गुरुवार, 24 अगस्त 2017

रायगढ़ का कथक घराना // डॉ० बलदेव

विजय वेद की कलाकृति
कथक को उसके मूल संस्कार और नये संदभों से जोड़कर उसे पुनः शास्त्रीय स्वरूप में प्रस्तुत करने में रायगढ़ दरबार का महत्वपूर्ण योगदान है। रायगढ़ नरेश चक्रधर सिंह के संरक्षण में कथक को फलने फूलने का खूब अवसर मिला। इस दरबार ने कार्तिक, कल्याण, फिरतू, बर्मन और रामलाल जैसे श्रेष्ठ कथक नर्तक तैयार किये। इसकी अपनी विशिष्ट शैली रही उसी शैली से निखरकर काफी शिष्य कालांतर में तैयार हुए। राजा साहब विशुद्ध कला पारखी थे। वे कला का संबंध आत्म कल्याण के साथ ही जन रूचि के परिष्कार से जोड़ते थे।उन्होंने नित नवीन प्रयोगशील कथक को शास्त्रीय स्वरूप देना चाहा । इसके लिए उन्होंने लखनऊ एंव जयपुर दोनोँ घरानों के आचार्यों का सहयोग आवश्यक समझा ।
नृत्य-संगीत के प्रायः सभी घरानों के गंभीर अध्ययन और विद्वानों के साथ चिन्तन -मनन के पश्चात यह नृत्य शैली रायगढ़ कथक घराना के नाम से 1978 में प्रचारित-प्रसारित की गई ।

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विशेषताएं:-
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रायगढ़ घराने के कथक ने इन दोनों घरानों की मिश्र शैली का नायाब उदाहरण नजर आता है। यहाँ जयपुर जैसी तैयारी है तो लखनऊ जैसा भाव प्रदर्शन और खूबसूरती । यहाँ का ठाठ न तो जयपुर घराने सा बड़ा न लखनऊ सा छोटा। यहाँ हवा में लहराते केतु के प्रतीक त्रिपटाकहस्त का अधिक महत्व है, इसलिए राजा साहब ठाठ की जगह त्रिपटाकहस्त कहना अधिक पंसद करते थे। उस समय जयपुर में विलंबित का काम अधिक होता था । लखनऊ में कम, लेकिन अति विलंबित का यहीं से प्रारंभ हुआ। यहाँ की अति विलंबित लय उस समय 64 मात्राओं तक की होती थी । संकीर्ण, खण्ड, मिश्र, तिश्र एंव पाँच जातियों का प्रयोग यहाँ की खासियत है । चक्करदार परण यहीं की उफज है। रायगढ़ घराने की कथक की सबसे बड़ी विशेषता है - उसका शास्त्र सम्मत होना और शास्त्र का अप्रतिम और अप्रकाशित ग्रंथ है। - नर्तक सर्वस्वम्। इस प्रकार रायगढ़ घराने का कथक अभिनय, समस्त रसों, भावों-अनुभावों से युक्त मुद्राओं से परिपूर्ण है।


दिग्गजों की दस्तक:-
वस्तुतः कथक का देश में आज जो स्वरूप है उसका विकास रायगढ़ दरबार में ही हुआ। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में रायगढ़ में प्रसिद्ध कथकों एंव संगीतज्ञों का आना जाना शुरु हो गया था। यहां चुन्नीलाल, मोहनलाल, सोहनलाल, सीताराम, चिंरजीलाल, झंडे खाँ, और शिवनारायण आदि कथकाचार्य तो राजा चक्रधर सिंह के बचपन में ही आ गए थे। इतना ही नहीं जमाल खाँ, सादिक हुसैन(तबला), चाँद खाँ(सारंगी), करामतुल्ला, कादर बख्श, अनोखेलाल, प्यारेलाल, प्यारे साहब(गायन),ठाकुर दास,मंहत,पर्वतदास(पखावज),आदि संगीतज्ञ भी राजा भूपदेव सिंह के दरबार की शोभा बढ़ाते थे।
राजा भूपदेव सिंह के समय मोहरसाय, घुरमीनदास और सहसराम को पहले-पहल कथक की शिक्षा देने का उपक्रम हुआ। पंडित चुन्नीलाल, शिवनारायण और झंडे खाँ इनके गुरु नियुक्त हुए। कार्तिक राम के चाचा माखनलाल और अनुज के पिता जगदेव माली उस समय इस क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक-नर्तक थे। राजा भूपदेव सिंह की इन पर विशेष कृपा थी। इन्होंने भी कार्तिकराम और अनुजराम के लिए जमीन तैयार की। राजा नटवर सिंह के देहांत के बाद राजा चक्रधर सिंह शासक हुए और शीघ्र ही रायगढ़ संगीत, नृत्य और काव्य का त्रिवेणी संगम हो गया।
शासक की बागडोर संभालते हुए अपना ध्यान कथक और संगीत के विकास पर केन्द्रित किया। उन्होंने शिवनारायण, जगन्नाथ प्रसाद, पं. जयलाल, अच्छन महाराज, शिवलाल, सुखदेव प्रसाद, सुन्दरलाल, हनुमान प्रसाद, झंडे खाँ,लच्छू महाराज, शंभू महाराज, सीताराम, ज्योतिराम, मोतीराम आदि श्रेष्ठ आचार्यों की नियुक्ति की।


घराने का वैशिष्टय:-
रायगढ़ घराने के अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार राजा साहब व्दारा निर्मित नये-नये बोल और चक्करदार परण है। जो नर्तन सर्वस्व, तालतोयनिधि, रागरत्न मंजूषा, मुरजपरण पुष्पाकर और तालबल पुष्पाकर में संकलित है। उनके शिष्य अधिकांशयता उन्हीं की रचनाएं प्रदर्शित करते हैं। यहाँ कड़क , बिजली, दल बादल, किलकिला परण जैसे सैकड़ों बोल, प्रकृति के उपादानों, झरने, बादल, पशु-पक्षी आदि के रंगध्वनियों पर आधारित है। जाति और स्वभाव के अनुसार इनका प्रर्दशन किया जाए तो ये मूर्त हो उठते हैं।
(कार्तिक-कल्याण की जोड़ी की बेमिसाल प्रतिभा को पहचान कर जब दतिया नरेश ने राजा साहब से इन दोनों की मांग की, तो राजा चक्रधर सिंह ने इन्हें अपनी दोनों आँखे बताकर इन्हें कुछ दिन के लिए भी देने से इनकार कर दिया था)

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डाँ बलदेव
श्रीशारदा साहित्य सदन,

श्रीराम कालोनी, जुदेव गार्डन ,

चक्रधर नगर, रायगढ़, छ.ग.

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