाल हरे रंग ना होंवे कहीं पे
झूमे मेरे देश की हर एक  छत पे
सदा हंसे मुस्कुराये
लहराये यहाँ एक ही तिरंगा
देश की आन बान शान में
सदा अमर ऊंचा लहराये
नील गगन में हवाओं संग गाये
हरी धरती का मान बढ़ाये
ना हो लहू की कोई धारा
माटी के पुतलों में बढ़ जाये
सदा प्रेम शांति भाईचारा
ना हो धर्म मजहब की दीवारें कहीं पे
इंसानों में बह जाये अमन गंगा
सारे जहां से हो यह न्यारा
केवल एक ही यह झण्डा हमारा
हिन्द के देश में सारे विश्व को
प्यारा लगे यह  तिरंगा
राजेश गोसाईं
-----------
६.......जशन ए आजादी
लहू से सींच कर......
दे गये जो वतन.......
उन शहीदों को है नमन.....
आजादी की नई हवा में.....
अपनी धरती अपना है गगन....
याद कर उनकी कुर्बानियां....
मेरे वीरों---सम्भालो ये वतन....
खुली बहारें , खुली सांसें....
खुली हवाओं में.....
गीत देश का भी....कुछ .. गा.. लो......
आज खुल के ....जशन मना लो.....
* * * *
मेरा रंग दे बसंती चोला....२
माये रंग दे बसंती चोला
आजादी का दिन है...
इस चोले को पहन के नाचे
हम मस्तों का टोला
मेरा रंग दे बसंती चोला
रंग बसंती में ......
ये चोला आज सजा लो
रंगोली खूब सजा लो
इस चोले को पहन के....
तिरंगा ये लहरा लो
जशन मना लो.......२
आजादी का दिन
बड़ा शुभ दिन....
खुशियां आज मना लो....
गा लो मुस्कुरा लो
जशन मना लो....
ना जाने कितनी जाने गंवा के
आजादी ये पाई
गा लो आज बधाई......
मिल जुल के सारे भाई
आज ...गले सबको ..लगा लो
गा लो ...मुस्कुरा लो...
महफिलें सजा लो...
आजादी की वेला में ,कर लो ये शुभ काम
जीवन की शाम ... देश के नाम
शहीदों को कर सलाम
दीप श्रद्धा के आज जला लो....
यारों... मुबारक दिन बना लो.....
......
बड़ा मजा आ रहा है इस मिट्टी में खेलने का
मेरे शहीदों के फूलों में खुशबू बहुत है
........
इस माटी का तिलक कर
चन्दन आज लगा लो
मस्ती में झूमो , मस्ती में नाचो गा लो,.....
वीरों की अमानत को ....२
मेरे वीरों आज सम्भालो
मिल जुल के  ..गीत देश के भी गा लो
गा लो ...मुस्कुरा लो
महफिलें सजा लो
आजादी का है दिन....
जशन खूब मना लो
मेरा रंग दे बसन्ती चोला
माये रंग दे बसन्ती चोला.....
ओये ....रंग दे ...बस़न्ती चोला
आजादी का दिन ये चोला आज सजा लो
.....
कितना खूबसूरत वो नजारा होगा
धरती आकाश हवा में
जब बसंती रंग के संग मिलकर
नाचता तिरंगा हमारा होगा
.....
इस चोले को पहन के
नाचे हम मस्तों का टोला
रंग बसंती में......
तिरंगा ये लहरा लो ...गा...लो...मुस्कुरा लो.....
महफिले सजा लो
चोला ये सजा लो........
मेरे देश की भक्ति....ई......
नाचो गा लो कर लो खूब मस्ती....
मेरे देश की भक्ति......
चोला आज सजा लो ..ये देश की भक्ति
रंगोली खूब सजा लो... ये देश की भक्ति
तिरंगा ये लहरा लो ......ये देश की भक्ति
इस देश की भक्ति में आज....
जयहिन्द जय हिन्द गा लो....
ये देश की भक्ति..….
गा लो मुस्कुरा लो......
***
राजेश गोसाईं
-----------
७......इक इच्छा
देश की सेवा में
जो लोग आते हैं
धरती अम्बर भी
उनके गीत गातें हैं
                        जो शहीद होते हैं
                        तारों में मिल जाते हैं
                        इस पावन सेवा का 
                        सौभाग्य मिल जाये
                        ये जान वतन पे मेरी
                        कुर्बान हो जाये
मैं ऐसा तन पाऊं
मेरा वतन सज जाये
इस देश की सेवा में
सब अर्पण हो जाये
                        मुझे चैन मिलता है
                        मेरा देश जब हंसता है
                        मेरा सुख दुख यही पर
                        हर पल कटता है
इक इच्छा करती है
शहीदों की धरती पे
कुछ देर सेवा कर
मैं भी सो जाऊं
                    हो तिरंगा तन पे
                    मेरी सेवा देश में
                    कोई रंग ले आये
                    मेरी सांसों का ये गीत
                    मेरा  देश भी गाये
//   /   *  /      //
राजेश गोसाईं
फरीदाबाद

