बुधवार, 9 अगस्त 2017

नगर सुदंरियों से अपनी प्रेमकहानियाँ // अनामी शरण बबल

अनामी शरण बबल

नगर सुदंरियों से अपनी प्रेमकहानी- 1

कोठेवाली मौसियों के बीच मैं बेटा

अनामी शरण बबल

एक पत्रकार के जीवन की भी अजीब नियति होती है। जिससे मिलने के लिए लोग आतुर होते हैं तो वह पत्रकारों से मिलने को बेताब होता है। और जिससे मिलने के लिए लोग दिन में भागते है तो उससे मिलने मिलकर हाल व्यथा जानने के लिए एक पत्रकार बेताब सा होता है। अपन भी इतने लंबे पत्रकारीय जीवन में मुझे भी चोर लुटेरों माफिय़ाओं इलाके के गुंड़ों पॉकेटमारों, दलालों रंडियों कॉलगर्लों तक से टकराने का मौका मिल। इनसे हुए साबका के कुछ संयोग रहे कि वेश्याओं या कॉलगर्लों को छोड़ भी दें तो बाकी धंधे के दलालों समेत कई चोर पॉकेटमार आज भी मेरे मूक मित्र समान ही हैं। बेशक मैं खुद नहीं चाहता कि इनसे मुलाकात हो मगर यदा कदा जब कभी भी राह में ये लोग टकराए तो कईयों की हालत में चमत्कारी परिवर्तन हुआ और जो कभी सैकड़ों के लिए उठा पटक करते थे वही लोग आज लाखों करोड़ों के वारे न्यारे कर रहे हैं। कई बार तो इन दोस्तों ने मदद करने या कोई धंधा चालू करने के लिए ब्याज रहित पैसा भी देने का भरोसा दिया। मगर मैं अपने इन मित्रों के इसी स्नेह पर वारे न्यारे सा हो जाता हूं।

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मगर यह संस्मरण देह-व्यापार में लगी या जुड़ी सुंदरियों पर केंद्रित हैं, जिनसे मैं टकराया और वो आज भी मेरी यादों में है। कहनियां कई हैं लिहाजा मैं इसकी एक सीरीज ही लिखने वाला हूं। मगर मैं यह संस्मरण 1989 सितम्बर की सुना रहा हूं । मेरी कोठेवाली मौसियां अब कैसी और कहां हैं यह भी नहीं जानता और इनके सूत्रधार मामाश्री प्रदीप कुमार रौशन के देहांत के भी चार साल हो गए हैं।

तभी एकाएक मेरे मन में यह सवाल जागा कि इस संस्मरण को क्यों न लिखूं ?

मैं औरंगाबाद बिहार के क्लब रोड से कथा आरंभ कर रहा हूं ,जहां पर इनके कोठे पर या घर पर जाने का एक मौका मुझे अपने शायर मामा प्रदीप कुमार रौशन के साथ मिला था। मुझे एक छोटा सा ऑपरेशन कराना था और एकाएक डॉक्टर सुबह की शिफ्ट में नहीं आए तो उनके सहायक ने कहा कि शाम को आइए न तब ऑपरेशन भी हो जाएगा। मैं अपने बराटपुर वाले ननिहाल लौटना चाह रहा था कि एकाएक मेरे मामा ने कहा कि यदि तुम वास्तव में पत्रकार हो और किसी से नहीं कहोगे तो चल आज मैं कुछ उन लोगों से मुलाकात कराता हूं जिनसे लोग भागते हैं।

मैं कुछ समझा नहीं पर मैंने वादा किया चलो मामा जब आप मेरे साथ हो तो फिर डरना क्या। पतली दुबली गलियों से निकालते हुए मेरे मामा जी एक दो मंजिल मकान के सामने खड़े थे। दरवाजा खटखटाने से पहले ही दो तीन महिलाएं बाहर निकल आयीं और कैसे हो रौशन भईया बड़े दिनों के बाद चांद इधर निकला है। क्या बात है सब खैरियत तो है न ? मेरे ऊपर सरसरी नजर डालते हुए दो एक ने कह किस मेमने को साथ लेकर घूम रहे हो रौशन भाई।

अपने आप को मेमना कहे जाने पर मेरे दिल को बड़ा ठेस सा लगा और मैंने रौशन जी को कहा चलो मामा कहां आ गए चिडियाघर में। जहां पर इनकी बोलचाल में केवल पशु पक्षियों के ही नाम हैं। यह सुनते ही सबसे उम्रदराज महिला ने मेरे हाथ को पकड़ ली हाय रे मेरे शेर नाराज हो रहे हो क्या। अरे रौशन भाई किस पिंजड़े से बाहर निकाल कर ला रहे हो बेचारे को। मान मनुहार और तुनक मिजाजी के बीच मैं अंदर एक हॉल में आ गया। जहां पर सोफा और बैठने के लिए बहुत सारे मसनद रखे हुए थे।

मैं यहां पर आ तो गया था पर मन में यह भान भी नहीं था कि इन गाने बजाने वालियों के घर का मैं अतिथि बना हुआ हूं। जहां पर हमारे मामा जी के पास आकर करीब एक दर्जन लड़कियों ने बहुत दिनों के बाद आने का उलाहना भी दे रही थी। इससे लग तो यही रहा था कि यहां के लिए वे घरेलू सदस्य से थे। सब आकर इनसे घुल मिल भी रही थी और सलाम भी कह रही थी। और मैं अवाक सा इन नगर सुदंरियों के पास में ही खड़ा इनकी मीठी मीठी बाते सुन रहा था।

दस पांच मिनट में रौशन जी को लेकर उनकी उत्कंठा और मेल-जोल का याराना कम हुआ तो निशाने पर मैं था। लगभग सबों का यही कहना था कि रौशन भाई किस बच्चे को लेकर घूम रहे हो। यह संबोधन मेरे लिए बेमौत सा था।

पूरे 24 साल का नौजवान होने के बाद भी अपने लिए बच्चा सुनना लज्जाजनक लग रहा था। मैंने तुरंत प्रतिवाद किया कि मैं बच्चा या मेमना नहीं पूरे 24 साल का हूं जी। मेरी बात सुनते ही पूरे घर में ठहाकों की गूंज फैल गयी। मैंने फिर कहा कि अभी मैं जरा अपने मामा के साथ हूं इसलिए जरा हिचक रहा हूं .....।

जब तक मैं आगे कुछ बोलता इससे पहले ही एक 25-26 साल की सुंदर सी लड़की मेरी नकल करने लगी नहीं तो मैं सबको बताता कि जवानी-दीवानी क्या चीज होती है। लड़की के नकल पर मैं भी जरा शरमा सा गया और घर में एकबार फिर हंसी के ठहाके गूंजने लगी। हंसी ठहाकों से भरे इस मीठे माहौल में मामा ने सबको बताया कि यह मेरा भांजा है। इसके बाद तो मानो मेरी शामत ही आ गयी या उनकी खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहा।

अब तक मेरे से हंसी मजाक चुहल सी कर रही तमाम देवियां मेरे ऊपर प्यार जताने दिखाने लगी। कोई अपनी ओढ़नी से तो कोई अपने पल्लू से मेरे को पोंछने में लग गयी । भांजा सुनते ही मानो वे अपने आपको मेरी मौसी सी समझने लगी। अरे बेटा आया है रे बेटा। मैं पूरे माहौल से अचंभित उनकी खुशियों को देखकर भी अपन दुर्गति पर अधिक उबल नहीं पा रहा था। सयानी से लेकर कम उम्र वाली लड़कियां भी एकाएक मेरी मौसी बनकर मेरे को बालक समान समझने लगी, और करीब एक दर्जन इन मौसियों के बीच में लाचार सा घिरा रहा।

इस कोठे पर बेटा आया है यह खबर शायद आस पास के कोठे में भी फैला दी गयी हो । फिर क्या था मैं मानो चिडियाघर का एक दर्शनीय पशु समान सा हो गया था और हर उम्र की करीब 30-32 महिलाएं मेरा दर्शन करके निहाल सी हो रही थी। सबों का एक ही कहना था रौशन भाई हम कोठेवालियां बड़भागन मानी जाती है यदि कभी कोठे पर रिश्ते में कोई बेटा आ जाए। आपने तो हमलोगों के जन्म-जन्म के पाप काट दिए। अपनी आंखों से आरती उतार-उतार कर मेरे पर न्यौछावर करती तमाम औरतों के बीच मैं मानो एक खिलौना सा बन गया था। कहीं से लड्डू की एक थाली आ गयी और तब तो मेरा तमाशा ही बन गया। सबों ने मुझे एक एक लड्डू चखने को कहा और मेरे चखे लड्डू को वे लोग पूरे मनोयोग से प्रसाद की तरह खाने लगी। लड्डू खाकर निहाल सी हो रही ये कोठेवालियों ने फिर मुझे नजराना देना भी शुरू कर दिया।

मैं एकदम अवाक सा क्या करूं कुछ समझ और कर भी नहीं पा रहा था। और देखते देखते मेरे हाथ में कई सौ रूपये आ गए। मेरी दुविधा को देखते हुए एक उम्रदराज महिला ने कहा कि बेटा सब रख लो,यह नेंग है और कोई एक पैसा भी वापस नहीं लेगी। उसी महिला ने फिर कहा कि बताया जाता है कि किसी कोठेवाली के कोठे पर यदि रिश्ते में कोई बेटा बिना ग्राहक बने आता है तो वेश्याओं को इस योनि से मुक्ति मिल जाती है। रौशन भाई हमलोगों के भाई हैं और तुम इनके भांजा हो इस तरह तो हम सब के भी तुम बहिन बेटा हुए। तो हम मौसियों के उद्धार के लिए ही मानो तुम आए हो। हम इससे कैसे चूक सकते हैं भला।

एकाएक मौसी बन गयी इन कोठेवालियों के स्नेह और दंतकथाओं को सुनकर मैं क्या करूं यह तय नहीं कर पा रहा था। करीब दो घंटे तक चले इस नाटक का मैं हीरो बना अपनी दुर्गति पर शर्मसार सा था। मैंने महसूस किया कि न केवल मेरे गालों पर बल्कि हाथ पांव छाती से लेकर बांहों पर भी सैकड़ों पप्पियों के निशान मुझे लज्जित के साथ साथ रोमांचित भी कर रहे थे। बालकांड खत्म होने के बाद फिर पाककला की बेला आ गयी। मेरे पसंद पर बार-बार जोर दिया जाने लगा। मैंने हथियार डालते हुए कहा कि क्या खाओगे ? यह दुनिया का सबसे कठिन सवाल होता है आप जो बना दोगी सारा और सब खा जाउंगा मेरी मौसियों।

पूरे उत्साह और उमंग के साथ इतराती इठलाती कुछ गाती चेहरे पर मुस्कान बिखेरे ये एकाध दर्जन बालाओं को लग रहा था कि मैं कोई देवदूत सा हूं। चहकती महकती इन्हें देखकर मैंने कहा कि अब बस भी करो मेरी मौसियों इतनी तैयारी क्यों भाई । एक जगह तुमलोग बैठो तो सही ताकि सबकी सूरत मैं अपनी आंखों में उतार सकूं ताकि कहीं कभी धोखा न हो जाए। मेरी बात पर सब हंसने लगी और मेरी नकल उतारने वाली मौसी पूरे अदांज में बोली हाय रे हाय। बच्चा मेमना नहीं है बेटा पूरा जवान लौंडा है। देख रही हो न हम मौसियों पर ही लाईन देने लगा।

मैंने तुरंत जोडा ये लाईन देना क्या होता है मौसी। इस पर एक साथ हंसती हुई मेरी कई कोठेवाली मौसियां मुझ पर ही झपटी साले यह भी हमें ही बताना होगा क्या। फिर मेरे मामा की तरफ मुड़ते हुए कई मौसियों ने कहा कि रौशन भाई इसकी शादी करा दो। नहीं तो यह लाईन देता ही फिरेगा। हंसी मजाक प्यार स्नेह और ठिटोली के बीच मैंने कोठेवाली मौसियों से कहा कि आपलोग का सारा प्यार और सामान तो ले ही रहा हूं पर यह पैसे रख लीजिए। इस पर बमकती हुई कईयों ने कहा कि बेटा फिर न कहना। जीवन भर के पुण्य का प्रताप है कि आज यहां पर तुम हो। हम सब धन्य हो गए तुम्हें देखकर अपने बीच बैठाकर पाकर बेटा।

इनके वात्सल्य को देखकर मेरा मन भी पुलकित सा हो उठा। 24 साल के होने के बाद भी इन लोगों के बीच मैं एकदम बालक सा ही हो गया था, तभी तो मेरी कोठेवाली मौसियों ने मुझसे जिस तरह चाहा प्रेम किया। और स्नेह की बारिश की।

खाने पीने की बेला एक बार फिर मेरे लिए जी का जंजाल सा हो गया। मेरी तमाम मौसियों की इच्छा थी कि आधी कचौड़ी खाकर मैं लौटा दूं। आधी कचौड़ी को वे इस तरह ले रही थी मानो कहीं का प्रसाद हो। आधी कचौड़ी खाते खाते मैं पूरी तरह बेहाल हो उठा। मुझसे खाया न जाए फिर भी जबरन मेरे मुंह में कचौड़ी ठूंसने और आधा कौर वापस लेने का यह सिलसिला भी काफी लंबे समय तक चला। तब कहीं जाकर खाने से मुक्ति मिली।

इसके बाद आरंभ हुआ मेरे जाने का विदाई का समय । तमाम मेरी कोठेवाली मौसियों के रोने का रुदन राग शुरू हो गया। चारों तरफ लग रहा था मानो कोई मातम सा हो। कोई मुझे पकड़े हैं तो कोई अपने से लिपटाएं रो रही है। एक साथ कई-कई मौसियां मेरे को पकड़े रो रही है नहीं जाओ बेटा अभी और रूक कर जाना। लग रहा था मानों शादी के बाद लड़की ससुराल जाने से पहले अपने घर वालों के साथ विलाप कर रही हो । बस अंतर इतना था कि मैं रो नहीं रहा था। तभी मेरी नजर नकल करने वाली मौसी पर पड़ी। मैं उसकी तरफ ही गया और हाथ पकड़कर बोला तुम तो न मेरे से लिपट रही हो न रो ही रही हो. क्या बात है मौसी।. इस पर वह एकाएक फूट सी पडी और मेरा हाथ पकड़कर वह जोर जोर से रोने लगी।

इतना प्यार और इतना स्नेह को देखकर मैं भी रूआंसा सा हो गया और इनको प्रणाम करने से खुद को रोक नहीं सका। सभी मौसियों के पांव छूने लगा। मेरे द्वारा पैर छूने पर वे सब निहाल सी हो गयी। कुछ उम्र दराज मौसियों ने कहा बेटा फिर कभी आना। एक बार ही तुम आए मगर हम सबों का दिल चुराकर ले जा रहे हो। इस पर मैं भी चुहल करने से बाज नहीं आया। नहीं मौसी दिल को तो अपने ही पास ही रखो चुराना ही पड़ेगा तो एक साथ तुम सबों को चुरा कर अपने पास रख लूंगा। मैंने तो यह मजाक में यह कहा था मगर मेरी बात सुनकर मेरी सारी कोठेवाली मौसियां फफक पड़ी। और मैं एक बार फिर नजराने और प्यार के पप्पियों के चक्रव्यूह में घिर गया। मेरे द्वारा उन तमाम मौसियों के पैर छूना इतना रास आया कि मैं उनका हुआ या नहीं यह मैं नहीं कह सकता, पर वे तमाम कोठेवाली मौसियां मेरी होकर मेरे दिल में ही बस गयी।

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नगर सुदंरियं से अपनी प्रेम कहानी-   2

