शनिवार, 30 सितंबर 2017

इटली की लोक कथाएँ–1 : 4 और सात // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक स्त्री थी जिसके एक बेटी थी। उसकी वह बेटी बहुत बड़ी और मोटी थी। जब उसकी माँ उसके लिये मेज पर सूप लाती थी तो वह उसका पहला कटोरा पीती, फिर दूसरा, फिर तीसरा और फिर भी वह माँगती ही रहती।

उसकी माँ भी उसका कटोरा भरती ही रहती और गिनती रहती – “यह तीसरा”, “यह चौथा”। जब वह लड़की सूप का सातवाँ कटोरा माँगती तो उसकी माँ बजाय उसका कटोरा भरने के उसके खाली कटोरे को उसके सिर पर मारती, चिल्लाती और कहती “और यह सात”।

एक बार एक बहुत ही अच्छे कपड़े पहने एक नौजवान उधर से गुजर रहा था कि उसने उस लड़की की माँ को खिड़की से देखा कि वह सूप का कटोरा उस लड़की के सिर पर उलटा करके मार रही थी और उससे कह रही थी “और यह सात”।

उस नौजवान को उस मोटी लड़की से प्यार हो गया। वह अन्दर चला गया और उसने पूछा — “सात क्या माँ जी?”

अपनी बेटी की इतनी भूख से शरमिन्दा माँ बोली — “सात ऊन कातने की तकली बेटा। यह मेरी बेटी है जो ऊन कातने के पीछे इतनी पागल है कि उसने आज सुबह से भेड़ के ऊपर के बालों से सात तकली ऊन कात ली हैं।

क्या तुम सोच सकते हो कि उसने इस सुबह से सात तकली ऊन कात दी है और अभी और भी कातना चाहती है। उसी को रोकने के लिये मुझे उसे मारना पड़ा।”

वह नौजवान बोला — “अगर यह इतनी ही मेहनत करने वाली लड़की है तो आप इसे मुझे दे दें। मैं कोशिश करूँगा कि अगर आप सच बोल रही हैं तो मैं इससे शादी कर लूँ।”

माँ ने अपनी उस बेटी को उस नौजवान को दे दिया और वह नौजवान उसको अपने घर ले गया। घर ले जा कर उसने उसको एक कमरे में बन्द कर दिया।

उस कमरे में बहुत सारी ऊन पड़ी थी कातने के लिये। उसको वहाँ ले जा कर वह नौजवान उससे बोला — “मैं समुद्री जहाज का कप्तान हूँ और अभी मैं एक समुद्री यात्रा पर जा रहा हूँ। अगर तुम यह सारी ऊन मेरे वापस आने तक कात दोगी तो मैं अपनी यात्रा पर से आ कर तुमसे शादी कर लूँगा।”

इस कमरे में बहुत सुन्दर सुन्दर कपड़े और जवाहरात भी रखे थे क्योंकि वह कप्तान बहुत अमीर था। उसने उससे यह भी कहा — “जब तुम मेरी पत्नी बन जाओगी तब ये सारी चीज़ें तुम्हारी हो जायेंगी।”

यह कह कर वह उसको उस ऊन के साथ वहीं छोड़ कर अपनी यात्रा पर चला गया।

अब क्या था। अब तो वह लड़की थी और वह कमरा था। वह रोज नयी नयी पोशाकें पहनती नये नये जवाहरात पहनती। उसके दिन तो बस ऐसे ही गुजरने लगे। वह उन कपड़ों और गहनों को पहन कर अपने को शीशे में देखती और अपनी तारीफ करती।

बाकी समय वह यह सोचने में गुजारती कि वह क्या खायेगी और फिर घर के नौकर उसके लिये वही बनाते जो वह उनसे बनाने के लिये कहती।

अभी तक उसने उस ऊन को हाथ तक नहीं लगाया था जो उसको कातनी थी और अब कप्तान के आने में केवल एक दिन ही बाकी रह गया था। लड़की ने उस कप्तान से शादी की सारी उम्मीदें छोड़ दीं और रो पड़ी।

