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लोक कथा // ढूँढी रक्सिन // डॉ. श्रीमती मृणालिका ओझा

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एक सियार और एक बंदर में गहरी दोस्ती थी। दोनों एक घने जंगल में रहते थे। साथ-साथ घूमते, साथ-साथ खाते और सुख-दुख बांटते थे। उसी जंगल में एक ढूंढी नाम की रक्सिन रहती थी। उसके घर से रोज अच्छे-अच्छे पकवानों की खुशबू आती थी। कभी-कभी मांस-मछली और मदिरा की भी महक उठती थी। बंदर तो सतोगुनी था। उसे इन बातों से फर्क नहीं पड़ता था। सुबह-शाम ताजे फल खाता और खुश रहता। सियार था सदा का धूर्त और लालची। वह ढूंढी के घर का खाना खाने के लिए बेचैन रहता था। पर ढूंढी से डरता था।
एक दिन उसने बंदर से कहा-दोस्त तुम छप्पर पर चढ़ कर झांको। यदि रक्सिन नहीं होगा, तो सांकल खोल देना। मैं घर में घुसकर भोजन करूंगा। जैसे ही ढूंढी आते दिखे, छप्पर से आवाज देना मैं तुंरत निकल कर भाग जाऊंगा। बंदर ने उसकी बात मान ली। फिर एक दिन सियार ढूंढी के घर घुस गया। उसके पकवानों पर हाथ साफ करने लगा। कहते हैं न ‘‘लालच बुरी बला’’ उसी समय ढूंढी रक्सिन आती दिखी। बंदर ने दोस्त को भागने कहा पर वो तो था निन्यान्बे के फेर में। ‘बस एक और’ के लोभ में फंस गया। ढूंढी रक्सिन अंदर आ गई, बंदर कूदकर भाग गया। ढूंढी ने देखा-घर अंदर से बंद है समझते देर नहीं लगी। उसने अपने घर की बाहर से कुंडी-लगा दी। अब तो सियार फंस गया।


उसी समय उधर से हाथी आ रहा था। ढूंढी ने उसे आवाज दिया-


हाथी राम, करो एक काम।
तोड़ दरवाजा, चोर को कुचलो।
फिर जी जाहे, जितना मचलो।


हाथी की आहट पाते ही घर के भीतर से सियार चिल्लाया-
मैं हाथी के दोनों दांत तोड़ूं।
जिंदा बाघ को थप्पड़ मारूं।
बिच्छू की मैं आरी बनाऊं।
नाग की सहनाई बजाऊं।


यह सुनते ही हाथी उल्टे पांव भाग खड़ा हुआ। कुछ देर बार एक बाघ आया।
उसने ढूंढी का हाल-चाल पूछा। ढूंढी ने सारी बात बताई। बाघ को बड़ा गुस्सा आया। आव देखा न ताव। सीधे ढूंढी के साथ उसके घर चला गया। वहाँ पहुंचा ही था कि सियार ने बाघ की गुर्राहट सुन ली। वह जोर-जोर से बोलने लगा-


बाघ के सारे दांत तोड़ूं
हाथी की तो सूंड मरोड़ू
बिच्छू की मैं आरी बनाऊं
नाग की सहनाई बजाऊं


ये सुनते ही बाघ डर गया। बोला ये तो अलग किस्म का जीव है। मुझे नहीं मरना है, ये बोल कर बाघ नौ-दो ग्यारह हो गया। ये देखकर ढूंढी रक्सिन हक्की-बक्की रह गई। फिर एक-एक कर कई प्राणी आए। सांप और बिच्छू भी आए । सब अपने प्राण बचाकर भाग खड़े हुए। सियार की झूठी लेकिन साहस भरी बातें सुनकर भाग खड़े हुए। अब ढूंढी खुद आगे बढ़ी। मरता क्या न करता? बाहर की कुंडी खोलकर अंदर से कुंडी लगा ही ली। देखती क्या है- अंदर में सियार दुबका बैठा है। ढूंढी ने उसे खंभे से बांध दिया। अब वह उसे सुबह शाम पांच-पांच कुटेला कूल्हे पर मारती थी। सियार का पूरा शरीर मार खा-खाकर फूल गया था। एक शाम बंदर, दोस्त सियार से मिलने छप्पर पर चढ़ गया। वहाँ से सियार को देखा तो हैरान हो गया। उसने सियार से पूछा- दोस्त क्या बात है? कुछ ही दिनों में तुम इतने मोटे-तगड़े कैसे हो गए? सियार बोला- किस्मत वाला हूँ। ढूंढी रक्सिन बहुत प्यार करती है। एक से एक स्वादिष्ट भोजन देती है। आराम से रहता हूँ,  किसी चीज की कभी नहीं है। ‘खाये पीये मौज किए’ मोटा तो होना ही है। बंदर को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ तो सियार ने कहा-आज रात मेरी जगह यहाँ रूककर देखो। कल सुबह फिर मैं आ जाऊंगा।


बंदर सियार की बात में आ गया। सियार ने उसे अपनी जगह बांध दिया और ढूंढी के आते ही भाग खड़ा हुआ। अब तो मार खा-खा के बंदर की हालत पतली हो गई। किसी तरह बंदर भागने में सफल हुआ। कहते हैं उसी दिन से बंदर और सियार की दोस्ती खत्म हो गई, और मेरी कहानी पूरी हो गई।


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