सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 16 शिकारी रैवन // सुषमा गुप्ता

एक बार जब रैवन छोटा था तो वह आर्कटिक समुद्र के किनारे किनारे उड़ रहा था कि उसको उस समुद्र के किनारे पर एक बड़ी उम्र वाली बतख बैठी दिखायी दी।

उसको देख कर वह नीचे उतर आया और उसके पास जा कर बोला - "हैलो मैम।"

बतख बोली - "हैलो रैवन, आओ मेरे साथ खाना खा लो।"

रैवन बोला - "धन्यवाद मैम, आज सुबह मैंने काफी सारा नाश्ता किया था इसलिये मेरा पेट अभी भरा हुआ है। मैं तो इधर सील मछली ढूँढने चला आया था क्योंकि जब समुद्र में ज्वार जाता है तो वह बहुत सारी सील मछली छोड़ जाता है।"

"मैं तो समुद्र में रहने वाली हूँ सो मेरा परिवार तो शैल फिश पर गुजारा करता है, और तुम?" बतख ने पूछा।

रैवन बोला - "मैं समुद्री दूध पिलाने वाले जानवर और धरती पर रहने वाले जानवर खाता हूँ। मैं बहुत अच्छा शिकारी हूँ। देखो न, आज कितना अच्छा दिन हो रहा है। तुम्हारा परिवार है?"

बतख बोली - "नहीं, अभी नहीं। मेरी माँ कहती है कि जब मैं बड़ी हो जाऊॅगी तब मेरा परिवार होगा। और तुम?"

रैवन बोला मेरे माता पिता भी यही कहते हैं। और दोनों हॅस दिये।

रैवन फिर बोला - "अगर तुम कुछ शैल फिश इकठ्ठा कर लो तो मैं उनको तुम्हारे लिये साफ कर दूँगा और इस रेत में उनको गाड़ भी दूँगा।"

बतख ने कहा यह तो बड़ी अच्छी बात है पर उस ढेर के पास कोई निशान लगा देना ताकि मुझे जब उनकी जरूरत हो तो मैं उनको जल्दी से और आसानी से ढूँढ सकूँ।

बस उसके बाद तो वे दोनों सारे वसन्त भर के लिये एक दूसरे के साथी बन गये। जल्दी ही बरफ भी पिघलने लगी और उसके साथ साथ बढ़ने लगा दोनों का प्रेम।

पर अचानक एक दिन....

एक सुहानी शाम को रैवन ने बतख से एक अजीब सा सवाल पूछा - "क्या तुम मेरी पत्नी बनोगी? जब तुम हमारे लिये घोंसला बनाओगी तो मैं उसको बनाने में तुम्हारी सहायता करूंगा।"

रैवन को यह सुन कर और भी ज़्यादा आश्चर्य हुआ जब बतख ने उससे शादी के लिये हाँ कर दी।

रैवन तो यह सुन कर इतना खुश हुआ कि वह तो अपनी होने वाली पत्नी यानी बड़ी उमर वाली बतख के चारों तरफ नाचने लगा। उस दिन के बाद से वे दोनों साथ साथ खुशी खुशी रहने लगे। धीरे धीरे उनके पाँच बच्चे भी हो गये।

जैसा कि उसने बतख से वायदा किया था वह बतख की हमेशा सहायता करता और अपने पाँच बच्चों वाले परिवार की रक्षा करता।

उसके तीन बच्चे तो अपनी माँ की तरह भूरे थे और उसके दो बेटे बिल्कुल अपने पिता पर गये थे। उनके पंख बिल्कुल काले थे और उनके पंजे भी नारंगी थे।

बतख अपने बच्चों को बड़ा होते हुए देखती रही। उसके बच्चे अपने माँ बाप से बिल्कुल मिलते जुलते थे। उसके तीन बच्चे उसकी तरह बरताव करते थे और दूसरे दो अपने पिता की तरह बरताव करते थे।

जब पतझड़ खत्म होने को आया तो उसके बच्चे जवान हो गये थे। इस समय में कुछ चिड़ियाँ और कुछ जानवर सरदी से बचने के लिये गरम देशों की तरफ चले जाते हैं।

ठंड शुरू होने वाली थी सो एक दिन बतख ने अपने बच्चों को अपने इस जाने के बारे में उनको समझाया।