वह अभी रो ही रही थी कि खिड़की से चिथड़ों का एक थैला उसके पैरों के पास आ कर गिर पड़ा।

उसने उस थैले की तरफ देखा तो वह कोई चिथड़ों का थैला नहीं था बल्कि वह तो एक बुढ़िया थी जिसकी लम्बी लम्बी पलकें थीं। उसने लड़की से कहा — “डरो मत। मैं तुम्हारी सहायता करने आयी हूँ। मैं यह ऊन कातती हूँ और तुम इस ऊन की लच्छी बनाती जाओ।”

बच्चों, तुमने कहीं भी कोई भी इतनी तेज़ ऊन कातता नहीं देखा होगा जितनी तेज़ वह बुढ़िया ऊन कात रही थी। 15 मिनट के अन्दर अन्दर उसने वह सारी ऊन कात दी।

वह जितना ज़्यादा ऊन कातती गयी उसकी पलकें उतनी ही ज़्यादा लम्बी होती गयीं। पहले वे उसकी नाक से लम्बी हुईं, फिर उसकी ठोड़ी से लम्बी हुईं और फिर वे एक फुट लम्बी हो गयीं। फिर भी वह लम्बी होती ही जा रही थीं।

जब उसका काम खत्म हो गया तो लड़की ने पूछा — “मैम, मैं इसके बदले में आपको क्या दूँ?”

वह बुढ़िया बोली — “तुम्हें मुझे इसके बदले में कुछ देने की जरूरत नहीं है। बस जब तुम्हारी शादी की दावत हो तब मुझे उस दावत में बुला लेना।”

“पर मैं आपको बुलाऊँगी कैसे?”

बुढ़िया बोली — “बस तुम कोलम्बिया बोल देना और मैं आ जाऊँगी। पर भगवान तुम्हारी सहायता करें अगर तुम मेरा नाम भूल गयीं तो इसका मतलब यह होगा कि जैसे मैंने कभी तुम्हारी सहायता की ही नहीं थी और तुम्हारा यह सब काम बेकार हो जायेगा।”

अगले दिन कप्तान जब घर वापस आया तो उसने देखा कि उसकी तो सारी ऊन कती पड़ी है। कती हुई ऊन देखते ही वह तो बहुत खुश हो गया और उसके मुँह से निकला “वाह, बहुत बढ़िया। मुझे लगता है कि तुम ही वह लड़की हो जिसको मैं अपनी शादी के लिये ढूँढ रहा था।

लो ये कपड़े और जवाहरात लो। ये मैंने तुम्हारे लिये ही खरीदे थे। पर अभी मुझे एक और समुद्री यात्रा पर जाना है। तब तक तुम एक इम्तिहान और दे दो।

यह उस ऊन से दोगुनी ऊन है जो मैंने तुमको पहले दी थी। अगर जब तक मैं अपनी यात्रा से वापस आऊँ तब तक तुम इसको कात दो तो मैं तुमसे वहाँ से आ कर शादी कर लूँगा।” इतना कह कर वह नौजवान वहाँ से फिर चला गया।

उसके जाते ही जैसे उस लड़की ने पहले किया था वैसे ही वह अब की बार भी करती रही। कप्तान के वापस आने तक वह कपड़ों और गहनों को पहन पहन कर देखती रही और अच्छे अच्छे खाने खाती रही जब तक कि कप्तान के आने का आखिरी दिन नहीं आ गया। और वह सारी ऊन कातने के लिये वहीं पड़ी रही।

जब कप्तान के आने का आखिरी दिन आया तो वह फिर रोने बैठ गयी। तभी कमरे की चिमनी के रास्ते से एक पोटली आ गिरी और उसके पैरों तक लुढ़कती चली आयी।

पहले की तरह से उस पोटली में से भी एक बुढ़िया निकल आयी। इस बुढ़िया के होंठ नीचे तक लटक रहे थे।

इस बुढ़िया ने भी इस लड़की से कहा कि वह उसकी सहायता करने के लिये वहाँ आयी थी। उसने इससे पहले वाली बुढ़िया से भी ज़्यादा मेहनत और तेज़ी से काम किया।