चादर और रखैल (साथी) प्रथा का टूटता तिलिस्म

अनामी शरण बबल

उत्तर प्रदेश में आगरा शहर का खास महत्व है। दुनिया में इसकी पहचान एक प्रेमनगरी की है। भले ही एक सामान्य आम आदमी का प्यार ना होकर यह एक बादशाह के प्यार की दीवानगी की कथा है। जिसमें प्यार के उत्कर्ष को अपने स्तर पर बादशाह ने एक ऐसी इमारत बनवा कर दी जिसे लोग ताजमहल के रूप में जानते है। और लगभग 360 साल से भी अधिक समय हो जाने के बाद भी इसके प्रति लोगों का लगाव कम नहीं हुआ है। मगर ज्यादातर लोग ताजमहल के साथ-साथ आगरा को बसई गांव के लिए भी जानते है। जहां पर प्यार के सबसे बेशर्म बाजारू चेहरा देहव्यापार को माना जाता है। वेश्याओं के इस गांव में भले ही आजकल धंधा नरम सा है। इसके बावजूद इस गांव को लेकर लोगों में सैकड़ों तरह की कहानियां है। पुलिस की तथाकथित सख्ती को लेकर रोष भी है तो शाम ढलते ही पुलिसिया संरक्षण में कारोबार की चांदी की बाते भी हवा में है। मगर सूरज की रौशनी में तो कथित तौर पर वेश्याओं के चादर और रखैल प्रथा के जादूई दिन लद से गए हैं।

वैसे तो मैं मूलत देव औरंगाबाद बिहार का रहने वाला हूं फिर भी आगरा से भी मेरा जन्म जन्म का नाता है। अब तक इस प्रेमनगरी में पांच सौ दफा से ज्यादा बार ही आ चुका हूं 1 मगर धन्य हो भाजपा के शीर्षस्थ पुरूष लाल कृष्ण आडवाणी जी का जिन्होंने 1989 से 1992 तक बाबरी मस्जिद हटाओ और राम मंदिर बनाओ का नारा बुलंद करके पूरे देश में हिन्दू और मुस्लमानों की एकता में आग लगा दी थी। पूरे देश के माहौल में जहर बोया गया सो अलग। इन तीन सालों के अंदर मेरठ मथुरा सहारनपुर मुजफ्फरनगर हरिद्वार आगरा में भी माहौल को विषैली बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी गयी थी। इस कारण चाहे मैं जिस अखबार में भी रहा उनके लिए पश्चिमी उतर प्रदेश के राजनीतिक सामाजिक और धार्मिक तापमान को जानने के लिए लगभग एक दर्जन दफा पूरे पश्चिमी उतर प्रदेश का दौरा करके लंबी-लंबी रिपोर्ट करने का सुअवसर मिला। इसी का नतीजा रहा कि आगरा के भगवान सिनेमा से दो किलोमीटर दूर दयालबाग में जाकर वहीं तक सालों साल सीमित रहने वाले इस पत्रकार को आगरा के भी हर लेबल के दर्जनों नेता दलाल और पत्रकारों से घुलने मिलने और दोस्ती करने का नायाब मौका मिला। जिसमें कई तो आज भी दोस्त की ही तरह है, तो कई सड़क छाप नेता राज्य मंत्री भी बने तो कई सांसद बनकर दिल्ली तक अपनी धमक पैदा की। तो कुछ नेता मंत्री बनकर रखैलों के चक्कर में फंसकर नाम धाम के साथ-साथ परिवार से भी अलग होना गए।

यहां पर इनका उल्लेख करना बहुत जरूरी नहीं था पर जब गांव बसई पर काम करने की बारी आई तो मैंने अपने इन तमाम दोस्तों से किस तरह काम की जाए इसके बारे में सलाह ली। लगभग सभी लोकल नेताओं ने पुलिस की गुंडागर्दी की बढ़ चढ़ कर बखान किया। मगर तमाम नेताओं ने मुझे भरोसा दिया कि चिंता ना करे हमलोग बसई में साथ-साथ रहेंगे। इन नेताओं को अपने साथ टांग कर वेश्याओं के गांव पर काम करने के लिए सोचना भी बड़ा अटपटा सा लगा, मगर मेरे लिए सैकड़ों रूपये की तेल फूंकने और घंटो साथ-साथ रहने के लिए प्रतिबद्ध इन मित्रों को यूं भी टरकाना ठीक नहीं लगा। सहारनपुर में 1988 के दौरान एसएसपी रहे बी.एल. यादव से मेरी बहुत अच्छी याराना थी। मीडिया से प्यार करने वाले श्री यादव ही उन दिनों आगरा मंडल के डीआईजी थे। मैंने दिल्ली से ही फोन लगाकर बसई जाने के लिए पूछा, तो हंसने लगे और पूछा कि वेश्याओं से मिलने के बाद या पहले मुझसे मिलोगे ?  मगर अजीब संयोग रहा कि सुबह-सुबह जब मैं आगरा पहुंचा तो श्री यादव उसी दिन लखनऊ के लिए निकल चुके थे। मगर बसई चौकी और अपने स्टाफ को हर संभव सहायता करने का निर्देश दे कर ही गए थे। मोबाइल का जमाना था नहीं लिहाजा जब आदमी घर या दफ्तर से बाहर हो तो फिर उसको पकड़ पाना लगभग असंभव सा होता था।

उल्लेखनीय है कि मुगलकाल में ही वेश्याओं के गांव बसई को बसाया गया था। सैनिकों के जमावड़े मुगल राज्य के अधीन प्रशासकों और व्यापारियों और सत्ता के दलालों के मनोरंजन तफरीह के लिए बसई की रंगीन हसीन नमकीन तितलियों के उपयोग का चलन था। निसंदेह मुगलों की राजधानी दिल्ली ले जाने के बाद भी बसई गांव की रौनक बरकरार रही। मुगलों के सैनिकों का बड़ा जमावड़ा आगरा में ही था मुगलों साम्राज्य के पत्तन के बाद भी अंग्रेजों ने अपने सैनिकों और नौकरशाहों की बड़ी मंडली को आगरा में ही बनाए रखा, लिहाजा समय सत्ता और शासन में पूरी तरह बदलाव आने के बाद भी बसई की रौनक पर कोई असर नहीं पड़ा। आगरा के अपने लोकल नेताओं की फौज के साथ उनकी ही गाड़ी में सवार होकर ताजमहल से चार किलोमीटर पीछे बसई गांव के लिए निकल पड़े। साथ में दो दो फोटोग्राफरों का भी दल बल हमारे था। इन छायाकारों ने बसई के लिए खासकर चलने की इच्छा जाहिर की थी।

बसई गांव में घुसते ही मार्च माह के आखिरी सप्ताह में ही गलियां वीरान नजर आई। मगर ज्यादातर घर पक्के और अच्छी हालत में ही दिखे। हमलोगों ने फैसला किया कि गांव की चौकी पर ही सबसे पहले धमका जाए। आगरा के छह नेताओं और साथ के दो छायाकारों समेत मेरे साथ आठ लोगों की फौज थी। गाड़ी से उतरते ही सभी चौकी इंचार्ज के सामने लगी कुर्सियों पर बैठ गए.। मैंने चौकी इंचार्ज से डीआईजी बी.एल.यादव के फोन के बारे में बताया, तो वह एकदम खड़ा होकर सेवा करने की अनुमति मांगी। मैंने उन्हें बैठने को कहा और किसी भी सेवा के लिए कोई कष्ट ना करने का ही आग्रह किया। इस पर वह एक मेजबान की तरह स्वागत करने के लिए अड़ा रहा। तब मैंने कहा कि ये सब हमारे आगरा को दोस्त हैं आप इनकी जो मन में आए चाहे सेवा करें पर हम तीनों बसई गांव घूमना चाहते हैं। कुछ वेश्याओं के घर के भीतर भी जाने की तमन्ना है। इस पर वह तुरंत दो एक सिपाही को साथ लगाने की हांक मारी। इस पर हंसते हुए मुझे किसी के साथ नहीं चलने के लिए मनाना पड़ा। कब इंचार्ज ने तुरंत दो तीन दलालों को चौकी में बुलाकर गांव में ले जाने का आदेश दिया। आगरा के दोस्तों से मैंने आग्रह किया कि आप दो तीन घंटे तक यही पुलिसिया मेहमानबाजी का मजा ले। एक आंख दबाकर एक नेता को कहा कि यदि यादव जी का फोन आए या डीआईजी कोठी से फोन आए तो आप कह देना कि मैं अपने काम में लगा हूं और काम निपटाते ही बात करूंगा।

आगरा के मेरे तमाम दोस्तों ने भी मेरी बातचीत करने के मतलब को समझकर हां जी, हां जी की झड़ी लगा दी। और मैं अपने छायाकार मित्रों के साथ बसई की गलियों में दो चार दलालों के संग निकल पड़ा। पुलिस द्वारा गरम-गरम, गरमागरम आतिथ्य पर ये दलाल भी कुछ राज नहीं समझ पा रहे थे। एक ने पूछा आपलोग कहां से हैं बाबू। मैं भी जरा भाव मारते हुए कहा कि ये जो डीआईजी यादव हैं न वे हमारे सहारनपुर से मित्र हैं। अरे वो तो आज लखनऊ निकल गए नहीं तो मैं उनको ही लेकर यहां आता। मेरी बातों पर सहमति जताते हुए कहा वो तो लग रहा है साहब नहीं तो यहां की पुलिस एकदम दम निकाल कर धंधे को बेदम कर चुकी है। मैंने तुरंत काटा साला मुझसे ही झूठ मार रहा है। यहां रात को तो धंधा हो ही रहा है।. यहां की औरतें और लड़कियां कॉलगर्ल बनकर इधर उधर तो जा ही रही हैं. और तमाम होटल वाले तुमलोग से ही बढिया बढिया लड़कियों को फोन कर मंगवाते हैं. यह सब क्या मुझसे छिपा है ? जहं पत्रकारों को देखा नहीं कि धंधा खत्म हो रहा है और भूखे मरने की कहानी करने लगते हो। ये पुलिस वाले क्या तुम लोग की तरह ही ग्राहकों को खोजकर लाए। एक दलाल ने कहा कि माफ करना बाबू ई सब थानेदार बाबू को मत कहना । इस पर मैंने धौंस मारी यदि शराफत से घुमाना है तो साथ रहो और अपनी वकालत बंद कर। एक ने टोका कि आप पहले भी यहां आ चुके हैं का ? दिल्ली में रहता हूं इसका मतलब थोड़े कि शहर से अनजान नहीं हूं। आगरा के दयालबाग नगलाहवेली में ही 20 साल से रहता हूं, और तू हमें ही चूतिया बना रहा है। चौकी पर बैठे सारे आगरा के नेता हैं। इसपर हमलोगों के साथ-साथ घूम रहे तीनों दलाल खामोश हो गए। मैंने उनलोगों को अपने साथ नहीं चलने की बजाय चौकी पर ही रहने को कहा कि हमलोग अभी घूमकर आते हैं। इस पर दलालों ने कहा कि इंचार्ज बाबू हमलोग को मारेंगे साहब। मैंने कहा नहीं साथ रहोगे तब भी मैं तुम्हारी शिकायत करूंगा। मुझे जासूस लेकर गांव में नहीं घूमना है। और किसी तरह उनलोगों को अपने से दूर किया। मेरे साथ चल रहे दोनों फोटोग्राफरों ने दे दनादन इन दलालों की कई फोटो भी ले ली, तो वे न चाहते हुए भी हमलोग से दूर हो गए। मेरे फोटोग्राफर दोस्तों ने भी इनके हट जाने पर खुशी जाहिर की। तुमने इनको हटाकर एकदम सही किया ये साले पुलिस के इनफॉर्मर सारी बातें चौकी में जाकर उगलता।

बिना किसी दलाल के हमलोग सामने वाली गली के ही एक पक्के दो मंजिली मकान में जा घुसे। अंदर जाते ही सामान्य साज सज्जा के एक बड़े हॉल में बैठी दो उम्रदराज महिलाओं ने स्वागत किया। मेरे साथ वाले छायाकारों ने दनादन इनकी तस्वीर समेत हॉल के रंग रूप को कैमरे में बंद कर ली। इस पर ये महिलाएं एकदम घबरा सी गयी। ये क्या कर रहे हो बाबू ? मैंने इन्हें भरोसा दिलाया कि आप एकदम चिंता ना करो कुछ नहीं होगा। फिर भी ये अंदर से डर जाहिर करने लगी। जब हमलोगों ने अपना परिचय और कार्ड धराया तो उनके मन का डर दूर हुआ। मैंने कहा कि कोई तुम्हें तंग करे तो मेरे को फोन पर बताना मैं दिल्ली से ही तेरा काम करवा दूंगा। फिर जोडा कोई बहुत जरूरी काम हो तो मेरा कार्ड लेकर तुम डीआईजी यादव के पास भी चली जाओगी तो वे तेरी सुनवाई करेंगे,मगर बहुत टेढ़ा आदमी हैं गलत शिकायत करोगी तो हमें भी तेरे ही साथ गालियां देगा। । वे मेरे सहारनपुर से दोस्त हैं।

मेरी बातों से उसको भरोसा होने लगा था। उसने फौरन किसी को आवाज लगाकर चाय के लिए बोली। इस पर हमलोगों ने हाथ जोड़कर चाय के लिए मना किया, तो वह बोली आपलोग मेरे मेहमान हो बाबू बिना जल दाना ग्रहण किए तो जा ही नहीं सकते। अजीब सा धर्मसंकट खड़ा हो गया था। उसने कहा कि हम ग्राहकों के साथ चादर का रिश्ता बनाते हैं। जब तक वह साथ में रहता है तो वह एक दामाद की तरह हमारा अतिथि होता है। उसके जाने के साथ ही चादर और संबंधों का खात्मा होता है। महिला ने कहा कि मेरे यहां तो दर्जनों नियमित ग्राहक हैं जो माह में दो तीन बार दो चार दिन रहकर जाते हैं। इनके लिए लड़कियां भी रखैल की तरह एक ही होती है। वे लोग अपनी लाड़ली की देखरेख और खान पान के लिए हर माह दो चार पांच हजार दे भी जाते है। वो लोग एक तरह से हमारे घर के सदस्य की तरह है। किसी कोठे पर रखैल और किसी ग्राहक के यहां दो चार दिन रूकने की बात एकदम अटपटी सी लगी। मैंने इस पर हैरानी प्रकट की। तो दोनों महिलाएं हंसने लगी। इसमें हैरान होने की क्या बात है बाबू अब तो कहो कि यह प्रथा खत्म होने के कगार पर है, नहीं तो पहले हमलोग केवल माहवारी सदस्यों के लिए ही होती थी। और राजस्थान पंजाब हरियाणा यूपी से आने वाले लोग यहां न केवल ठहरते थे बल्कि हमारे घर की देखभाल भी करते थे। हम सब एक तरह से उनकी बांदिया थी। मैं इस रहस्योद्घाटन पर चौंक पड़ा। तो यह बताओ कि कोई ग्राहक बनकर तुम्हारे यहां आता है वो किस तरह घर का सदस्य या दामाद सा बन जाता है। इस पर वे खिलखिला पड़ी। अरे बाबू इसमें क्या हैं हमारी लड़कियां पूरी ईमनदारी से सेवा करती हैं तो मुग्ध होकर वे हमारे यहां ही नियमित आने लगते है और कईयों के साथ रहने के बाद दो एक से अपना लगातार वाला रिश्ता बना लेते है। एक ने कहा कि हमलोग के समय के भी कुछ मर्द कभी कभार अभी भी आकर कुछ रुपए और घंटो बैठकर हाल चाल पूछ कर चले जाते हैं।