बतख ने कहा - "बच्चो, जब जाड़ा आता है तो हम उन दिनों में अपने गरमी वाले घरों में नहीं रह सकते हैं। जब मैं दक्षिण में समुद्र की तरफ जाऊॅगी तो अगर तुम भी मेरे साथ चलना चाहो तो मेरे साथ चलना।

तुम्हारे पिता तो सारे साल यहाँ रह सकते हैं पर मैं यहाँ नहीं रह सकती क्योंकि मेरे लिये यहाँ बहुत ठंडा है। उन दिनों समुद्र यहाँ जम जाता है तो हमें खाना नहीं मिल पाता।

अगर तुम सब मेरे साथ चलना चाहो तो मुझे शाम तक बता देना। हम सब कल सुबह जल्दी ही अपनी यात्रा पर रवाना हो जायेंगे। ठीक है?"

रैवन बोला - "मुझे और मेरे बेटों को अभी सोचना पड़ेगा। मैं सोचता हूँ कि मैं वहाँ तक तुम लोगों के साथ चलूँगा जहाँ तक मैं उड़ सकता हूँ।

और बेटों, तुम लोग अपनी माँ के साथ जा सकते हो क्योंकि तुम लोग यहाँ की ठंड में जम जाओगे। पर तुम घबराओ नहीं हम लोग अपनी गरमियाँ फिर से एक साथ गुजारेंगे।"

सो सारे बच्चों ने दक्षिण की तरफ उड़ने का तय कर लिया। हालाँकि पिता को बच्चों के बिना अच्छा नहीं लग रहा था पर फिर भी उसने ऊपर से कुछ दिखाया नहीं।

वह बोला - "मैं तुम लोगों के साथ समुद्र के किनारे किनारे टिकीगाक तक चलूँगा जो कि चकची की खाड़ी के पास है।"

उसका एक बेटा बोला - "ठीक है पिता जी। माँ और हम बच्चे आपके साथ एक दिन और एक रात वहाँ समुद्र के किनारे बितायेंगे।"

सो वे सब सबेरे उड़ चले। टिकीगाक पहुँचने में उनको 5 घंटे लग गये। टिकीगाक में ऐस्किमो लोग रहते हैं।

शाम को पिता रैवन ने कहा - "मैं समुद्र के पार अपने परिवार को विदा कहने जाऊॅगा और फिर जमीन पर लौट आऊॅगा।" यह सब उसके परिवार को ठीक लगा।

रैवन बहुत ऊॅचा उड़ गया जबकि उसका परिवार वहीं समुद्र की लहरों से खेलता रहा। उसको लगा कि समुद्र की ऊॅची ऊॅची लहरें उसको बीमार कर देतीं हैं इसलिये मुझे धरती पर वापस लौट जाना चाहिये।

सो वह बहुत ज़ोर से अपने परिवार से बोला - "बाई बाई ओ बतख, बाई बाई मेरे बच्चों।" जवाब में सबने अपने अपने पंख फड़फड़ा दिये।

जैसे ही वह वहाँ से गया वह रो पड़ा उसने सोचा कि सारा जाड़ा अकेले काटना कितना मुश्किल है। मैं कहाँ रहूँगा, किसके साथ रहूँगा। वह बेचारा तो अपने आँसू भी न पोंछ सका जब तक वह नीचे धरती पर नहीं उतर गया।

फिर उसने सोचा कि वह समुद्र की पानी की सतह पर ही तैरेगा। पर जब उसने तैरना शुरू किया तो वह डूबने लगा। समुद्र की लहरें उसको चारों तरफ से थपेड़े मार रहीं थीं।

बस उसके दिमाग में एक ही बात आयी कि हे भगवान कोई चमत्कार हो जाये। और लो चमत्कार हो गया।

उसको अपने सामने एक बड़ा सा दरवाजा दिखायी दे गया और वहाँ से आवाज आयी - "रैवन, अन्दर मेरे कमरे में आओ और अपने आपको सुखा लो।"

रैवन को यह सुन कर बहुत अच्छा लगा। वह उस दरवाजे से अन्दर चला गया। जैसे ही वह अन्दर गया दरवाजा बन्द हो गया। वह बोला - "आपने मुझे अन्दर बुलाया इसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद।"

उस मकान का न दिखायी देने वाला मालिक रैवन को एक कमरे में ले गया और उसको वहाँ बैठने को कहा। वह बोला - "रैवन, आओ यहाँ बैठो और आराम करो। पर देखो मेरी छत में लगा यह लैम्प मत छूना। अगर तुमने इसे छुआ तो हम और तुम दोनों ही अॅधेरे में होंगे।"

रैवन बोला मैं नहीं छुऊॅगा। वह वहाँ बहुत देर तक बैठा रहा और उस झप झप करते लैम्प को तकता रहा। तभी उसने सोचा "अरे मैं कहाँ हूँ? और यह कमरा इतना अॅधेरा क्यों है?"

