सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 10 रैवन और एक आदमी // सुषमा गुप्ता

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एक बार की बात है कि एक नौजवान आदमी रैवन लोगों को चाहने लगा जो वहीं पास में उन आदमियों के साथ ही रहते थे।

वह नौजवान उन रैवनों को देखने के लिये हमेशा ही इधर उधर घूमता रहता और कई बार पेड़ों के पीछे से छिप कर उनको देखता।

रैवन लोग बहुत ही तेज़ थे। उन्होंने उसको ऐसा करते देखा तो पर अक्सर उसको टाल दिया। पर एक दिन एक रैवन आदमी उड़ा और उस जगह पहुँच गया जहाँ वह नौजवान छिप कर खड़ा हुआ उनको देख रहा था।

उसने उससे पूछा "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

वह नौजवान बोला - "मैं तुमको कोई नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता। मुझे तो बस तुम लोग अच्छे लगते हो सो मैं तुम लोगों के बारे में कुछ और जानना चाहता हूँ।"

रैवन आदमी यह सुन कर कुछ सन्तुष्ट सा हुआ और बोला - "यह जान कर मुझे बहुत खुशी हुई कि तुम हमारे बारे में ज़्यादा जानना चाहते हो। अगर तुम चाहो तो हम तुमको अपने रहने के ढंग के बारे में सिखा सकते हैं।" वह नौजवान राजी हो गया और रैवन लोगों के साथ रहने लगा।

रैवन लोगों ने उसको अपने रहने के तौर तरीके सिखाये। वह रोज कैसे रहते थे वह सब बताया। काफी समय उनके साथ रहने के बाद रैवन लोगों ने उसे अपने समाज का एक हिस्सा मान लिया।

एक दिन एक रैवन ने उस नौजवान के सिर पर एक गिरी फेंक दी। सारे रैवन लोगों ने उसकी तरफ इशारा किया और इतने ज़ोर से हॅसे कि वे अपनी अपनी शाखों पर से नीचे गिर गये।

वह नौजवान इस बात पर गुस्सा हो गया और उन पर चिल्लाया - "तुम लोगों मुझे क्यों छेड़ रहे हो?"

एक रैवन हॅसते हॅसते रुका और गम्भीर हो कर बोला - "हम को लगा कि तुम अब तक हम लोगों को समझ गये होगे पर इस सब से तो ऐसा लगता है कि तुम हमको अभी तक समझे ही नहीं हो। यह तो एक मजाक था, केवल मजाक। तुमको तो अब तक हमको समझ जाना चाहिये था।"

वह बेचारा नौजवान सन्तुष्ट हो गया और चला गया। फिर कुछ दिन बाद की बात है, जब सब कुछ ठीक हो गया तो एक रैवन ने उस नौजवान के सिर पर अपनी चोंच मार दी। फिर एक और रैवन ने और फिर एक और रैवन ने।

वह बेचारा नौजवान तंग हो कर जंगल की तरफ भागा पर वे रैवन भी उसको तंग करते हुए उसका पीछा करते रहे। तंग हो कर उस नौजवान ने उनको छोड़ने और अपने घर जाने का निश्चय किया।

जब वह अपने घर वापस जा रहा था तो उसी रैवन ने उसको रोका जो उससे सबसे पहले बोला था। उसने उससे पूछा कि वह कहाँ जा रहा था।

नौजवान ने बताया कि वह घर जा रहा था जहाँ आज भी उसके लोग उसको अपने आस पास देखना चाहते हैं।

वह बड़ा रैवन बोला - "तुम अभी तक नहीं समझे। छोटे रैवन लोगों ने तुम्हारे साथ यह सब इसलिये नहीं किया क्योंकि तुम हम लोगों से अलग दिखायी देते हो बल्कि इसलिये किया क्योंकि वे तुमको अपना ही समझते हैं।

तुमको तो अब तक यह मालूम हो जाना चाहिये था कि हम लोग आपस में भी कितना लड़ते झगड़ते हैं। सो बजाय इसके तुम गुस्सा हो और हमको छोड़ कर जाओ तुमको उन लोगों से वापस लड़ना चाहिये जैसे हम आपस में लड़ते हैं।"

कुछ पल रुकने के बाद वह फिर बोला - "वैसे अगर तुम हमें छोड़ कर जाना चाहते हो तो जाओ यह तुम्हारी मरजी है पर मैं तुम्हें यह बता दूँ कि एक तुम ही हो जो हमारे और बहुत लोगों से सबसे ज़्यादा नजदीक हो।

अब बताओ क्या तुम सच में हम लोगों को छोड़ कर जाना चाहते हो जबकि तुम हमारे इतने नजदीक आ गये हो?"

उस नौजवान ने सोचा कि उसका अब अपने पुराने गाँव से तो कोई रिश्ता रह नहीं गया था और रैवन लोग अभी भी उसको बहुत अच्छे लगते थे सो कुछ देर के बाद वह बोला - "ठीक है मैं वापस आता हूँ।"

जैसे ही वह रैवन लोगों के गाँव की तरफ चला एक रैवन ने उसके सिर के ऊपर बीट कर दी। उस नौजवान ने ऊपर देखा और हॅसा और बोला - "यह अच्छा मजाक है बाबा जी।" और उनके गाँव की तरफ बढ़ गया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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