व्यंग्य // बाबा बजरंगी // डा. सुरेन्द्र वर्मा

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सुरेन्द्र पटेल की कलाकृति

चलिए आपको एक बाबा के डेरे पर ले चलते हैं। कहने को तो बाबा रमता राम होता है। धार्मिक मेलों में तमाम बाबा लोग आते हैं। और अपने पड़ाव डाल लेते हैं। इन पड़ावों को डेरा कहते हैं। डेरा बाबाओं का अल्प कालीन निवास होता है। लेकिन किसी भी बाबा का यह अल्पकालीन टिकने भर का स्थान कब स्थाई निवास बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे में यह डेरा ‘डेरे’ को मुंह चिढाता है। यह कोई ऐसा-वैसा डेरा नहीं रहता। पूरी एक बसाहट हो जाती है। कई सौ एकड़ की ज़मीन यह घेर लेता है। स्थाई भक्त-गणों के वहां आवास बन जाते हैं। ये स्थाई भक्त और भक्तिनें अपना तन मन धन सभी कुछ बाबा को अर्पित कर देते हैं। बाबा अपने को तो अलौकिक शक्ति से तो संपन्न बताता ही है, वह अपने भक्तों को भी कम से कम भौतिक बल से संपन्न देखना चाहता है। उन्हें आत्मरक्षा की शिक्षा दिलवाई जाती है। राइफल और बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। बाबा की खातिर भक्तों को दूसरों के प्राणों की परवाह न कर बाबा की खिलाफत करने वालों को मारने-मिटाने के लिए तैयार किया जाता है। बाबा स्वयं अपने डेरे में स्थित किसी आलीशान गोह / खोह में रहते हैं। उनतक पहुँचना आसान नहीं होता। लेकिन जिस किसी भक्तिन को चाहते हैं वे अपनी सेवा में ले लेते हैं। अपना धन और मन तो वे पहले ही अर्पित का चुकी होती हैं, बाबा को वे अपना तन भी अर्पित करके धन्य हो जाती हैं। बाबा के तो बस ऐश ही ऐश हैं। बाबा जो ठहरे !

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बाबा का शरीर वज्र सा कठोर है। वे बजरंगी हैं। तरह तरह के करतब दिखाते हैं। किसी से डरते नहीं। बड़े बड़े राजनीतिज्ञ उनकी जेब में रहते हैं। अपने हज़ारों लाखों भक्तों से वो वोट दिलवाते हैं। बाबा का कहा भक्तों के लिए पत्थर की लकीर होता है। बाबा सर्वशक्तिमान है। अजय और अभय है। बाबा जब बुलेट प्रूफ गाढ़ी में निकलता है, तो सौ-पचास कारें उसकी रक्षा के लिए उसके पीछे रहतीं हैं। बाबा की सवारी को भला कौन रोक सकता है ? उसके एश्वर्य के सामने ईश्वर तक ठहर नहीं सकता। ईश्वर का स्वरूप क्या है कोई नहीं जानता, पर जो भी हो वह अपरिवर्तनीय है। बाबा स्वरूप बदलता रहता है और इन बदलते स्वरूपों को हम अपनी नंगी आँखों से देख सकते हैं। बाबा गायक है। बाबा एक्टर है। बाबा की संवाद अदायगी लाजवाब है। बाबा के ह्रदय में प्यार हिलोरें लेता है। अनेकानेक भक्तिनों ने उसका आस्वादन किया है। बाबा लीला दिखाता है। उसकी अदाएं मायावी हैं। बाबा का मारा पानी नहीं मांगता। वह बस गायब हो जाता है, हमेशा के लिए डिलीट कर दिया जाता है। बाबा अहम से फूला फूला फिरता है तो कभी यही बाबा बिलकुल निरीह होकर अदालत के समक्ष हाथ जोड़े खडा देखा जाता है।

हमारे बजरंगी बाबा का यह रेखा-चित्र परम्परागत बाबा से बिलकुल अलग है। हम पिता को बाबा कहते हैं, पिता के पिता को परबाबा कहते हैं। अपने आदि पुरुष को बाबा आदम कहते हैं। बुजुर्गों को बाबा कहते हैं। भिखारियों को बाबा कहते हैं। बच्चों को बेबी तो कहते ही हैं, पर बेबी क्योंकि हिन्दी में स्त्रीलिंग माना गया है, लड़का-बेबी को बाबा कहते हैं। हमारे बजरंगी-बाबा न तो पिता सरीखे हैं न सफ़ेद बालों वाले बूढ़े हैं। न साधु हैं न सन्यासी हैं। भिखारी भी नहीं हैं बच्चा भी नहीं हैं। वे तो अपनी तरह के अकेले हैं। लेकिन आज धर्म के नाम पर उन जैसे बाबाओं की एक होड़ सी लग गई है। जिस डेरे पर हाथ डालो बस ऐसे ही बाबा-लोग मिल जाते हैं। कई पर तो मुकद्दमें भी चल रहे हैं। किया है तो कबतक नहीं भरेंगे !

पचासी का हो चला हूँ। लोग ससम्मान मुझे भी बाबा कहने लगे हैं। कुछ लोग रहम खाकर दादा भी कहते हैं। बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूँ। मेरे मोहल्ले में भी एक ‘दादा’ है। उसका अरमान “नेता” बनने का है। फिलहाल दादा की कोटि तक ही आ पाया है। बजरंगी बाबा के सरीखे बाबाओं के कारनामे देखकर रूह काँप उठती है। पर लोग मानते नहीं। मुझे बाबा या दादा ही कहते हैं। अरे कोई तो समझाओ इन्हें !

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डा. सुरेन्द्र वर्मा ( ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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3 टिप्पणियाँ "व्यंग्य // बाबा बजरंगी // डा. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बाबा आलेख अच्छा है. फिलहाल तो एक ही बाबा का देशभर में चलन है...रामदेव बाबा, उनके पास हर मर्ज की दवा है. पतंजलि से लगता है इन्हें वरदान प्राप्त हो गया है.

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  2. ना ना बाबाओं की किस्म ही अलग होती है। आप तो सदाबहार नाना ही रहेँगे या फिर बच्चों के बाबाजी।हा हा हा हा

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  3. कर्महीनता ही बाबाओ को जन्म देती है,जिसको खुद पर विश्वास नही होता ,वो ही चमत्कार की आशा करता है और बाबाओं के भेष में पाखण्डी लोग इसी चीज का फायदा उठाते है। बहुत अच्छा। लेख है।

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