----------
८.....बालक
मैं बालक हूँ तेरा
तू भारत देश है मेरा
तेरी लाज बचाने को
सरहद पे लगाया डेरा
कभी तुझपे आँच ना आये
कोई दुशमन आँख ना उठाये
तेरी आन बान शान में
मेरा लहू काम आ जाये
तेरी हरियाली सेज पे सदा
केसर श्वेत परिधान रहे
इसलिये बांध के कफन का सेहरा
सीमा पे किया बसेरा
तू भारत देश है मेरा
राजेश गोसाईं
------------
९.......अंजाम
भारत के टुकड़े करने वालों को
देश विरोधी नारे लगाने वालों को
सबक आज सिखाना है
चुन चुन के एक एक गद्दार
फाँसी पे अब लटकाना है
आओ मिल के करें बुलन्द आवाज
मजहबी दीवारों के लिये
अब हमको ना टकराना है
हिन्दू मुस्लिम की बातें बहुत हुई
अब केवल हिन्दुस्तान बनाना है
हर धर्म के गुल एकत्र कर
महकता गुलिस्तान फिर बनाना है
नागफनी बबुलों का
नाम  ओ निशान मिटाना है
और जितने अफजल घर घर पैदा होंगे
हर हिन्दुस्तानी को बारूद हमने बनाना है
और जितने आतंकी देश में पालोगे
और जितने नक्सलवादी
घर घर में पालोगे
हर अलगावादी के
टुकड़े टुकड़े कर दिखाना है
बगदादी दाऊद की रहमत पे
पलने वालों को
आज सही सबक सिखाना है
घर में उनके घुस घुस कर
उनको आज मिटाना है
इसिलिये
उठो देश के वीर जवानो
संकट माँ पर आया है
अन्तर्मन की आवाज सुनो
दुशमन सरहद पर आया है
उठो आज धरती माँ की पुकार सुनो
घर घर से निकल कर
इक इक गद्दार चुनो
भारत माँ की छाती पर
जिन्होने लहू बहुत बहाया है
लाज माँ के दूध की रखो
कहीं राम कहीं कृष्ण
कहीं पर अर्जुन तुम बनो
अपने भारत के टुकड़े करने वालों को
टुकड़े टुकड़े कर अंजाम अब पहुँचाना है
राजेश गोसाईं
-----------
१०.....( देश- क्यों मौन है ? )
जिस सेना के बल पर हम
स्वच्छंद देश में सोते हैं
घर घर ईद दीवाली मनायें
वो गोली और खूं में होते हैं
आँच ना आये देश पे जरा भी
वो अपना सर्वस्व खो देते हैं
उसी सेना के अपमान पर
क्यों हम कुछ नहीं बोलते हैं
क्यों हमारी आक्रोश की ज्वाला
ठंडी पड़ी स्वतन्त्र हवाओं में
क्यों क्रोध का समन्दर ये
हमारे अन्दर ठहरा है
कहाँ गई देश मेरे की युवा शक्ति
भुजबल क्यों कमजोर पड़ा
मौन होकर पूछ रहा देश मेरा
देश भक्त हमारा कहाँ खो रहा
क्यों चूड़ी पहन के बैठा
क्यों देश का अपमान हो रहा
सेना हमारी शान है
देश की आन बान अभिमान है
फिर क्यों चन्द सरफिरे भेड़ियों से
सेना का टूटा स्वाभिमान है
क्योंकि चुप होकर हम बैठे हैं
क्योंकि स्वतन्त्र सांसे हम लेते हैं
क्योंकि रोजी रोटी में हम आजाद हैं
क्योंकि खुली हवाओं में
खुला हुआ बच्चा बच्चा
स्वतन्त्रता का आगाज है
सेना देश की पहरेदार
दुश्मन को पल पल करे खबरदार
फिर भी क्यों चुप मेरे धरती के लाल हैं
भारत माँ के वीर सपूतों
क्यों नहीं बनते देश के चौकीदार
उठो देश के नौजवानों
चन्द गद्दारों को तुम  पहचानो
अपनी  शक्ति पुंज से
सैनिकों के अपमान का बदला लो
चाहे कशमीर , चाहे दिल्ली
चाहे सुकमा  के जवान हो
प्यारे देश की प्यारी सेना के
याद करो हर बलिदान को
दहला दो हर धरा को
भर दो गोली  , जो भी गद्दार हो
लहूलुहान हो सीने चाहे, पर
वन्देमातरम -जय हिन्द हमारी जुबान हो
राजेश गोसाईं
----------
११....(  अमर गीत   )
--------------------
तू मेरा तिरंगा महान
तेरा अमर हो ये गाना......
शहीदों की धरती पर
तू ऊँचा सदा  लहराना....
भारत का पावन तू
विश्व गुरू बन जाना.....
हर दिल की दुआ है ये
तेरे गीत गाये जमाना.....
तू मेरा तिरंगा महान
तेरा अमर हो ये गाना......।
तू रक्त सिंधु का मेला
तेरा केसरी अमृत आशियाना....
तू शांति धारण उज्जवल
तेरा श्वेत है  परिधाना......
शहीदों की निशानी में
धानी धरती पर तू
खुशहाल सदा लहराना.......
तेरी अद्धभुत गाथा को
गाये ये सारा  जमाना.....
तू मेरा तिरंगा महान
तेरा अमर हो ये गाना.....।।
है चारों तरफ छाई
खुशियों की बदलियां.....
पलकों में मिले मोती
दिलों में खिली कलियां......
शहीदों के मधुबन को
तेरी खुशबु से  है महकाना.....
तेरे जय हिन्द के फूलों से
आसमां को है सजाना....
तेरी फुलवारी में मिल के
गुनगुनाये  गीत तेरा , ये जमाना...
तू मेरा तिरंगा महान
तेरा अमर हो ये गाना.....।।।
तू अमर तिरंगा हो जाये
तेरे रंग में देश रंग जाये.......
तेरी शक्ति से मेरे भारत का
हर वीर भर जाये .......
तेरी लाज बचाने को
कफन का  बांधा  सेहरा ......
हर बलिदानी हो
तेरे चरण रज का दीवाना......
तेरी माटी में खेले
तेरी गोदी हो अंत ठिकाना......
ऐे मेरे तिरंगे महान
तेरा अमर हो ये गाना....।।।।
राजेश गोसाईं
फरीदाबाद ( हरियाणा )
-----------
१२.....आरजू , ( एक सैनिक की )
माटी का चन्दन गुलाल
हर भाल लगायेंगे
देश में होली हम ऐसे मनायेंगे
बन्दूकों की पिचकारी
से दुश्मन मार भगायेंगे
तोपों  में भर बारूद
हर आतंक को मिटायेंगे
अब के बरस होली
हम ऐसे मनायेंगे
देश में रहे खुशहाली
गोली संग होली मनायेंगे
मातृ भूमि की हरियाली खातिर
लहू का रंग दिखायेंगे
केसरिया श्वेत परिधान वतन की
झोली में रोली खूब सजायेंगे
अब के बरस होली
हम ऐसे मनायेंगे
हर चेहरे पे हो लाली
वतन की कर रखवाली
सुरक्षित जागृत रहे अमन के रंग
जागे दिल ओ देश मेरा स्वतन्त्र
इस के लिये तिरंगे में हम सो जायेंगे
इस मिट्टी के गुलाल में हम डूब जायेंगे
राजेश गोसाईं
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लोकनाथ साहू ललकार