इस पर मैं हंस पड़ा अरे तब तो तुमलोग की तो चांदी ही चांदी है कि जो यहां आया वो बस तुमलोग का ही होकर रह जाता है। मेरी बात पर वे दोनों हंसने की बजाय बोली कि यह तो बाबू हमलोग की सेवा और ईमानदारी का फल है कि लोग भूल नहीं पाते। मैंने फिर पूछा कि अभी तुम बोल रही थी कि माहवारी सदस्यों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। इस पर रूआंसी सी होकर वे बोल पड़ी कि अब जमाना बदल रह है बाबू नए लोगों में रिश्तों को लेकर ईमानदारी कहां रह गयी है। अब के लोग तो केवल दो चार घंटे की ही मौज चाहते है । अब तो जो बहुत पहले से यहां आते रहने वाले लोग ही रह गए है, जो आज भी हमारे सदस्य हैं । नया तो कोई अब कहां ग्राहक बन पाता है। मैं तुरंत बोल पड़ा इसका कारण तुमलोग क्या मानती हो? अरे बाबू शहर ज्यादा आधुनिक और बड़ा हो गया है। रात में रूकने के लिए होटल धर्मशाला भी काफी हो गए है जिससे लोगों को यहां आकर रूकने की अब जरूरत नहीं पड़ती। पहले तो वे यहां आकर खुद सुरक्षित हो जाते थे।

चादर और रखैल प्रथा के बारे में पूछा कि जो तुम्हारे यहां की कईयों के दिल की रानी कहो या रखैल सी है। यह तो बताओ कि क्या वे लोग जो दो चार घंटे के लिए आने वाले ग्राहक के लिए भी राजी होती है? इस पर दोनों एक साथ बोल पड़ी क्यों नहीं हमलोग किसी की अमानत नहीं हैं। हमारा रिश्ता तो केवल चादर वाला है जब तक वे लोग हैं तो हर तरह से हमारी लडकियां उनकी है। मैंने जिज्ञासा प्रकट की एक महिला के करीब कितने यार होते हैं जो माहवरी देते हैं ? इस सवाल पर वह हंसने लगी ,यह कोई तय नहीं होता, मगर दो तीन यार तो होते ही हैं। इस रखैल प्रथा पर मेरी उत्सुकता और बढ़ गयी थी मैंने फिर पूछा क्या कभी इस तरह का भी धर्मसंकट आ खड़ा होता है क्या कि एक साथ ही किसी के दो-दो आशिक आ जाते हो तब जबकि वह किसी और की रखैल बन अपने माहवारी आशिक के साथ हो ? इस पर दोनों औरतें फिर हंस पड़ी। क्या करें बाबू इस तरह की दिक्कत तो हमेशा आ खड़ी होती है। इसीलिए तो हमलोग किसी एक को दो-दो के साथ चादर वाला रिश्ता बनाने को कहते हैं ताकि कोई दिक्कत ना हो। रखैल प्रथा के इस अजीब त्रिकोण में मैं भी उलझता जा रहा था। मैंने फिर पूछ डाला कि अच्छा यह बताओ कि किसी के साथ दो-दो का रिश्ता हो और एक समय में दोनों खाली हो तब उनके एक आशिक के आने के बाद रखैलों का चुनाव किस तरह होता है? इस पर महिलाओं ने कहा कि यह तो बाबू पर है कि वो किसके साथ रहना चाहे, मगर एक साथ वह किसी एक के ही चादर में रह सकता है। यदि वह दो या किसी और से भी चादर बदलना चाहे तो? इस पर महिलाएं खीज सी गयी तू यहां के कानून को नहीं जानते हो बाबू। ये मर्द एय्याश तो होते हैं मगर यहां पर वे दिल हार कर ही सालों साल तक आते जाते हैं, क्योंकि बहुत सारे मामले में वो काफी ईमानदर भी होते हैं।

क्या तुमलोग से रिश्ता रखने में उन्हें कोई खतरा नहीं होता? हमलोग से तो कोई खतरा नहीं होता है कि हमलोग उनके घर में जाकर हंगामा करेंगे या पेट रह गया है का नाटक करेंगे। अरे बाबू यह तो एक दुकान है जब तक चाहो आ सकते हो, ना चाहो ना आओ, मगर हमारे आतिथ्य और प्यार को वे हमें नहीं भूल पाते।

जिस तरह की बातें तुमने मेरे साथ कर रही है तो क्या यही कानून और रस्मोरिवाज सबों के यहां भी है या इसमें कुछ अंतर भी आ रहा है ? इस पर विलाप करती हुई महिलाओं ने कहा कि मैं पहले ही बोल रही थी न बाबू कि जमाना बदल रहा है। कुछ तो कॉलगर्ल बन होटलों में जाती है। आगरा में इतने लोग बाहर से आते हैं कि चारों तरफ से इनकी मांग है। मैंने उनसे पूछा कि क्या तुम अपनी सुदंरियों को हमलोगों को नहीं दिखाओगी ? इस पर चहकती हुई बोल पड़ी अरे तुमलोग से ही तो उनकी रौनक हैं बेटा मैं तुमलोग से बात कर रही हूं और वे सारी अंदर अंदर हमें गरिया रही होंगी कि लगता है कि ये बुढिया ही इन सबको खा जाएगी। अभी बुलाती हूं पर क्या कुछ .......। इसका तात्पर्य मैं समझ गया। मैंने अपने फोटोग्राफरों की तरफ देखा फिर इनसे कहा कि एक शर्त है कि इनकी फोटो उतारने दो? वे हंस पड़ी और बोली जो चाहो करो। मैंने तुरंत प्रतिवाद किया लगता है कि तुम गलत ट्रेन पकड़ रही है। हमलोग केवल बात करेंगे । फिर तुरंत बोल पड़ा अरे बात भी क्या करेंगे तुमलोग ने तो इनका पूरा इतिहास भूगोल तो सब बता ही दी। इस पर उनलोग ने कहा कोई बात नहीं बाबू जो चाहो बात कर लो। पर अब तो चाय पी सकते हो न ? यहां आए करीब एक घंटा हो चुका था। दिन के 11 बज गए थे, लिहाजा आंख मारकर मैंने फोटोग्राफरों से यहां से अब रूखसत होने का संकेत दिया। इन महिलाओं ने कहा कि मैं यहां पर ही बुला दूं कि तुमलोग उनके पास जाओगे ? मैंने फौरन कहा नहीं नहीं हमलोग ही वहां जाएंगे, तो दोनों हाथ फैलाकर हंसने लगी। मैंने पूछा क्या दूं तू ही बोल न। हम तो तेरे ग्राहक है नहीं तेरी बात सुनने वाले है, जो तेरी मर्जी पर यह तो एक दुकान हैं न बोहनी तो होनी ही चाहिए। हम तीनों दोस्त उसकी बात सुनकर हंस पड़े, और जेब से मैंने अपनी जेब से दो सौ रूपया निकलकर उनके हाथों में रख दिए। वे लोग मायूस होने की बजाय खुश हो गयी, और हमलोग उनके पीछे पीछे एक दूसरे कमरे में चले गए।

कमाल है देखते ही आंखें चौंधिया गयी। एकदम सामान्य साज सज्जा और सामान्य पहनावा में वे लोग कहीं से भी वेश्या या रंडी नहीं लग रही थी। सात आठ वेश्याओं में ज्यादातर 30 पार कर चुकी थी, मगर कम उम्र वाली भी 20 से 25 के बीच होगी। मैं इनको देखकर यही तय नहीं कर पा रहा था कि सामने बैठी कन्याएं क्या सचमुच में रंडियां हैं या आंखों को धोखा देने के लिए ही हमें रंडी बताया गया है। इन्हें गांव से बाहर कहीं भी आगरा में इन्हें कोई न रंडी कह सकता है और न ही मान सकता है। मैंने तुरंत टिप्पणी की कमाल है यार तुमलोग तो एकदम मेनका रंभा जैसी बेजोड़ अप्सराएं सी हो। मैंने तो कहीं और कभी सोचा तक नहीं था कि बसई की वेश्याएं दिल फाड़कर घुस जाने वाली होती है। मेरी बातों को सुनकर सब हंसने लगी । इससे क्या होता है बाबू हैं तो हमलोग नाली के ही कीड़े। मैंने फिर पूछा क्या केवल तुमलोग ही इतनी हसीन रंगीन हो कि यहां कि और भी तुम जैसी ही इतनी ही मस्त है? मेरी बात सुनते ही सब खिलखिला पड़ीं। एक ने कहा एक औरत कभी दूसरी औरत की तारीफ नहीं करती बाबू तुम तो एकदम बमभोले हो, फिर हम तो वेश्याएं है कैसे कह दें कि हमसे भी कोई सुंदर हैं यहां। यह कहकर सभी फिर जोर से हंसने लगी। और मैं इनकी बातें सुनकर झेंप सा गया।

फिर एक बार पूछा कि धंधा कैसा चल रहा है यहां के लोग तो कह रहे हैं कि बड़ी मंदी का दौर है। मेरी बात सुनकर ये लोग फिर जोर से हंस पड़ी। अरे बाबू खाना के बगैर लोग रह सकते हैं मगर ....। हमारा धंधा ना कल कम था न आज कम है और मान लो कि हम बुढिया भी जाएंगी न तो भी यह कम नहीं होगा। हां रंग रूप अंदाज जरूर बदल जाएगा। इससे पहले कि मैं कुछ और पूछने के लिए मुंह खोलता उस,पहले ही दो तीन वेश्याओं ने बड़ी अदा से गुनगुना चालू कर दिया कि या तो साथ चलो ऊपर नहीं तो चले चलो चले चलो चले चलो चले चलो..... गाते हुए सब कमरे से बाहर निकल गयी।

हमलोग भी कमरे से बाहर होकर फिर आंटियों की शरण में थे। मैंने फिर आंटी से कहा आह कहे या वाह कहे आंटी तुमने तो पूरे चांद को ही अपने कोठे पर बैठा लिया है। इस पर वो भी हंसने लगी। बेटा इनको देखकर तो लोग अपने घर का रास्ता ही भूल जाते हैं। मैंने फौरन पूछा इनको लाई कहां से ? यह सुनते ही दोनों उकता सी गयी। चल बाबू चल तू भी चल इनको देखते ही ये तेरे दिमाग में नाचने लगी है और अब तू केवल अंड शंड बकेगा। वेश्याओं की मालकिन की गुर्राहट पर हम तीनों जोर से हंसे और घर से बाहर निकल पडे।।

तभी मुझे कुछ याद आया तो हम तीनों फिर अंदर आ गए। । हमलोगों को देखकर वो सवालिया नजर से देखने लगी। मैं आराम से जाकर बैठ गया। अपने स्वर को नरम करती हुई पूछी कुछ सामान छूट गया क्या बाबू ? मैंने कहा आंटी तुम घर में घुसते ही बोली थी कि हम मेहमानों से दाना पानी का रिश्ता बनाते हैं। तो हमारे लिए बन रही चाय किधर गयी ? बस यही चाय पीने आ गया नहीं तो तुम बाद में चाय फेंकने पर हमलोग को ही गरियाती। मेरी बाते सुनकर वो एकदम मस्त हो गयी। और हंसते हुए बोली हाय री मर ही जावां क्या मस्त है तू भी इन हसीनाओं से कम नहीं है रे बात करने और छेड़ने में। इस पर मैं झेंपते हुए बोला अरी आंटी मेरे से तुलना करके तू उन रूपसियों की बेइज्जती कर रही है कहां वे और कहां मैं। मैं मुंहफट वाचाल बक बक करने वाला। कहकर हंस पडा। मेरे उपर निहाल होती हुई बोली सब कहां बोल पाते हैं बेटा तेरे दिल में किसी तरह का लोभ नहीं है न तभी इतना साफ और सीधे कह डालता है।

मैं भी माहौल को जरा मस्तानी बनाने के लिए कहा अरे तेरे चरण किधर हैं आंटी मेरी इस तरह तारीफ करने वाली तू दुनियां की पहली औरत है लाओ तेरे पैर छू ही लूं। मेरी बातों को सुनकर वो बाहर भाग गयी और कमरे के बाहर ठहाके लगाने लगी। मैं प्रसंग को मोड़ने के लिए जरा हड़बड़ाते हुए कहां आंटी चाय पिलानी है तो जरा जल्दी कर नहीं तो हम लोग निकल रहे है। एकदम एक मिनट के अंदर चाय आ गयी। बेटा मैं सैकड़ों लोगों को चाय पीला चुकी हो मगर जिस प्यार लगाव और स्नेह से तुम्हें पिला रही हूं वह आज से पहले कभी नहीं । मैं भी गद गद होते हुए उन पर मोहित सा था और बिन चाय को पीए ही बोल पड़ा आहा क्या स्वाद है चाय का। तभी दूर खड़ी एक जवान वेश्या ने फौरन आंटी को बताया कि बिना चाय पीए ही तारीफ करने लगे हैं। मैं उसकी तरफ देखकर बोला चाय को पीने की क्या जरूरत हैं आंटी के प्यार से चाय तो बेमिसाल हो गयी है। तू चाय पी रही है और मैं तो आंटी के प्यार को पी रहा हूं। इस पर वे उठकर मुझे गले लगा ली। जीते रहो बेटा जीवन भर फलो फूलो। उनके इस आशीष पर मैं भी झुककर उनके पैर छू ही लिए तो वो मुझसे लिपटकर रोने लगी। मैंने उनको चुप्प कराया और बोल पड़ा पता नहीं क्यों आंटी मुझसे लिपटकर ज्यादातर लोग रो ही जाते हैं।

इस पर वो मेरे को साफ दिल का नेक इंसान बोली। तब मैं भी ठठाकर बोला कि तेरे यहां तो लोग लड़कियों से चादर वाला रिश्ता बनाते हैं और मैं तेरे संग ही रिश्ता बना गया। इस पर वो बैठे बैठे सुबक पड़ी। और मेरे लिए न जाने कौन-कौन सी दुआएं देने लगी। बेटा लोग यहां पर तो दिल हार कर जाते हैं पर तू तो सबके दिल को लेकर जा रहे हो। इस पर मैंने अपना थैला तुरंत खोलकर फर्श पर रख दिया कि भाई जिसका जिसका भी दिल मेरे साथ जा रहा है वे निकाल ले। इस पर हॉल में ठहाकों की गूंज फैल गयी और दोनों उम्रदराज आंटियों ने अपने हाथ से मेरे चेहरे को लेकर जितना हो सकता था लाड प्यार जताया। प्यार का नाटक खत्म होते ही मैंने उनसे पूछा कि किस किस घर में चलूं आप कुछ बताएंगी। इस पर वे दोनों अपनी एक खास सहेली के यहां अपने साथ लेकर चलने को राजी हो गयी।

इस बार हम तीनों आंटियों के संग इस घर के पीछे वाले एक मकान में घुस गए। वहां की भी दो तीन उम्र दराज महिलाओं ने इनका भरपूर स्वागत किया। एक आंटी ने मेरा नाम पूछा तो मैंने कहा बबल। इस पर वह अपनी सहेली को बताने लगी है तो ये सब पत्रकार मगर (मेरी तरफ संकेत करती हुई) यह बबली बहुत मस्त है। हमारे यहां तो लोग दिल हार कर जाते हैं मगर इस बबली ने सबक दिल ही जीत लिया। मैं भी जरा ज्यादा शिष्ट सभ्य और सुकुमार दिखाने के लिए इस ने कोठे की तीनों उम्र दराज आंटियों के पैर छू लिए और हाथ जोड़कर कहा कि एकदम खरा और तीखा पत्रकार हूं आंटी पर यह तो इनका प्यार दुलार है कि ये हमें इतना मान दे रही हैं। नए कोठेवाली आंटियों ने कहा कि बेटा हम तो मर्दों की चाल से पूरा हाल जान लेती हैं पर जब ये तुम्हें इतना दुलार दे रही हैं तो जरूर तू खास है। मैं लगभग पूरी तरह उनके सामने झुकते हुए हाथ जोड़ दिए। इस पर मोहित होती हुई नयी आंटी ने कहा वाह बेटा क्या सलीका और शिष्टाचार है तुममें। मैं तुरंत एकदम टाईट होकर खड़ा होकर बोला कि आंटी यह सब दिखावा है। न आज इसका कोई मोल है न कोई पूछ रहा है। मगर आंटी का प्रलाप जारी रहा। तब मैंने उनसे पूछा कि आपके यहां कोई बड़ा थैला होगा। तो एक साथ कईयों ने पूछ किस लिए। इस पर मैं बोल पड़ा कि आंटी के घर के सारे लोगों का दिल तो इस थैले में बंद हैं और अभी जो आपलोग के दिल को ले जाने के लिए भी तो एक थैला चहिए न। इस पर पूरे घर में हंसी फैल गयी। सब पेट पकड़ पक़ड़ कर हंसने में लगी रही। थोडी देर में चाय आ गयी। फिर आंटियों ने बताया कि हमलोग यहां करीब 200 साल से रह रहे है। धंधा कैसा है तुम जानते ही हो, मगर अब इससे बाहर निकलना भी चाहें तो यह सरल नहीं हैं। अपने घर की बेटियों को दिखाया और बताया किस तरह पुलिस की सख्ती के कारण यह धंधा काफी मंद सा हो भी गया है। इस घर की आंटियों ने भी बताया कि केवल चादर और रखैल कहो या साथी वाला ही रिश्ता मान लो कि हर घर में रौनक और हंसी मजाक है।

