शनिवार, 30 सितंबर 2017

इटली की लोक कथाएँ–1 : 9 साँप // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक किसान था जो घास काटने के लिये रोज बाहर जाया करता था। उसके तीन बेटियाँ थीं। उनमें से उसकी एक बेटी उसके लिये रोज खाना ले कर जाया करती थी। उसकी बाकी की दो बेटियाँ पीछे घर में रह कर घर की देखभाल किया करती थीं।

एक दिन अपने पिता के लिये खाना ले जाने की उसकी सबसे बड़ी बेटी की बारी थी। जब तक वह उसके लिये खाना ले कर जंगल तक पहुँची तब तक वह बहुत थक गयी थी सो वह घास के मैदान तक पहुँचने से पहले ही सुस्ताने के लिये एक पत्थर पर बैठ गयी।

पर जैसे ही वह पत्थर पर बैठी तो उसको एक बहुत ज़ोर का झटका लगा और उसके नीचे से एक साँप निकल आया। लड़की के हाथों से खाने की टोकरी छूट गयी और वह डर के मारे जितनी तेज़ वहाँ से भाग सकती थी उतनी तेज़ वहाँ से भाग गयी।

उस दिन उस किसान को खाना नहीं मिला और वह भूखा ही रह गया। शाम को जब वह घास के मैदान से घर लौटा तो उसने गुस्से में अपनी बेटी को बहुत डाँटा।

अगले दिन उसकी दूसरी बेटी की बारी थी। वह भी अपने पिता के लिये खाना ले कर चली। इत्तफाक से वह भी जंगल तक पहुँचते-पहुँचते थक गयी और सुस्ताने के लिये उसी पत्थर पर जा कर बैठ गयी जिस पर उसकी बड़ी बहिन बैठी थी। उसके साथ भी वही हुआ जो उसकी बड़ी बहिन के साथ हुआ था।

जैसे ही वह उस पत्थर पर बैठी कि एक साँप उसमें से बाहर निकला। वह भी उसको देख कर डर गयी और उसके हाथ से भी खाने की टोकरी नीचे गिर गयी और वह भी वहाँ से जितनी जल्दी हो सकता था उतनी जल्दी भाग ली।

और उस दिन भी किसान को खाना न मिलने की वजह से भूखा रह जाना पड़ा। शाम को जब वह घर लौटा तो उसने अपनी इस बेटी को भी बहुत डाँटा।

उसके अगले दिन उसकी सबसे छोटी लड़की की बारी थी। वह सोच रही थी कि आज मेरी बारी है पर मैं साँप से नहीं डरती। यह सोच कर उसने खाने की दो टोकरियाँ तैयार की – एक अपने पिता के लिये और दूसरी साँप के लिये।

पर उसके साथ भी वैसा ही हुआ जैसा उसकी दोनों बड़ी बहिनों के साथ हुआ था। वह भी जंगल तक जाते-जाते थक गयी और जाकर सुस्ताने के लिये उसी पत्थर पर बैठ गयी जहाँ उसकी दोनों बड़ी बहिनें बैठी थीं।

उसके बैठते ही उस पत्थर के नीचे से एक साँप निकला तो वह डरी नहीं बल्कि अपने साथ लायी दो टोकरियों में से एक टोकरी का खाना उसने साँप को दिया।

साँप ने खाना खाया और बोला — “तुम मुझे अपने साथ घर ले चलो। मैं तुम्हारे लिये अच्छी किस्मत ले कर आऊँगा।”

यह सुन कर लड़की ने उस साँप को उठा कर अपने ऐप्रन में रख लिया और अपने पिता के पास चल दी। वहाँ उसने अपने पिता को खाना खिलाया और फिर घर वापस आ गयी। घर आ कर उसने उस साँप को अपने पलँग के नीचे रख दिया।

वह वहाँ इतनी जल्दी जल्दी बढ़ता रहा कि जल्दी ही वह इतना बड़ा हो गया कि अब वह पलंग के नीचे रह ही नहीं सकता था। वह वहाँ से चला गया।

जाने से पहले वह उस लड़की को तीन वरदान देता गया। पहला वरदान तो यह कि जब भी वह रोयेगी तो उसके आँसू मोती और चाँदी बन जायेंगे।

दूसरा वरदान यह कि जब भी वह हँसेगी तो उसके सिर से अनार के सोने के दाने गिरेंगे। और तीसरा वरदान यह कि जब वह हाथ धोयेगी तो उसके हाथों से सब तरह की मछलियाँ निकलने लगेंगी।

