सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 15 रैवन और उसकी दादी // सुषमा गुप्ता

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एक बड़े गाँव के एक किनारे पर एक दादी माँ अपने पोते रैवन के साथ अपने पुराने घर में रहती थी। वे लोग गाँव के अन्दर न रहने की बजाय गाँव से थोड़ी दूर पर इसलिये रहते थे क्योंकि गाँव के लोग उनको पसन्द नहीं करते थे।

जब लोग समुद्र में से कोई कौड मछली पकड़ लेते तब रैवन उनके पास जाता और उनसे कुछ खाना माँगता पर वे लोग उसको कभी अपने शिकार में से थोड़ा सा हिस्सा भी नहीं देते थे।

जब वे लोग समुद्र का किनारा छोड़ कर घर आ जाते तो वह वहाँ के कूड़े में से कुछ खाना निकाल लाता, यहाँ तक कि बीमार मछलियाँ भी, और इन्हीं पर वह और उसकी दादी गुजारा करते।

एक बार बहुत ज़ोर का जाड़ा पड़ा। शिकार करना बहुत मुश्किल हो गया। खाना मिलने में भी बहुत मुश्किल होने लगी। गाँव में भी लोग भूखे मरने लगे। यहाँ तक कि गाँवों के सरदारों के पास भी बहुत कम खाना रह गया था।

तब उस गाँव के सरदार ने गाँव के सब आदमियों को बुलाया और उनसे प्रार्थना की कि वे दूसरे लोगों के लिये भी काफी खाना इकठ्ठा करने की कोशिश करे ताकि लोग ज़िन्दा रह सकें नहीं तो वे सभी भूख से मर जायेंगे।

उसके बाद ही सरदार ने लोगों से यह भी कहा कि वह अपने बेटे की शादी करना चाहता है और उसके लिये वह लड़की गाँव की लड़कियों में से ही चुनेगा। सो गाँव की सारी लड़कियाँ अपने सबसे अच्छे कपड़े और गहने पहन कर वहाँ इकठ्ठी हों।

कुछ समय के लिये लोग अपनी भूख भूल गये। जब वहाँ लड़कियाँ इकठ्ठी हुईं तो सरदार ने उनको देखना शुरू किया और गाँव की एक सबसे सुन्दर लड़की को अपनी बहू चुन लिया।

सरदार के लड़के और उस लड़की की शादी हो गयी। शादी के बाद एक बहुत बड़ी दावत दी गयी। पर उस सबके जल्दी ही बाद भूख का रोना फिर शुरू हो गया।

जब शादी की दावत हो रही थी तब रैवन अपने घर के बाहर एक खम्भे के ऊपर बैठा अपने आस पास का सब कुछ देख और सुन रहा था कि वहाँ क्या क्या हो रहा था।

जब दावत खत्म हो गयी तो रैवन उड़ कर अपनी दादी माँ के पास गया और बोला - "दादी माँ, मैं भी शादी करना चाहता हूँ।"

दादी माँ ने उसकी इस बात का कोई जवाब नहीं दिया तो वह अपना काम करने चला गया - यानी अपने छोटे से घर के लिये खाना ढूँढने।

वह रोज समुद्र के किनारे जाता और वहाँ उसको कुछ मरी हुई मछलियाँ और चिड़ियाँ मिल जातीं। वही ले कर वह घर आ जाता। वह वहाँ से अपने दोनों के खाने से ज़्यादा ही खाना ले कर घर लौटता था।

जब वह गाँव में था तो उसको लगा कि अकाल से तो गाँव का हाल बहुत ही बुरा हो गया है। सो वह गाँव के सरदार के पास गया और बोला - "अगर मैं तुम्हें खाना ला कर दूँ तो तुम मुझे क्या दोगे?"