बसई गांव के ज्यादातर घरों में आज भी चादर और साथी कहे या रखैल वाला रिश्ता ही मुख्य है। मगर लड़कियों की लगातार बढ़ती मांग के चलते आगरा शहर में देह के धंधे का कारोबार भी खूब चमक रहा है।

बसई की लड़कियों समेत शौकिया तौर पर भी इस धंधे में उतर रही युवतियों के कारण भी रंग रूप पहिचान छिपाने से इस धंधे का पूरा नक्शा ही बदल गया है। और इनकी चमक के पीछे बसई जैसे परम्परागत गांवों की चमक धुंधली होती पड़ रही है।

बसई की देवियों के दर्शन करके जब हमलोग बाहर निकले तो शाम के साढ़े चार बज चुके थे। खुद पर लज्जित होते हुए जब मैं पुलिसचौकी पर पहुंचा तो आगरा के मेरे सारे लोकल दोस्त नेताओं की फौज पूरे आराम से मेरा इंतजार कर रही थी। मैंने व्यग्रता से कहा चलो यार कुछ खाते पीते हैं। आपलोग को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा होगा। मेरी बात सुनकर चौकी इंचार्ज चंद्रशेखर सिंह समेत मेरे सारे दोस्त हंस पड़े। मैं भौचक्का सा देखता रहा कि क्या माजरा है। यादव जी की कोठी से बार-बार खाने के लिए फोन आने पर सबों को इंचार्ज ने खाना खिलाया और पिछले छह घंटे से चाय और सिगरेट के बेरोकटोक दौर को झेलता रहा। इतने लंबे उबाऊ इंतजार के बाद भी मेरे तमाम मित्रों के चेहरे पर न कोई शिकन थी और ना ही शिकायत थी। और जब हमलोग बसई से बाहर निकले तो आगरा के मेरे सारे मित्र बहुत सारे पुलिस वालों के पक्के यार बन चुके थे। अलबत्ता लखनऊ से ही यादव साहब ने मेरे लिए मिलकर ही जाने का ही फरमान जारी कर दिया था। एक दिन आगरा में रूकना पडा। अगले दिन पांच साल के बाद दोपहर में मिले बगैर दिल्ली लौटना मुझे भी ठीक नहीं लगा और सहारनपुर की बहुत सारी बातों यादों को आगरा में याद करके हमलोग कई घंटे तक बहुत मस्त रहे।

अनामी शरण बबल

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नगर सुदंरियों से अपनी प्रेम कहानी -3

सिनेमा हॉल में पैसे का प्यार

अनामी शरण बबल

यह घटना भी कोई सात आठ साल पहले की है। गरमी के दिन थे और मैं क्नॉट प्लेस के रीगल सिनेमा के सामने बने मेहराब की दीवार के सहारे खड़ा था। मैं किसी काम से किसी के इंतजार में था मगर अब यह सही सही याद नहीं है। मगर एकाएक मुझे लगा मानो एक महिला अपने हाथों से मुझे धक्का मारते हुए आगे निकल कर खड़ी हो गयी। टक्कर लगने के बाद जब मेरी तंद्रा टूटी और मैंने घूर कर उस महिला को देखा तो सामने खड़ी महिला मुस्कुराते हुए अपनी एक आंख दबा दी। उसकी इस अदा पर मेरे अंदर जगा विरोध एकएक नरम सा हो उठा। मैंने उसको घूरना क्या छोड़ा कि अगले ही पल वो मेरे सामने खड़ी थी। रीगल में सिनेमा देखना है क्या ? मैंने रूखे स्वर में जवाब दिया नहीं। काहे भाई जिसके संग चाहो देख सकते हो। 16 से लेकर 36 तक की मिल जाएगी तेरे को। इस पर मैंने तीर छोड़ा सिनेमा देखने का पैसा लेती हो या देती हो ? पईसा क्यों देंगे टिकट के अलावा 200 रूपए और इंटरवल में कुछ खान पान बस्स। तीन घंटे तक एक हीरोईन तेरे बगल में क्या महंगा सौदा है। मैं थोड़ा और खुलते हुए पूछा कि साथ में बैठकर जो सिनेमा देखेगी, उसका क्या करेंगे हॉल में ? फौरन मेरे हाथों को पकड़ते हुए बोली पर उपर से ढाई घंटे का मजा तो देगी। अधीर होती हुई वह फिर मुझसे पूछी क्या देखना है तो बता तो मैं सबकुछ मैंनेज कर दूं । मैंने चारा डालते हुए फिर पूछा तू क्या मैनेजर है या गैंग लीडर पहले यह तो बता। इस पर वह बड़े गर्व भाव के साथ अपने बदन को टाईट कर हंसने लगी। इस पर मैं मुस्कुरा उठा. यानी तू मैनेजर है।

मेरे यह कहने पर वह शांत भाव से खड़ी खड़ी मुस्कुराती रही। एकाएक फिर अधीर होती हुई पूछी कि क्या सिनेमा देखना है ? इस बार मैं उसके हाथों को पकड़कर कहा यार आज तो बहुत जरूरी काम है लिहाजा आज तो संभव ही नहीं है, पर एक बिजनेस डील कर तू मेरे साथ। जिस तरह लड़कियों की तलाश में लोग रहते होंगे तो जाहिर है कि बहुत सारी एय्याश औरतें भी तो गिगेलो मर्दों की तलाश में रहती होंगी। सिनेमा देखने के लिए मैं उनके साथ जा सकता हूं। जो राशि मिलेगी उसमें हम दोनों आधा आधा। मेरी बात सुनकर वो खिलखिला पडी। साले गैर लौंडिया को अपने बगल में बैठाकर सिनेमा देखने में तो तेरी सिनेमाहॉल के बाहर ही फटी जा रही और तू साला उन चूसनियों के साथ सिनेमा देखेगा। मैं भी इसके साथ मुंहफट होते हुए बोल पडा तो इसमें क्या हर्ज है। एक बार तू मेरे साथ सिनेमाहॉल मे बैठकर ट्रेनिंग दे देना और क्या। धंधा के लिए तो कुछ करना ही पड़ेगा न। मेरे साथ वो बात भी कर रही थी और कभी-कभी एकाएक अधीर सी भी हो जाती थी। वह आगे बताती जा रही थी कि यदि सिनेमा हॉल में साथ नहीं रहना है तो बता सारी व्यवस्था है 500 से लेकर 2000 तक रूपया निकाल तो यहीं पर एक दर्जन लड़कियों की परेड़ करवा दूंगी। जिसे पसंद करेगा वो अपने साथ लेकर कमरे में चली जाएगी। मैंने फिर पूछा और पुलिस का डर। इस पर वो हंसने लगी। सबका हिस्सा होता है। तू इसकी फ्रिक न कर । एकाएक फिर वो उतावली होते हुए मुझसे पूछी तू तो अपनी पसंद बता। इस पर मैंने कहा कि अभी से नहीं पहले ही मिनट से बता रहा हूं न कि आज कोई जरूरी काम है। आज तो हो ही नहीं सकता। मेरी बातों को सुनकर वह थोडी मायूस सी होने लगी। इस पर मैंने उससे कहा कि मायूस होने वाले लोग बड़े बिजनेस नहीं करते। तेरे बहाने ही तो मैं भी इस धंधे में उतरने के लिए तुमसे सलाह मशविरा ले रहा हूं।

मेरी बातों को सुनकर उसके चेहरे पर फिर मुस्कान लौट आयी। मैंने फिर उससे पूछा कि तू केवल मैनेजर ही है य किसी के साथ भी आती जाती हो। करीब 34-35 साल की इस महिला मायूसी से बोल पड़ी कि अरे अब तो हमारे ढलान के दिन आ गए है। हमलोग पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। इस पर मैंने उससे कहा कि तू पागल है। अपने ऊपर तुम खुद ध्यान दोगी नहीं और दूसरों पर इल्जाम लगाओगी । मैंने कहा ठीक से आईना देखे तुम्हें कितने दिन हो गए है। अपने रंग रूप को जरा मजे से संवारो तो सही, तू तो आज भी एकदम करीना कपूर से कम नहीं है। मेरी बातों को सुनकर वो एकदम शरमा गयी। आंखें नीचे करके मुझसे बोल पडी तू मुझे उल्लू बना रहे हो। तिस पर मैंने फिर जोर देकर कहा कि हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखों को फारसी क्या। तू आज ही घर जाकर केवल अपने आपको आइने में निहारना और अगली मुलाकात में बताना। मेरी बातों को सुनकर वो एकदम निहाल सी हो गयी। मेरे हाथ को पकड़ती हुई बोली तू सही कह रहा है न। इस पर मैंने उसको एकदम खल्लास कहा तो वह भाव विभोर सी हो गयी। मेरे हाथ को पकड़ कर बोल पडी कि तू मेरे साथ बिना पैसे के भी चल सकता है यार। इतनी मीठी-मीठी बात और तारीफ करने वाला तो अब तक कोई दूसरा लौंडा मिला ही नहीं था रे। मैंने उसको सावधन करते हे कहा तू कैसी मैनेजर है कि खुद भावुक हुए जा रही है। एक उपदेश हमेशा अपने साथ गिरह बांधकर रखना कि घोडा घास से यारी नहीं करता। मीठी-मीठी बाते करने वाले मेरे जैसे चार यार तेरे हो गए न तो तेरी कंगाली के दिन आ जाएंगे। कोई भी हो साला बिन पईसा कैसी दोस्ती । मेरी बात सुनकर वह फिर भाव विभोर सी होती हुई बोली कि साला बातें तो तू अईसी करता है न कि सीधे छाती में समा जाए।

उसकी भावुकता को कम करने के लिए मैंने पूछा कुल्फी खाएगी ? (रीगल के बाहर उस समय कुल्फी की कीमत दस रूपये थी) जेब से 50 रूपये का एक नोट अभी निकाला भी नहीं था कि वह बोल पड़ी खाउंगीं पर मैं अकेली नहीं हूं। यह सुनते ही मैं चौंक पडा। अकेली जान और मान कर ही मैं मस्ती से जानकारियां ले रहा था, मगर वो अकेली नहीं है यह सुनते ही मैं कांप सा गया। खुद को सामान्य और बेपरवाह दिखाते हुए मैंने पूछा किधर है तेरी मंडली? एकाएक उसने अपने दोनों हाथ खड़े किए नहीं कि अगल बहल आंए-दांए-बांए सामने पीछे से एक साथ रंग बिरंगी सात देवियां मेरे इर्द-गिर्द आकर खड़ी हो गयी। अलबत्ता सबों ने मुस्कान के साथ मुझे सलाम भी किया। 50 का एक नोट तो मेरे हाथ में ही था कि फिर मैंने एक सौ रूपये का एक नोट और निकाला। मैंनेजर को धराते हुए कहा कि लो तुमलोग कुल्फी खाओ। मेरे हाथ से नोट लेकर सब मिल जुलकर कुल्फी खाकर हंसती हुई फिर इधर उधर लापता हो गयी और दो कुल्फी लेकर वो मेरे करीब आ गयी। हम दोनों एक साथ कुल्फी खाने लगे। मैंने अचरज के साथ कहा अरे यार तेरा तो बड़ा तगड़ा नेटवर्क है। मैं तो तुम्हें अकेली मान रहा था पर तुम तो पूरी फौज के साथ मुझपर नजर ऱखी थी। वो भी इतना तेज कि नंगा करके भी साले को न छोड़ो। इस पर वो हंसते हुए बोली कि नजर रखना पड़ता है कि इन लड़कियों के साथ कौन किस तरह पेश आ रहा है। गालियां देती हुई बोली इतने हरामखोर लोग होते है कि कमरे में या हॉल में ही लड़कियों पर बाज की तरह झपट जाते हैं और तीन घंटे में ही जन्म जन्म का हिसाब वसूलने लगते है। मैंने डरने का अभिनय करते हुए कहा तब तो अपनी लड़कियों के साथ धूप अगरबती भी दे दिया करो यार ताकि अंदर जाकर सिनेमा और पूजा दोनों साथ-साथ करके ही कोई बाहर निकले। मेरी बात सुनकर वो खिलखिला पड़ी। अरे अईसा कुछ नहीं होता मगर इंटरवल में अपनी लड़कियों से सांकेतिक तौर पर हाल चाल ले ही लिया जाता है।

अब इतनी सूचना और इसके हर रूप की अनायास जानकारी मिल जाने के बाद मेरा मन भी खिसकने का करने लग। अपने पत्रकार वाले दिमाग को अपने बैग में रखते हुए अब हंसी ठिटोली से ही बाहर निकलने का फैसला किया। कुल्फी खाने के बाद मैंने पूछा यार अभी तक तुमने अपना नाम नहीं बतायी। तपाक से वो बोली तुमने पूछा ही नहीं। मैंने कहा चल अब तो बता मगर सही वाला नाम बताना नहीं तो सलमा सुल्ताना रेहाना शबना धन्नो जैसा चलताउं झूठा नाम नहीं बोलना। इस पर वो हंसने लगी साला आरी से काटता है और यह भी पूछता है कि दर्द हो रहा है या नहीं। मैंने भी हंसते हुए ही कहा कि साला आऱी से काटना ही हो न तो तेरे आलसपन को काट दूं जवानी में बुढिया मानने वाली तेरी ग्रंथी को काट दूं। अपने उपर ध्यान देगी न तो भरी जवानी में अरूणा इरानी बनने की नौबत नहीं आएगी। अभी तो तू वाकई करीना कपूर से कम नहीं है। मेरी बातों से मानो वह निहाल सी हो गयी। खुद को संभाल नहीं पा रही थी। हंसते हंसते वो दीवार का सहारा ले ली। एकाएक फिर वो मेरे पास आकर आंखों में आंखें डालकर पूछी क्या तू सही कह रहा है ? मैंने उसको संजीदगी से कहा भला झूठ बोलकर मेरा क्या जाएगा, पर तेरा तो बहुत कुछ संवर जाएगा। रीगल सिनेमा के दीवार के सहारे वो खड़ी रही और मैं उससे बाते कर रहा था। भावुक होकर वह बोल पडी तू मेरा दोस्त बनेगा ?

