रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 5 रैवन उत्तर में दिन ले कर आया // सुषमा गुप्ता

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यह उन दिनों की बात है जब न दिन था, न सूरज था, न चाँद था और न तारे थे। सब तरफ बरफीली ठंड थी और चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा था।

उत्तर के लोगों ने तो दिन देखा ही नहीं था पर वे इस बात की चिन्ता नहीं करते थे क्योंकि उनका खयाल था कि शायद सारी दुनिया ऐसी ही होगी।

एक दिन रैवन जो उत्तर से बहुत दूर दूर तक यात्रा किया करता था उत्तर में दिन की बहुत सारी कहानियाँ ले कर आया। उसने बताया कि किस तरह दिन की रोशनी सारी दुनिया को रोशनी और रंगों से भर देती थी।

उत्तर के लोग आग के पास बैठे बैठे जब ये सब कहानियाँ सुनते तो उनको बड़ा आश्चर्य होता।

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जल्दी ही ये कहानियाँ सारे उस ठंडे और अँधेरे देश में फैल गयीं और जल्दी ही वे सब उस समय का इन्तजार करने लगे जब वे लोग उस दिन की रोशनी को देखेंगे। क्योंकि उनको वह दिन की रोशनी बहुत ही फायदेमन्द लगी।

एक आदमी बोला - "अगर दिन यहाँ आ जाये तो हम लोगों के लिये शिकार करना कितना आसान हो जायेगा।"

वहाँ के लोगों ने रैवन से कहा - "रैवन, तुम जाओ न और हमारे लिये यह दिन की रोशनी ले कर आओ। क्योंकि केवल तुम ही एक ऐसे हो जो हमारे लिये उसे ढँूढ कर ला सकते हो।"

रैवन बोला - "मैं अब बहुत बूढ़ा हो चुका हूँ मैं इतनी दूर नहीं उड़ सकता।" पर लोग जब उससे दिन लाने के लिये कहते ही रहे तो वह दिन की रोशनी लाने पर राजी हो गया।

वह अँधेरे आसमान में जितनी तेज़ी से उड़ सकता था उड़ गया। वह बहुत दूर तक उड़ता रहा। यहाँ तक कि वह इतना थक गया कि उसका घर लौटने का मन करने लगा। तभी उसको दिन की रोशनी की चमक दिखायी दी। उसको पता चल गया कि अब वह अपनी जगह पहुँच चुका है।

उसने अपने थके हुए पंख एक बार फिर से फड़फड़ाये और वह रोशनी की तरफ चल दिया। जैसे जैसे वह आगे बढ़ता गया दिन की रोशनी बढ़ती गयी।

जल्दी ही वह एक गाँव में आ गया जो एक बड़ी सी नदी के किनारे पर था। सुस्ताने के लिये वह एक पेड़ पर बैठ गया और दिन की रोशनी की से हुए आसमान को नीला देख कर बहुत खुश हुआ।

उसी समय एक सुन्दर सी स्त्री नदी पर पानी भरने आयी। उसके बहुत ही बढ़िया फ़र के कोट पहनने से रैवन को पता चल गया कि वह स्त्री जरूर ही उस गाँव के सरदार की बेटी होगी।

रैवन ने अपने आपको धूल के एक कण में बदला और उस स्त्री की तरफ चल दिया। वह उसके फ़र के कोट पर जा कर बैठ गया। इससे जब वह स्त्री अपने घर पहुँची वह भी उसके फ़र के कोट पर बैठ कर उसके घर पहुँच गया।

जब रैवन उसके घर पहुँचा तो उसने उसके सरदार पिता के धेवते को फर्श पर खेलते देखा। घर आ कर उस स्त्री ने अपना कोट उतार कर एक खँूटी पर टाँग दिया। रैवन उसके कोट से उतर कर उस लड़के के कान में जा कर बैठ गया। वहाँ उसने उसका कान खुजलाना शुरू किया तो वह लड़का रोने लगा।

हालाँकि सरदार अपने बच्चों और अपने धेवती और धेवते सब को बहुत प्यार करता था पर वह अपने इस धेवते को बहुत ज़्यादा प्यार करता था। वह अपने इस धेवते को जरा सा भी दुखी या रोता नहीं देख सकता था।

सो जैसे ही उसने अपने उस बच्चे का रोना सुना वह उसके पास दौड़ा आया और उससे पूछा - "क्या बात है बेटे? क्या हुआ तुम को? तुम क्यों रो रहे हो?"