सरदार को उसकी बात सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस अकाल के समय में वह उसको खाना कहाँ से ला कर देगा। वह उसकी तरफ आँखें फाड़ फाड़ कर देखने लगा।

पर फिर जब होश में आया तो बोला - "अगर तुम मुझे खाना ला कर दोगे तो मैं अपनी सबसे बड़ी लड़की की शादी तुमसे कर दूँगा।"

रैवन के लिये इससे ज़्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती थी सो वह वहाँ से तुरन्त ही खुशी खुशी उड़ गया।

वह अपनी दादी माँ के पास पहुँचा और उससे जा कर बोला - "दादी माँ, चलो अपना घर साफ करते हैं। तुम मेरी दुलहिन के लिये सब कुछ साफ करो। मैं सरदार को खाना दे कर आता हूँ और इस खाने के बदले में उसने मुझे अपनी सबसे बड़ी लड़की देने का वायदा किया है।"

उसकी दादी माँ आश्चर्य से बोली - "अरे तू शादी करेगा? हमारा घर तो बहुत छोटा सा है तू अपनी पत्नी को रखेगा कहाँ?"

"काँव काँव, तुम फिकर मत करो दादी माँ। जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो।"

वह खुशी के मारे चिल्लाया और फिर अपनी चोंच से उसको वह सब जल्दी करने को कहा जो उसको अपनी दुलहिन वहाँ लाने के लिये जरूरत थी।

दूसरे दिन सुबह रैवन जल्दी ही उड़ गया और शाम को सूखी सालमन मछली का एक गठ्ठर अपने पंखों में ले कर लौटा।

आ कर वह अपनी दादी माँ से बोला - "चलो दादी माँ, मेरे साथ सरदार के घर चलो।"

जब वे दोनों सरदार के घर पहुँचे तो रैवन ने मछली का गठ्ठर सरदार को दे दिया और सरदार ने अपनी सबसे बड़ी बेटी की शादी उसके साथ कर दी।

रैवन अपनी दादी माँ और अपनी पत्नी से पहले ही घर आ गया। उसने अपने घर में से पुराने तिनके और बिछौना निकाल कर अपना घर साफ किया। जब दोनों स्त्रियाँ घर आयी तो उन्होंने अपने छोटे से घर को खाली पाया।

तो दादी माँ ने रैवन को डाँटा - "यह तू क्या कर रहा है? घर की सारी चीज़ें बाहर क्यों फेंक रहा है?"

रैवन ने कुछ तीखी आवाज में जवाब दिया - "देख नहीं रही हो दादी माँ कि मैं घर साफ कर रहा हूँ?"

रात को रैवन ने अपने घर में एक बड़ा सा सफेद पंख बिछाया और अपनी पत्नी को उस पर लिटाया। फिर उसको एक दूसरा सफेद पंख ओढ़ा दिया।

रैवन की पत्नी की रात बहुत बुरी बीती क्योंकि रैवन में से उसको मछली की बू आ रही थी और उस मछली की बू ने उसको एक पल को भी नहीं सोने दिया। उसने सोचा कि सबेरा होते ही वह यह घर छोड़ देगी।

पर जब वह सुबह उठी तो उसने फिर से सोचा कि वह वहीं रहेगी और रैवन के तौर तरीकों की आदत डालेगी। पर सारा दिन वह कुछ तो नाखुश सी रही और कुछ चिन्ता करती रही। रैवन ने उसे खाना दिया तो उसने खाना भी नहीं खाया।

दूसरी रात को रैवन ने उससे कहा कि वह अपना सिर उसकी छाती पर रखे और उसकी बाँहों में आराम करे पर बहुत कहने सुनने पर ही वह ऐसा कर सकी।

इस तरह उसकी दूसरी रात भी उसके लिये पहली रात से कोई ज़्यादा अच्छी नहीं गुजरी। सो वह सुबह ही उठी और रैवन की चोरी से अपने पिता के घर चली गयी और वहाँ जा कर उसने अपने पिता को सब कुछ बताया।

सुबह को रैवन जब उठा तो अपनी पत्नी को घर में न देख कर अपनी दादी माँ से पूछा कि क्या वह उसकी पत्नी के बारे में कुछ जानती थी कि वह कहाँ है?