मन ढूंढता वो हिन्दुस्तान


अपनी माटी, अपना देश

कितना बदल गया परिवेश

कबीर का दीया जलता था

फूले-नानक पीर पिघलता था

वो न्यारा हिन्दुस्तान था

गोविन्द से प्यारा गुरू महान् था

मन ढूंढता वो हिन्दुस्तान, बंदे !

जिसकी अमर है दास्तान


माटी सोना उगलती थी

सोने की चिड़िया कहलाती थी

शास्त्री के किसान मिट रहे

उनके खेतों को गिद्ध लूट रहे

वो न्यारा हिन्दुस्तान था

शास्त्री का दुलारा जवान-किसान था

मन ढूंढता वो हिन्दुस्तान, बंदे !

जिसकी अमर है दास्तान


कर्णावती की राखी थी

हुमायूँ को वो बांधी थी

अब मज़हब की गलियाँ तंग हुईं

अक़ीदत बेनूर-ओ-बेरंग हुईं

वो न्यारा हिन्दुस्तान था

कृष्ण का प्यारा सैयद रसखान था

मन ढूंढता वो हिन्दुस्तान, बंदे !

जिसकी अमर है दास्तान


बांग्लादेश, क्या पाकिस्तान

हिन्द फैला था तक इरान

थी कांधार की बेटी गांधारी

हस्तिनापुर पर थी बलिहारी

वो न्यारा हिन्दुस्तान था

चाणक्य संवारा अखंड हिन्दुस्तान था

मन ढूंढता वो हिन्दुस्तान, बंदे !

