रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 16 रैवन ने आदमियों को मारा // सुषमा गुप्ता

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वैसे तो अलास्का के लोगों में रैवन की चालाकी और धोखे से दूसरे जानवरों को मारने की कई लोक कथाएँ कही सुनी जाती हैं पर रैवन की यह लोक कथा एस्किमो लोगों की कुछ लोक कथाओं में से एक ऐसी लोक कथा है जिसमें वह आदमियों के साथ चालाकी खेलता है, उन्हें मारता है और खाता है।

यह कहानी इससे पहले वाली कहानी "रैवन की पहले आदमी से मुलाकात" से बिल्कुल उलटी है। कहते हैं कि बहुत पहले की बात है जब रैवन आदमियों को खाया करता था क्योंकि उनको धोखा देना आसान था।

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एक बार वह आर्कटिक समुद्र के ऊपर उसके किनारे किनारे उड़ रहा था कि उसने एक गाँव देखा। उसको बहुत भूख लगी थी सो उसने वहाँ से खाना लेने का विचार किया।

वह उस गाँव के ऊपर थोड़ा सा नीचे की तरफ उतरा और चिल्लाया - "तुम्हारे दुश्मन आ रहे हैं। तुम्हारे दुश्मन आ रहे हैं।"

यह सुन कर सारे लोग अपना अपना भाला ले कर अपने अपने इगलू से निकले और रैवन से पूछा कि दुश्मनों से निपटने के लिये उनको क्या करना चाहिये।

रैवन एक ऊँची पहाड़ी पर बैठ गया और उनसे बोला - "इस से पहले कि वे तुम्हारे गाँव तक पहुँचें तुमको उन पर हमला बोल देना चाहिये। अभी तुम लोग जाओ ओर उस पहाड़ी की तलहटी में अपने डेरे डाल लो और सुबह तक उनके आने का इन्तजार करो।"

रैवन की चाल से बेखबर गाँव के आदमियों ने रैवन को धन्यवाद दिया और पहाड़ी की तलहटी की तरफ दुश्मनों का मुकाबला करने के लिये चल दिये जैसा कि रैवन ने कहा था।

वहाँ पहुँच कर उन्होंने अपने अपने डेरे लगाये और सुबह के लिये दुश्मन को मारने की योजना बनाने लगे। कुछ देर बाद उन्होंने अपने सील मछली के तेल से जलने वाले लैम्प बुझाये और सो गये।

जब सब जगह अँधेरा हो गया और सभी लोग सो गये तो रैवन उड़ा और उस पहाड़ी की एक चोटी से निकली बरफ की एक बहुत बड़ी सी शाख पर जा कर बैठ गया

पर उसने देखा कि बरफ की वह शाख उसका बोझ नहीं सह पायेगी और जरा से झटके में टूट सकती थी सो वह वहाँ से उस शाख पर दो तीन बार कूदा।

वह शाख कमजोर तो थी ही रैवन के दो तीन बार कूदने पर ही टूट गयी और सारा का सारा बरफ उन सोते हुए आदमियों के ऊपर गिर पड़ा। वे सारे आदमी उस बरफ में दब गये और मर गये।

बरफ बहुत ज़्यादा थी और रैवन क्योंकि आलसी था इसलिये वह इतनी सारी बरफ उसी समय खोद कर उन आदमियों को अपने खाने के लिये निकालना नहीं चाहता था, सो वह वसन्त आने का इन्तजार करता रहा ताकि तब तक सब बरफ पिघल जाये और वह उन आदमियों को खा सके।

धीरे धीरे वसन्त आया और बरफ पिघली। रैवन बहुत खुश था कि अब की बार उसको इतना सारा माँस खाने को मिलेगा। उसको अपने शिकार की पहले ऑख फोड़ना और फिर ऑखें निकाल कर खाना बहुत अच्छा लगता था।

सारे वसन्त वह वहीं उस पहाड़ी के आस पास ही रहा ताकि वह अपने उन शिकारों की रक्षा कर सके जो उसकी चाल में आ गये थे।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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