अरे मैं पिछले एक घंटे से तुमको दोस्त मानकर ही तो बात कर रहा हूं अगर तू यह मान रही होगी कि मैं किसी रंडी के दलाल से प्यार फरमा रहा हूं तो तू मूर्ख है। मेरी बत सुनते ही वह चहक उछी। नहीं रे तू अनमोल है तू केवल मेरा दोस्त बन। तेरी दोस्ती पाकर ही मैं निहाल हो जाउंगी, और तू जो कहेगा वही करूंगी पर तू केवल मेरा दोस्त होगा। मैंने फिर उसके हाथ को पकड़कर बोला कि तू गलत-गलत ट्रैक पर फिर जा रही है। मैं यह कैसे कह दूं कि केवल तेरा हूं मेरे सैकड़ों मित्र हैं और मैं भी तो सैकड़ों के दुख सुख का साझेदार हूं यार। हर दोस्ती की परिभाषा अलग होती है, और अभी तो तू भावना में बही जा रही है खुद को संभालो पागल। एकदम उतावली सी होकर बोली कि फिर तेरे से कब मुलाकात होगी ? इस पर जोर देते हुए मैंने कहा शायद कभी नहीं। तो मैं करीना कपूर लग रही हूं या बंदरिया यह कौन बताएगा रे। . वो एकदम बालसुलभ चिंता के साथ बोल पड़ी। उसके इस रूप को देखकर मैं भी हंस पड़ा। अरे चिंता ना कर जब करीना लगने लगेगी न तो तेरे आस पास भौंरे मंडराने लगेंगे तो तू खुद समझ जाएगी कि क्या लग रही हो। इस पर वह फिर खिलखिला पड़ी और बोली कि इस करीना का हीरो तो तुमको ही बनना पड़ेगा। मैंने उसको सख्त होकर कहा कि हीरो मैं नहीं तेरा कोई यार होगा।

चल यार मैं भी तुमको याद रखूंगी और जब भी मुझसे मिलने का मन करे तो जहां पर आज खड़ा था न वहीं पर आकर खड़ा रहना तेरी रानी प्रकट हो जाएगी। मैं इस पर हंस पड़ा और साफ कहा कि तू मेरी रानी नहीं है। हां रे बाबा बातें तो उपदेश की करता है पर इतनी अच्छी बातें करता है कि तेरे को मारने का नहीं तेरे उपर मर जाने का मन करता है। मैं इस पर यह कहते हुए खादी ग्रामोद्योग की तरफ बढ़ गया कि जब मरने का मन करे तो जरूर बता देना। और दूर से खड़ी होकर वो मेरे को अपनी आंखों से दूर होते देखती रही।

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नगर सुदंरियों से अपनी प्रेम कहानी -4

जब जीबीरोड की वेश्याओं ने मुझे गर्भवती बना दिया

अनामी शरण बबल

यह एक इस तरह की कहानी है जिसको याद करके भी काफी समय तक शर्मसार सा हो जाता था। मगर काफी दिनों के बाद अपने शर्म और संकोच पर काबू पाया। मगर इसको कभी लिखने के लिए नहीं सोचा था। मगर अब जबकि इस घटना के हुए करीब 16 साल हो गए हैं तो मुझे लगने लगा कि इसे भी एक कहानी या संस्मरण की तरह तो लिखना ही चाहिए। अगर कहीं मैं रंगरूप बदलकर या अपनी पहचान छिपाकर कोई बड़ी खबर करना हूं जिसे मीडिया जगत में सराहनीय भी माना जाता है तो फिर कोठे पर जाकर कोई खबर करने में शर्म कैसी। यह एकाएक अजीब हालात वाली कहानी है जिसके लिए ना मैं तैयार था और ना ही जीबीरोड के कोठेवालियां ही। पर संयोग इस तरह का बना कि करीब दो घंटे तक मैं उनकी लाड़ला बन गया। हंसी मजाक और गालियों के इस सिलसिले में एक साथ दर्जनों वेश्याएं मुझ पर निहाल सी हो गयी। और इसे प्यार कहे या दुलार गाल पर दर्जनों हाथ भी पड़े । जिसे यदि थप्पड ना भी कहे तो चोट में बस प्यार से मारा गया थप्पड ही था।

नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ से जब कभी भी मैं जीबीरोड होते हुए चावडीबजार या चांदनी बाजार की तरफ गया तो उस रात मेरी उचट जाती थी। हर छत की खिड़कियों पर खड़ी बेशुमार रंग बिरंगी हर उम्र की वेश्याओं द्वारा संकेत करके ग्राहकों को बुलाना या सीटी मारकर अपनी तरफ मोहित करने का यह दिलफेंक सिलसिला सुबह से लेकर रात तक चलता ही रहता है। इस तरफ शाम ढले या रात को कभी गुजरा नहीं लिहाजा उस समय के हालात पर ज्यादा कह नहीं सकता मगर दिन के 11 बजे से लेकर शाम चार पांच बजे तक कई बार गुजरा तो हमेशा खिड़की गुलजार रही और खिड़कियों पर हर उम्र की वेश्याएं हमेशा ग्राहकों को लुभाती या अश्लील संकेतों से ऊपर बुलाती ही मिली। जीबी रोड की इन सुदंरियों पर काम करने या इनके जीवन की कथा -व्यथा को जानने की उत्कंठा मेरे मन में हमेशा जगी रहती थी, मगर मन में इतना साहस ही नहीं था कि कभी कोठे पर जाकर इनसे बात करूं। और बात भी करता तो क्या करता । बेवजह समय बर्बाद करने के नाम पर तो वे लोग मुझे इतनी गालियां देती, जिसे मैं शायद इस जन्म में भूल नहीं सकता या इतने जूते खाने पड़ते कि चेहरे को ठीक होने में भी समय लगता। अपने संपादक को बताए बिना बहादुरी करने या करते हुए पकड़े जाने पर तो रंडीबाज पत्रकार की तोहमत को इस जन्म में मैं धो ही नहीं सकता। कोठे पर रपट के बहाने कई थे तो साथ ही जीवनभर के लिए बदनामी या कलंक के तमाम खतरे भी जुड़े थे। इन तमाम खतरों के बाद भी मेरे मन की उत्कंठा शांत नहीं हुई थी। मगर मेरे भीतर इतना साहस कहां कि वेश्याओं से अकेले जूझ सकूं। जीबीरोड की वेश्याओं के कई नेता भी हैं जिनसे, संपर्क करके कभी भी बेखौफ बातचीत की जा सकती है, मगर यह संयोग इस तरह का ही होता मानो उन पर नकेल डालकर बहादुर बना जाए।

किसी काम से मैं एक बार फिर जीबी रोड की तरफ से ही गुजर रहा था। मैं किसी कोठे की छत पर जाने वाली सीढी के नीचे माहौल से अनजान खड़ा था। आज की अपेक्षा उस समय मैं थोड़ा ज्यादा मोटा सा था। मेरा एक हाथ पेट पर था और मैं कहीं दूसरी तरफ देख रहा था। मेरे ध्यान में यह था ही नहीं कि मैं किसी कोठे पर जाने वाली सीढी के एकदम करीब या किसी कोठे के एकदम पास में ही खड़ हूं। तभी पीछे से आवाज आई कितने माह का जानू ? पहले तो मैं कुछ समझा नहीं । तभी पीछे से फिर आवाज आई कितने माह का है रे । मैं मुड़कर देखा कि सीढी पर एक महिला (वेश्या) खड़ी होकर मेरा उपहास करते हुए मजाक उड़ा रही है। एक पल को तो मैं यह नहीं समझ पाया कि इस हाल से कैसे निपटा जाए। तभी वो एकबार फिर मेरे सामने आकर बोली किससे है और कितने माह का है रे। अचानक मैंने ठान लिया कि बस्स इसी औरत का नकाब ओढ़कर ही इन वेश्याओं से निपटना है। मैं तुरंत बोल पडा किधर भाग गया था रे हरजाई अकेली छोड़कर। मैं कहां-कहां न तुमको खोजती घूम रही हूं बेवफा। आज मिला है। चल मेरे साथ कोख में आग लगा-के किधर भागा था रे। मैंने बोलचाल में स्त्री का रूप धारण करके उसको मर्द की तरह संबोधित कर उलाहना देने लगा। मेरी बातों को सुनकर वो हंसने लगी। मेरी बातों से पेट के बल होकर हंसती रही। उसने मुझे कहा चल साली चल यारों से मिलाता हूं। मेरे सामने वो भी मर्द की तरह ही बोलने लगी। एकाएक मेरा हाथ पकड़ कर छत पर ले जाने लगी चल इतने यारों से मिलाउंगा न कि तू यहीं मर-मरा जाएगी। अब तक तो मैं भी काफी संभल गया था और ठान लिया कि एकदम स्त्रीलिंग की तरह ही हाव-भाव न सही मगर बोलचाल रख कर ही इससे जूझना है। मेरा हाथ पकड़कर वो सीढी पर से ही अपनी सखियों सहेलियों को पुकारने लगी अरे आओ रे एक लौंडिया आई है जो मुझसे पेट से है रे आओ न देख मेरी दुलारी को। छत के ऊपर वह एक बड़े से कमरे में ले गयी। और मुझसे बोली पानी पीएगी रानी ? मैं हंस पडा और मस्ती के साथ बोल पड़ा - राजा के हाथ से तो जहर पी जाएगी तेरी रानी। तू पिलाकर तो देख। मेरी बातें सुनकर वो फिर निहाल सी हो गयी। हंसते हुए बोली साली लौंडिया होने का ड्रामा अब बंद भी कर. मैं एकदम निराश होकर बोल पड़ा और मेरे पेट का क्या होगा रे हरजाई बेवफा ? मेरी बाते सुनकर वो फिर हंसने लगी। साली ज्यादा याराना दिखाएगी न तो यहीं पर रख ली जाएगी। तो यहां से भाग कौन रहा है,, तेरे साथ तो जहन्नुम में भी रह लूंगी या रह जाउंगी। मेरी बातों को सुनकर वो फिर हंसते हुए बोली साला लौंडा बन जा बहुत हो गया तेरा नाटक। मैंने भी तीर मारा कि तुम भी गजब मर्द है साला जब तक नौ माह पूरे नहीं होंगे तब तक तो लौंडा कैसे बन सकती हूं। साला इतना भी नहीं जानता है। मेरे द्वारा हर बात पर दोटूक हास्यस्पद जवाब देने से मुझे उपर तक लाने वाली मगर मेरे साथ मर्द की तरह बात करने वाली वेश्या हर बार उछल पड़ती। मेरी बातों से उसकी हंसी रूक नहीं रही थी, और मैं भी हर जवाब को इतना रसीला बनाने में लगा था कि यह मेरे सामने मेरी दीवानी सी नजर आए। हमलोग अभी आपस में उलझे ही थे कि हर उम्र की एक साथ 10-15 रंगीन हसीन वेश्याएं कमरे में आ धमकी। किसी ने कहा क्या हुआ सलमा किसे इश्क फरमा रही है।

मेरी तरफ कईयों की नजर गयी तो सबों ने कहा कि साली एक जब तेरे पास पहले से आया हुआ है तो कहीं और जा। यहां नुमाईश क्यों लगा रखी है अपने यार का। नहीं संभल रहा है तो बोल साले में आग लगाती हूं फिर बकरी बनाकर कमरे में ले जाना। एकाएक धमकने वाली तमाम वेश्याओं का मन उखड़ चुका था और लगता था कि वे बस अब बाहर भागने ही वाली है। तभी मेरे साथ मर्द का रोल कर रही वेश्या ने अपने साथिनों को लताड़ा। नहीं रे यह बात नहीं है यह तो मेरी रानी है और इसके पेट में मेरा पांच माह का बच्चा है। साली खोजते-खोजते नीचे मुझे मिल गयी तो अपनी रानी से तुमलोग को मिलाने के लिए ऊपर लेकर आई हूं। अपनी सहेली की बात सुनते ही कमरे में मौजूद तमाम वेश्याओं का रंग रूप मिजाज और बातचीत का अंदाज ही बदल गया। भीतर-भीतर मैं भी थोड़ा नर्वस सा होने लगा कि एक साथ इतनी सुदंरियों को संभला कैसे जाएगा। मगर मैंने सोच लिया था कि एकदम रसमलाई से भी रसीली और मीठी बातें उलाहना या नकल करूंगा कि ये सब मेरे साथ ही मशगूल रहे। कईयों ने अपनी सहेली वेश्या पर ही इल्जाम लगाए बड़ी घाघ है री माशूका भी पालती है और हमलोग से छिपाकर भी रखती है।

कईयों ने अपनी साथिन के ही गाल छूते हुए हुए बोली कितने दिन का ये तेरा यार है । कभी बोली बताई तक नहीं। अपनी सहेलियों द्वारा उसी पर संदेह अविश्वास किए जाने पर वो बौखला सी गयी। अरे मेरा यार नहीं है रे ये साला नीचे खड़ा था और हम दोनों के बीच पेट को लेकर जो भी रसीली और मीठी मीठी बाते हुई वह सबको बताने लगी। पूरी कहानी सुनने के बाद शामत मेरी और मेरे मर्द वेश्या को भी झेलनी पडी। कईयों ने उसकी बातों पर यकीन ही नहीं हो रहा था। सबको लग रहा था मानो मैं इसका वास्तव में यार हूं और आज सबों से मिलाने के लिए ही यह नाटक किया जा रहा है। कईयों ने उलाहना दी साली हम कौन से तेरे यार को खा जाती, मगर कभी दिखाती तो सही। अकेले-अकेले रसगुल्ला खाती रही। मेरे को निहारते हुए कईयों ने कहा इसके तोंद को कम करा नहीं तो नीचे घुटकर मर जाएगी। लौंडा तो ठीक है, कहां से पकड़ी यार यह तो बता । अपने साथिनों की उलाहना और अविश्वास के बीच मेरा मर्द वेश्या उबल पड़ी अरी चुप भी रहो तुमलोग। मेरी बात तो मान सीढी के नीचे यही साला पेट पर हाथ रखकर दूसरी तरप देख रहा था। मैं तो बस हंसी ठिठोली में मजाक की मगर साले ने इतना सटीक और मीठा जवाब दिया कि बस हाथ पकड़कर तुमलोग से मिलवाने ऊपर तक खींच ले आई। कईयों ने फिर भी उस पर झूठ बोलने का ही इल्जाम मढ़ती रही। तू अब तो झूठ ना बोल कौन सा मैं तेरे सनम को खाने जा रही हूं, पर साले को जीजा तो कह सकती हूं। इसके समर्थन में एक बार फिर कई वेश्याओं ने अपनी ही साथिन पर फिर संदेह की।

अपनी साथिनों के इस अविश्वास को दूर करने के लिए वो मेरे ऊपर झपट पड़ी। चल भाग यहां से तू साला पांच मिनट के लिए यहां आया और मेरी सभी सहेलियों के मन में संदेह जगा रहा है चल भाग। मैं भी कौन से आफत को अपने पल्ले बांधकर ले आई ऊपर। यह कहते हुए वो रोने लगी। मैं कोठे से जाने की बजाय पास में पड़े एक रूमाल से उसके आंसू पोंछते हुए कहा रो मत यार मैं तो जाने ही वाला हूं पर तू क्यों रो रही है। रूमाल से आंसू पोंछने पर उसकी कई सहेली वेश्याएं मुझपर कटाक्ष की, अरे हाथ से भी आंसू पोंछ देता न तो कोई शामत नहीं आ जाती। मैं इस पर बोल पड़ा बिना आंसू पोंछे और हाथ पकड़े तो भूचाल आ गया और तुमलोग मुझे पिटवाने के ही फिराक में ही हो क्या ? एक वेश्या मेरे पास आकर बोली इसका क्या नाम है रे तू जानता है ? मेरे द्वारा इंकार किए जाने पर सबों ने फिर से मुझसे पूरी कहानी सुनी और मैं किस तरह ऊपर ले आया गया की एकरूपता पर विश्वास करने लगी।

तो अब मेरे इंटरव्यू का समय था तू क्या करता है इधर क्यों आय़ा था। सवालों की बौछार से निपटने से पहले मैंने कहा क्या तुमलोग पानी पिला सकती हो। ज्यादातरों ने गलती का अहसास किया और तुरंत पानी के लिए दो दौड़ पड़ी। दो गिलास पूरा पी लेने के बाद दो चार ने मुझसे पूछा चाय भी पिएगा क्या ? इस पर मैंने कहा तू चाय ना बना बाहर से रस और चाय मंगा ले मगर इसका पैसा मैं दूंगा। अपने बैग में रखे एक और बैग को निकाला और तीन सौ रुपए आगे कर दिए। कईयों ने कहा अरे चाय के लिए तो यह बहुत है। मैंने फिर कहा तो कुछ नमकीन भी मंगा ले तो तेरे साथ-साथ मैं भी खा लूंगा। फिर मैंने पूछा तुमलोग मेरे साथ तो खा ही सकती हो न ? इस, सवाल पर सारी खिलखिला पड़ी। तेरे साथ तो मर भी सकती हूं तू तो केवल खाने के लिए ही पूछ रहा है। बाजी को बिन कहे अपने हाथ में आते देख मैं उठा और सुबकते हुए जमीन पर ही सो गयी अपनी मर्द वेश्या के पास जाकर उठाया और साथ में बैठने को कहा।

मेरे देखा देखी कई उसकी सहेलियां भी पास में आ गयी और सबों ने झिझोंड़कर उठाया चल-चल मान गए कि वो तेरा नहीं हम सबका यार है यार । उसको मनाने उठाने में कुछ समय लगा तब तक चाय समोसे और रस को लेकर चाय वाला हाजिर हो गया। दो सौ कुछ रूपए का बिल बना । बाकी रुपए मुझे लौटाने लगी तो मैंने कहा अगली बार कभी आया तो उसमें जोड लेना। इस पर एक साथ सारी वेश्याएं खिलखिला पड़ी साला बहुत तेज है अगली बार का भी अभी से टिकट कन्फर्म कराके जा रहा है। एक साथ ठहाका लगा और मैं सबको हंसते हुए देखता रहा।

चाय पान के बीच में ही दो एक ने अपने बक्से से नमकीन के पैकेट ले आए और मस्ती और पूरे आत्मीय माहौल में करीब 15 मिनट तक यह ब्रेक चलता रहा। खानपान खत्म होते ही एक ने पूछा तू बता करता क्या है ? मैं इस पर हंस पड़ा। करूंगा क्या स्टोरी राईटर हूं। इधऱ उधऱ घूमना और कहानी लिखना ही काम है। मैंने चारा डालते हुए पूछा कहो तो तुमलोग की भी स्टोरी लिख दूं? मेरे इस सवाल पर कईयों ने कहा हाय हाय मेरी भी कोई स्टोरी है जो लिखेगा?

