सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 12 रैवन और बतखें // सुषमा गुप्ता

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बहुत दिनों तक रैवन अकेला रहा। फिर वह अकेले रहते रहते थक गया और उसने शादी करने की सोची।

यह पतझड़ के आखिरी दिनों की बात है कि रैवन ने देखा कि बहुत सारी चिड़ियें दक्षिण की तरफ उड़ी जा रहीं हैं। वे सब गरमी वाले देशों की तरफ जा रहीं थी। वह उड़ा और सीधा उनको रोकने के लिये उनके रास्ते में जा कर बैठ गया।

जब वह वहाँ बैठा हुआ था तो उसने देखा कि एक बहुत ही सुन्दर और नौजवान बतख उसकी तरफ चली आ रही है।

उसने उसको देख कर उसके पैरों की तरफ देखना शुरू कर दिया ताकि इस तरह वह उससे अपना मुँह छिपा सके ताकि वह यह न जान सके कि वह एक काला पक्षी था।

जब वह उसके पास आ गयी तो वह बोला - "कौन मुझसे शादी करना चाहता है? मैं बहुत ही अच्छा आदमी हूँ।"

वह बतख कुछ देर तक तो उसकी तरफ बिना ध्यान दिये इधर उधर उड़ती रही और रैवन उसकी तरफ देख कर आहें भरता रहा पर फिर वह बतख वहाँ से चली गयी।

तभी एक और चिड़िया वहाँ से उड़ी। रैवन उसको भी देख कर पहले की तरह से चिल्लाया पर वह भी उड़ गयी।

फिर कुछ और चिड़ियें आयीं और रैवन उनसे भी शादी करने के लिये कहता रहा पर किसी ने उसकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया।

वह इन्तजार करता रहा। काफी देर बाद एक बतख आयी और रैवन पहले की तरह से फिर चिल्लाया - "कौन मुझसे शादी करना चाहता है? मैं बहुत ही अच्छा आदमी हूँ।"

यह सुन कर उस बतख ने अपना मुँह रैवन की तरफ किया। इससे रैवन को लगा कि इस बार शायद उसका काम बन जायेगा। इस उम्मीद में उसका दिल बहुत ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। पर वह बतख भी चली गयी और रैवन फिर वहीं का वहीं खड़ा देखता रह गया।

तभी एक दूसरा बतख परिवार उधर से गुजरा जिसमें दो माता पिता थे, उनके चार बेटे थे और एक बेटी थी। रैवन फिर चिल्लाया - "कौन है जो मुझसे शादी करना चाहता है?"

तुरन्त ही वह पूरा परिवार उसके सामने आ गया तो रैवन ने सोचा कि इस बार उसको पत्नी जरूर मिल जायेगी। उसने चारों तरफ देखा तो उसको पास में पड़ा सुन्दर सा एक छोटा सा सफेद पत्थर दिखायी दे गया जिसमें एक छेद था।

उसने उस पत्थर को उठा लिया और एक लम्बी घास की पत्ती तोड़ कर उसमें उसे पिरो कर अपने गले में लाकेट की तरह पहन लिया। यह करने के बाद उसने अपनी चोंच ऊपर की जिससे वह उसके सिर के ऊपर पहुँच गयी और वह एक जवान काला आदमी बन गया।

उसी समय उन बतखों ने भी अपनी अपनी चोंचें ऊपर खिसका दीं और वे भी सुन्दर इन्सान बन गये। यह देख कर रैवन उन लोगों की तरफ बढ़ा और उस लड़की की शक्ल देख कर बहुत खुश हुआ।

वह उस लड़की की तरफ गया और वह सफेद पत्थर उसको भेंट किया जिसको उस बतख ने तुरन्त ही अपने गले में पहन लिया। यह करके उसने रैवन को यह बताया कि उसने उसको अपना पति मान लिया है।

फिर सब लोगों ने अपनी अपनी चोंचें नीची कर लीं। इससे वे सब फिर से बतखें बन गये और दक्षिण की तरफ उड़ चले।

बतखों के पंख भारी थे और वे उनको धीरे धीरे हिला कर उड़ रहीं थीं जबकि रैवन के पंख बहुत बाहर को निकले हुए थे सो वह उनको उन बतखों के मुकाबले में ज़्यादा तेज़ी से हिला पा रहा था।

बतखों ने उसकी तरफ देखा तो वे उसके उड़ने के ढंग की तारीफ करती हुई बोलीं - "देखो तो वह कितना हल्के से और कितनी सुघड़ता से उड़ रहा है।"