जिसकी अमर है दास्तान


---


लोकनाथ साहू ललकार

बालकोनगर, कोरबा, (छ.ग.)

मोबाइल - 09981442332

000000000000

डॉ. सुलक्षणा अहलावत

कोय ना समझदा दुःख एक किसान का।
होरया स जोखम उसनै आपणी जान का।।

जेठ साढ़ के घाम म्ह जलै वो ठरै पौ के जाड्डे म्ह।
कोय बी ना काम आवै उसकै भई बखत आड्डे म्ह।
किसान की गरीबी प हांसै भई लोग ब्योंत ठाड्डे म्ह।
मन नै समझावै वो के फैदा औरां का खोट काड्डे म्ह।
कर्म कर राखै माड़े दोष के उस भगवान का।।
सोलै दिन आये प मुँह बंद होज्या जहान का।।

कर्जा ठा ठा फसल बोये जा करकै नै कुछ आस।
कदे सुखा पड़ज्या कदे बाढ़ आज्या होज्या नाश।
कर्मा का इतना स हिणा फसल बी ना होती खास।
दुःख विपदा म्ह गात सुखज्या बनज्या जिंदा लाश।
मन म्ह न्यू सोचे जा जीना के हो स कर्जवान का।।
बेरा ना कद सी पहिया घुमैगा बखत बलवान का।।

बालकां का कान्ही देख देख खून सारा जल ज्या स।
भूखे तिसाये रहवैं आधी हाणा न्यू काया गल ज्या स।
गरीबी के कारण देखदे माणसा का रुख बदल ज्या स।
कदे दो पिस्से ना माँग ले सोच के मानस टल ज्या स।
रोज करना पड़ै स सब्र पी कै जहर अपमान का।।
माथे की लिखी के आगे के जोर चालै इंसान का।।

गुरु रणबीर सिंह नै बहोत समझाया पढ़ लिख ले।
हो ज्यावैगा कामयाब बेटा ढ़ाई अखर तू सीख ले।
याद कर उन बाताँ नै जी करै ठाडू ठाडू चीख ले।
इसे जमींदारे तै आछा कितै जा कै मांग भीख ले।
सुलक्षणा नै ठाया बीड़ा साच स्याहमी ल्यान का।।
बालकपन तै स खटका उसकै कलम चलान का।।
---
मैं छोरी सूं जमीदारां की
तेरे लैन लाग री कारां की
मैं खुश सूं जिंदगी मेरी म्ह
मन्नै चाहणा कोण्या याराँ की

इब शुरू होगी लामणी गाम म्ह
सारी दोपाहरी जलूँगी मैं घाम म्ह
उलटे तवे बरगी हो ज्यांगी इब मैं
दिन रात का फर्क आज्या चाम म्ह

तेरे बरगे मजनुआं नै खूब पिछाणु सूं
के रह स मन म्ह थारे सब जाणू सूं
दो चार दिन आगे पाछै हांड कै
लव यू लव यू थाम बांड कै
छोरियाँ नै जाल में फ़ंसाओं सो
शुरू शुरू म्ह खूब हंसाओं सो
पाछै सारी उम्र थम रुवाओ सो
आपणी यादां म्ह तड़पाओ सो
तेरे चक्करां म्ह छोरे आऊँ कोण्या
घर आल्याँ की हवा उड़ाऊँ कोण्या
जा कै आपणा जाल किते और बिछा ले
मैं पडूँ ना इन चक्करां म्ह और नै पटा ले
जिन नै पिछोड़े उन तिलां म्ह तेल कोण्या
बावलीबूच ऊँ बी तेरा मेरा मेल कोण्या
तन्नै खान नै चाहिए रोज पिज्जा बर्गर
आड़े खावाँ बासी रोटी गंठा धर धर
तू बाप की कमाई प मौज उड़ावै स
आड़े खुद कमाते हाणी मजा आवै स
क्यूँ जिंदगी नै खोवै स खोल बता दी सारी
क्यूँ ना माण्दा सुलक्षणा समझा समझा हारी

वे और होंगी जो इन चक्करां म्ह आज्यां सं
माँ बाप की इज्जत नै बेच कै खाज्यां सं
रोज रोज यार बदलें छोरा नै उल्लू बना कै
कदे गिफ्ट लेवैं कदे फोन रिचार्ज कराज्यां सं

छोरे मान ज्या ना इन चक्करां म्ह पड़ती
तेरे जिसे के काना प सुलक्षणा जड़ती
गुरु रणबीर सिंह नै दी सीख आछै बुरे की
सुन सुन कै मजा आज्या इसे छंद घड़ती