इस पर मैंने तीर मारा अरे क्यों नहीं तुमलोग को तो मैं दुनिया की सबसे शरीफ ईमानदार और पवित्र महिला मानता हूं। मेरी बातों पर यकीन न करते हुए सभी चकित रह गयी कैसे कैसे-कैसे-कैसे बता? हमलोग तो दुनिया की सबसे गंदी मानी जाती है। यही तो बात है कि जिसे लोग दुनिया की सबसे गंदी मानती है वो उसी माहौल में रहकर संतुष्ट है। क्या तुमलोगों ने कभी जंतर मंतर पर धरना दी है। तुम्हारा काम क्या है सब जानते हैं मगर हम लोगों के काम में कितना दोगलापन है दोगला चरित्र और दो तीन चेहरे वाले हमलोग में तो कदम कदम पर बेईमानी भरा है। जितने तेरे पास आते हैं वे साले हरामखोर अपनी बीबीओं से दगाबाजी करके आते हैं। मगर तुमलोग तो ऊपर से लेकर नीचे तक ईमानदार हो क्या कभी किसी से चाहे कोई हो बिस्तर पर साथ देने में भेदभाव करती हो? तुम्हारी सादगी समर्पण और अपने धंधे के प्रति ईमानदारी देखकर तो लोगों को सबक लेनी चाहिए। मेरे इस प्रवचन का बहुत ही सार्थक असर पड़ा।

मैंने कहा - मैं तो तुमलोगों को बहुत पवित्र और ईमानदार मानता था और मानता रहा हूं। मेरी बातों का मानों उनपर जादू सा असर हुआ। वे सब मुझपर मानो न्यौछावर सी हो गयी। अरे तेरे जैसी तो बातें करने वाला कभी यहां पर आया ही नहीं । मैंने तुरंत जोड़ा भला आएगा कैसे? मेरे जैसों को कभी ग्राहक माने बिना बुलाएगी न तो ,,,,। इस पर कई चीख पड़ी साले पैसा निकालने में तो मर्दों की जान निकल जती है अगर तेरी बात मानकर कोठे को फ्री कर दी न तो पूरा चांदनी चौक ही कोठे के बाहर लाईन लगाकर खड़ी हो जाएगी।

मेरे बैग की तलाशी लेती हुई सुदंरियों ने राष्ट्रीय सहारा के आई कार्ड और विजिटिंग कार्ड निकाल ली। एक ने कह अच्छा तो तू पत्रकार है ? मैंने फौरन कहा कि एकदम सही पहचानी मैं इसके लिए ही स्टोरी लिखता हूं। अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए एक ने पूछा कि तुम इसके लिए काम करते हो या नौकरी महीना वेतन वाला करते हो ? अरे तू मेरे साथ मेरे दफ्तर चल ना मैं लेकर चलता हूं वहां तुम्हें जानता कौन है। चाय भी पिलाउंगा और सबों से अपने दोस्त की तरह परिचय भी कराउंगा। तेरा मन करे तो तू जब चाहे मेरे दफ्तर में आ सकती है। अगर कभी मैं ना भी रहूं तो भी तू मेरे केबिन में बैठकर और चाय पीकर भी जा सकती है।

मेरी बातों से चकित होती हुई कईयों ने कहा तुमको हमलोग पर इतना विश्वास है? मैंने तीर मारा उससे भी ज्यादा जानेमन। मेरे द्वारा जानेमन क्या कहना मानो सबकी खुशियों का ठिकाना नहीं रहा और बारी बारी से मेरे गालों का ऑपरेशन ही कर डाला। अपना हाथ लगाकर मुझे अपना चेहरा बचाना पड़। सबों ने मेरे कार्ड को अपने पास रखती हुई दफ्तर में फोन करके चाय पीने के लिए आने का वादा किया। जब मैं जाने लगा तो एक ने मुझसे कहा क्या तुम हमलोग का नंबर नहीं लोगे ? मैं बात को मोड़ते हुए कहा कि जब तुमलोग फोन करोगी या मेरे दफ्तर में आओगी तो संवाद तो बना ही रहेगा। जाने से पहले मैं अपने मर्द बनी साथी से गले लगा और माफी मांगने के अलावा धन्यवाद भी दिया कि यार मैं तेरे प्रति आभार नहीं जता सकता कि तेरे कारण मैं तुम्हारी और तुमसे इतना घुलमिल सका। इस पर वो एकबार फिर मुझ पर मर जाने का डायलॉग दी।.

मैंने हाथ पकड़कर कहा दोस्ती मरने के लिए नहीं होती बल्कि जिंदा रहकर दोस्ती की मान रखा जाता है। सबों से हाथ मिलाते और हाथ लहराते हुए मैं कोठे की सीढियों से नीचे उतर गया। इस घटना के कोई पांच साल तक मैं सहारा में ही काम करता रहा, मगर कोठेवाली सुदंरियो ने ना तो कभी मुझे फोन किया और ना ही मेरे दफ्तर में आकर चाय पीने का वादा ही निभाया। अलबत्ता तब कभी कभी मुझे इनसे फोन नंबर नहीं लेने का मलाल जरूर लगा।

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नगर सुंदरियों से अपनी प्रेम कहानी -5

रात में एक कॉलगर्ल के साथ रिक्शे पर सफर

अनामी शरण बबल

यह बात 1995 की है। तब मयूर विहार फेज-तीन आबाद नहीं हुआ था। इसके आबाद नहीं होने के कारण गाजीपुक डेयरी कोणडली दल्लूपुरा में भी दुकानों की चहल पहल नहीं थी। कहा जा सकता है कि आवगमन की सुविधा भी आज की तरह नहीं थी। शाम ढलते ही पूरा इलाका वीरान सुनसान सा हो जाता थ। इसके बावजूद अपराध की घटनाएं ना के बराबर होती थी। कहा जा सकता है कि जब इलाका ही वीरान हो जाए तो बेचारे चोर, बदमाश लुटेरे किस पर आजमाईश करते। राष्ट्रीय सहरा में तमाम रिपोर्टरों को एक दिन नाईट यानी रात 12 बजे तक दफ्तर में रहकर क्राईम की खबरों को देखना होता था। उस समय मेरा नाईट किस दिन था यह तो मुझे अब याद नहीं पर रात में घर तक छोड़ने की व्यस्तता होने के कारण खास चिंता नहीं होती थी। देर रात तक दफ्तर में रहकर सभी अखबारों में नाईट कर रहे रिपोर्टर दोस्तों से बात करने तथा पुलिस हेडक्वार्टर में लगातार फोन घंटियाने का अलग मजा होता था। रात में केवल पत्रकारों को सूचना देने वाले तमाम इंस्पेक्टरों से भी मिले बिना ही हम पत्रकारों की गहरी याराना हो गयी थी। घटना वाले दिन गाड़ी चालक के घर पर कोई बहुत बड़ी आपात स्थिति थी। वो दफ्तर में ही बैठकर मयूर विहार फेज 3 तक मुझे ना छोड़कर गाजीपुर डेयरी वाले पुल एन एच-24 पर ही छोड़ देने का मनुहार कर रहा था। गरमी के दिन थे और इलाके से परिचित होने के नाते मैंने भी हरी झंडी दे दी, और मैं पुल के पास साढे बारह बजे उतर गया। पुल से नीचे उतरते समय मैं मान कर चल रहा था कि करीब एक किलोमीटर मुझे गाजीपुर कल्याणपुरी मोड़ तक पैदल जाना है। उसके बाद की सवारी मिली तो ठीक नहीं तो बाबू चरण सिंह की कार तो है ही। मानसिक तौर पर इसके लिए मैं तैयार भी था कि नीचे उतरते ही देखा कि एक पेड़ के नीचे थोड़ा अंधेरे में एक रिक्शा चालक रिक्शा के साथ बैठा है। रिक्शा देखते ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं बस फटाफट पलक झपकते ही रिक्शे पर जा बैठा और फेज-3 चलने को कहा। मेरी बातों को नजर अंदाज करते हुए उसने कहा रिक्शा खाली नहीं है अभी सवारी आने वाली है।

सवारी आने वाली है, सुनते ही मेरा माथा ठनका। क्यों वो तेरी रोजाना की सवारी है। इसका जवाब देते उसका हलक सूख गया और हां और ना करने लगा। कितने दिनों से तेरी सवारी है यह तो बताना ? अब तक वो संभल चुका था और तन कर बोला मैं क्यों बताउं। इस पर मैं गुर्राया साले चल पुलिस से तेरी शिकायत करता हूं कि रात में यह रंड़ियों का दलाल है और उनकी सवारी करता है। मेरी गुर्राहट पर भी वो हल्के स्वर में भुनभुनाता रहा। चल आज देखता हूं तेरी अनारकली को भी साली रात में धंधा से निपटकर रिक्शा से घर जाती है। और तू तो दलाली के चक्कर में जाएगा जेल। साले पुलिस वालों की कहीं एक बार हाथ लग गयी न तो महीने में 15 दिन तक यह सिपाहियों को ही ठंडा करती घूमेगी। मेरी बातों से रिक्शा वाला शांत हो गया था। थोड़ी देर बाद फिर मैंने फिर पूछा अभी और कितनी देर है उसके आने में। करीब एक बजने वाले थे। रिक्शा वाले ने कहा कि वो कभी भी आ सकती हैं रोजाना वो साढे बारह बजे तक तो आ जाती थी। तो यहां पर वो आती कैसे थी। इस पर रिक्शा वाले ने कहा पुल के ऊपर कोई कार उनको रोजाना छोड़ता है। यह सुनते ही मैं हंस पडा साले वो तेरे को उल्लू बनाती है। तू हरामखोर मूर्ख 50 रूपए में ही खुश है कि इससे तेरी कमाई हो जाती है, मगर तू भी उसके अपराध में शामिल है। साला जाएगा तू जेल । कितने दिनों से तेरे को उल्लू बना रही है।

मेरी बातों का उस पर असर होने लग था। वो भीतर से घबराने लगा था। करीब दो साल से। मैंने फिर डॉटा तूने कभी सोचा नहीं कि रात एक बजे आने वाली लौंड़िया कोई शरीफ तो हो नहीं सकती गदहा। देख लेना पुलिस वाले तो साले उसको अपनी रखैल बना लेंगे मगर जाएगा तू भीतर। हम दोनों अभी बातचीत में लगे ही हुए थे कि रात की अनारकली सामने प्रकट हो गयी। मेरे ऊपर ध्यान न देते हुए वो रिक्शावले से पूछी क्या माजरा है । उसके आने पर वो थोडा सबल सा महसूस करने लगा था । दो मिनट में मेरे एकाएक आगमन और हड़काने की जानकारी दी। मेरे ऊपर बेरूखी से बोली क्या हंगामा कर रहे हो।

इस पर मैं हंस पड़ा हंगामा तू रोजाना करती है और मुझसे पूछती है कि मैं हंगामा कर रहा हूं। उसने कहा क्या मतलब। अभी चल पुलिस थाना सब पता चल जाएगा धंधा रंडी वाला और ताव पुलिस वाला मारती है।. जोर से चीखने लगी क्या बकवास करता है। वहीं तो मैं कह रहा हूं साले को दो साल से पटा रखी हो कि रात में तेरे को ले जाया करे और तेरा काम नाम किसी को भी पता नहीं लगा। वह मेरे से पूछी तुम कौन हो।

मैं कोई रंडा या दलाला नहीं हूं। पुलिस का मुखबिर हूं तेरी कारस्तानी का थाने में पोल खोली जाएगी। फौरन अपना तेवर ठंडा करते हुए बोली क्या मांगता है। मैं तुरंत बोला धंधा करने वाली मुझे क्या देगी, जो चंद रूपयों को लिए हर जगह बिछ जाए। रिक्शा वाले की तरफ इशारा करते हुए मैंने कहा अरे इस मूरख को तो समझा देती कि यदि कोई सवारी बीच में आ जाए तो उसको ठीक से पटा ले ना कि तोते की तरह तेरे धंधे की कहानी बताने लगे।

थोड़ा नरम पड़ती हुई बोली आपको क्या शिकायत है इससे या मुझसे। मेरी कोई शिकायत नहीं हो सकती, मैं तो मयूर विहारफेज 3 जाने के लिए पूछा तो बकने लग मेरी सवारी है मैं नहीं जा सकता। तो मैं बस तुम्हारा इंतजार कर रहा था कि एक ही साथ फेज-3 चलेंगे। वह तुरंत बोली यह कैसे हो सकता है। मैंने कहा कि एक रिक्शे में दो सवारी बैठ सकते हैं या तो एक साथ चलो या फिर मैं पहले जाता हूं फिर तेरा तोता तो तेरे लिए आ ही जाएगा। पर अब इसको मूर्ख बनाना बंद करो रात को एक बजे 50 रूपे देती हो, और यह साला इसी में खुश कि रात में लौंडिया को लेकर जा रहा है।

लौंडिया सुनते ही वह चीखी क्या बकते हो । मैंने तुरंत सॉरी कहा तुम ठीक कह रही हो ये लौंडिया नहीं रंडी को लेकर रात में घूमता है मूरख। साले को पकड़े जाने दो जीवन भर रहेगा भीतर। इस बार वो मेरे ऊपर चीखी क्या रंडा रंडी बक रहा है मैं अभी मजा चखाती हूं। मेरी शराफत का नाजायज फायदा उठा रहे हो। मैं हंसने लगा तू अभी इस लायक ही कहां है कि तेरा फायदा उठा सकूं। अगर बात को तूल देनी है तो जहां तेरी मर्जी हो वहां चल और शराफत के साथ अपने धंधे पर पर्दा डाले रखना चाहती है तो मयूर विहर फेज 3 तक साथ-साथ मुंह बंद करके चल। रिक्शा वाले को जो तुम दोगी उसमें 25 रूपए मैं भी शेयर कर दूंगा।

मेरी बातें सुनकर वो रिक्शे पर बैठ गयी। जब मैं बैठने लगा तो सती सावित्री कुलवंती देवी की तरह मेरे को छिटकाते हुए बोली ठीक से बैठो ठीक से। इस पर मैं भी जोर से बोल पड़ा कि तेरे से चिपकने या चिपक कर बैठने का कोई इरादा या मूड नहीं है। बीच में मैं अपने बैग को रख डाला तो उसको बैठने मैं दिक्कत होने लगी होगी, तो बोली इसको हटाओ मैं नहीं बैठ पा रही हूं। तो मैं क्या करूं, ऐसा करो तुम नीचे बैठ जाओ केवल 15 मिनट की ही तो बात है। मेरी बातें सुनकर फिर वो चीखी बकवास बंद करेगा। मैंने तुरंत जोड़ा मैंने तो सारी बकवास बंद कर रखी है, मगर इस बेचारे को छोड़ दे नहीं तो पुलिस तो तेरी आगे पीछे घूमने लगेगी, मगर इसका तो कोई नहीं है।