एक दिन घर में खाने के लिये कुछ नहीं था। उसका पिता और बहिनें खाना न मिलने की वजह से बहुत कमजोर हो रहे थे सो उसने अपने हाथ धोये तो उसके हाथों में से खूब सारी मछलियाँ निकल आयीं।

यह देख कर उसकी बहिनों को उससे बहुत जलन होने लगी। उन्होंने अपने पिता को यह विश्वास दिला दिया कि उसके इस जादू के पीछे कुछ है इसलिये उस लड़की को सबसे ऊपर वाले कमरे में बन्द कर देना चाहिये। पिता ने वैसा ही किया और उसको सबसे ऊपर वाले कमरे में बन्द कर दिया।

उनके घर के सामने राजा का घर था। राजा का एक बेटा था। एक दिन वह अपने घर के बागीचे में गेंद खेल रहा था। एक बार वह गेंद के पीछे भागा और फिसल कर गिर पड़ा। यह देख कर वह लड़की हँस पड़ी। जैसे ही वह हँसी उसके सिर से अनार के सोने के दाने गिरने लगे।

राजा का बेटा तो बेचारा सोच ही नहीं सका कि वे अनार के सोने के दाने आये कहाँ से क्योंकि उस लड़की ने तब तक अपनी खिड़की बन्द कर ली थी।

अगले दिन वह फिर बागीचे में खेलने आया तो उसने देखा कि जहाँ वे अनार के सोने के दाने गिरे थे वहाँ तो अनार का एक पेड़ उग आया है। वह पेड़ खूब ऊँचा था और उस पर बहुत सारे अनार लगे हुए थे।

अनार देख कर वह बहुत खुश हो गया और उनको तोड़ने जा पहुँचा पर वह पेड़ तो उसकी आँखों के सामने सामने बढ़ कर और ऊँचा हो गया। अब अगर उसको कोई अनार उस पेड़ पर से तोड़ना था तो जैसे ही वह उस अनार की तरफ हाथ बढ़ाता तो उस फल की डाली एक फुट और ऊँची हो जाती।

इस तरह वह उस पेड़ पर से कोई भी अनार नहीं तोड़ पा रहा था। यह देख कर वह बहुत दुखी हुआ और अपने पिता से जा कर कहा।

राजा ने दूसरे लोगों को भी अनार तोड़ने के लिये भेजा पर उनमें से भी कोई आदमी उस पेड़ पर से एक पत्ती से ज़्यादा नहीं तोड़ सका। इस पर राजा ने अपने यहाँ के सब अक्लमन्द लोगों को इकठ्ठा किया और उनसे पूछा कि इस जादू का क्या मतलब था।

उन अक्लमन्दों में जो उम्र में सबसे ज़्यादा बड़ा था वह बोला — “इस पेड़ के फल केवल एक लड़की ही तोड़ सकती है और फिर वही राजा के बेटे की पत्नी बन जायेगी।”

यह सुन कर राजा ने यह घोषणा करा दी कि उसके राज्य में जो कोई शादी लायक लड़कियाँ हैं चाहे वे किसी भी जाति की हों और कहीं भी रहती हों अनार तोड़ने के लिये उसके घर आयें। और जो कोई भी उस पेड़ का अनार तोड़ पायेगी वही उसके बेटे की पत्नी बनेगी।

सो बहुत सारे देशों से हर जाति की लड़कियाँ राजा के घर अनार तोड़ने आयीं। सबने अनार तोड़ने के लिये कई तरह की छोटी बड़ी सीढ़ियाँ इस्तेमाल की पर वे सब छोटी पड़ गयीं। कोई भी सीढ़ी किसी भी अनार तक नहीं पहुँच सकी।

इन लड़कियों में उस किसान की दोनों बड़ी लड़कियाँ भी थीं जिसकी छोटी लड़की के मुँह से अनार के सोने के दाने गिर कर यह पेड़ उगा था । पर वे दोनों तो अनार तोड़ने के लिये उस सीढ़ी पर चढ़ते समय ही गिर गयीं।

जब आयी हुई लड़कियों में से कोई लड़की अनार नहीं तोड़ सकी तो राजा ने घरों में जा जा कर लड़कियों की खोज की और उस किसान के ऊपर वाले कमरे में बन्द लड़की को भी ढूँढ लिया।