©® डॉ सुलक्षणा अहलावत



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नैनाराम देवासी


ये परदेश की लड़कियां
ये परदेश की लड़कियां
कितनी बेखोफ़ होकर
सात समंदर पार होकर
बेख़ौफ़ चली आती है
परिंदों की तरह
आजाद होकर
वे निकलती है घर से
उन लोगों के मुंह पर
तमाशा मार कर जो कहते
की औरत का कोई वजूद नहीं
बिना पुरुष के
घूमती है अकेली
ट्रेनों में ,बसों में
जंगलों में, पहाड़ों में
बेखौफ़ होकर
नहीं है परवाह उन्हें किसी समाज की
किसी धर्म की
वे नहीं जीती किसी की परिभाषा ओढ़ कर
वे निकलती है घर से खुद होकर
कोई नहीं कहता उन्हें
की कपड़े उनके  छोटे है
कहेगा कौन उन्हें
उनके हौसले पर्वतों से भी बड़े है
काश निकले मेरे देश की भी लड़कियां
इसी तरह बेखौफ होकर
निर्भया से लक्ष्मीबाई हो कर
अबला से सबला होकर
अपनी परिभाषा खुद गढ़ कर
इसकी उसकी न होकर 
घर से निकले खुद होकर
0000000000000

सुधा गोयल 'नवीन'


माँ आई है

गाँव से मेरी माँ आई है,
बड़ी मिन्नतों के बाद आई है,
बगल में गठरी आशीषों की,
गोंद के लड्डू में, प्यार लाई है,
मुद्दतों बाद माँ आई है,
गाँव से मेरी माँ आई है।

सरसों जम कर फूल रही है,
गेंहू की बाली....... 
मोटी होकर झूल गई है....
सुरसी गैया के छौना हो गया....
पूरे गाँव में दूध बंट गया.......
छन्नू की अम्मा, पप्पू के पापा,
और चाची, मौसी के,
उपहार लाई है.......
गाँव से मेरी माँ आई है।

कमली के जुड़वा बेटे की,
उर्मिला के भाग जाने की,
शन्नो बुआ ने खटिया पकड़ी....
रामू काका के गोरू बिक गए,
समाचार मज़ेदार लाई है.......
गाँव से मेरी माँ आई है।

बेटा खुश है, बेटी खुश है,
बेटा-बेटी की माँ भी खुश है,
छप्पन पकवानों की खुशबू से,
दो कमरे का दबड़ा खुश है,
रोज़ खिलाती अडोस-पड़ोस को,
मेरी माँ से हर कोई खुश है।

पढ़ता हूँ जब मैं, माँ का चेहरा,
लगता पूछूं, क्या माँ भी  खुश है,
सौंधी रोटी,  चूल्हे की छोड़,
गैस भरी रोटी क्या पचती,
नीम की ठंडी छाँव याद कर,
रात- रातभर मेरी माँ जगती,
आधी बाल्टी पानी है,
माँ का हिस्सा .....
कैसे धोये,कैसे नहाए माँ नाखुश है.......  

माँ चुप है.......
पर मैं और नहीं सह सकता,
कल ही माँ को गाँव में उसके,
खुश रहने को छोड़ आउंगा .......
मैं जाऊँगा, मिल आऊँगा........
बेटा-बेटी को मिलवा लाऊँगा.......
मैं मेरी सुविधाऔ,
खुश होने की खातिर,
माँ से उसका स्वर्ग छीन कर,
खुश रहने की भूल,
भूल कर भी नहीं कर सकता,
अब मैं और नहीं सह सकता
माँ को अपनी खुश रहने को छोड़ आउंगा,
गाँव में उसके छोड़ आऊँगा।।


सुधा गोयल 'नवीन'