जितना ज़्यादा वह ऊन कातती जाती थी उसके होंठ उतने ही ज़्यादा नीचे को लटकते जाते थे। इस बुढ़िया ने वह सारी ऊन आधा घंटे में कात कर रख दी।

जब इस लड़की ने उस बुढ़िया से पूछा कि वह उसको इसके बदले में क्या दे तो इसने भी यही कहा कि उसको इसके बदले में कुछ देने की जरूरत नहीं है। बस जब उसकी शादी कप्तान से हो तब वह उसको अपनी शादी की दावत में बुला ले।

लड़की ने पूछा कि वह उसको कैसे बुलाये।

तो उस बुढ़िया ने भी वही जवाब दिया — “बस तुम मुझे कोलम्बरा कह कर पुकार लेना मैं आ जाऊँगी। पर मेरा नाम मत भूल जाना क्योंकि अगर तुम मेरा नाम भूल गयीं तो मेरा यह सब किया धरा बेकार हो जायेगा। और फिर तुमको इसका फल भुगतना पड़ेगा।” यह कह कर वह वहाँ से चली गयी।

अगले दिन कप्तान अपनी यात्रा से वापस आ गया। उस सारी ऊन को कता हुआ देख कर वह तो आश्चर्य में पड़ गया पर ऊन तो कत चुकी थी सो इसमें अब शक की तो कहीं कोई गुंजायश ही नहीं थी।

पर फिर भी उससे रहा नहीं गया तो उसने उससे पूछ ही लिया — “यह सब ऊन तुमने काती है?”

“हाँ मैंने अभी अभी अपना काम खत्म किया है।”

“तुम ये कपड़े और जवाहरात लो। मैंने ये भी तुम्हारे लिये ही लिये थे। अब अगर तुम यह तीसरा ढेर भी मेरे वापस आने तक कात दो तो मैं तुमसे वायदा करता हूँ कि अब की बार मैं तुमसे शादी जरूर कर लूँगा। यह ढेर उन दोनों ढेरों से कहीं ज़्यादा बड़ा है।”

इतना कह कर वह नौजवान अपनी तीसरी समुद्री यात्रा पर चला गया। इस लड़की ने इस बार भी वही किया जो पहली दो बार किया था। उसने अपना सारा समय नये नये कपड़े और गहने पहनने में और अपने आप को शीशे में देखने में और अच्छा अच्छा खाना खाने में बिता दिया और वह ऊन वहाँ ऐसे ही पड़ी रही।

कप्तान के आने से पहले दिन वह फिर रोने बैठ गयी। तभी कमरे की छत की नाली के छेद से फिर से एक फटे कपड़ों की पोटली उसके पैरों के पास आ गिरी और पहले की तरह से उस पोटली में से भी एक बुढ़िया निकल आयी।

इस बुढ़िया के आगे के दाँत बहुत आगे की तरफ निकले हुए थे। इस बुढ़िया ने भी आते ही ऊन कातनी शुरू कर दी। पर यह बुढ़िया तो उन दोनों बुढ़ियों से भी ज़्यादा तेज़ी से ऊन कात रही थी जो उससे पहले उसकी ऊन कात कर गयी थीं।

जितनी ज़्यादा ऊन वह कातती जाती थी उसके दाँत उतने ही और ज़्यादा आगे की तरफ निकलते जाते थे। उसने वह सारी ऊन बहुत जल्दी ही खत्म कर दी।

जब बुढ़िया का काम खत्म हो गया तो इस लड़की ने इस बुढ़िया से भी पूछा कि वह उसको इस काम के बदले में क्या दे।

इस बुढ़िया ने भी वही कहा जो पहली दो बुढ़ियों ने कहा था कि अभी उसको कुछ भी देने की जरूरत नहीं है। बस केवल जब उसकी शादी कप्तान से हो तो वह उसको अपनी शादी की दावत में बुला ले।

पूछने पर कि वह लड़की उस बुढ़िया को अपनी शादी की दावत में कैसे बुलाये वह बुढ़िया बोली “बस तुम मुझे कोलम्बन कह कर बुला लेना मैं आ जाऊँगी। पर अगर तुम मेरा नाम भूल जाओगी तो बस समझ लेना कि जैसे तुमने मुझे पहले कभी देखा ही नहीं था।” यह कह कर वह बुढ़िया वहाँ से तुरन्त ही गायब हो गयी।

