गुरुवार, 24 अगस्त 2017

गणेश चतुर्थी पर विशेष // गणेशोत्सव देश ही नहीं विदेशों में भी बना बड़ा पर्व // डॉ. सूर्यकांत मिश्र

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(मिट्टी के इकोफ्रेंडली, पर्यावरण मित्र गणेश अपनाएँ, पर्यावरण बचाएँ.)

गणेशोत्सव देश ही नहीं विदेशों में भी बना बड़ा पर्व

० लोकमान्य तिलक की सोच को मिला सम्मान

भारतवर्ष में अनादिकाल से धर्म-कर्म और पर्व-त्यौहारों की गंगा प्रवाहित होती आ रही है। इन्हीं पर्वों में गणेशोत्सव का पर्व भारतवासियों सहित विश्वभर में निवास करने वालों को भाईचारे और प्रेम-स्नेह का संदेश देता आ रहा है। भारतवर्ष के महान दूरदृष्टा ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक’ ने महाराष्ट्र राज्य से गणेश उत्सव पर्व की शुरूआत की थी, यही कारण है कि आज भी मुंबई से लेकर संपूर्ण महाराष्ट्र में प्रथम पूज्य गणदेवता भगवान श्री गणेश का पर्व पूर्ण उल्लास और उमंग के साथ मनाया जाता है। प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश की स्थापना करने के साथ चतुर्दशी तक प्रातः और सायंकाल गणेश भगवान की पूजा अर्चना उनके अनन्य भक्तों द्वारा की जाती है। इतना ही नहीं इस पर्व के संदेश को अखिल विश्व में पहुंचाने गणेश पण्डालों में धार्मिक आयोजनों के बीच प्रवचन और देवी-देवताओं के प्रकटीकरण से संबंधित झांकियों का प्रदर्शन भी किया जाता है। भगवान गणेश को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग माना जाता है। विद्या और बुद्धि के देवता स्वरूप पूजे जाने वाले गणेश जी अपने भक्तों पर शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले बताए जाते है। भारतवर्ष की मातृभूमि से शुरू होने वाला गणेश पर्व समय के काल खण्ड से होते हुए अब जापान, चीन, कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैण्ड, मलाया तथा मैक्सिको तक में उत्साह के साथ मनाया जाने लगा है। अखिल भारतवर्ष ने एक गणराज्य का रूप ले लिया है जिसके अध्यक्ष के रूप में भगवान गणेश सर्वार्थ सिद्ध देवता बने हुए हैं।

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गणेश पर्व की शुरूआत के संबंध में मिले इतिहास के संदर्भ बताते हैं कि यह उत्सव स्वतंत्रता से पूर्व सन् 1900 में बाल गंगाधर तिलक द्वारा गणपति की मूर्ति स्थापित कर किया गया था। तिलक जी ने गणेशोत्सव पर्व को स्वाधीनता की पहचान के रूप में स्थापित किया है। पूरे भारतवर्ष में लगभग एक सौ दस वर्षों से हजारों गणेश पण्डालों पर भारतीय कला और संस्कृति की विभिन्न शैलियों के दर्शन होते आ रहे हैं। प्राचीन काल से ही हिन्दुधर्मावलंबी किसी भी कार्य को शुरू करने से पूर्व निर्विघ्न संपन्नता के लिए गणों के गण भगवान गणेश से प्रार्थना करते आ रहे हैं। स्कन्ध पुराण के अनुसार जो भी धर्मप्रेमी भक्ति पूर्वक भगवान गणेश की पूजा अर्चना करते हैं, उनके सम्मुख विघ्न कभी नहीं ठहरते। वेदों में भी विघ्नविनाशक गणेश जी की वंदना करते हुए लिखा गया है :-‘नमोगणेभ्योगणपतिभ्वयश्रवो नमो नमः’ अर्थात गणों और गणो के स्वामी श्री गणेश को नमस्कार। हिन्दू धर्मशास्त्रो में गणेश जी के विभिन्न रूपों का वर्णन मिलता है, किंतु यह निर्विवादित है कि सभी ने श्री गणेश की विघ्नकारी शक्ति को स्वीकार किया है। वराह पुराण एवं लिंग पुराण के अनुसार एक बार ऋषि-मुनियों ने असुरी शक्तियों से ग्रसित होकर देवाधिदेव भगवान शंकर से सहायता की प्रार्थना की। भगवान आशुतोष ने विनायक रूप श्री गणेश को प्रकट किया तथा अपने शरीर को कंपित कर अनेक गणों की सृष्टि की ओर उनका अधिपति गणेश को नियुक्त किया। शास्त्रों में गणेश जी के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा गया है।