दादी माँ ने रैवन को बताया कि वह तो उसके बारे में कुछ नहीं जानती थी। तब रैवन ने उसको सरदार के घर जाने और अपनी पत्नी को वापस लाने के लिये कहा।

दादी माँ रैवन से बहुत डरती थी। वह उसको ना नहीं कह सकती थी सो वह बेचारी उसकी पत्नी को वापस लाने के लिये सरदार के घर चल दी।

जब वह सरदार के घर आयी तो सरदार ने उसको वहाँ से धक्का दे कर बाहर निकाल दिया। उसने आ कर यह सब रैवन को बताया।

जाड़े के बाद गरमी आ गयी थी और गरमी आराम से निकल गयी थी। पर गरमी के बाद फिर जाड़ा आ गया और एक बार फिर अकाल की सी हालत हो गयी।

पर रैवन और उसकी दादी माँ के पास पिछले जाड़े की तरह इस साल भी खाने के लिये बहुत खाना था और घर गरम रखने के लिये बहुत लकड़ी थी। पर दूसरे लोग फिर से खाने के लिये तरस रहे थे। सो रैवन ने एक बार फिर शादी का विचार किया।

इस बार वह एक बहुत सुन्दर लड़की थी जो गाँव के दूसरे कोने पर रहती थी। उसने अपनी दादी माँ से उसके बारे में बताया और कहा कि वह उस लड़की से शादी करना चाहता था।

फिर वह दादी माँ से बोला कि वह उस लड़की के घर जा कर उसको उसके लिये ले कर आये क्योंकि वह लड़की उसे पसन्द थी और वह उससे शादी करना चाहता है।

"ओह, तो तू उससे शादी करना चाहता है? तेरी पहली पत्नी तो तेरे साथ रह नहीं पायी क्योंकि तुझमें से बहुत बू आती है। कोई लड़की तो तुझसे शादी करना चाहती नहीं और तू शादी के लिये इधर उधर मारा मारा फिर रहा है।" दादी माँ बोली।

"काँव काँव, तुम मेरी बू की चिन्ता मत करो दादी माँ। जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो।"

कह कर रैवन ने फिर उसको अपनी चोंच मार मार कर उकसाना शुरू किया जब तक वह उस लड़की के घर खुशी खुशी जाने के लिये तैयार नहीं हो गयी। सो उसको जाना ही पड़ा।

दादी माँ के जाने के बाद रैवन बहुत ही बेचैन हो गया और इस बैचैनी में वह अपने घर और पहाड़ियों के आस पास कूदने लगा। वह अपनी पत्नी की एक झलक देखने के लिये बेचैन था।

फिर जल्दी जल्दी उसने अपना घर साफ करना शुरू किया। उसने अपने घर में से पुराने तिनके, बिछौना, टोकरियाँ और बहुत सारी चीज़ें उठा कर बाहर फेंक दीं।

जब उसकी दादी माँ लौट कर आयी तो उसने रैवन को फिर बहुत डाँटा पर रैवन ने उसकी डाँट की कोई परवाह नहीं की।

यह नयी दुलहिन भी उसकी पहली पत्नी की तरह उसके पंखों में कस कर जकड़ी हुई थी और उसी की तरह से इसकी भी रात बहुत खराब गुजरी।

पर इसने निश्चय कर रखा था कि जहाँ तक होगा वह रैवन की बू सहेगी। इसको यहाँ कम से कम इस बात का तो भरोसा था कि उसको खाने की कोई कमी नहीं रहेगी।

उसकी दूसरी रात भी पहली रात की तरह ही बीती। पर उसने निश्चय कर लिया था कि वह अगले वसन्त तक वहाँ रहने की कोशिश करेगी।

तीसरे दिन जब रैवन ने देखा कि उसकी पत्नी तो वहीं थी कहीं नहीं गयी तो वह बहुत खुश हो गया। उसने अपनी दादी माँ से कहा कि मैं कल एक बड़ी व्हेल ले कर आऊॅगा और जब तक मैं लौटूँ तब तक तुम मेरी पत्नी के लिये एक कमर की पेटी और एक जोड़ी जूता बना कर रखना।

दादी माँ बोली - "पर तू इतनी बड़ी व्हेल लायेगा कैसे? बड़े बड़े शिकारी तक तो उसको मार नहीं सकते तू कैसे मारेगा?"