कुछ देर बाद उसकी उत्सुकता और बढ़ गयी। वह लैम्प की तरफ उड़ा और उसने उसको अपने चाकू से कई बार छुआ। यह चाकू वह हमेशा ही ऐसे समय के लिये अपने पंखों के अन्दर छिपा कर रखता था।

अचानक ही रोशनी चली गयी। जब रैवन नीचे की तरफ आया तो बड़े ज़ोर से फर्श से टकरा गया। उस अॅधेरे में वह बेचारा इधर से उधर टकराता रहा।

तभी उसको अपने चारों तरफ एक बू आयी और उसको अपने पैर कुछ चिपके चिपके से लगे। उसके पंख भी आपस में चिपकने लगे थे। और अब तो वह साँस भी नहीं ले पा रहा था। उसका दम घुट रहा था। वह क्या करे उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, वह रोने लगा। वह बहुत प्यासा था सो उसने अपने ही आँसू पीने शुरू कर दिये जिससे उसको कुछ आराम आया।

जब घर ने हिलना बन्द कर दिया तो उसने सोचा कि वह अपने चाकू से उस मकान की दीवार में काट कर एक छेद कर लेगा जिससे वह बाहर जा सकता था सो उसने अपने चाकू से एक छेद बनाने की कोशिश की।

वह सोच रहा था कि उस मकान की दीवार शायद लकड़ी की होगी सो वह कुछ कुछ दीवार काटने के बाद उसमें हाथ डाल कर देख लेता था। वह काटता रहा और उस कटे हुए टुकड़े को वह पीछे धकेलता रहा।

काफी कोशिशों के बाद वह कटा हुआ टुकड़ा भी धीरे धीरे हिलने लगा था और रैवन भी इतनी मेहनत के बाद अपने आपको ज़्यादा ताकतवर महसूस करने लगा था।

जब उसने उस कटे टुकड़े को शायद सौवीं बार धकेला तो वह बाहर की तरफ गिर पड़ा। छेद होने से उस छेद में से रोशनी अन्दर आने लगी और एक पल के लिये उसे लगा जैसे वह अन्धा हो गया है। सो वह उस छेद के सहारे एक तरफ को खड़ा हो गया।

उसको पता नहीं वह वहाँ कब तक खड़ा रहा पर कुछ देर बाद उसके मुँह से निकला - "भगवान का लाख लाख धन्यवाद है कि मैं ताजा हवा में साँस ले पा रहा हूँ।"

उसने उस छेद में से बाहर झाँक कर देखा तो उसको समुद्र का लम्बा किनारा दिखायी दिया। उसको देख कर रैवन ने खुशी से हॅसना चाहा पर वह हॅस ही नहीं सका क्योंकि उसके पंख चिपके हुए थे। वह तो अपने चेहरे की खाल को भी नहीं हिला सकता था।

वह बस केवल कुछ आवाजें ही निकाल सका जिससे दूसरी चिड़ियों का ध्यान उसकी तरफ गया और वे उस घर के आस पास आ कर इकठ्ठी हो गयीं।

कुछ देर में रैवन भी अपने काटे हुए छेद में से बाहर निकल गया पर निकलते ही वह समुद्र के किनारे के उथले पानी में जा गिरा।

जब वह उसमें नहा रहा था तो उसने देखा कि समुद्र का पानी लाल हो रहा था। वह तुरन्त ही कूद कर किनारे पर पहुँच गया और उसने पलट कर देखा... ।

क्या तुम जानते हो कि उसने क्या देखा? वहाँ कोई घर नहीं था बल्कि वहाँ था एक बहुत बड़ा जानवर। उसको अभी तक यही पता नहीं था कि उसने अब तक क्या किया। उसने एक बहुत बड़ी व्हेल मार दी थी।

उसके मुँह से निकला - "अरे मैं तो एक बहुत बड़ा शिकारी हूँ ओ मेरी रानी।"

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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