जमशेदपुर
00000000000000

डॉ नन्दलाल भारती

गुमराह।।।।

बूढ़े माँ बाप भींगना चाहते थे,
तुम्हारी खुशियों में,
पर क्या ?
तुमने दगा दे दिया,
फरेब में आकर
वहीं माँ बाप जो तुम्हारे
सुख के लिए दर्द  ढोते रहे
रात दिन, भूखे -प्यासे
ढूंढ़ते रहे सुकून के कुछ पल
तुम्हारी खुशियों में
पर ये कैसी खता तुमने कर दिया
फरेब में फंस कर
धरती के भगवान माँ बाप को
दगा दे दिया।।।।।।।
तुम्हारे लिए सर्वस्व किया
न्यौछावर
तुम्हारा हर सपना जिनका
अपना सपना था
अपनी औकात से बढ़कर तुम्हारे लिए
सब कुछ तो किया
कर्ज़ के पहाड़ पर भी चढ़े तुम्हारे लिए
बदले में तुमने क्या दिया
आँसू..……......
तुम कैसे बदल गए
तुम्हारे लिए अपने बेगाने हो गए।
ये तुमने क्या कर दिया
अपनों को दगा दे दिया।
माँ बाप सब कुछ न्यौछावर करते हैं
कामयाबी के सपने रोपते है
जीवन कुर्बान करते हैं
  औलाद में प्यार ढूंढ़ते हैं
आंसू पीकर भी दुआ करते हैं.....…..
अरे फरेबियों को पहचानो
माँ बाप की ज़िंदगी में जहर मत बोओ
बूढ़े दर्द से बेमौत मर जाते हैं
ऐ भूले हुए पथिक
ना जाओ तपती रेत पर
गुमराह करने वाले तुम्हें लूटना चाहते हैं
माँ बाप तुम्हारी खुशियों में भीगना चाहते हैं
आ जा बसंत के झोंके सरीखे
समा जा दिल में
तुम्हारे लिए सर्वस्व त्याग कर सपने
सजाने वाले माँ बाप भींग जाएं
खुशियों में।।।।।


0000000000

सीताराम पटेल


प्रेम की खिड़की
1 :-
तेरी गली से गुजरूँगा, खिड़की खुला रखना तुम।
तुम कहती हो, याद करती हूँ, बंद रखती हो तुम।।
मैं हूँ तेरा दीवाना गोरी, खिड़की से जाता हूँ भीतर,
श्वेताम्बर पहन, कर रही शयन, शारदा लगती तुम।।
2 :-
तेरी चरण रज, मस्तक तिलक, निर्निमेष निहारूँ मैं।
कभी तुम्हारे खुले नयन, होवे नयनों का योग हमें।।
योग नयन में तेज धड़कन, खिड़की लगाए हैं रोग,
सुबह जाता मैं सरोवर, खिड़की से देखने आती हमें।।
3 :-
मेरे पग चलना भूल गए, लोचन भूल आया खिड़की में।
कब लगा खटका,जब खट की आवाज आई खिड़की में।।
नजरें मिलाई औ मुस्कुराई, कही चल भग यहाँ से बेशरम,
बहुत आनंद मिला मुझे गोरी, तेरी प्यार भरी झिड़की में।।

4 :-
तेरी देखकर छरहरी बदन गोरी, दिल मेरा हुआ दीवाना।
मेरे तन की ये कैसी है मजबूरी, पचा नहीं पाता मैं खाना।।
मुझे न पड़े कभी भी ठुकराना, तेरा नेह निमंत्रण गोरी,
तुम श्रृंगार सेज में करती श्रृंगार, नयनों को तुम मिलाना।।
5 :-
तेरी जुल्फों के जंगल में भटकाकर, रजतदंत दिखलाना।
तुमको मालूम है मुझको प्यार है,  पर नहीं नहीं जतलाना।।
बचपन से  हूँ गोरी मैं मुरहा, हर किसी से अपमान खाना,
हम तो बहता पानी, रमता जोगी, अनिकेतन से क्या दिल लगाना।।
6 :-
मुझे बांध नहीं सकेगा जीवन बंधन, मेहमानों को यहाँ क्यों घबराना।
क्या क्या लेकर मैं यहाँ से जाउँ पिया, दाग लगा है मेरा ताना बाना।।
हर पल, हर क्षण, हर दिवस, मास, हर बरस, हर ऋतु, हर मौसम में,
गा लें हम तुम दोनों मिलकर पिया यहाँ, नेह प्यार का अनुपम तराना।।

7 :-
तेरी यादों में गोरी मेरे आँखों में आँसू आते हैं।
मेरा अंत : पुकार प्रिये, तुम तक नहीं पहुँच पाते हैं।।
मिलन पर भी हम तुम नहीं मिल पाते हैं गोरी,
न जाने कैसे विधाता के पास भाग्य लिखे जाते हैं।।
8 :-
नियति चक्र में प्रेमीजन कैसे पीसे जाते हैं।
उनकी आँखों में महज आँसू पाये जाते हैं।।
दिल गदगद और तन पर गुदगुदी होती है,
तुमसे बिछड़कर प्रिये, सभी आत्माएँ रोते हैं।।
9 :-
मिलन के पल प्रिये, प्रिये मुझे याद आते हैं।
उन्हीं यादों के सहारे तो हम भी जी पाते हैं।।
तेरी अधरों का अमृत रस एक बार पिला दे,
मुर्दा मानव को देवियाँ ऐसे यहाँ जिलाते हैं।।

