गुरुवार, 31 अगस्त 2017

कहानी // एक लेखनी की मौत // स्वराज सेनानी

हेमराज की कलाकृति

सुधाकर अपनी पहली साहित्यिक कृति के प्रकाशन के वक्त, बच्चा पैदा होने जैसे दर्द और कष्ट के सामान अनुभवों से गुज़र रहा था । कविताओं की अपनी पहली पुस्तक प्रकाशित करने की एक अजीब धुन सवार थी। उसे ज़रा भी आइडिया नहीं था कि ये सब कुछ कैसे होगा।

हमेशा की तरह उस ने प्रकाशन पर पैसे बचाने के आर्थिक विकल्प की जगह, बिना परेशानी वाला विकल्प, जो लेखकों को डिजाइन, विपणन और वितरण के लिए सलाह सहित कई विशेष सुविधाएं प्रदान करने वाले महंगे विकल्प को चुनने का दांव खेल डाला । वह प्रिंट में अपनी पुस्तक की कल्पना भी मुश्किल से कर पा रहा था ।

अनेक कठिनाई के साथ जब काम शुरू किया तो केवल 65 पृष्ठों लायक सामग्री ही उस के पास थी लेकिन फिर न जाने कैसे सिर्फ अगले 15 दिनों में 144 पृष्ठों की पुस्तक की सामग्री एकत्र हो गई । उसे बहुत यकीन नहीं था कि वह किसी को अपनी संग्रह के प्राक्कथन के लिए अनुरोध करेगा और कोई आसानी से तैयार भी हो जायेगा । अपने फेस बुक के मित्रों की सूची में से उनकी काव्य योग्यता और सराहनाओं के मद्दे नज़र, कई नाम उसके दिमाग में आये और जैसे तैसे उस के एक मित्र ने उस की मदद करने और ये जोखिम लेने का हौसला कर डाला । समय को गंवाए बगैर एक टेम्पलेट प्रस्तावना उस ने लिख कर भेज दिया। अब वह प्रस्तावना और उनकी प्रतिक्रियाओं का बहुत उत्सुकता से इंतज़ार कर रहा था ।

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जिन से उम्मीद की थी प्रस्तावना लिखने की उन की प्रतिक्रिया ने और थोड़ा मामले को उलझा दिया । उन का ख़याल था कि उन की काबिलियत इस क्षेत्र में नहीं है और इस कारण वह सहज महसूस नहीं कर पा रहे थे । उन्होंने एक बार फिर कोशिश की इस असहज प्रस्ताव से अपने आप को मुक्त करलें लेकिन सुधाकर ने उन्हें आसानी से जाने नहीं दिया । उन का कहना था कि “ मैं आपकी कविताओं की सराहना करता रहा हूँ , लेकिन मैं एक तरह से एक प्रस्तावना लिखने के लिए अपने आप को सर्वथा अयोग्य समझता हूँ “। वास्तव में यह एक महान सम्मान की बात है लेकिन फिर भी मैं अपने आप को इस योग्य नहीं समझता हूँ और पशोपेश में पाता हूँ” । बड़ी कठिनाई के साथ यह मसला सुलझा वैसे भी सुधाकर बाक़ी की सारी तैयारी कर चुका था और शीघ्र ही उन्हें पांडुलिपि प्रकाशक को भेजनी थी अगर प्रस्तावना लिखने वाला कोई नहीं होता तो किसी अन्य को राजी करने में और भी वक्त लगता और दरअसल वक्त ही तो सुधाकर के पास नहीं था । अब सुधाकर का धैर्य जवाब देने वाला था। वह चाहता था जैसे - तैसे किताब प्रकाशक तक पहुँच जाए ताकि आगे के कार्य सम्पादित किये जा सकें । वह अब इस से कम और अधिक कुछ भी नहीं चाहता था।

स्काईप का उपयोग कर वर्तनी की अशुद्धियों को दुरुस्त किया गया और कुछ वाक्यों में रद्दोबदल भी किए गए और प्रस्तावना के स्वरूप पर सहमति हो गई । वह दिन भी आ गया जब पांडुलिपि प्रकाशक को भेज दी गई ।

सुधाकर को तैयार पांडुलिपि पर सभी प्रकार का संदेह था; सामग्री प्रकाशन के योग्य थी भी कि नहीं? या वह एक भावनात्मक मूर्ख तो नहीं बन रहा है जो अपने परिवार और विरासत के बारे में बहुत ज्यादा सोच रहा था। जब कि इन दिनों कोई भी लोग अपने अतीत, माता-पिता और परिवार के इतिहास के बारे में ज्यादा भावनात्मक नहीं होते हैं। अब तो केवल पैसे से सभी का जुड़ाव है । पैसा लगा कर , अपने पैसे की वापसी तथा परिवार की महिमा, प्रतिष्ठा बहाल करने की कोशिश तथा परिवार के सदस्यों में भावनात्मक जुड़ाव की उम्मीद कोई भावनात्मक मूर्ख ही कर सकता था और उस ने यह जोखिम ले डाला था । पांडुलिपि भेजने के बाद बहुत मुश्किल समय था, कम नींद आती थी और रातें करवटों में कट जाती थीं. वह दिन भी आ गया जब उस ने कई बार मोल भाव करने के बाद किताब की छपाई से पहले प्रकाशक को भुगतान की अंतिम किस्त अंततः भेज दी ।

कल किताब प्रेस में चली जायेगी और उस के बाद यह वेब पर होगी और हर जगह लोग स्टालों पर उसे देखेंगे , दूर से देखेंगे, हाथ में लेकर पुस्तक का ब्लर्ब और लेखक का बायो पढेंगे और न जाने उन की क्या प्रतिक्रिया होगी। उसका दिल इन सवालों से भरा हुआ था और नींद का आंखों में कहीं दूर तक पता नहीं था। वह रात भर नींद के क्षणों के अलावा करवटें बदलता रहा । पुस्तक के बारे में उस की चिंता और उस की किस्मत सब शक के दायरे में थे । यहाँ मसला सिर्फ किताब का नहीं था लेकिन किताब के रूप में अगर अपने पूरे जीवन की विश्वसनीयता और उसकी साख दांव पर लगी हुई थी।

इन भावों में डूबते उतारते न जाने कब उस की आँख लग गई।

उसने अपने आप को पानी के एक पूल में पाया और देखा कि वह डूब रहा था। उस ने प्रयास किया कि वह पानी से बाहर आ जाए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ जोर से धड़का और एक धमाके के साथ एक कष्टदायी दर्द सीने के एक छोर से दूसरी छोर तक जैसे उस चीर कर निकल गया। एक झटके के साथ उस की चेतना खो गई। अब वह एक भावना विहीन स्थिति में अपने शरीर से बाहर निकल रहा था। वह विचारों और भावनाओं के लिए अभेद्य हो चुका था, वह बहुत हल्का होकर अपने नश्वर शरीर से परे हवा में तैरता हुआ आकाश में विलीन हो गया ।

अब भावनात्मक और भौतिक दुनिया और अपनी पुस्तक के साथ उस के सभी संबंध समाप्त हो चुके थे । पुस्तक की रिलीज और उस के भाग्य की प्रासंगिकता भी उस के लिए खत्म हो गई थी।

---स्वराज सेनानी

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