बुधवार, 13 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 1 - 4 : रैवन दिन ले कर आया // सुषमा गुप्ता

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यह उन दिनों की बात है जब न दिन था, न सूरज था, न चाँद था और न तारे थे। चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा था।

रैवन एक गाँव में गया और वहाँ के लोगों से उसने पूछा कि क्या वे कुछ देख सकते थे? लोगों ने कहा कि नहीं वे कुछ नहीं देख सकते थे क्योंकि सब जगह अँधेरा ही अँधेरा था।

पर उन्होंने रैवन को यह भी बताया कि वहाँ एक आदमी था जिसके पास दिन था। मगर वह आदमी उस दिन को एक बक्से में बन्द करके रखता था और बाहर नहीं निकालता था।

उस गाँव के लोग कोई भी काम नहीं कर पाते थे क्योंकि वहाँ हमेशा ही अँधेरा रहता था। रैवन ने पता लगाया कि वह दिन वाला आदमी कहाँ रहता था और उसके घर पहुँच गया।

इस आदमी के पास केवल दिन ही नहीं था बल्कि सूरज, चाँद और तारे भी इसकी मुठ्ठी में रहते थे। रैवन उसके घर में घुस गया और उसका सारा घर देख कर बाहर निकल आया। उसने सोच लिया था कि दिन को बाहर लाने के लिये उसको क्या करना है।

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दिन वाले आदमी के पास बहुत सारे नौकर चाकर थे। उसके एक बेटी भी थी। हालाँकि उसकी बेटी बड़ी हो चुकी थी फिर भी उसका पिता उस पर कड़ी नजर रखता था और उसको एक कोने वाले कमरे में अकेले रखता था।

उस लड़की के पास सफेद रंग की एक बालटी थी जिसमें से वह पानी पिया करती थी पर पानी पीने से पहले वह हमेशा उस पानी की अच्छी तरह जाँच कर लिया करती थी कि उस पानी में कहीं कुछ है तो नहीं। उसके पिता के नौकर हमेशा उस बालटी में पानी भर जाया करते थे।

एक दिन रैवन ने अपने आपको सीडर के एक पत्ते में बदला और पानी की उस बालटी में बैठ गया जो उस आदमी के नौकर उसकी बेटी के लिये ले कर जा रहे थे।

उस लड़की ने यह पहले ही देख लिया था कि उस बालटी में कुछ पड़ा था सो उसने उस बालटी का सारा पानी पीने से पहले ही फेंक दिया।

रैवन फिर अपने असली रूप में आ गया और अगले दिन वह फिर से सीडर की एक बहुत ही छोटी सी पत्ती के रूप में पानी की उसी बालटी में बैठ गया जिसको उस आदमी के नौकर उसकी बेटी के कमरे में लिये जा रहे थे।

इस बार उस लड़की को पानी में कुछ भी दिखायी नहीं दिया सो वह उस बालटी का सारा पानी पी गयी। इस तरह रैवन उसके पेट में घुस गया और उस लड़की को बच्चे की आशा हो गयी।

उसके माता पिता ने उससे कई बार पूछा कि उस बच्चे का पिता कौन है पर वह बेचारी कुछ भी न बता सकी। बताती भी कैसे, वह किसी आदमी को जानती तब तो बताती।

उसके पिता को भी बड़ा आश्चर्य था कि वे उसके ऊपर इतना कड़ा पहरा रखते थे कि उसके कमरे में कोई आ ही नहीं सकता था फिर यह सब कैसे हुआ।

समय आने पर उस लड़की ने एक बेटे को जन्म दिया। लड़की के माता पिता ने कहा कि वे उस बेटे को अपने धेवते की तरह ही पालेंगे।

हालाँकि उस बच्चे के पिता का कोई पता न था फिर भी उस लड़की के माता पिता ने उस लड़की से कई बार उस बच्चे के पिता का नाम पूछने की कोशिश की पर बार बार पूछने पर भी वह बेचारी किसी का नाम नहीं बता सकी।

धीरे धीरे वह बच्चा बड़ा हो गया। वह आदमी अपने धेवते को बहुत प्यार करता था। एक दिन उसका धेवता बहुत रोया, बहुत रोया। वह चाँद के साथ खेलना चाहता था। उस आदमी से उसका रोना देखा नहीं गया तो उसने उसके खेलने के लिये चाँद ला दिया।

