बुधवार, 13 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 14 शुरू शुरू में // सुषमा गुप्ता

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पानी लाने की एक और लोक कथा। यह पिछली कहानी "रैवन पानी ले कर आया" से काफी मिलती जुलती है।

शुरू शुरू में इस दुनिया में कुछ भी नहीं था सिवाय कोमल अँधेरे के, रैवन की दिल की धड़कन के और उसके पंखों की फड़फड़ाहट की आवाज के। और वह अँधेरा भी धरती की सतह तक पहुँचा हुआ था। और उस घने अँधेरे के नीचे था बरफीला ठंडा काला समुद्र और समुद्र का तंग किनारा।

मगर आदमी लोग भी जल्दी ही समुद्र के किनारे आ कर रहने लगे। पर रैवन उन बेचारे बीमार लोगों के लिये बहुत दुखी था जिन्होंने कभी धूप ही नहीं देखी थी।

वे लोग केवल गिरियाँ और पत्ते खा कर ही ज़िन्दा रहते थे और पानी की जगह ऐल्डर पेड़ की जड़ कूट कर उसका रस पीते थे।

रैवन ने सोचा कि उसको उनकी कुछ सहायता करनी चाहिये।

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वह "गा गा गा" करता हुआ उड़ कर जमीन पर आया और उसने लोगों को इकठ्ठा किया। वे सारे लोग घने अँधेरे में भूत की तरह दिखायी दे रहे थे, पीले और साये जैसे।

सब बोले - "रैवन आ गया। रैवन आ गया। यह रैवन ही है जो सब चीज़ें ठीक कर सकता है।" सारे लोग उसको देख कर बहुत ही उत्साहित हो उठे कि देखें अब रैवन क्या करता है।

रैवन ने ऐल्डर पेड़ की एक शाख तोड़ी और उसके पत्ते एक गड्ढे के पानी की सतह पर बिखेर दिये। पत्तियाँ जल्दी ही पानी में नीचे चली गयीं और पानी में बुलबुले उठने लगे।

जब पानी काफी गरम हो गया तो पानी की सतह साफ हो गयी और उस पर मछलियाँ तैर गयीं। इस तरह रैवन ने लोगों को खाने के लिये मछलियाँ दीं।

अब जब लोगों को मछली खाने को मिल गयी थी तो उनको पहले के मुकाबले में ज़्यादा प्यास लगने लगी।

उन्होंने फिर रैवन को बुलाया तो रैवन आया। लोगों ने उसको अपनी परेशानी बतायी और कहा - "अब रैवन आ गया है अब वह सब कुछ ठीक कर देगा।"

रैवन को मालूम था कि मीठे पानी का दुनिया भर में केवल एक ही सोता है और गनूक नाम के आदमी ने उसके चारों तरफ अपना घर बना रखा है। वह उसमें से किसी को भी पानी नहीं लेने देता।

रैवन ने सोचा मैं उसके घर जाता हूँ मैं खुद भी पानी पी कर आता हूँ और इन लोगों के लिये भी थोड़ा पानी ले कर आता हूँ। सो वह उसके घर चल दिया।

गनूक ने जब रैवन को आते देखा तो उसको घर के अन्दर बुलाया और उसको इज़्ज़त से घर में बिठाया। रैवन मीठी आवाज में उससे बातें करने लगा। जल्दी ही उसने कहा कि उसे प्यास लग रही है उसको थोड़ा पानी चाहिये।

गनूक बोला ठीक है और उसने उसको वह सोता दिखा दिया जिसमें से बिल्कुल साफ पानी निकल कर आ रहा था। रैवन उधर पानी पीने चला तो गनूक बोला - "सारा पानी मत पी लेना तुम्हें तो मालूम है कि दुनिया भर में केवल यही एक मीठे पानी का सोता है।"

रैवन को भी यह पता था और इसी लिये वह यहाँ आया था फिर भी उसने कहा - "नहीं मैं सारा पानी नहीं पियँूगा बस केवल एक घँूट।"

पर जब उसने पानी पीना शुरू किया तो वह तो काफी पानी पी गया।

गनूक यह देख कर चिल्लाया - "रुक जाओ रैवन। क्या तुम पानी का सारा कुँआ ही खाली कर दोगे?" रैवन तो सच में यही करने जा रहा था पर यह सुन कर वह वहाँ से चला आया और आग के पास आ कर आराम से बैठ गया।

वह गनूक से बोला - "गनूक मैं तुमको एक कहानी सुनाता हूँ।" रैवन ने गनूक को चार बेवकूफ भाइयों की एक लम्बी सी बेवकूफी भरी कहानी सुनायी जिसमें वे एक लम्बी यात्रा पर गये थे।