अगले दिन कप्तान अपनी समुद्री यात्रा से लौट आया और इतनी सारी ऊन कती देख कर तो उसने आश्चर्य से अपने दाँतों तले उँगली दबा ली। पर क्योंकि अब ऊन तो कती पड़ी थी इसलिये आज भी शक की कोई गुंजायश नहीं थी।

यह सब देख कर वह बोला — “अब हमारी तुम्हारी शादी होगी।” और उसने शादी की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उसने अपनी शादी में शहर के सभी कुलीन लोगों को बुलाया था। शादी की तैयारियों में वह लड़की उन बुढ़ियों को बिल्कुल ही भूल गयी।

जिस दिन उसकी शादी होने वाली थी उस दिन सुबह उसको याद आया कि उसको तो उन तीनों बुढ़ियों को भी बुलाना था जिन्होंने उसको ऊन कातने में सहायता की थी। पर जब वह उनके नाम याद करने लगी तो उनमें से तो उसको एक का भी नाम याद नहीं आया। वे उसके दिमाग से बिल्कुल ही निकल गये थे।

उसने अपने दिमाग पर बहुत ज़ोर डाला कि वे नाम उसको किसी तरह से याद आ जायें पर उसको तो उन तीनों में से एक का नाम भी याद नहीं आया।

वह हमेशा खुश रहने वाली लड़की दुख के सागर में डूब गयी। कप्तान ने यह भाँप लिया कि वह लड़की बहुत परेशान है तो उसने उससे पूछा — “क्या बात है तुम इतनी परेशान क्यों हो?”

पर वह उसको क्या बताती। जब कप्तान को उसके दुखी होने का कुछ पता न चल सका तो उसने सोचा कि शायद शादी का यह दिन ही ठीक नहीं है सो उसने अपनी शादी की तारीख उस दिन से बदल कर उसके अगले वाले दिन के लिये तय कर दी।

पर उसका अगला दिन तो और भी खराब था। और उसका अगला दिन, यानी शादी का दिन, कैसा था यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है। कप्तान को अपनी शादी की तारीख फिर से बदलनी पड़ी।

पर जैसे जैसे दिन बीतते जाते थे वह लड़की और ज़्यादा दुखी और चुप सी होती जाती थी। उसके माथे पर सिकुड़नें पड़ी रहतीं जैसे वह कुछ सोच रही हो और उसको उसकी परेशानी का हल न मिल रहा हो।

कप्तान ने उसको हँसाने की बहुत कोशिश की – उसको चुटकुले सुनाये, हँसी की कहानियाँ सुनायीं पर उसकी कोई भी कोशिश उस लड़की को खुश न कर सकी।

अब क्योंकि वह उसको खुश नहीं कर सका तो एक दिन उसने शिकार पर जाने का प्रोग्राम बनाया। जब वह शिकार के लिये जंगल गया तो इत्तफाक से बीच जंगल में काफी ज़ोर का तूफान आ गया और वह उस तूफान में घिर गया। पास ही में उसको एक झोंपड़ी दिखायी दे गयी सो उस तूफान से बचने के लिये वह उस झोंपड़ी में चला गया।

वह वहाँ पर अँधेरे में खड़ा था कि उसने वहाँ कुछ आवाजें सुनी — “ओ कोलम्बीना, ओ कोलम्बरा, ओ कोलम्बन, मक्का का दलिया बनाने के लिये बरतन आग पर रख दो। लगता है कि वह लड़की तो हमको अपनी शादी की दावत में बुलाने वाली नहीं है।”

यह सुन कर उसने पीछे मुड़ कर देखा तो वहाँ उसको तीन पतली दुबली बदसूरत बुढ़ियें दिखायी दीं। उनमें से एक की पलकों के बाल जमीन तक गिरे हुए थे, तो दूसरी के होंठ उसके पैरों तक आ रहे थे और तीसरी के ऊपर के दाँत इतने बड़े थे कि वे उसके घुटनों तक आ रहे थे।

