सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 17 जब रैवन की आँखें खो गयीं // सुषमा गुप्ता

image

एक बार रैवन एक नदी के किनारे बैठा था। उसने नदी के ऊपर की तरफ देखा, नीचे की तरफ देखा पर उसे कोई कहीं दिखायी नहीं दिया। उसकी आँखें थक गयी थीं सो उसने अपनी आँखें निकाल कर बाहर रख दीं।

आँखें रख कर वह भूल गया कि वे उसने कहाँ रखी थीं और वह सोने चला गया कि उसकी आँखों ने कहा कि नदी के किनारे पर कोई है।

उसने सोचा कि उसकी आँखें उससे झूठ बोल रही हैं सो वह अपने बिस्तर पर ही पड़ा रहा और उसने अपनी आँखों का कहा नहीं सुना।

उसको उठते न देख कर उसकी आँखों ने फिर कहा कि कोई तुम्हारे और पास आ चुका है परन्तु वह फिर भी नहीं उठा। पर उसके काफी देर बाद तक उसकी आँखों ने कुछ भी नहीं कहा। वे चुप हो गयी थीं।

अब रैवन बिना आँखों के तो कुछ देख नहीं सकता था सो उसने अपनी आँखों को वहाँ वहाँ ढूँढने की कोशिश की जहाँ जहाँ वह सोचता था कि उसने उनको रख दिया है।

वह अपनी आँखें ढूँढता रहा पर वह तो वह जगह ही भूल गया था जहाँ उसने उनको रखा था। उसने जमीन पर झुक कर महसूस करने की कोशिश की कि वह कहाँ था तो उसको वहाँ एक पगडंडी महसूस हुई। वह उस पगडंडी पर चल दिया।

आगे बढ़ा तो उसे पहाड़ से आती हुई एक ऊॅची सी दीवार महसूस हुई। वह इस जगह को जानता था। यहाँ कोई पेड़ नहीं था।

उसने सोचा अगर मैं एक बैरी अपनी आँख की जगह में रख लूँ तो शायद मैं देख सकूँ। सो वह उस जगह को ढूँढने चला जहाँ उसको बैरी मिल जाती। उसको उस जगह को ढूँढने में बहुत मुश्किल पड़ रही थी। कभी कभी उसको रेंग कर भी चलना पड़ रहा था।

जब वह उस जगह पर पहुँच गया तो उसको ब्ल्यूबैरी का एक पेड़ मिल गया। वहाँ से उसने दो ब्ल्यूबैरी तोड़ कर अपनी आँखों की जगह में लगा लीं।

पर फिर भी वह कुछ देख नहीं सका क्योंकि वे बैरी बहुत गहरे रंग की थीं सो उसने उनको निकाल कर फेंक दिया।

उसको मालूम था कि पहाड़ की एक दूसरी ऊॅची दीवार भी अभी आने वाली है और एक पगडंडी उस तरफ भी जाती है सो वह उस तरफ चल दिया। वह जब वहाँ पहुँचा तो उसको वहाँ क्रेनबैरी की झाड़ियाँ मिल गयीं।

उसने क्रेनबैरी अपनी आँखों में लगायी तो उसे सब कुछ लाल लाल दिखायी दिया। यह भी उसको अच्छा नहीं लगा। इसके अलावा वे छोटी भी बहुत थीं सो वे बार बार उसकी आँखों के छेद में से निकल जातीं थीं। इसलिये उसने उनको भी निकाल कर फेंक दीं।

वह यह नहीं समझ पा रहा था कि वह अब क्या करे पर फिर भी वह पहाड़ पर चढ़ता रहा चढ़ता रहा। अब उसको एक दूसरी बैरी मिल गयी।

ये कैनेडियन जे की आँखें थीं। उसने उसकी आँखों को ही लगा लिया। उसकी आँखें लाल थीं। वह इन आँखों से देख तो पाया पर इन आँखों को लगा कर वह ऐसा लगने लगा जैसे वह कहीं किसी दूसरे ग्रह से आया हो।

इसलिये वह अपने घर वापस लौट आया और सोचने लगा कि उसको फिर से नदी पर ही वापस जाना चाहिये और नदी के ऊपर की तरफ जा कर अपनी आँखों को ढूँढना चाहिये।

उसके पास अपनी एक नाव थी वह उसमें बैठ कर नदी के ऊपर की तरफ चल दिया। वह उस नाव को खे ही रहा था कि उसको बड़े पेड़ों में से कुछ ऐसी आवाज सुनायी पड़ी जैसे वहाँ बहुत सारे लोग हॅस रहे हों। वह जानना चाहता था कि वे लोग क्यों इतना शोर मचा रहे थे।

उसने अपनी नाव को किनारे लगा दिया और जंगल की तरफ चल दिया पर वहाँ जा कर उसने देखा कि वह जगह तो केवल नाव ले कर जाने वाली जगह थी। वहाँ और कुछ भी नहीं था। पर जंगल में से हॅसने की आवाज अभी भी आ रही थी।

अब वह नदी के नीचे की तरफ चल दिया तो वहाँ उसको एक घर दिखायी दिया।

घर आने से पहले उसने क्रिसमस के पेड़ की बहुत सारी डंडियाँ इकठ्ठी कीं और उनको चारों तरफ बिखरा दिया। फिर उनके ऊपर उसने अपनी बीट कर दी जिससे वे सब डंडियाँ बहुत सुन्दर कपड़ों में बदल गयीं। उसने वे कपड़े पहन लिये।