जैसे जैसे उसकी कहानी आगे बढ़ती गयी वह उसमें बहुत बेकार की चीज़ें जोड़ता गया जिससे गनूक को नींद सी आने लगी। उसकी ऑखें झपकने लगीं। यह देख कर रैवन ने अपनी आवाज धीमी और और धीमी कर ली। धीरे धीरे गनूक सो गया।

उसको सोता देख कर रैवन तुरन्त वहाँ से उठा और पानी के सोते तक आया और अपनी चोंच उसके अन्दर डाल दी।

जैसे ही पानी सटकने के लिये उसने अपना सिर ऊपर उठाया गनूक सोते में बोला - "हाँ हाँ अपनी कहानी चालू रखो मैं सुन रहा हूँ। मैं सोया नहीं हूँ।"

फिर उसने अपना सिर हिलाया, पलकें झपकायीं और बोला - "अरे तुम कहाँ हो रैवन? क्या कर रहे हो?"

रैवन बोला - "मैं यहीं हूँ जरा घूम रहा था।"

और फिर उसी आवाज में उसको कहानी सुनाते सुनाते फिर उसी पानी के सोते के पास चला गया। जैसे ही गनूक को कहानी कान में सुनायी पड़ी वह फिर खर्राटे मारने लगा।

रैवन कहता जा रहा था - "सो वे चारों आगे चलते गये चलते गये, पहाड़ों के ऊपर। हवा उनके चारों तरफ भारी हो गयी थी, कोहरा उनको घेरे जा रहा था, आगे कोहरा पीछे कोहरा, नीचे कोहरा ऊपर कोहरा।" और गनूक ने फिर से खर्राटे मारने शुरू कर दिये थे।

रैवन ने उस सोते का सारा पानी पी लिया लेकिन जैसे ही उसने पानी का आखिरी घँूट गटकने के लिये अपना सिर उठाया कि गनूक उस पर कूद पड़ा और देखा कि वह क्या कर रहा था।

यह देख कर रैवन भागा।

वह चिल्लाया - "तुम क्या सोचते हो कि तुम मुझे कहानी सुना कर और सुला कर मेरा पानी चुरा सकते हो? मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दँूगा।" उसने पास में पड़ा अपना डंडा उठाया और रैवन का पीछा करना शुरू कर दिया।

रैवन कुछ पग दौड़ता, फिर अपने बड़े बड़े पंख फड़फड़ाता, फिर कुछ इंच ऊपर उड़ता। फिर एक बार वह ज़ोर से उड़ा और चिमनी के रास्ते बाहर निकलने चला पर वह इतना सारा पानी पी गया था कि वह चिमनी में ही फँस गया। पर फिर भी वह वहाँ से बाहर निकलने की कोशिश करता ही रहा।

यह देख कर गनूक चिल्लाया - "ओ टेढ़ी ऑख वाले रैवन, अब तू भाग नहीं सकता। मैंने तुझे पकड़ लिया है, ओ चोर।"

यह कह कर गनूक ऐल्डर पेड़ के हरे हरे लठ्ठे ले आया और उनको चिमनी में नीचे रख कर उनमें आग लगा दी।

वे हरी लकड़ी के लठ्ठे थे, जल तो सकते नहीं थे सो उनमें से धुँआ निकलना लगा। वह धुँआ चिमनी में ऊपर चढ़ने लगा जिससे रैवन का दम घुटने लगा।

रैवन वहीं अटका रहा और वहाँ से निकलने की कोशिश भी करता रहा। आखिर किसी तरह वह वहाँ से निकल गया और आसमान में उड़ गया।

इतना सारा पानी पीने के बाद वह इतना भारी हो गया था कि उससे सीधा नहीं उड़ा जा रहा था। वह टेढ़ा मेढ़ा उड़ रहा था।

जैसे जैसे वह उड़ रहा था वह अपने पीछे पानी की धारा छोड़ता जा रहा था। जहाँ जहाँ वह पानी की धारा छोड़ रहा था वहाँ वहाँ नदियाँ बनती जा रहीं थीं।

क्योंकि रैवन टेढ़ा उड़ रहा था और पानी भी टेढ़ा ही जमीन पर गिर रहा था सो नदियाँ भी टेढ़ी ही बह रहीं थीं। जहाँ कहीं पानी छोटी छोटी बँूदों में गिरा वहाँ वहाँ तालाब आदि बन गये।

इस तरह रैवन आदमियों के लिये ताजा पानी ले कर आया पर उसके शरीर पर उस चिमनी का दाग फिर भी बना रहा। वह गनूक के पास एक बड़े सफेद बरफीले रंग के पक्षी के रूप में गया था पर जब वहाँ से लौटा तो रात के अँधेरे की तरह काला था।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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