वक्रतुण्ड महाकायः सूर्यकोटि समप्रभः।

निर्विघ्नं कुरू में देवा, सर्व कार्येषु सर्वदा।।

अर्थात् जिनकी सूंड वक्र है जिनका शरीर महाकाय है, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी है, ऐसे सब कुछ प्रदान करने में सक्षम शक्तिमान गणेश जी सदैव मेरे विघ्न हरे।

भगवान श्री गणेश जी के जन्म के विषय में भी अलग-अलग कथाएं मिलती है। यह कथा सर्वप्रचलित है कि माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगाए गए उबटन के द्वारा निकाले गए मैल से एक पुतला बनाकर उसमें जान फूंक दी और वही भगवान श्री गणेश बने। वराह पुराण में आये उल्लेख के अनुसार स्वयं भगवान शंकर ने पांच तत्वों को मिलाकर गणेश जी का निर्माण तन्मयता पूर्वक किया। अत्यंत सुन्दर रूप सौंदर्य वाले गणेश जी को देखकर देवताओं में खलबली मच गई, वस्तुस्थिति को जानकर भगवान शंकर ने गणेश जी के पेट का आकार बढ़ा दिया और सिर को गजानन की आकृति का कर दिया ताकि उनका आकर्षण कम हो सके। एक अन्य कथानक ब्रम्ह वैवर्त पुराण में आता है जिसके अनुसार पार्वती जी की प्रतिज्ञा से खुश होकर स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने उनके गर्भ से गणेश जी के रूप में जन्म लिया। गणेश के जन्म लेने पर पार्वती जी ने सभी देवी-देवताओं को बालक को आशीर्वाद देने आमंत्रित किया। इस आमंत्रण में शनि देव शापित होने के कारण जाने में झिझक रहे थे, कारण यह कि उन्हें मिले श्राप के अनुसार किसी भी बच्चे पर मोहित होने पर उसका सिर धड़ से अलग हो सकता था, यह श्राप स्वयं शनि देव की पत्नी ने उन्हें दिया था। जब शनि देव ने बालक गणेश को देखा तो उनका सिर अलग हो जाने पर ही हाथी का सिर जोड़ा गया। अन्य देवताओं में शामिल इन्द्र ने बालक गणेश को अंकुश, वरूण ने पाश, ब्रम्हा ने अमरत्व लक्ष्मी ने ऋद्धि-सिद्धि और सरस्वती ने समस्त विद्याएं प्रदान कर उन्हें देवताओं में सर्वोपरि बना दिया।

गणेश जी को प्रथम लिपिकार भी माना जाता है। उन्होंने ही देवताओं की प्रार्थना पर वेदव्यास जी द्वारा रचित महाभारत को लिपिबद्ध किया था। जैन और बौद्ध धर्मों में भी गणेश पूजा का विधान मिलता है। अनंतकाल से अनेक नामों से गणेश दुःख, भय, चिन्ता आदि विघ्नहर्ता के रूप में पूजित होकर संताप हरते रहे हैं। वर्तमान समय में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना, भावनात्मक एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए गणेश जी की पूजा और गणेश चतुर्थी का पर्व उत्साह पूर्वक मनाने का अपना अलग महत्व है।

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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