10 :-
तुझे बाँहों में भरने को दिल मेरा रहा मचल।
तू ही मेरी आस्था है और तू ही मेरी है संबल।।
मुस्कुरा कर मेरे दिल में हलचल मचा दे गोरी,
रसना तेरे रसना से अठखेलियाँ को रहा मचल।।
11 :-
परस कर दे दे मुझे प्रिये गीता का ज्ञान।
विराट दर्शन करा जता मुझे देवी का भान।।
प्रिये एक बार ले लूँ मैं तेरी दाँतों का चुंबन,
अहम् अंबर उतार कर लूँ तुमसे मिलन जान।।
12 :-
तेरी खिलखिलाहट मेरी दिल में उतर गई।
तेरी अपरूप गोरी मेरी नयनों में ठहर गई।।
तेरी स्वप्न मेरे शरीर में करते शक्ति संचार,
तम रूप भवसागर के भाग धवल लहर गई।।

13 :-
ओ मेरी पाँच आराध्य शक्तियाँ तुम्हें रहा पुकार।
सागर स्नेह समर्पण शक्तियाँ तुम करो स्वीकार।।
अपनों को मिटा उपर बढ़ने को मची है हाहाकार,
महाभारत का अभिमन्यु बनाकर करो युद्ध तैयार।।
14 :-
गोरी तेरी संगमरमरी रूप से मिले मुझे धूप।
लग रही है तू कोसलखंड की धान भरे सूप।।
तेरी खनखनाती आवाज रेंग रहे हैं नस नस,
युगों युगों से प्यासा सागर पिला दे जलकूप।।
15 :-
आ प्रिये हम तुम दोनों खेलें गुब्बारों का खेल।
गुब्बारे को लेने को हो परस्पर तन मन का मेल।।
हाथ में पकड़कर गुब्बारा उपर उठाए खड़ा हूँ,
मेरे पाँवों पर चढ़कर बदन बना रही हो तुम रेल।।

16 :-
पाने के लिये उचक उचक अधर कर रहे चुंबन।
अति आनंद से प्रिये काँप रहे मेरे मन औ बदन।।
तेरे हृदय के नोंक गड़ रहे हैं मेरे हृदय प्रिये,
कटि को मेरा बना कुर्सी, बैठ गई हो तुम तन।।
17 :-
शमाँ तेरी अंगों की छवि देख मंडरा रहे हैं पतंग।
मुसकुराकर उरोज दिखाकर कर रही हो तंग।।
तेरे आगे पीछे घुमा रही हो मुझे कर दीवाना,
आ योग कर ले गोरी, हम तुम दोनों प्रेम रंग।।
18 :-
खाट पर हम तुम दोनों बैठे हैं तुम्हारे आँगन।
कलम को चूमते हुए ले ली मेरे कर की चुंबन।।
दो पैर परस्पर कर रहे हैं अनोखी अठखेलियाँ,
योग नयन हमारे दीवानेपन को देख रहे गुरूजन।।

19 :-
जब भी पुकारोगी गोरी, आ जाउँगा तेरे पास।
मेरा मन मस्तिष्क गोरी, रहता है तुम्हारे पास।।
तन मन की दूरियाँ भी जीने नहीं देती है गोरी,
तेरी छरहरी तन देख मुझे हो रहा है आभाष।।
20 :-
माँ और बेटी अति सुन्दर लगते रहते संग संग।
बेटियों की महतारी होती है उनकी रक्षक अंग।।
फिर भी प्रेमियों से मिलाती है है नजर यौवन,
उढ़रिया भग जाने पर समाज हो जाता है दंग।।
21 :-
तुमने दीदार करवा ही दिए अपने अंग अंग।
क्यों करवाना चाहती हो तुम मेरा ब्रह्मचर्य भंग।।
बाँहों में भर लेता तुम्हें नहीं रहता मुझे कोई भय,
मुझे अभय बना दो प्रिये, खेल प्रणय का जंग।।

22 :-
दुल्हन की तरह सजकर सजनी आओ सुहाग सेज।
मानस तृप्त कर लूँ मैं आँखों के कैमरे से तुम्हें देख।।
तेरे उन्नत सरोज उरोज दे रहे हैं मुझे खुला आमंत्रण,
तुम्हारी अपरूप सौन्दर्य देख गोरी मेरा मानस रेख।।
23 :-
विरह की अनल में झुलस रहा हूँ, रूपानल को देख।
नयन योग कर भी योग न हुआ , विधाता का लेख।।
तनबदन हमारा हमेशा रहे परस्पर आत्मसात प्रिये,
फिर भी प्यासा रहकर मैं, पुकार रहा हूँ जैसे भेख।।
24 :-
परस्पर पास बैठ कर गोरी, देखे हम तुम दूरदर्शन।
तुम करो मेरा कर परस और मैं करूँ स्पर्श करधन।।
नयन टिका है दूरदर्शन पर, पुलकित हो रहा है मन,
चल कहीं दूर हम चलें प्रिये, देख रहे हमें गुरूजन।।