अब उस कप्तान की कुछ कुछ समझ में आया कि उसकी होने वाली पत्नी दुखी क्यों थी। अब वह उसको ऐसा कुछ बता सकता था जिससे वह हँस सके। और अगर वह इस बात पर भी न हँस सकी तब फिर वह किसी बात पर भी नहीं हँस सकेगी।

सो वह शिकार तो भूल गया और वहाँ से तुरन्त ही अपने घर की तरफ दौड़ चला। जा कर उसने तुरन्त उस लड़की को बुलाया और अपने पास बिठा कर कहा — “पता है आज क्या हुआ? बस तुम सुन लो जो मैं तुमको बताऊँ। और देखो हाँ बीच में मत बोलना।

आज जब मैं जंगल गया तो वहाँ बहुत ज़ोर की बारिश आ गयी। और बारिश से बचने के लिये मैं एक झोंपड़ी में चला गया।

वहाँ मैंने तीन जादूगरनियाँ देखीं जिनमें से एक की पलकों के बाल जमीन पर लटक रहे थे, तो दूसरी के होंठ उसके पैरों तक लटके हुए थे और तीसरी के दाँत उसके घुटनों तक लम्बे थे। और वे एक दूसरे को कोलम्बिया, कोलम्बरा और कोलम्बीना कह कर पुकार रही थीं।”

यह सुन कर उस लड़की का चेहरा तो वाकई चमक गया और वह बहुत ज़ोर से हँस पड़ी।

जब उसकी हँसी थोड़ी सी रुकी तो वह बोली — “शादी की दावत की तैयारी करो। पर तुम मेरे ऊपर एक मेहरबानी और कर दो। क्योंकि तुमने उन तीन जादूगरनियों के नामों से मुझे हँसाया है मैं उनको भी अपनी शादी की दावत में बुलाना चाहती हूँ।”

“यह भी कोई पूछने की बात है। तुम उनको जरूर बुलाओ।” और फिर उस लड़की ने उनको अपनी शादी की दावत में बुलाया।

शादी की दावत के दिन उन तीनों के लिये अलग से एक गोल मेज सजायी गयी। वह मेज इतनी छोटी थी कि उन तीनों की आँखों की लम्बी पलकों के बाल, लटकते होठ और बड़े बड़े दाँत कहाँ थे यह किसी को भी दिखायी नहीं दिये।

जब खाना खत्म हो गया तो कैप्टेन ने कोलम्बीना से पूछा — “आपकी पलकों के बाल इतने लम्बे क्यों हैं?”

कोलम्बीना ने जवाब दिया — “बहुत ही बारीक धागा कातने की वजह से मेरी आँखों पर बहुत ज़ोर पड़ता है इसी लिये वे इतने लम्बे हो गये हैं।”

फिर कैप्टेन ने कोलम्बरा से पूछा — “मैम, क्या मैं जान सकता हूँ कि आपके होठ इतने नीचे को लटके हुए क्यों हैं?”

कोलम्बरा बोली — “क्योंकि मैं जब धागा कातती हूँ तो अक्सर अपनी उँगली गीली करने के लिये अपने होठों पर हाथ फेरती रहती हूँ इसलिये वे लटकते जाते हैं।”

फिर कैप्टेन ने कोलम्बीना से पूछा — “और कोलम्बीना जी आप? आपके दाँत इतने लम्बे कैसे हो गये?”

कोलम्बीना बोली — “क्योंकि मुझे अक्सर धागे में पड़ी गाँठें अपने दाँतों से काटनी पड़ती हैं न, इसी लिये।”

“ओह अच्छा अच्छा।”

फिर वह अपनी पत्नी से बोला — “जाओ और एक धागा लपेटने वाली तकली ले कर आओ।”

जब वह तकली ले कर आयी तो उसने उसको वहीं आग में फेंक दिया और बोला — “अब से तुम कभी धागा नहीं कातोगी।”

इसके बाद वह मोटी लड़की खुशी खुशी कैप्टेन के साथ आराम से रही। उसको कातने के लिये फिर कभी धागा नहीं दिया गया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओंको आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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