रविवार, 20 अगस्त 2017

अंकुश्री की लघुकथाएँ

सुखजीत सिंह कुक्कल की कलाकृति


अंदेशा
 
      ‘‘कांव-कांव’’, ‘‘कांव-कांव’’ - - -
सुबह खिड़की खोलते ही बागान में कौवे की बोली सुनायी पड़ जाने से वह अंदेशा में पड़ गया. करीब सात साल पहले उसने इसी तरह सुबह अपने मकान पर बैठे एक कौवे की बोली सुनी थी तो दोपहर में डाकिया आकर एक पोस्‍टकार्ड दे गया था. घर से चाचा ने लिखा था कि दादा नहीं रहें.

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     दुबारा करीब तीन साल पूर्व अपने बागान के अंदर एक कौवे की बोली सुनी थी. उस दिन उसकी ससुराल से सास, ससुर और साली आ गये थे. ससुराल के परिवार को आया देख कर उसे खुशी हुई थी. लेकिन गर्मी की पूरी छुट्‌टी बिता कर जब तक ससुराल वाले गये, तब तक उसका दिवाला निकल चुका था. छुट्‌टी तो बेकार हो ही चुकी थीं.
     पिछले माह भी उसने कौवे की बोली सुनी थी. और जब वह कार्यालय पहुंचा था तो चपरासी ने उसे एक पोस्‍टकार्ड दिया था. ससुर ने सूचित किया था कि उसकी पत्‍नी के बेटा हुआ है. बेटा होने की बात सुन कर उसके सहकर्मियों ने उसे घेरा तो मिठाई खाने के बाद ही छोड़ा. परिवार से लेकर पड़ोस तक बेटा होने की  बात जिसने सुनी, सबका मुंह मीठा कराना पड़ा.
     महीने का अंतिम सप्‍ताह चल रहा था. इसलिये कौवे का कांव-कांव सुन कर वह अंदेशा में पड़ गया था. पता नहीं क्‍या संदेशा आ जाये.
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अपना घर
                       
     जब से शादी हुई थी, वह प्रताड़ित जिंदगी जी रही थी. ससुराल में पति और सास अपना रोआब दिखाने से नहीं चूकते थे. ननद और देवर भी उसे आंखे दिखाने से नहीं चूकते थे.
     ससुराल से तंग आकर वह मैके चली गयी. वहां पूरी स्‍थिति से अवगत होने पर मां ने समझाया, ‘‘बेटी, यह तुम्‍हारे पिता का घर है. घूमने या भेंट करने के लिये तुम यहां आ सकती है. लेकिन जहां तक रहने की बात है, इसके लिये तुम्‍हें अपने पति के घर ही जाना होगा. हमारे समाज की यही व्‍यवस्‍था है.’’
     वह दूसरे दिन ही ससुराल वापस चली गयी. वहां प्रताड़नाओं का दौर फिर शुरू हो गया. ससुराल में रहना उसे दूभर हो गया. पिता के घर से वह पति के घर आयी थी. उसका अपना घर कोई नहीं था. अपने घर की तलाश में वह पति के घर से निकल गयी.
     अगले दिन लोगों ने देखा कि मुहल्‍ले के कुएँ में उसकी लाश तैर रही है.
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                                                            अंकुश्री
          प्रेस कॉलोनी, सिदरौल,
          नामकुम, रांची-834 010

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