यह सुन कर नयी दुलहिन बहुत खुश हुई कि उसके घर वाले उसके पति के उड़ने के ढंग की कितनी तारीफ कर रहे हैं।

लेकिन रैवन को इतना लम्बा और सारा सारा दिन उड़ने की आदत नहीं थी जैसी कि उन बतखों को थी सो वह बहुत जल्दी ही थक गया।

वह बोला - "हम लोगों को जल्दी ही किसी ऐसी जगह रुक जाना चाहिये जहाँ हम रात को आराम कर सकें।"

सारे बतख इस बात पर राजी हो गये। सो एक अच्छी सी जगह देख कर वे सब आराम करने के लिये रुक गये।

अगली सुबह सब बतखें तो अपनी यात्रा शुरू करने की वजह से बहुत जल्दी उठ गयीं पर रैवन बहुत देर तक सोता रहा। यहाँ तक कि पिता बतख को उसको झकझोर कर उठाना पड़ा।

वह बोला - "जल्दी उठो, जल्दी उठो। हमको यहाँ से जल्दी ही चले जाना चाहिये क्योंकि यहाँ जल्दी ही बरफ पड़ जायेगी। हम यहाँ देर तक नहीं रुक सकते।"

जैसे ही रैवन पूरी तरह जाग गया तो उसने बहाना बनाया जैसे वह भी जल्दी ही जाना चाहता हो जबकि ऐसा नहीं था। पर फिर भी पिछले दिन की तरह से उस दिन भी वह तेज़ी से उड़ता रहा और बतखों का समूह उसकी उड़ने के ढंग की तारीफ करता रहा, खास कर उसकी पत्नी।

वह अपने साथियों से आगे उड़ रहा था और उसकी पत्नी तो उसके उड़ने के ढंग की बहुत ही ज़्यादा तारीफ करती रही। ऐसा करते हुए वह अपने चारों भाइयों की तरफ देख लेती थी जिससे वे शरमिन्दा हो रहे थे। कुछ ही देर में वे रैवन से जलने भी लगे।

एक दिन वे समुद्र के किनारे रुके और वहाँ उन्होंने बैरीज़ खायीं जो वहाँ बहुत लगी हुईं थीं। फिर वे अपनी अपनी जगह देख कर सो गये।

सुबह सारी बतखें नाश्ता किये बिना ही उड़ने के लिये तैयार थीं पर रैवन को तो और बैरीज़ खानी थीं। पर पिता बतख ने कहा कि वे वहाँ और इन्तजार नहीं कर सकते थे और रैवन उनको मना नहीं कर सकता था। दुलहिन के भाइयों ने भी चुपचाप अपने पिता से वहाँ अब और न रुकने के लिये कहा।

उधर रैवन समुद्र के ऊपर से इतनी लम्बी उड़ान भरने से डरता था क्योंकि उसने पिता बतख को यह कहते हुए सुन लिया था कि हम इस समुद्र को पार करते समय बीच में केवल एक बार ही रुकेंगे।

समुद्र के बीच में एक टापू है वहाँ हम लोग थोड़ी देर रुक कर आराम करेंगे और फिर समुद्र के दूसरे किनारे की तरफ उड़ चलेंगे।

रैवन को यह कहते में शरम लगती थी कि वह समुद्र पार तक की इतनी लम्बी उड़ान नहीं भर सकता था सो वह कुछ नहीं बोला और वह भी उनके साथ ही उड़ लिया। वे सब उड़ चले।

बतखें सब धीरे धीरे उड़ती रहीं। काफी देर तक उड़ने के बाद रैवन उनसे पिछड़ने लगा। उसके बड़े बड़े फैले पंख दर्द करने लगे थे। पर बतखें सब आराम से और बिना थके उड़ रहीं थीं।

उधर पंखों के दर्द करने की वजह से अब उसकी उड़ान में भी वह बात नहीं थी जिसकी सारे बतख पहले तारीफ कर रहे थे। वह बहुत कोशिश करता उन बतखों के साथ उड़ने की पर वह उनसे ज़्यादा और और ज़्यादा पीछे रहता गया।

जब बतखों ने उसको अपने साथ नहीं देखा तो उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा तो वह तो काफी पीछे रह गया था। दुलहिन के भाई बोले - "अरे हम तो समझ रहे थे कि वह बहुत हल्का है और चुस्त है पर वह तो हमसे बहुत पीछे रह गया।"