जैसे ही लोग उस लड़की को ले कर उस पेड़ के पास आये तो उस पेड़ की शाखें अपने आप ही झुक गयीं और उसके अनार खुद बखुद उसके हाथों में आ गये।

यह देख कर सब लोग बहुत खुश हुए। यह देख कर राजा का बेटा बहुत ज़ोर से चिल्लाया — “यही मेरी दुलहिन है पिता जी, यही मेरी दुलहिन है।”

बस फिर क्या था शादी की तैयारियाँ होने लगीं। लड़की की दोनों बहिनों को भी बुलाया गया था। तीनों एक ही गाड़ी में सवार हुईं पर जब वह गाड़ी एक जंगल में से गुजर रही थी तो उस गाड़ी को वहीं जंगल में ही रोक दिया गया और दोनों बड़ी लड़कियों ने सबसे छोटी वाली लड़की को गाड़ी से उतर जाने के लिये कहा।

जब वह उतर गयी तो उन बहिनों ने उसके दोनों हाथ काट डाले और उसकी आँखें निकाल कर उसे अन्धा कर दिया। वह लड़की बेचारी वहीं बेहोश हो गयी। वे दोनों बहिनें उसको उसी बेहोशी की हालत में वहीं एक झाड़ी में छोड़ कर राजमहल चली गयीं।

सबसे बड़ी लड़की दुलहिन की पोशाक पहन कर शादी के लिये राजा के बेटे के पास गयी। राजा के बेटे की समझ में ही नहीं आया कि वह लड़की जिसने अनार तोड़ा था इतनी बदसूरत कैसे हो गयी। पर क्योंकि दोनों की सूरत काफी कुछ मिलती जुलती थी सो उसने सोचा कि शायद उसी से उसकी सुन्दरता के बारे में कुछ गलतफहमी हो गयी होगी।

उधर वह छोटी लड़की बिना आँखों और हाथों के जंगल में पड़ी रो रही थी। एक गाड़ी चलाने वाला उधर से गुजर रहा था तो उसको उस लड़की को इस हालत में देख कर उस पर दया आ गयी। उसने उस लड़की को अपने साथ अपने खच्चर पर बिठा लिया और उसको अपने घर ले गया।

लड़की ने उस आदमी से नीचे देखने के लिये कहा तो उस आदमी ने नीचे देखा। उसने देखा कि वहाँ तो मोती और चाँदी पड़ी हुई है। ये वे मोती और चाँदी थे जो उस लड़की के रोते समय गिर गये थे। उस आदमी ने उनको उठा लिया और उनको बाजार में बेच आया।

उनको बेचने से उसको 1000 क्राउन से भी ज़्यादा मिले। इतना पैसा देख कर वह तो उस लडकी की सहायता करके बहुत खुश हो गया।

अब वह लड़की कोई काम तो कर नहीं सकती थी, न ही वह देख सकती थी और न ही वह उसके परिवार की ही कोई सहायता कर सकती थी क्योंकि उसके तो हाथ ही नहीं थे और आँखें भी नहीं थीं।

एक दिन उस लड़की को महसूस हुआ कि कोई साँप उसके पैरों के चारों तरफ लिपट गया है। यह वही साँप था जिसके साथ उसने पहले दोस्ती की थी। उसको खाना खिलाया था और जिसने उसे तीन वरदान भी दिये थे।

साँप ने उस लड़की से पूछा — “क्या तुमको मालूम है कि तुम्हारी बहिन ने राजा के बेटे से शादी कर ली है और क्योंकि राजा मर गया है वह अब रानी बन गयी है। अब उसको बच्चा भी होने वाला है और वह अंजीर खाना चाहती है।”

लड़की ने उस आदमी से कहा — “एक खच्चर पर अंजीर लादो और उसे रानी को दे आओ।”

आदमी बोला — “पर इस समय में मैं अंजीर लाऊँगा कहाँ से? यह तो जाड़े का मौसम है और जाड़े के मौसम में तो अंजीर आती नहीं।”

लड़की बोली – “तुम बागीचे में जाओ तो।”

सो अगली सुबह जब वह बागीचे में गया तो वहाँ उसको एक बड़ा सा अंजीर का पेड़ दिखायी दे गया। उस पर बहुत सारी अंजीरें लगी हुई थीं पर सबसे ज़्यादा आश्चर्य की बात तो यह थी कि उस पर केवल अंजीरें हीं अंजीरें थीं पत्ती कोई नहीं थी। उस आदमी ने दो टोकरियाँ भर कर अंजीर तोड़ीं और अपने खच्चर पर लाद लीं।

उस आदमी ने उस लड़की से कहा — “इन बेमौसम की अंजीरों को राजा को दे कर तो मुझे बहुत सारी कीमत मिलेगी। इनकी तो मैं कोई भी कीमत माँग सकता हूँ। बोलो मैं क्या माँगू?”

