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रैवन की लोककथाएँ - 1 - 2 : रैवन की नाक // सुषमा गुप्ता

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2 रैवन की नाक

बच्चों तुमने यदि कभी ध्यान से देखा हो तो रैवन पक्षी की नाक ऐसी लगती है जैसे उसको तोड़ कर उसके चेहरे पर दोबारा चिपकाया गया हो। तुमने ठीक पहचाना। उसकी नाक वाकई टूट गयी थी और उसको वाकई वहाँ दोबारा चिपकाया गया है।

कैनेडा के लोग इसकी ठीक ठीक वजह जानते हैं कि ऐसा कैसे हुआ। आज वही वजह हम तुमको बताते हैं कि तुमको भी ऐसा क्यों लगता है।

वे कहते हैं कि एक बार कुछ लोग समुद्र में मछली पकड़ने के लिये जाल बिछाये बैठे थे पर उनके जाल में कोई मछली ही नहीं फँस रही थी।

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एक रात जब वे अपनी अपनी मछलियों के काँटों पर पहरा दे रहे थे तो उनमें से एक आदमी के काँटे को एक झटका सा लगा।

यह झटका उसको इसलिये लगा था क्योंकि रैवन उस काँटे में से मछली का चारा खाने की कोशिश कर रहा था। उस झटके को महसूस करके उसने अपने काँटे को कुछ और झटका दिया तो इस झटके से रैवन की नाक उस मछली के काँटे में फँस गयी।

रैवन तब मछली के काँटे में लगा चारा खा रहा था कि तभी उस मछियारे ने अपना काँटा ऊपर खींच लिया।

रैवन को इतना भी समय नहीं मिल सका कि वह अपनी नाक उस काँटे से बाहर खींच सकता। पर वह यह भी नहीं चाहता था कि उसको ये मछियारे पकड़ लें इसलिये उसने अपने आपको उस जाल से खींच लिया और इस खींचने में उसकी नाक टूट गयी।

जब उस आदमी ने वह काँटा ऊपर खींचा तो लोगों ने देखा कि उसके काँटे में तो किसी की नाक लगी हुई है पर वह किसकी नाक थी यह कोई नहीं बता पाया।

वे लोग उस नाक को निकाल कर अपने सरदार के पास ले गये और यह जानने की कोशिश की वह नाक किसकी हो सकती थी।

उनका सरदार एक अक्लमन्द और अमीर आदमी था पर वह भी यह नहीं बता सका कि वह नाक किसकी थी। वहाँ और भी लोग बैठे थे पर उनमें से भी कोई यह नहीं बता सका कि वह नाक किसकी थी।

इधर रैवन ने मिट्टी की एक नाक बनायी और उसको अपने चेहरे पर लगा लिया। फिर उसने अपना टोप पहना और उसको थोड़ा नीचे की तरफ खिसकाया और उसी गाँव में आ गया जिसमें उसकी नाक थी।

वह एक घर में गया तो लोगों ने कहा - "तुम कौन हो? तुम तो इस गाँव में कोई अजनबी लगते हो।"

रैवन बोला - "हाँ, मैं इस गाँव में अजनबी ही हूँ। मैं यहाँ एक दूसरी जगह से आया हूँ।"

उन्होंने उससे फिर पूछा - "भाई, तुम कौन से देश से आये हो और तुम यहाँ किसलिये आये हो?"

रैवन बोला - "मैं यहाँ एक दूर देश से आया हूँ क्योंकि मैंने सुना है कि तुम लोगों ने समुद्र में से कोई ऐसी चीज़ पकड़ी है जिस को तुममें से कोई भी नहीं पहचान पा रहा है। मैं उसी अजीब चीज़ को देखने के लिये यहाँ आया हूँ।"

लोग बोले - "हाँ भाई पकड़ी तो है पर वह हमारे सरदार के पास रखी है। चलो वहीं चलते हैं।"

सो वे लोग रैवन को अपने सरदार के घर ले गये। सरदार ने रैवन को वह नाक दिखायी और उससे पूछा कि क्या वह उसे पहचानता है?

रैवन ने उसे अपने हाथ में उठा कर खूब उलट पलट कर देखा और उस पर अपना आश्चर्य भी प्रगट किया कि वह क्या हो सकती थी।

फिर जैसे ही लोगों का ध्यान बँट गया तो वह उसे ले कर घर की चिमनी के रास्ते ऊपर उड़ गया और उसको अपने चेहरे पर लगा लिया। इसी लिये रैवन की नाक पर एक निशान है जिससे ऐसा लगता है जैसे वह नाक वहाँ पर दोबारा लगायी गयी हो।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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