मैंने फिर रिक्शे वाले को आगाह किया कि यही तेरे को अब एक सौ रूपया भी रोजाना दे न तो भी इसका साथ छोड़ दे ,नहीं तो तेरे को भीतर मैं करवा दूंगा मूऱख। मैंने उसे पूछा कहां का है रे। मेरी बात पर दबे स्वर में बोला दरभंगा का। यह सुनते ही मैंने पांव से एक ठोकर उसको दे मारी । साला गदहा अपने साथ साथ बिहार का भी नाक कटाता है। ठोकर लगते ही उसने रिक्शा रोकते हुए रोने लगा। तेरे को भी मजा देती है क्या जो इसके पीछे पागल बना है। इस पर रिक्शा वाला तो खामोश रहा पर मेरे बगल में बैठी देवी फिर चिल्लाने लगी अजीब बदतमीज हो हर बात पर मुझे रंडा रंडी कॉलगर्ल बताए जा रहे हो। मैं नहीं बोल रही हूं इसका मतलब यह नहीं कि तू जो चाहेगा बोल सकता है।

इस पर मैंने कहा मैं तो शुरू से ही कह रहा हूं कि तू बोल-बोल न रोक कौन रहा है। यह तो मेरी शराफत है कि मामले को तूल नहीं दे रहा हूं वर्ना तू भी जानती है कि इन पुलिस वालों के चक्कर में आते ही तेरा धंधा तो हो जाएगा चौपट, मगर रोजाना इनसे ही निपटने में और कोख गिरने में ही तेरी सारी जवानी खत्म हो जाएगी। मेरी बात सुनते ही रिक्शा पर बैठी बैठी वह रोने लगी। मैंने तुरंत नाटक बंद करने को कहा। रिक्शा कोणडली गांव होते हुए घडौली डेयरी के रास्ते में आ गया । तभी सामने से एक गाडी की लाईट्स पडी। मैं इसको थोडा संभल कर बैठने को कहा । ठीक मेरे सामने पुलिस की जिप्सी रूक गयी। मैं फौरन रिक्शे से उतरा और अपना कार्ड देते हुए कहा कि आज नाईट थी और दफ्तर की गाडी आज ठीक नहीं थी मगर गाजीपुर पुल के नीचे एक रिक्शे पर ये मोहतरमा मिल गयी तो लिफ्ट ले लिया 25 रूपये शेयर करने की शर्त पर। इस पर पुलिस वाला मुस्कुरा पड़ा। ये मोहतरमा कौन है। कोई बीमार है और ई रिक्शा वाला दरभंगा का है। पुलिस वाला हंसते हुए बोला तो पत्रकार जी आपने तो पूरी रिर्पोर्टिंग कर ली है। मैंने भी कहा क्या करें रात का मामला है और कोई लड़की हो तो तहकीकात तो करनी ही पड़ती है।

मेरी बात सुनकर पुलिस वाला ठहाका लगाया और आगे गाड़ी आगे बढ़ गयी। वापस रिक्शा पर बैठते ही मोहतरमा बोली कि तू पत्रकार है। मैंने फौरन कहा बस इसीलिए आज तू बच गयी। बातचीत करते-करते मैं मयूर विहार फेज 3 के बस अड्डे पर आ गया। यहां पर मुझे उतरना था। मगर महिला ने बताया कि मैं आगे जाउंगी। रिक्शा वाले को नीचे उतरकर मैंने एक हाथ जमाते हुए मैंने फिर आगाह किया कि साला कमाई कर दलाली ना कर वर्ना जीवन भर के लिए भीतर हो जाएगा। घर गांव में बदनामी होगी सो अलग। और अंत में मैंने इस कॉलगर्ल कहे या संभ्रात रंडी को भी सलाह दी कि रिक्शे की सवारी तेरे लिए एकदम सेफ नहीं है। ये तो कहो कि गाजीपुर डेयरी के हरामजादों को पता ही नहीं है रि तू रोजाना रात में आती है। ये साले तुम्हें इस लायक भी नहीं छोड़ेगें कि खुद को संभाल सको। और जब रात में पुल तक गाडी से आती है तो अपने इश्कखोरों से कहो कि फेज-3 तक छोड़ा करें नहीं तो किसी भी दिन तेरा राम नाम सत्य हो जाएगा।

जब मैं मुड़ने लगा तो वह हाथ जोड़कर रोने लगी। रोते देखकर मैंने कहा खुद को संभाले, संभल कर रहें, सेफ रहें। यह कहते हुए मैं अपने घर की तरफ जाने लगा। इस घटना के बाद फेज-3 में ही उससे एक बार बाजार में और दूसरी दफा डीटीसी बस में टक्कर हो गयी। मुझे देखते ही वह शरमाते हुए हाथ जोड़ दी। बस में तो वह बैठी थी, मगर मेरे को देखते ही अपनी सीट खाली कर दी। मैंने उसे सीट पर बैठने को कहा और हाल चाल पूछते के बाद बस से उतर कर दूसरे बस की राह देखने लगा।

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नगर सुदंरियों से अपनी प्रेम कहानी-6

देहव्यापार का एक रूप यह भी

जब मेरे घर पर ही लड़की बुलाने का ऑफर दिया

अनामी शरण बबल

कभी-कभी जिन लोगों को हम बहुत आदर और सम्मान से देखते है तो हमेशा पाते हैं कि वहीं आदमी कभी-कभी अपनी नीचता के कारण एकदम बौना सा लगने लगता है। इसी तरह की एक घटना मेरे साथ भी हुई कि सैकड़ों कैसेट का एक गायक और जानदार नामदार आदमी को अपने घर से दुत्कार कर निकालना पड़ा। जिस आदमी के करीब होने से जहां मैं खुद को भी गौरव सा महसूस कर रहा था कि अचानक सबकुछ खत्म हो गया। यह घटना 1994 की है। जब एकाएक मेरे एक मित्र ने मेरे घर में आकर इस तरह का ऑफर रख दिया कि मन में आग लग गयी, और ...।

घर में मेरे अलावा उन दिनों कोई और यानी पत्नी नहीं थी। मेरी पत्नी का प्रसव होना था। प्रसूति तो दिसम्बर में होना था मगर वे कई माह पहले ही चली गयी थी। खानपान का पूरा मामला बस नाम का ही चल रहा था। होटल ही बडा सहारा था। खैर मेरे फ्लैट के आस पास में ही एक भोजपुरी गायक रहते थे और भोजपुरी संसार में बड़ा नाम था। उस समय तक उनके करीब 250 कैसेट निकल चुके थे। वे लगातार गायन स्टेज शो और रिकॉर्डिग में ही लगे रहते थे। समय मिलने पर मैं माह में एकाध बार उनके घर जरूर चला जाता था। मेरी इनसे दोस्ती या परिचय कैसे हुआ यह संयोग याद नहीं आ रहा है। मगर हमलोग ठीक-ठीक से मित्र थे।

संभव है कि उस समय मयूर विहार फेज-3 बहुत आबाद नहीं था तो ज्यादातर लोग एक दूसरे से जान पहचान बढाने के लिए भी दोस्त बन रहे थे। अपनी सुविधा के लिए हम इस गायक का नाम मोहन रख लेते हैं ताकि लिखने और समझने में आसानी हो सके। हालांकि मैं यहां पर उनका नाम भी लिख दूं तो वे मेरा क्या बिगाड़ लेंगे, मगर हर चीज की एक मर्यादा और सीमा होती है, और इसी लक्ष्मण रेखा का पालन करना ही सबों को रास भी आता है। राष्ट्रीय सहारा अखबार में मेरा उस दिन ऑफ था या मैं छुट्टी लेकर घर पर ही था यह भी याद नहीं हैं । मैं इन दिनों अपने घर पर अकेला ही हूं, यह मोहन को पता था। मैं घर पर बैठा कुछ कर ही रहा हो सकता था कि दरवाजे पर घंटी बजी और बाहर जाकर देखा तो अपने गायक मोहन थे। उस समय शाम के करीब पांच बज रहे होंगे। मैं उनको बैठाकर जल्दी से चाय बनाने लगा। चाय बनाने में मैं उस्ताद हूं, और पाककला में केवल यही एक रेसिपी माने या जो कहे उसमें मेरा कोई मुकाबला नहीं। हां तो चाय के साथ जो भी रेडीमेड नमकीन के साथ हमलोग गप्पियाते हुए खा और पी भी रहे थे ।

जब यह दौर खत्म हो गया तो मोहन जी मेरे अकेलेपन और पत्नी से दूर रहने के विछोह पर बड़ी तरस खाने लगे। बार-बार वे इस अलगाव को कष्टदायक बनाने में लगे रहे। मैं हंसते हुए बोला कि आपकी शादी के तो 20 साल होने जा रहे हैं फिर भी बड़ी प्यार है भाई। अपन गयी हैं तो कोई बात नहीं। मामले को रहस्य रोमांच से लेकर यौन बिछोह को बड़ी सहानुभूति के साथ मेरे संदर्भ से जोड़ने में लगे रहे। थोड़ी देर के बाद उनकी बातें मुझे खटकने लगी। मैंने कहा कि यार मोहन जी मैं आपकी तरह अपनी बीबी को इतना प्यार नहीं करता कि एक पल भी ना रह सकूं । मेरे लिए दो चार माह अलग रहना कोई संकट नहीं है बंधु। इसके बावजूद वे मेरे पत्नी विछोह पर अपना दर्द किसी न किसी रूप में जारी ही रखा। मोहन जी के विलाप से उकता कर मैंने कहा अब बस्स भी करो यार मैं तो इतना सोचता भी नहीं जितना आप आधे घंटे में बखान कर गए। इस चैप्टर को बंद करें ।

तभी मेरे पास आकर मोहन जी ने कहा क्या मैं आपके लिए कोई व्यवस्था करूं। यह सुनते ही मेरा तन मन सुलग उठा पर मैं उनकी तरफ देखता रहा कि यह कहां तक जा सकते हैं। मेरी खामोशी को सहमति मानकर खुल गए और बताया कि इनका जीजा नोएडा में किसी बिल्डर के यहां का लेबर मैनेजर है। उसने कहा कि आप कहें तो शाम को ही एक औरत को लेकर जीजा यहां आ जाएगा और दो चार घंटे के बाद सब निकल जाएंगे। मेरी तरफ देखे बगैर ही हांक मारी कि जब तक आपकी फेमिली नहीं आती हैं तब तक चाहे तो सप्ताह में दो तीन दिन मौज मस्ती की जा सकती है। मोहन की बातें सुनकर मैंने भी हां और ना वाला भाव चेहरे पर लाया। तो वे एकदम खुल से गए।

अरे बबल जी चिंता ना करो जीजा रोजाना नए-नए को ही लाएगा। मुझे क्या करना है मैं सोच चुका था पर इन हरामखोरों के सामने भी कुछ इसी तरह का प्रस्ताव रखने की ठान ली। मैंने कहा मोहन आईडिया तो कोई खास बुरा नहीं है पर मैं उसके साथ आ ही नहीं सकता जो 44 के नीचे आई हो। मेरे लिए तो कोई एकदम फ्रेश माल लाना होगा। मेरी बात सुनकर वे चौंके क्या मतलब ? एकदम फ्रेश । मोहन जी एक ही शर्त पर मैं अपने घर को रंगमहल बना सकता हूं कि मेरे लिए आपको अपनी बेटी लाना होगा। मेरी बात सुनते ही वे चौंक उठे, कमाल है अनामी जी आप क्या बोल रहे हो। मैंने तुरंत कहा इससे कम पर कुछ नहीं। इसमें दिक्कत क्या है आपका जीजा आपके साथ मिलकर आपकी बहन और अपनी बीबी के साथ दगाबाजी कर रहे हो तो एक तरफ बहिन तो दूसरी तरफ बेटी होगी और क्या। मेरे अंदाज से मोहन भांप गया कि बात नहीं बनेगी तो थोडा गरम होने की चेष्टा करने लगा। तब मैं एकदम बौखला उठा और सीधे-सीधे घर से निकल जाने को कहा। सारी शराफत बस दिखावे के लिए है। मेरे से यह बात आपने कैसे कर दी यही सोच कर मुझे अपने ऊपर घिन आ रही है कि तू मेरे बारे में कितनी नीची ख्यालात रखता है।

कंधे पर हाथ लगाया और सीढियों पर साथ-साथ चलते हुए मैंने जीवन में फिर कभी घर पर नहीं आने की चेतावनी दी। इस तरह की एय्याशियों या साझा सेक्स की तो मैं दर्जनों घटनाओं को जानता हूं, पर कभी मैं इस तरह के साझा-समूह-सेक्स के लिए कोई मुझे कहे या मेरे घर को ही रंगमहल सा बनाने को कहे यह मेरे लिए एकदम अनोखा और नया अनुभव सा था। मैं घर में लौटकर काफी देर तक अपसेट रहा । इस घटना के बारे मैं अपनी पत्नी समेत कईयों को बताया। और इसी बीच मेरे और मोहन के बीच संवाद का रिश्ता खत्म हो गया।

तभी 1996 में होली के दिन मोहन मेरे घर पर एकाएक आ गए। उसको देखते ही मेरा मूड उखड़ सा गया। पहले माफी मांगी मगर होली में यह सामान्य होने के बाद भी मैं यह नहीं देख सका जब मोहन मेरी पत्नी के गालों पर गुलाल और रंग लगाने लगा। यह देखते ही मैं उबल पड़ा और फौरन मोहन को घर से जाने की चेतावनी दी। तू मित्र लायक नहीं है यार अभी कटुता को भूले एक क्षण भी नहीं हुआ कि तू रंग बदलने लगा। तू बड़ा गायक होगा तो अपने घर का यहां से चल भाग। पर्व त्यौहार में अमूमन घर आए किसी मेहमान के साथ इस तरह की अभद्रता करना कहीं से भी शोभनीय नहीं होता, मगर कुछ संबंधों में सब कुछ जायज होता है।

करीब दो साल के बाद मैं अपनी पत्नी को लेकर गांव चिल्ला सरौदा के पास स्कूल में गया। जहां पर उनको अपने स्कूल की बोर्ड परीक्षा दे रही तमाम लडकियों से मिलकर हौसला अफजाई के साथ-साथ विश करना था। तभी एकाएक एक बार फिर मोहन टकरा गए। उनकी दूसरी बेटी भी बोर्ड की परीक्षा देने वाली थी। मोहन से ठीक-ठाक मिला तो उन्होंने अपनी बड़ी बेटी से मेरी पत्नी का परिचय कराया जिसकी पिछले साल ही शादी हुई थी। वो हम दोनों के पैर छूकर प्रणाम की तो मैं उसको गले लगा लिया । माफ करना बेटा एक बार किसी कारण से तेरे को मैं गाली दे बैठ था पर तू तो परी की तरह राजकुमारी हो । माफ करना बेटा. मेरे इस रूप और एकाएक माफी मांगने से वह लड़की अचकचा गयी। पर मेरे मन में कई सालों का बोझ उतर गया। जिसको बेटी की तरह देखो और उसको ही किसी कारण से कामुक की तरह संबोधित करना वाकई बुरा लगता है। इस घटना के बाद करीब 18 साल का समय गुजर गया, मगर गायक मोहन या इसके परिवार के किसी भी सदस्यों से फिर कभी मुलाकात नहीं हुई।

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नगर सुदंरियों से अपनी प्रेम कहानी-7