बच्चा खुश हो गया। वह बहुत देर तक चाँद के साथ खेलता रहा फिर खेलते खेलते जब वह थक गया तो उसके नाना ने उस चाँद को ऊपर टाँग दिया।

एक दिन वह बच्चा फिर रोने लगा। इस बार उसकी इच्छा हुई कि वह सूरज के साथ खेले। नाना ने उसको सूरज भी ला कर दे दिया।

बच्चा सूरज के साथ भी बहुत देर तक खेलता रहा फिर थक गया तो उसने उसे भी अपने नाना को वापस कर दिया। नाना ने सूरज को भी ऊपर टाँग दिया।

अब की बार बच्चे ने तारों से खेलने की जिद की तो उसको तारे भी दे दिये गये। अब जब भी वह इन चीज़ों से खेलना चाहता तो ये चीज़ें उसको दे दी जातीं और जब वह उनसे खेल चुकता तो वे चीज़ें वापस उठा कर रख दी जातीं।

इस तरह कुछ समय और बीत गया और बच्चा कुछ और बड़ा हो गया।

एक दिन वह दिन से खेलने की जिद करने लगा पर इस बार उसका नाना उसको दिन देने के लिये डर रहा था क्योंकि एक तो दिन में रोशनी बहुत थी और दूसरे जब भी उसको बाहर निकाला जाता तो सूरज, चाँद, तारे सभी उसके साथ काम करने लग जाते थे क्योंकि दिन तो सबका सरदार था न?

पर बच्चे की जिद के सामने नाना को हार माननी पड़ी और उसने बच्चे को दिन खेलने के लिये दे दिया। परन्तु जब भी बच्चा दिन से खेलता तो उसका नाना हमेशा कुछ बेचैन सा रहता।

बच्चा जब भी दिन को अपने हाथों ऊपर उठाता तो उससे सब जगह खूब रोशनी फैल जाती और जब वह उसको और ऊपर उठाता तो उसकी बहुत सारी रोशनी बहुत दूर तक फैल जाती।

और जब वह उसको और बहुत ऊपर उठाता तब तो नाना की साँस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती और डर के मारे उसके मुँह से एक आह सी निकल जाती।

यह देख कर वह लड़का दिन को अपने हाथों में साधे रखने का अभ्यास करता रहता ताकि वह उसको ठीक से सँभाले रखे। और आखिरकार एक दिन वह अपने उस काम करने में सफल हो गया जिसको करने के लिये वह आया था।

एक दिन जब वह खिलौनों से खेल रहा था तो उसने एक साथ दो खिलौने अपने हाथ में उठा लिये और देखा कि वह दो खिलौने एक साथ अपने हाथों ले कर भाग सकता था या नहीं।

एक दिन जब उसने देखा कि उसको कोई नहीं देख रहा था तो वह उन सब खिलौनों को उठा कर चिमनी के रास्ते से भाग लिया।

उसने दिन को उत्तर की तरफ फेंका, सूरज को पूरब की तरफ फेंका, चाँद को पश्चिम की तरफ फेंका और तारों को दक्षिण की तरफ फेंक दिया।

उनको फेंक कर वह बोला - "आज से दिन हुआ करेगा ताकि लोग देख सकें, काम कर सकें और एक जगह से दूसरी जगह आ जा सकें। रात के बाद सूरज निकलेगा और जब सूरज डूबेगा तो फिर रात भी होगी।

रात में लोग सोयेंगे, आराम करेंगे क्योंकि वे उस समय काम नहीं कर सकेंगे और न ही इधर उधर कहीं जा सकेंगे। उस समय चाँद और तारे आसमान में घूमेंगे और लोगों को रोशनी देंगे।

इसके अलावा ये सब चीजें आज से किसी एक आदमी की नहीं होंगी और उसके पास ताले में भी बन्द नहीं रहेंगी बल्कि सभी लोगों के फायदे के लिये काम में लायी जायेंगी। बस उसी दिन से धरती पर दिन और रात होने शुरू हो गये।

दिन में सूरज रोशनी देने लगा और रात में चाँद और तारे। लोगों को दिन में दिखायी देने लगा, और रात में चाँद तारों की मुलायम रोशनी लोगों को सुलाने लगी। लोग दिन में काम करने लगे और रात में सोने लगे।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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