क्योंकि दादी माँ रैवन के गुस्से से डरती थी इसलिये रैवन उसको थोड़ा डाँट कर बोला - "काँव काँव, दादी माँ चुप रहो और जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो।"

अगले दिन सुबह सूरज निकलने से पहले ही रैवन समुद्र की तरफ उड़ गया। रैवन के जाने के बाद दादी माँ नयी दुलहिन के लिये पेटी और जूते बनाने में लग गयी। नयी दुलहिन उसको वे चीज़ें बनाते देखती रही और उससे बातें भी करती रही।

दोपहर के समय दोनों ने रैवन को समुद्र के किनारे की तरफ व्हेल ले जाते हुए उड़ते हुए देखा। दादी माँ ने बहुत बड़ी आग जलायी।

नयी दुलहिन ने भी अपनी नयी पोशाक परका पहनी और उसे कमर की पेटी से बाँध लिया। फिर उसने अपने नये जूते पहने और चाकू पत्थर पर घिस कर तेज़ किया। चाकू ले कर वह समुद्र के किनारे अपने पति से मिलने चल दी।

जैसे ही रैवन घर के पास आया वह ज़ोर से बोला - "दादी माँ जाओ, गाँव में जाओ और गाँव के सब लोगों से कहो कि मैं एक बहुत बड़ी और मोटी व्हेल ले कर आया हूँ।"

दादी माँ यह सुन कर जितनी तेज़ भाग सकती था भाग कर गाँव गयी और गाँव जा कर सबको यह खुशी की खबर सुनायी।

भूख के मारे जो आधे मरे से पड़े थे यह सुन कर उनमें भी जान आ गयी। कुछ अपने चाकू तेज़ करने में लग गये। कुछ ने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन लिये।

पर बहुत सारे लोग तो अपने अपने चाकू ले कर व्हेल को देखने के लिये समुद्र के किनारे की तरफ ऐसे ही भाग लिये जैसे वे बैठे थे। वहाँ जा कर सबने देखा कि रैवन समुद्र में व्हेल के ऊपर बैठा ऊपर नीचे कूद रहा है।

हर कुछ पल के बाद रैवन अपने थैले में से एक पत्थर निकालता, कुछ सोचता और फिर उसी थैले में वापस रख लेता। जब सरदार और उसके रिश्तेदार कुछ पास आ गये तो उसने उन सबको दूर भगा दिया।

उनको तो बस दूसरों को खाते और खुशी मनाते देख कर ही सन्तुष्ट रहना था। हाँ वे थोड़ी बहुत खाल घर ले जा सकते थे। और फिर सारे गाँव वाले सरदार से उसको ले सकते थे।

रैवन की पहली पत्नी यानी सरदार की सबसे बड़ी बेटी के रैवन से एक लड़का भी था - छोटा रैवन। वह जब समुद्र के किनारे आयी थी तो रैवन के उस बेटे को भी साथ लायी थी और उस समय उसको गोद में लिये थी।

उसको गोद में लिये लिये ही वह रैवन के सामने आयी और बोली - "देखो यह तुम्हारा बेटा है।" पर रैवन ने उसकी तरफ बिल्कुल भी नहीं देखा।

उसने रैवन का ध्यान उसको बार बार पुकार कर उसके बच्चे की तरफ खींचने की कई बार कोशिश की। पहले तो रैवन ने उसकी तरफ कोई ध्यान ही नहीं दिया पर फिर आखिर रैवन को अपनी पुरानी पत्नी से कहना ही पड़ा - "पास आओ, जरा और पास आओ।"

उसके कहने पर वह उसके पास आयी भी पर जब वह उसकी बू बिल्कुल ही सहन नहीं कर पायी तो वहाँ से चली गयी।

उस दावत के बाद बहुत लोग मर गये। कुछ लोग तो इतना ज़्यादा खा गये थे कि कुछ देर के बाद वे वहीं मर गये। कुछ ने अपने घर व्हेल के माँस से इतने ज़्यादा भर लिये थे कि उनका उसी की वजह से दम घुट गया।

पूरे गाँव मे केवल तीन लोग बचे - रैवन, रैवन की दादी माँ और रैवन की नयी पत्नी। आज जितने रैवन तुम सब लोग देखते हो वे सब उन्हीं के बच्चे हैं।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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