ऐसा ही उसने एक बार और किया तो वे डंडियाँ भी सुन्दर कपड़ों में बदल गयीं। उसने उन कपड़ों को एक थैले में रखा और वह नदी किनारे वाले घर में आ गया।

वहाँ एक नौजवान लड़की थी जो दूसरों से मिलती जुलती नहीं थी। वह वहाँ अकेली थी और अपने राजकुमार का इन्तजार कर रही थी। उसने बताया कि बहुत सारे आदमियों ने उससे शादी करने के लिये कहा पर उसने अभी तक किसी को हाँ नहीं की।

तब रैवन ने उसको वह बढ़िया कपड़े दिखाये जो उसने उस क्रिसमस पेड़ की डंडियों से बनाये थे। उनको देख कर वह रैवन से शादी करने के लिये तुरन्त तैयार हो गयी और बोली - "हाँ, मैं तुमसे शादी करूॅगी।"

इसी समय जंगल से आदमी लोग वापस आ गये। उन्होंने रैवन को देखा तो उनको लगा कि यह तो कोई अजीब सा अजनबी है। पर लड़की ने उनको बताया कि वह उस अजनबी से शादी करना चाहती है।

उन लोगों ने हाँ कर दी और उन दोनों की शादी हो गयी।

दिन में वे आदमी लोग तो जंगल में आनन्द करने चले जाते थे पर रैवन और उसकी पत्नी कभी उधर नहीं गये।

एक दिन रैवन ने अपनी पत्नी से पूछा - "ये लोग वहाँ जंगल में जा कर क्या करते हैं?"

रैवन की पत्नी ने कहा - "मालूम नहीं क्या करते हैं पर वे लोग किसी चीज़ से खेलते हैं। वे कहते हैं कि वे रैवन की आखें हैं जो किसी ने उनको ला कर दी थीं। उन्होंने उसके ऊपर कुछ सिल लिया है जिससे वे अब दिखने में रैवन की आँखें नहीं लगतीं।"

अब रैवन को पता चल गया कि उसकी आँखें यहाँ हैं और ये लोग उसकी आँखों से ही खेल रहे हैं। वे लोग शाम को वापस आ गये पर सुबह को वे फिर चले गये और जा कर उनसे खेलने लगे।

उनके जाने के बाद रैवन ने अपनी पत्नी से कहा चलो हम भी देखते हैं कि वे लोग वहाँ क्या खेल रहे हैं। मैं देखना चाहता हूँ कि वह ऐसा कौन सा खेल है जिसके लिये वे सुबह ही चले जाते हैं और शाम से पहले वापस घर नहीं लौटते। सो वे दोनों भी जंगल चल दिये।

चलते चलते उनको सामने एक बहुत बड़ा रेतीला मैदान दिखायी दिया। वे लोग वहीं खेल रहे थे। वह उस मैदान के एक किनारे पर बैठ गया और वहीं से उन लोगों का खेल देखने लगा। वे लोग गेंद खेल रहे थे।

बैठे बैठे उसने उस गेंद को ध्यान से देखा तो उसको दो गेंदें दिखायी दीं। कभी कभी उनमें से आँखें बाहर निकल जातीं। उस समय वह उनको उठा लेना चाहता पर उसके पास ऐसा कोई मौका नहीं था कि वह उनको उठा सके।

वह सचमुच में अपनी आँखें वापस लेना चाहता था। वह वहाँ बैठा बैठा यही मनाता रहा कि काश वे दोनों आँखें उसी के पास आ कर गिर जायें जहाँ वे दोनों बैठे हुए थे तो वह उनको उठा ले।

कुछ ही पल में उसकी इच्छा पूरी हुई और वे आँखें उसी के पास आ कर गिर गयीं। उसने तुरन्त ही उनको उठा लिया।

खिलाड़ी लोग उसके पास वे आँखें उठाने के लिये आये पर तब तक तो रैवन ने उनको अपनी आँखों में लगा लिया और यह कह कर वहाँ से उड़ गया कि क्योंकि वे उसकी आँखें हैं इसलिये वह उनको लिये जा रहा है।

उड़ कर वह एक पेड़ के ऊपर जा बैठा। खिलाड़ी लोग उसके ऊपर बहुत गुस्सा हुए और बोले - "तुम कितने बुरे हो। हमको तो तुमको तीर से मारना चाहिये।"

रैवन कुछ देर तक तो वहाँ बैठा रहा फिर वह वहाँ से उड़ गया। रैवन जैसे जैसे ऊपर उड़ता गया उसकी पत्नी के सुन्दर कपड़े जो वहीं खड़ी थी रैवन की बीट में बदलते गये जबकि उसके जाने से पहले उसके वे कपड़े बहुत सुन्दर थे।

सारे लोग रैवन पर बहुत गुस्सा थे पर वे उसका कर कुछ नहीं सकते थे। रैवन उड़ कर अपनी नाव पर आ गया और आदमी में बदल गया।

अब जब उसकी अपनी आँखें वापस मिल गयीं थीं उसने वे सारी बैरीज़ फेंक दीं और अपने घर वापस आ गया।

----

सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------