लड़की बोली — “तुम उनसे आँखें माँग लेना।”

उस आदमी ने ऐसा ही किया परन्तु न तो राजा ने, न उसकी रानी ने और न रानी की बहिन ने, किसी ने भी उसको अपनी आँखें नहीं दीं।

फिर उस लड़की की बहिनों ने आपस में बात की — “हम उसको अपनी बहिन की आँखें दे देते हैं क्योंकि वे तो हमारे किसी काम की नहीं हैं।” सो उन्होंने अपनी बहिन की आँखें दे कर उस आदमी से वे अंजीरें खरीद लीं।

आँखें ले कर वह आदमी घर वापस आ गया और वे आँखें ला कर उस लड़की को दे दीं। उन आँखों को उसने अपने चेहरे पर फिर से लगा लिया और अब उसको फिर से पहले जैसा ही दिखायी देने लगा।

कुछ दिन बाद रानी की खूबानी खाने की इच्छा हुई तो राजा ने फिर उसी आदमी को बुलवाया और कहा — “अगर तुमने अंजीर की तरह से कहीं से खूबानी का इन्तजाम नहीं किया तो....।

उस आदमी ने यह बात जब उस लड़की को बतायी तो उसने फिर वही कहा — “एक खच्चर पर खूबानी लादो और उसे रानी को दे आओ।”

आदमी बोला — “पर इस समय में मैं खूबानी लाऊँगा कहाँ से? इस मौसम में मुझे खूबानी कहाँ मिलेगी?”

लड़की बोली – “तुम बागीचे में जाओ तो।”

अगले दिन उसके बागीचे में खूबानी का एक पेड़ खड़ा हुआ था। अंजीर के पेड़ की तरह से खूबानी का पेड़ भी खूबानियों से भरा हुआ था पर उस पेड़ पर पत्ती एक भी नहीं थी।

उसने उस पेड़ से दो टोकरी भर कर खूबानियाँ तोड़ीं और दरबार में ले जाने लगा तो उसने फिर से उस लड़की से पूछा — “आज मैं राजा से इन खूबानियों के बदले में क्या माँगू?”

लड़की बोली — “आज तुम उनसे हाथ माँग लेना।”

उस दिन उसने उन खूबानियों की कीमत हाथ माँगी पर कोई भी अपने हाथ काट कर उसे देने को तैयार नहीं हुआ – राजा को खुश करने को भी नहीं।

सो पिछली बार की तरह से मामला फिर से बहिनों के पास आया तो उन्होंने सोचा कि उनकी बहिन के हाथ तो उनके पास बेकार ही पड़े हैं तो क्यों न हम उन्हीं हाथों को इसको दे कर ये खूबानियाँ खरीद लेते हैं।”

सो उन्होंने अपनी बहिन के हाथ उस आदमी को दे कर खूबानियाँ खरीद लीं।

उस आदमी ने वे हाथ ला कर उस लड़की को दे दिये। उस लड़की ने वे हाथ अपने हाथों की जगह लगा लिये और उसके हाथ अब पहले की तरह ही हो गये।

कुछ दिनों बाद रानी को फिर बच्चा हुआ तो वह तो एक बिच्छू था। फिर भी राजा ने एक शानदार नाच का इन्तजाम किया जिसमें सब लोगों को बुलावा भेजा गया।

बुलावा उस आदमी को भी आया जो रानी के लिये अंजीर और खूबानी ले कर गया था। वह लड़की रानी की तरह सजी और उस नाच में गयी। राजा उसको देखते ही उससे प्यार करने लगा। बाद में उसने महसूस किया कि वह तो उसकी असली रानी थी।

जब वह हँसती थी तो उसके सिर से अनार के सोने के दाने गिरते थे। जब वह रोती थी तो मोती और चाँदी गिरते थे। और जब वह हाथ धोती थी तो बरतन मछलियों से भर जाता था।

वे दोनों नीच बहिनें और बिच्छू आग में जला दिये गये। उसी दिन उस लड़की और राजा की शादी की दावत हुई और फिर वे दोनों खुशी-खुशी रहने लगे।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओंको आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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