रैवन उसके कान में फुसफुसाया - "कहो कि तुम दिन की रोशनी की गेंद से खेलना चाहते हो।" सो उस लड़के ने अलमारी के ऊपर वाले तख्ते पर रखे एक चमकीले बक्से की तरफ इशारा किया और बोला कि वह उस बक्से में रखी चीजों से खेलना चाहता था।

सरदार ने अपनी बेटी को वह बक्सा लाने को कहा और जब वह बक्सा खोला गया तो रैवन तो उसमें दिन की रोशनी की कई गेदें इधर उधर घूमती देख कर हैरान रह गया।

सरदार ने उस बक्से में से एक छोटी वाली गेंद निकाली, उसके चारों तरफ एक रस्सी बाँधी और अपने धेवते को खेलने के लिये दे दी।

बच्चा उसको देख कर बहुत खुश हो गया और उसको उछाल उछाल कर खेलने लगा। उसको उसके बदलते रंग बड़े अच्छे लग रहे थे।

कुछ देर बाद रैवन ने उस बच्चे का कान फिर से खुजलाया और बच्चा फिर से रोने लगा। सरदार फिर वहाँ आया और बच्चे से उसके रोने की वजह पूछी।

वह यही सोच कर बहुत दुखी था कि आज उसके धेवते को क्या हो गया था जो वह अपनी मनमानी चीज़ पा कर भी रो रहा था।

इस बार रैवन उस बच्चे के कान में फुसफुसाया - "बोलो कि तुम इस गेंद के साथ बाहर जा कर खेलना चाहते हो।"

और उस बच्चे ने वही बोल दिया जो रैवन ने उससे बोलने के लिये कहा था। बच्चे की माँ बच्चे को तुरन्त ही बाहर ले गयी।

जैसे ही बच्चा बाहर पहुँचा रैवन उसके कान में से बाहर निकल आया। उसने अपना रैवन का रूप रखा, उस बच्चे से वह दिन की रोशनी वाली गेंद छीनी और उसको अपनी चोंच में दबाये वहाँ से जितनी तेज उड़ सकता था उड़ लिया।

उड़ते उड़ते वह अपनी उस अँधेरी जगह में आ गया जहाँ के लिये वह यह दिन की रोशनी ले कर आया था। उसने वह दिन की रोशनी वाली गेंद आसमान से नीचे गिरा दी।

जमीन पर गिरते ही वह गेंद चकनाचूर हो गयी। दिन की रोशनी के टुकड़े चारों तरफ बिखर गये और सब घरों में रोशनी हो गयी और सारा अँधेरा दूर हो गया।

उत्तर के लोग तो उस रोशनी को देख कर बहुत ही ज़्यादा आश्चर्य में पड़ गये। खुशी के मारे वे एक दूसरे को गले लगाने लगे और नाचने लगे।

वे कहने लगे - "अरे देखो तो, सारी चीज़ें कितनी चमकीली चमकीली दिखायी दे रही हैं। अब हम लोग बहुत दूर तक देख सकते हैं। ओ रैवन, तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद जो तुम हमारे लिये यह दिन ले कर आये।"

रैवन बोला - "मुझे दुख है कि मैं बहुत छोटा हूँ इसलिये मैं तुम लोगों के लिये दिन की रोशनी की केवल एक बहुत छोटी सी गेंद ही ला सका। इससे तुम लोग एक साल में केवल छह महीने ही देख सकोगे, बाकी के छह महीने तुमको वैसे ही अँधेरे में रहना पड़ेगा। इसका मुझे बहुत दुख है।"

पर उत्तर के लोग इसी बात से बहुत खुश थे कि अब वे कम से कम साल के छह महीने दिन की रोशनी में रह सकते थे, देख सकते थे। वे लोग इसी बात से इतने ज़्यादा खुश थे कि उन्होंने फिर उससे ज़्यादा रोशनी की इच्छा भी नहीं की और आज भी वे उसी तरह से रह रहे हैं।

आज भी सुदूर उत्तर में छह महीने दिन रहता है और छह महीने रात रहती है। वहाँ के लोग अभी भी रैवन को नहीं भूले हैं क्योंकि वह रैवन ही था जो उनको छह महीने के लिये दिन की रोशनी दे गया। इसी लिये वे उसके बच्चों की आज भी बड़ी इज़्ज़त करते हैं।


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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