जब ग्राहक बनकर कमरे में बैठा रहा

अनामी शरण बबल

यह अपने बिंदासपन और एक पत्रकार होने के कारण ही मैंने नगर सुदंरियों के हाव-भाव और जीवन को जानने की ललक की आपबीती लिखी। अभी तक छह किस्तों में अपने मेलजोल की लीला को मस्त तबीयत के साथ बखान भी किया । यदि मैं पत्रकार नहीं होता तो निसंदेह एक सामान्य नागरिक की तरह ही मैं भी अपनी इमेज और इज्जत (?) बचाने की जुगत में ही 24 घंटे लगा रहता। यदि मैं इन सुदंरियों और कोठे का दीवाना भी रहा होता तो भी अपनी इस बहादुरी पर पूरी बेशर्मी से ही पर्दा डालकर शराफत का नकाब पहने रहता। मगर किसी भी अपने सच को लंबे समय तक छिपाना मेरे लिए असंभव है।

यह अलग बात हैं कि मेरे भीतर मेरे बहुत सारे दोस्तों के जीवन का काला सच छिपा है। मेरे ऊपर भरोसा करने वाले इन तमाम लोगों या परिचितों का मैं शुक्रगुजार हूं कि बातूनी स्वभाव के बाद भी मेरे ऊपर यकीन किया। और मैं भी जानता हूं कि इनका सच भी मेरे शव के साथ ही लोप हो जाएगा। अपने इन मित्रों ( जिनमें कई अब कहां हैं यह भी नहीं जानता) मेरे दो टूक बोल देने या साफगोई के कारण ही कोई महिला मित्र मेरे को नसीब नहीं हुई। और जो मेरी जीवनसाथी है वो भी अक्सर मेरी इसी साफगोई से ही तंग परेशान रहती है।

यहां पर मैं चाहता तो सुदंरियों की एक और किस्त बढा सकता था जिसमें दिल्ली के उन इलाकों की खबर ली जाती, जिसमें लड़कियां औरतें ही खुलेआम सड़कों पर यारों की तलाश करती है। मगर इन इलाकों में मैं पिछले काफी समय से गुजरा नहीं हूं लिहाजा जमाना बदलने के साथ-साथ और क्या-क्या नफासत और ट्रेंड बदला या जुड़ा है इसकी अप-टू-ड़ेट रपट नहीं दी जा सकती थी। लिहाजा इसे कभी श्रृंखला 8 के लिए रख छोड़ते है। आज श्रृंखला सात में मैं खुद को ही नंगा कर रहा हूं। दूसरों को तो नंगा या बेनकाब करना तो सरल होता हैं मगर खुद को बेनकाब करना आसान नहीं होता।

वेश्याओं के बारे में जब मैंने जमकर रसीली बातें की हैं तो जरा अपना भी तो रस निकले। इस खबर कहें या रपट कहें या जो नाम दें जिसको मैं आज लिख रह हूं तो इसी के साथ मेरे मां पापा मेरी पत्नी बेटी सहित मेरे सभी छोटे भाईयों और इनकी पत्नी सहित बच्चों को भी पता चलेगा कि बड़े पापा क्या वाकई आदर इज्जत और सम्मान के लायक हैं ? मेरे परिवार के सभी मेरे बड़े पापा चाचा मामा मामी मेरे बड़े भैय्या भाभी और बच्चों समेत मेरी सास मां सहित मेरे भरे पूरे परिवार में भी मेरे इस नंगई का पर्दाफाश होगा कि पत्रकारिता का यह कौन सा चेहरा है ? अपने पाठकों सहित सभी चाहने वालों से यह उम्मीद करता हूं कि वे अपनी नाराजगी ही सही मगर अपने आक्रोश को जरूर जाहिर करें ताकि अगली बार इसी तरह की कोई रिपोर्ट करने के खतरे को भांपकर मैं ठहर जाउं। खुद को रोक लूं या अपने ऊपर काबू कर सकूं कि हर हिम्मत सामाजिक तौर पर सही नहीं होता। मैं अपने समस्त परिचितों से क्षमा मांगते हुए श्रृंखला सात को प्रस्तुत कर रहा हूं। आप चाहें तो कोई टिप्पणी नहीं भी कर सकते हैं क्योंकि कोई भी बहादुरी या सूरमा बनने के लिए जब किसी की सहमति अनुमति नहीं ली है तो फिर कमेंट्स के लिए प्रार्थना क्यों ?

यह घटना 2003 की है। वेश्याओं पर इतनी और बहुत सारे कोण से खबर करने और उनके दुख सुख नियति पीड़ा और दुर्भाग्य को जानने के बाद भी मुझे लगा कि अभी भी इन पर एक कोण से रपट नहीं किया जा सका है, और इसके बगैर इन लिखी गयी किसी भी बात का शब्दार्थ नहीं है। तभी मुझे लगा कि एक ग्राहक बनकर अकेले में उसके हाव-भाव लीला को जाने बिना तमाम किस्तें बेमानी और केवल शब्दों की रासलीला में अपनी चमक दमक दिखाने से ज्यादा कुछ नहीं है। सूरमा बनकर तो बहुतों से बात की और रसीली नशीली बातें करके तो मैं इन कोठेवालियों को भी मुग्ध कर डाला, मगर अपनी असली परीक्षा अब होने वाली थी। बहुत सारे कोठे और वेश्याओं और उनके घर को जानने के बाद भी ग्राहक बन कर कहां चला जाए ? इस समस्या के समाधान के लिए मैंने शाहदरा के एक पोलिटिकल मित्र को साथ चलने के ले राजी किया। इस किस्त को लिखने को लिखने से पहले मैं खास तौर पर शाहदरा में जाकर उसे मिला और नाम लिखने को बाबत पूछा। एक पल में ही सहर्ष राजी होते हुए उसने कहा अरे अनामी भाई जब तुम अपना नाम दे रहे हो तो कहीं पर भी मेरा नाम डाल सकते हो। उसके इस प्रोत्साहन पर मैं एकदम नत मस्तक हो गया तो हंसते हुए मेरा मित्र दर्शनलाल ने कहा कि मेरी पत्नी को मुझसे ज्यादा तुम पर भरोसा है कि जब अनामी भैय्या होंगे तो मैं चाहकर भी बहक नहीं सकता।

अब समस्या थी कि जाए तो कहां जाए ? मेरे मित्र अपने कुछ रंगीन दोस्तों से सलाह मशविरा करने लगा। कईयों ने हम दोनों की खिल्ली भी उड़ाई कि अब कोठा पर जाने का जमाना कहां रह गया है। जब चाहो और जहां चाहो किसी भी जगह कॉलगर्ल आ जाएगी। मैंने कहा कि कॉलगर्ल कहां मिलेगी क्या इसकी जानकारी केवल उसी को है मगर हमें कोठे पर ही जाना है वेश्याओं कहो या रंड़ियों के पास।

हाई फाई मौजी लड़कियों पर कभी काम किया तो बाद में मगर अभी केवल कोठा पर जाना है। मेरे मित्र दर्शनलाल ने कई दिनों के होमवर्क के बाद जीबीरोड के कुछ कोठे का हाल चाल पता लगा लिया। इस पर मैंने उन दो चार कोठे पर नहीं जाने के लिए कहा जहां पर कुछ वेश्याओं ने मुझे गर्भवती बताकर ले गयी थी। दर्शनलाल ने यह कह रखा था कि कमरे में केवल तुम्हें जाना हैं, मैं बाहर बैठकर तब तक आंटियों और खाली लड़कियों को कुछ खिलाउंगा । छत पर जाने के साथ ही एक आंटी सामने थी। मेरे मित्र ने कहा कि यह मेरा दोस्त है और पहली बार यहां आया हैं सो इसकी हिम्मत नहीं हो रही थी तो मैं केवल साथ भर हूं। आंटी निराश सी हो गयी तो मेरे मित्र ने कहा तू उदास क्यों हो रही हैं कीमत से ज्यादा मैं खर्च मैं तुमलोग के साथ चाय पानी पर करूंगा।

मेरे सामने हर तरह की करीब 10 वेश्याएं आकर खड़ी हो गयी। कुछ तो वाकई बहुत सुदंर चपल चंचल तेज और मर्दमार सी ही दिख रही थी। मगर इन्ही भीड़ में ही एक सबसे सामान्य सांवली नाटी और किसी भी मामले में अपनी साथिनों के बीच नहीं ठहरने वाली मायूस और मासूम सी उदास लड़की दिखी। मैंने उसकी तरफ अंगुली कर दी, तो सारी लड़कियां एक साथ ठठाकर हंस पड़ी। दो एक उस लड़की पर कटाक्ष किया अरे वंदना तू भी किसी की पसंद बन सकती है। आंटी मेरी तरफ देखने लगी और बोली हो जाता है हो जाता है तू चाहे तो फिर किसी को पसंद कर ले। मैंने फौरन कहा क्यों ? क्या कमी है इसमें । इसमें जितना सौंदर्य और आकर्षण हैं यहां पर खड़ी और किसी में कहॉ ? सब आंख नाक मुंह और छाती उठाकर अपने को बिकाउ होने का बाजा बजा रही थी। मगर यहां पर यही तो केवल एक इस तरह की मिली जो एकदम शांत और अपने शारीरिक मानसिक सुंदरता का बाजार नहीं लगा रही थी।

आंटी ने 30 मिनट का समय और ढाई सौ रूपये कीमत का ऐलान किया। मेरे दोस्त ने पांच सौ रुपये का एक नोट निकाला और आंटी की गोद में यह कहते हुए डाल दिया कि बाकी रूपये का तुमलोग चाय पानी पी सकती हो। इस पर आंटी तुरंत मुझसे बोल पड़ी कि तू चाहे तो और ज्यादा समय तक भी अंदर रह सकता है। मैं और दर्शनलाल ने एक दूसरे को देखा और मैं अंदर जाने के लिए तैयार हो गया। मेरी पसंद वाली लड़की का उदास चेहरा एकदम खिल सा गया था, और एकदम चहकती हुई मेरा हाथ पकड़कर मेरे साथ एक कमरे में घुस गयी। कमरे में एक सिंगल बेड लगा था,और दीवारों पर कई उतेजक कैलेण्डरों के बीच भगवान शंकर और हनुमान जी के कैलेण्डर टंगे हुए थे। कमरे के बाहर ही मैं अपने जूते उतार दिए थे। कमरे का मुआयना करते हुए मैंने कहा कि यहां पर इन भगवानों के कैलेण्डर क्यों टांग रखी हो ?

इस पर वो खिलखिला पड़ी और चहकते हुए बोली कि यहां के हर कमरे में किसी न किसी भगवान का कैलेण्डर जरूर मिलेगा। मैं भी इस भक्ति पर हंस पडा कमाल है तुमलोग ने तो भगवान को भी अपने गुट के साथ शामिल कर ऱखी हो। छोटे से कमरे में घुसते ही मैं चौकी पर जा बैठा। कमरे में हल्की खुश्बू और रौशनी थी, मगर मेरे बैठने पर वो चौंक सी गयी। अपने हाथ उठाकर कपड़े उतरने के लिए तैयार सी थी। मैंने फट से कहा अरे-अरे अभी रुको जरा। मुझे कोई जल्दी नहीं है। अभी बैठो तो सही मैंने तो अभी तुमको ठीक से देखा तक नहीं है कि तुम उतावली सी होने लगी।

मेरी बात सुनते ही वो हंस पड़ी। अऱे कमरे के भीतर बात नहीं मुलाकात की जाती है। लोग तो साले कमरे के बाहर ही हाथ डाल देते हैं और तुम यहां पर आकर भी सिद्धांत मार रहा है। अरे यार और लोग कैसे होते हैं यह तो मैं नहीं जानता मगर मैं वैसा ही पागल रहूं यह कोई जरूरी है क्या ? वो हंसने लगी तू क्या सोचता हैं कि यहां पर कोई आदमी आता है सारे सिरफिरे बेईमान और पागल ही हम रंडियों को गले लगाने आते हैं। फौरन मैं बोल पडा जैसा कि मैं भी तो एक पागल बेईमान, मूर्ख सिरफिरा और चरित्रहीन एय्याश यहं पर आया हूं। मेरी बातों को काटते हे वह बोल पड़ी नहीं रे तू ऐसा नहीं लगता हैं नहीं तो मुझे कभी पंसद नहीं करता। मेरे को माह दो माह में ही कोई तुम्हारी तरह का पागल ही पसंद करता है या जिसकी जेब में रूपए कम होते हैं। मगर तेरे साथ तो ऐसा कुछ नहीं है फिर भी मुझे क्यों चुना ? मैं उन नौटंकीबाज नखरेवालियों को जानता हूं मगर तू एकदम शांत बेभाव खड़ी थी तो लगा कि तुम अलग हो। बात करते-करते करीब 15 मिनट गुजर गए थे। वो एकाएक व्यग्र सी हो उठी। अब उठो तो बतियाते-बतियते ही समय खत्म हो जाएगी। तो हो जाने दो न फिर कभी आ जाउंगा। मेरी बात सुनकर वो भड़क उठी। साले मैं सुदंर नहीं हूं इस कारण तेरा मन नहीं कर रहा हैं तो तू हमें उल्लू बना रहा है । इस पर मैं हंसते हुए बोला तू पागल है । अब वो पहले से ज्यादा उग्र होकर बोली तो तू कौन सा सही है। तू भी तो पागल ही है कि पैसा खर्च करके रंडी की पूजा करने आया है। मैंने कहा कि तू चाहे जितना बक-बक कर ले मैं 30 मिनट के बाद ही यहां से निकलूंगा। तो 30 मिनट क्यों अभी निकल और दो चार गंदी गंदी गालियों के साथ नपुंसक हिजडा छक्का आदि आदि मुझे तगमा देने लगी।

दो चार मिनट तक शांत भाव से गालियां खाने के बाद मैं फिर बोल पड़ा कहां गयी तेरी गालियां। बस खत्म हो गया स्टॉक। मैंने कहा चल मेरे साथ गाली बकने की बाजी लगा एक सांस में एक सौ गाली देकर ही ठहरूंगा। मेरी बातें सुनकर वो हंसने ली। मेरे मूड को देखकर वो अपने कपड़े ठीक कर ली। मैंने अपने बैग से नमकीन और बिस्कुट के पैकेट निकालकर दिए कि चल खा मेरे साथ। इन सामानों को देखकर वो फिर बमक गयी। साला बच्चा समझता है कि पटाने के लिए ई सब थैला में रखकर घूमता है। ये छैला टाईप के लौंडिया बाज लोग ही करते हैं कि जहां देखे वहीं पटाने या मेल जोल बढ़ाने में लग गए। उसकी बातें सुनकर मैं खिलखिला पड़ा अरे यार तूने तो मेरी आंखें ही खोल दी मैं तो अपने बैग में जरूर कुछ न कुछ सामान अमूमन रखता हूं। इस पर वो हंसते हुए बोली तो तू कौन सा बड़ा ईमानदार है।

मैंने कहा कि ये लो जी आरोप लगाने लगी। फिर बौखलाते हुए बोली कि साला यहां पर आकर अपने आप को पाक दिखाने की कोशिश करना सबसे बड़ी कुत्तागिरी होती है। मैं बाहर जा रही हूं तेरे वश में कुछ नहीं है हरामखोर और रोते हुए कमरे से बाहर निकल गयी। उसके जाने बाद मैं भी बिस्तर पर पालथी मारकर बैठे आसन से उठा और दोनों हाथ ऊपर करके अपने बदन को सीधा किया। दरवाजे पर ही खड़ा होकर जूता पहनकर हॉल की तऱफ बढ़ गया। मेरे को देखते ही आंटी बोली भाग गयी क्या फिर बुलाउं ? मैंने तुरंत कहा नहीं नहीं नहीं नहीं । आंटी भौंचक सी होकर मेरी तरफ देखने लगी। मेरा मित्र भी थोडा अचकचा सा रहा था। मैंने कहा कि तुमलोग चाय पी लिए क्या ? आंटी ने कहा हां जी बेटा इधर आते रहना। मैंने भी आंटी को हाथ जोड़कर नमस्ते की और अपने दोस्त दर्शनलाल के साथ कोठे से बाहर जाने लगा।

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संपर्क - asb.deo@gmail.com

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