शनिवार, 9 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 3 - रैवन क साहस // सुषमा गुप्ता

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3 रैवन का साहस

यह कहानी इससे पहले वाली कहानी "रैवन की नाक" जैसी ही है। उस कहानी में उसको अपनी नाक मिल जाती है और इस कहानी में इसको अपनी चोंच मिल जाती है।

इन्नु बहुत सुन्दर मूर्तियाँ बनाता था, आदमियों की¸ जानवरों की, चिड़ियों की, मछलियों की, देवताओं की। फिर उनको वह बहुत चमकीले रंगों में रंगता था।

टोटम पोल बनाने के लिये वह ऊँचे ऊँचे सीडर पेड़ चुनता जिनमें वह अपनी पुरानी सभ्यता दिखाता था और जिनसे पीढ़ी दर पीढ़ी लोग अपनी सभ्यता को देखते और जानते रहते थे।

ऐसे ही एक टोटम पोल पर उसने एक बहुत सुन्दर रैवन बनाया पर उसकी चोंच नहीं थी। ऐसा कैसे हुआ इस की भी एक कहानी है।

अब रैवन अलास्का की कोई मामूली चिड़िया तो थी नहीं। उसके पास बहुत खास ताकतें थी।

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वह कोई भी शक्ल ले सकता था। वह चिड़िया से आदमी की भी शक्ल ले सकता था, और न केवल वह उड़ सकता था या चल सकता था बल्कि वह पानी में किसी भी मछली से ज़्यादा तेज़ तैर भी सकता था।

तो अपनी इसी ताकत का इस्तेमाल करते हुए एक दिन रैवन ने एक झुकी हुई कमर वाले बूढ़े का रूप रखा और जंगल में चल दिया। उसकी लम्बी सफेद दाढ़ी थी और वह बहुत धीरे धीरे चल रहा था।

कुछ देर चलने के बाद रैवन को भूख लग आयी। जैसे ही उसने यह सोचा कि उसको भूख लगी है उस समय वह समुद्र के किनारे वाले जंगल के दूसरे किनारे पर एक गाँव के पास खड़ा था। वहाँ बहुत सारे लोग मछली पकड़ रहे थे।

तुरन्त ही रैवन के दिमाग में एक तरकीब दौड़ गयी। वह समुद्र में कूद गया और तैरता हुआ उस जगह तक आ गया जहाँ लोगों ने पानी में अपने अपने मछलियाँ पकड़ने के जाल डाल रखे थे।

वहाँ जा कर वह उनके मछली के काँटों में से मछली के लिये लगा हुआ चारा खाने लगा। जब भी वह किसी काँटे से चारा खाता हर आदमी अपने काँटे में एक झटका सा महसूस करता।

झटका महसूस होने पर जब वह मछियारा अपना काँटा खींचता तो न तो उसे उसमें कोई मछली दिखायी देती और न ही कोई चारा।

रैवन अपनी यह चाल कई बार खेलता रहा। एक बार एक बहुत ही होशियार मछियारा हुस्काना ने जब यह झटका महसूस किया तो उसने अपने काँटे को तुरन्त ही ज़ोर से खींच लिया।

इत्तफाक से रैवन को काँटा छोड़ने का बिल्कुल भी समय नहीं मिला और वह उसी काँटे में अटका रह गया।

मछियारे ने महसूस किया कि उसका काँटा भारी था। रैवन ने अभी भी काँटे को मुँह से पकड़ रखा था। हुस्काना काँटे को अपनी तरफ खींच रहा था और रैवन उसको अपनी तरफ खींच रहा था।

अपने को रोके रखने के लिये उसने समुद्र की तलहटी में पड़ी एक चट्टान को पकड़ लिया और फिर चिल्लाया - "ओ चट्टानों, मुझे बचाओ मेरी सहायता करो।" पर चट्टानों ने उसकी आवाज नहीं सुनी।

रैवन को बहुत दर्द था सो उसने अपने जबड़े से कहा - "छूट जा ओ जबड़े छूट जा, मैं बहुत थक गया हूँ।" जबड़े ने उसकी सुन ली और वह छूट गया।

हुस्काना ने भी तुरन्त ही अपना काँटा खींच लिया। उसने देखा कि उस काँटे में तो एक आदमी का जबड़ा लगा हुआ है और उस जबड़े के साथ ही लगी थी एक सफेद दाढ़ी।

वह और उसके साथी मछियारे तो उसे देख कर बहुत ही डर गये क्योंकि उन सबको लगा कि वह किसी बुरी आत्मा का जबड़ा है। उसको देख कर वे सब तुरन्त ही वहाँ से भाग खड़े हुए और सीधे अपने सरदार के पास पहुँचे।

रैवन भी तुरन्त पानी में से बाहर निकला और उन मछियारों के पीछे पीछे दौड़ा। अपना जबड़ा टूट जाने की वजह से हालाँकि उसको बहुत दर्द हो रहा था फिर भी किसी ने उसके ऊपर यह ध्यान नहीं दिया कि उसके तो जबड़ा ही नहीं है क्योंकि उसने अपने चेहरे का निचला हिस्सा कम्बल से ढक रखा था।

मछियारे जब सरदार के पास पहुँचे और उन्होंने उसको सारी कहानी सुना कर वह जबड़ा दिखाया जो अभी भी मछली के काँटे में लगा हुआ था तो सरदार और वहाँ बैठे सारे आदमी उसको देख कर आश्चर्य में पड़ गये।

वह जबड़ा पहचाने जाने के लिये एक के हाथ से दूसरे के हाथ में जाता रहा पर कोई उसको पहचान ही नहीं सका कि वह किसका जबड़ा था।

और आखीर में वह जबड़ा पहचान के लिये रैवन के पास आया तो वह उसको देखते ही बोला - "यह तो देखने में ही कितना सुन्दर है।" और तुरन्त ही उसने अपना कम्बल फेंक कर उसे अपने मुँह में लगा लिया।

रैवन ने यह सब इतनी जल्दी किया कि किसी को इतना समय ही नहीं मिला कि वह यह देखे कि क्या हुआ।

जैसे ही रैवन ने अपना जबड़ा अपने मुँह में ठीक से लगा लिया वह चिड़िया बन कर सरदार के घर में बनी चिमनी से हो कर उड़ गया।

तब लोगों की समझ में आया कि यह तो चालाक रैवन था जो उनके मछली के काँटे से मछली का चारा चुराता रहा है और अब हुस्काना के काँटे में फँस गया था।

टोटम पोल के ऊपर जो रैवन खोदा गया था वह वह बूढ़ा आदमी नहीं था बल्कि वह तो रैवन खुद था जो बिना चोंच का था। यह टोटम पोल इसी कहानी की याद दिलाता है कि कैसे रैवन ने बूढ़ा आदमी बन कर अपना जबड़ा खोया था।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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