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रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 10 रैवन आग कैसे ले कर आया? // सुषमा गुप्ता

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रैवन जैसा आज दिखायी देता है वह पहले से ही ऐसा नहीं था। पहले वह बहुत सुन्दर था। पर वह ऐसा कैसे हुआ यह कहानी यही बताती है।

शुरू शुरू में दुनिया एक बहुत ही अँधेरी और ठंडी जगह थी। रोशनी केवल सूरज से ही मिलती थी पर वह ज़्यादा समय तक रुकती नहीं थी। उन दिनों लोग रात में ठंडे रहते थे और बहुत सारे लोग तो कड़ी ठंड में बेचारे ज़िन्दा भी नहीं रह पाते थे।

उस समय जानवरों की आज जैसी शक्ल भी नहीं थी। इस शक्ल में तो वे बहुत बाद में आये। उन दिनों जानवर भी आदमी की ही शक्ल के हुआ करते थे। आदमी और जानवर एक साथ शान्ति से मिल जुल कर रहते थे और उन दिनों वे सब बनाने वाले भी हुआ करते थे।

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इस ठंड की परेशानी से बचने की कोई तरकीब निकालने के लिये जानवरों ने जानवरों की एक मीटिंग बुलायी। इस बात पर तो सभी तैयार हो गये कि इसके लिये कुछ करना चाहिये पर क्या करना चाहिये इस पर वे सब एक राय नहीं हो पाये।

काफी बहस के बाद यह तय पाया गया कि कोई सूरज के पास जाये और उससे धरती के आदमियों के लिये आग ले कर आये। अब सवाल केवल यह था कि इस काम के लिये जाये कौन?

वे जानवरों के घेरे के चारों तरफ यह पता करने के लिये घूमे कि सूरज के पास कौन जायेगा।

अब क्योंकि जाड़ा आ गया था तो भालू तो इस काम को करने के लिये बहुत थका हुआ था। भेड़िये को यह पता था कि अगर वह चला गया तो उसके पीछे आदमियों की रखवाली कौन करेगा।

गिलहरी इस काम को करने के लिये बहुत चंचल थी और साँप तो कुछ ले कर जा ही नहीं सकता था। मोर अपने आप में ही मग्न था और उसे लगता था कि इस काम को करने में कहीं उसके सुन्दर पंखों को कोई नुकसान न पहुँचे।

रोबिन और रैन दोनों चिड़ियें इस काम को करने के लिये बहुत छोटी थीं। सो घूमते घूमते वे रैवन के पास आये और वह उनका यह काम करने के लिये तैयार हो गया।

उन दिनों रैवन ऐसा नहीं दिखायी देता था जैसा कि आज दिखायी देता है। उसकी चोंच सीधी थी, उसके पंखों का रंग इन्द्रधनुषी था और वह बहुत सुरीला बोलता था। उसकी मीठी बोली से बहुत सारी चिड़ियाँ उससे जलतीं थीं।

अब जब यह तय हो गया कि कौन इस काम को करेगा तो अब यह तय करना बाकी रह गया कि यह काम होगा कैसे?

रैवन ने इस काम के लिये अपने चारों तरफ औजार देखे तो उसे कुछ सूखी डंडियों के अलावा कुछ और दिखायी नहीं दिया। उसने उनमें से एक सबसे लम्बी सूखी डंडी उठायी और उसको ले कर सूरज की तरफ उड़ चला।

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वह तीन दिन और तीन रात तक उड़ता रहा। आखिर में जब वह सूरज के पास पहुँचा तो उसने वह सूखी डंडी सूरज की तरफ कर दी और उसमें से धुँआ निकलने लगा।

रैवन ने अपने पंख जरा से ही फड़फड़ाये थे कि डंडी ने आग भी पकड़ ली। डंडी के आग पकड़ते ही रैवन तुरन्त धरती की तरफ लौट पड़ा।

आग से जलने की वजह से वह डंडी धीरे धीरे छोटी होती जा रही थी और उससे उठता हुआ धुँआ रैवन के दिल में घुसता जा रहा था जिससे उसे देखने में बहुत मुश्किल हो रही थी।

आग अब उसके पंखों के पास तक आ रही थी। उसने उसकी चोंच भी जला दी थी। आखिर वह धरती पर आ गया और उसने वह जलती हुई डंडी लोगों को दे दी।

आग से जलती डंडी तो उन्होंने ले ली पर वे रैवन की तरफ तो बस देखते ही रह गये। उसकी सुन्दरता और मीठी आवाज दोनों ही चली गयी थीं।

वह तो एक काली भर्राई हुई आवाज वाली चिड़िया को देख रहे थे। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि वे उससे क्या कहें या उसके लिये क्या करें। इसलिये उन्होंने उसको तो छोड़ दिया और आग जलाने में लग गये।

आग के आने की खुशी में एक बहुत बड़ी दावत का इन्तजाम किया गया। लेकिन जब रैवन खाना खाने के लिये मेज पर आया तो किसी ने उसको मेज के पास भी नहीं आने दिया। उन्होंने उसके सामने बचा हुआ खाना फेंक दिया।

रैवन को यह देख कर बहुत दुख हुआ कि उसने जिन लोगों की इतनी सहायता की वे ही लोग उसके साथ ऐसा बरताव कर रहे थे। दुखी हो कर वह वहाँ से जंगल की तरफ चला गया और बहुत दिनों तक वहाँ अकेला घूमता रहा।

जब वह जंगल में अन्दर की तरफ जा रहा था तो उसे एक आवाज सुनायी पड़ी "रैवन, रैवन"।

रैवन ने पहले तो उस आवाज को अनसुना कर दिया पर उस आवाज ने फिर कहा "रैवन, सुनो तो।"

तो रैवन बोला - "तुम मुझसे क्या चाहते हो? मेरे पास तुम्हें देने को कुछ नहीं है।"

वह आवाज फिर बोली - "रैवन, जो कुछ तुमने किया वह भला काम था।" अब रैवन को लगा कि वह आवाज तो "दुनिया बनाने वाले" की आवाज थी।

रैवन बोला - "वह भला काम होगा जिसके लिये भी होगा पर मुझे देखो। मैं तो रात की तरह काला हो गया। और मेरी आवाज को देखो, क्या हो गया है उसको, कितनी भर्रा रही है। और लोगों ने भी मुझसे किनारा कर लिया है।"

उस आवाज ने फिर कहा - "मैं इसी सबके बारे में सोच रहा था ताकि लोग तुम्हारे इतने बड़े काम को भूल न पायें।

अब मैं तुमको तुम्हारी पहले वाली शक्ल नहीं दँूगा। तुम आज से इसी शक्ल में रहोगे - काला रंग, भर्राई हुई आवाज और तुम हमेशा खाना ढँूढते रहोगे ताकि लोग तुम्हारे इतने बड़े काम को याद रखें।

पर त़ुम्हारे पंख काले होने के बावजूद तुम्हारा पहला रूप दिखाने के लिये इन्द्रधनुष के रंगों की झलक मारते रहेंगे।

तुम्हारी आवाज में एक ऐसी चिल्लाहट होगी जो आदमी को कँपकँपा देगी और वह याद रखेगा कि उसने तुम्हारे साथ क्या किया था। तुम्हारा माँस कड़वा रहेगा ताकि लोग तुम्हारे शिकार की खोज में भी न निकलें।"

और इस तरह लोगों को आग मिली और इसी लिये रैवन आज ऐसा दिखायी देता है। उसकी आवाज भी इसी लिये इतनी भर्रायी हुई है और उसको इसी लिये कोई मारता भी नहीं और खाता भी नहीं।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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