25 :-
बरामदे में बैठकर प्रिये, तुम्हें पढ़ा रहा हूँ मैं भूगोल।
तेरे रूप सौन्दर्य देखकर मेरा मानस रहा अभी डोल।।
बारह बजा रही है बेशरम घड़ी, फड़क रहा फण,
मुझे समाहित करने को अपने हृदय के द्वार को खोल।।
26 :-
सोलह साल में सिखा दिया है, मदन भी अपना पाठ।
पैरों में पैर  रख तुम, हट जाती हो इंच आठ।।
मैंने मर्यादा में रह कर यहाँ, क्या क्या गुमाया हूँ प्रिये,
आज याद कर कर रो रहा हूँ, प्रिये उम्र हुआ है साठ।।
27 :-
आओ एक बार फिर प्रिये, खेलें दोनों ताश का खेल।
मैं हारूँ और तुम्हें जीतारूँ, और अँखियों का हो मेल।।
अँखियों के मेल से होती है तन में शक्ति के संचार,
फिर खुशी खुशी झेल लेता हूँ, मैं भवसागर का जेल।।

28 :-
तुम बेसुध हो कर सोती रहो, मृदुल स्पर्श से उठाउँ रोज।
जिससे खिल उठे प्रिये तेरा, इंदु मुख युगल सरोज।।
तुम्हारे मिलन सुख के लिये, युग युग से रहा तड़प,
आ कर ले तन बदन का योग, जिससे आए ओज।।
29 :-
इतना कुछ है हमारा फिर क्यों लगता है कुछ नहीं है।
प्रेमियों के लिये यहाँ, योग सही है या वियोग सही है।।
योग में वियोग संसार में, वियोग में यहाँ योग क्यों है,
ऐसा क्यों लग रहा है प्रिये, दूर कहीं बयार बही है।।
30 :-
सरोवर में स्नान करते हुए, दिखे मुझे कांचन तन।
तुम्हें बाँहों में भरने के लिए, मचल रहा है मेरा मन।।
आजा गोरी बैठ लें फिर से, एक बार मेरी गोद में,
मिलन का करो तर्पण, जिससे जल जाए तन बदन।।

31 :-
दो कुर्सियों को आराम कुर्सी बनाकर करूँ आराम।
मेरे पास  बैठकर गोरी, तुम करो अपना काम।।
इस नव कुर्सी आसन को देखकर जमाना हो दंग,
फिर नव वात्स्यायन लिखेगा, अपना आसन काम।।
32 :-
दिल दिया दर्द लिया प्रिये, ये कैसे तुमने दगा दिया।
जरूरत थी तो गोद में बैठी, फिर मुझको भगा दिया।।
संसार का मारा हूँ मैं प्रिये, तेरे प्यार का भरोसा कर,
हाँकना चाहा हूँ मैंने गाड़ी, तुमने कुत्ता लगा दिया।।
33 :-
जो मिला उससे दूर भागा, जो न मिला उसे पाना है।
तुम्हें पूजा है, तुम्हें चाहा है, तुम्हें छोड़ कहाँ जाना है।।
नोच लूँ अपना चेहरा मैं, लगता फाड़ डालूँ अंबर को,
हर कोई जाने और कहे, वो देखो जा रहा दीवाना है।।

34 :-
वाह गुरू प्रणाम मेरा स्वीकार, दीवानापन के लिए।
ना उम्र की सीमा ना जन्म का बंधन प्यार के लिए।।
प्रेमियों के दिल में रहता परस्पर, प्रेम की प्रतिमा है,
ये सब सनकीपन लगे, ये सनकी समाज के लिए।।
35 :-
तेरी एक एक पगध्वनि प्रिये, मेरा पागल दिल सुनता है।
तेरी छरहरी रूप सौन्दर्य को, मस्तिष्क में वो गुनता है।।
तेरी खिलखिलाती मुस्कान से, प्रकाशवान है मेरा जीवन,
चमन में लाखों है सुमन प्रिये, चमेली तुम्हें ही चुनता है।।
36 :-
प्रेम की कमी से ही हमारी, ये दुनिया में हिंसा भरी है।
प्रकृति में आता प्राणी तो, हमेशा अहिंसा यहाँ खरी है।।
अध्यात्म और विज्ञान से ही होगा हमारा पूर्ण विकास,
वरना सारा संसार तो यहाँ, भौतिकता के पीछे मरी है।।

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रचनाकार: पखवाड़े की कविताएँ
पखवाड़े की कविताएँ
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