पिता बतख बोला - "ऐसा लगता है कि वह थक गया है। हमको उस पर ज़्यादा ज़ोर नहीं डालना चाहिये। मुझे लगता है कि हमको कहीं आराम करने के लिये रुक जाना चाहिये ताकि वह भी थोड़ा आराम कर सके।"

सारे बतख पानी के बहुत करीब आ कर उसमें डूब से गये और रैवन बड़ी मुश्किल से उड ़कर आता हुआ हाँफता हुआ सा उनकी पीठ पर आ कर गिर गया।

कुछ देर में जब उसकी साँस में साँस आयी तो वह अपने सीने पर एक हाथ रखते हुए बोला - "यहाँ पर मेरे एक बार एक लड़ाई में एक तीर का अगला हिस्सा रह गया था जो मुझे बहुत दर्द करता है इसी लिये मैं थोड़ा पीछे रह गया था।"

फिर उसने अपनी पत्नी का सिर अपनी छाती पर रखा और उससे कहा कि अगर वह चाहे तो वह भी तीर के उसके अगले हिस्से को उसकी छाती में महसूस कर सकती थी।

पर वहाँ अगर वह तीर का अगला हिस्सा होता तो वह बेचारी महसूस करती पर जब वहाँ कुछ था ही नहीं तब वह क्या महसूस करती पर हाँ उसने उसके दिल का ज़ोर ज़ोर का धड़कना जरूर महसूस किया।

लेकिन उस बेचारी ने कुछ कहा नहीं क्योंकि उसके भाई फुसफुसा रहे थे - "हमको इसकी तीर के अगले हिस्से के इसके दिल में रह जाने की कहानी पर विश्वास नहीं होता। कोई भी आदमी तीर का अगला हिस्सा इतने दिनों तक अपने दिल में लिये हुए कैसे रह सकता है?"

वे सब रास्ते में र्23 बार और रुके और वे जब भी रुके रैवन उनकी पीठ पर उसी तरीके से गिरा जैसे वह पहले गिरा था।

लेकिन जब उनको समुद्र का दूसरा किनारा दिखायी दिया तो पिता बतख बोला - "अब हम तुम्हारा इन्तजार नहीं कर सकते।" क्योंकि किनारा देख कर सब बतख वहाँ पहुँचने के लिये बेचैन हो रहे थे।

सो सब बतख उठे और तेज़ी से उड़ चले और रैवन पानी की तरफ नीचे और नीचे गिरता चला गया।

जब समुद्र की लहरें उसको छूने लगीं तो वह अपनी पत्नी से चिल्ला कर बोला - "अरे मेरा वह सफेद पत्थर तो मुझे वापस करती जाओ। वह मेरा जादुई पत्थर है। मेरा वह पत्थर फेंक दो मुझे।"

वह इसी तरह रोता रहा जब तक कि उसके पंखों की ताकत बिल्कुल खत्म नहीं हो गयी। फिर वह पानी पर तैरता रहा और उधर बतखों ने धरती पर कदम रखा।

उसने पानी पर से ऊपर उठने की बहुत कोशिश की पर उसके पंखों ने जवाब दे दिया और वह धरती के किनारे और समुद्र के बीच बहता रहा।

समुद्र की लहरें उसके ऊपर आती जाती रहीं और वह पानी में भीगता रहा। बड़ी मुश्किल से वह अपनी चोंच साँस लेने के लिये बाहर निकाल पा रहा था। काफी देर के बाद एक बड़ी लहर आयी और उसको किनारे पर छोड़ गयी।

जैसे ही उस बड़ी लहर ने उसको किनारे पर छोड़ा उसने अपने पंजे रेत में गड़ा दिये ताकि वह वापस उस लहर के साथ समुद्र में न जा सके। धीरे धीरे जब वह कुछ ठीक हालत में आया तब भी वह किनारे पर एक बहुत ही दुखी आत्मा की तरह पड़ा हुआ था।

धीरे धीरे वह झाड़ियों के पास पहुँचा। उसने अपना रैवन का कोट उतार दिया, अपनी चोंच ऊपर की और एक छोटा काला आदमी बन गया।

"ओह, आज से मैंने इन बतखों से हमेशा के लिये तौबा कर ली।"

पता नहीं वह बेचारा वापस भी अपने देश कैसे पहुँचा होगा? उफ रैवन की शादी ...

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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