सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 19 एक बूढ़े पति पत्नी और जूता बनाने वाले // सुषमा गुप्ता

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एक बुढ़िया अपने पति के साथ यूपिक के टैकैक गाँव में रहती थी। वे लोग अपनी रोटी कमाने के लिये खालों के जूते बनाने का काम किया करते थे। वे लोग जूते बहुत अच्छे बनाते थे और अपने अच्छे जूते बनाने के लिये बहुत मशहूर थे।

जूते बनाने के लिये वे बढ़िया सील मछली की खाल इस्तेमाल करते थे। और सिलाई तो इतनी अच्छी करते थे कि जूते पर वह कहाँ है दिखायी ही नहीं देती थी।

लेकिन इस साल वे लोग बहुत गरीब थे। अभी उनके पास आखिरी सादा जूता बनाने के लिये भी सील मछली की खाल काफी नहीं थी। और इस आखिरी जूते की जोड़ी बनाने के बाद तो उनके पास कोई खाल ही नहीं थी कोई और जूता बनाने के लिये।

सो एक जाड़े की रात उन्होंने जूता बनाने के लिये खाल काटी तो पर क्योंकि वे बहुत थक गये थे और भूखे थे सो यह सोच कर वे जल्दीे ही सोने चले गये कि वे जूते सुबह पूरे करेंगे।

जब वे सुबह उठे तो उन्होंने अपने आखिरी बचे हुए मछली के टुकड़े खाये और अपने आखिरी जूता बनाने के लिये सील की खाल पर काम करने चले गये।

उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब वहाँ उन्होंने सील की खाल का बहुत ही सुन्दर एक जोड़ी जूता बना रखा देखा। वह उस जूते की जोड़ी से कहीं ज़्यादा अच्छा था जो वे अपने पास रखी थोड़ी सी सील की खाल से बना सकते थे।

उन जूतों को देख कर वे बहुत खुश हुए कि अब वे उसको बाजार में ऊॅचे दाम पर बेच कर कुछ खाना और कुछ सील की खाल खरीद सकेंगे।

पर उन जूतों को देख कर वह बूढ़ा यह जानने के लिये बहुत उत्सुक था कि उसके छोड़े हुए जूते किसने बनाये। रात में क्या हुआ।

सो वह ठंड में ही बाहर गया और घर के चारों तरफ देखा लेकिन उसको अपने घर के दरवाजे के बाहर रैवन के एक काले पंख के अलावा और कुछ भी दिखायी नहीं दिया।

उसने वह पंख उठा लिया और सोचने लगा कि वह वहाँ आया कहाँ से होगा? क्या वह पंख किसी बहुत बूढ़े दादा रैवन का होगा - वही जिसने सबसे पहला आदमी और सबसे पहली औरत बनाये?

वह जब कुछ और नहीं सोच सका तो अपनी पत्नी के पास घर के अन्दर चला गया।

वे सुन्दर जूते इतनी अच्छी तरह बने हुए थे और इतने सुन्दर थे कि इत्तफाक से उसी दिन एक शिकारी उनके घर आया और उनको एक बड़े मोटे रेनडियर के माँस और चार बढ़िया तरीके से रंगी हुई सील की खालों के बदले में खरीद कर ले गया।

शिकारी के जाने के बाद उन्होंने सील की वे खालें उठायीं और उनके जूते बनाने का निश्चय किया।

उस रात उन लोगों ने सील की खालें काटीं पर वे फिर इतने भूखे थे कि रेनडियर का जो सूखा माँस उन्होंने उस शिकारी से लिया था उसे पेट भर कर खाया।

खाना खाने के बाद वे बहुत थक गये थे सो उन्होंने सोचा कि वे जूते कल सुबह बनायेंगे। फिर उनको नींद भी आने लगी थी सो वे वह कटी हुई खाल ऐसी की ऐसी ही छोड़ कर सोने चले गये।

जब वे सुबह उठे तो एक और आश्चर्य उनका इन्तज़ार कर रहा था। इस बार वहाँ सील की खाल के दो जोड़ी सुन्दर जूते बने रखे थे।

वह बूढ़ा आदमी फिर बाहर देखने गया कि रात को कौन आया था पर इस बार भी उसको काले रैवन के एक पंख के अलावा कुछ और दिखायी नहीं दिया।

आश्चर्य से उसने वह पंख उठाया और फिर सोचने लगा कि क्या वह पंख भी उसी रैवन का था जिसने यह दुनियाँ बनायी? कुछ और न सोच पाने पर वह फिर घर के अन्दर चला आया।

ये दो जोड़ी जूते भी इतने सुन्दर और सफाई से बने हुए थे कि उन्होंने उनको एक दूसरे शिकारी को कुछ सील के माँस और एक स्ले भर कर समुद्र के किनारे से लायी गयी सील मछली की खालों के बदले में बेच दिया।

वह शिकारी जूतों की उन जोड़ियों से इतना खुश था कि उसने उस बूढ़े और बुढ़िया को माँस और खालों के अलावा सील का ताजा और स्वादिष्ट तेल भी दिया जो उसने शैल्डन पौइन्ट से अभी अभी पकड़ी थी।

अब उन बूढ़े और बुढ़िया को यह जानने की उत्सुकता हुई कि यह कौन है जो उनकी सहायता कर रहा है।

सो उस दिन वे जब रात को सोने गये तो वे सोये नहीं। वे बस सोने का बहाना करते रहे। वे जानना चाहते थे कि उनके सो जाने के बाद रात में क्या होता है।

ठीक आधी रात को उन्होंने रैवन के बोलने की आवाज सुनी और दो जूते बनाने वाले उनके घर में चुपके से घुस आये। और नाचते हुए जो सील की खाल वहाँ रखी हुई थी उससे चार जोड़ी सुन्दर जूते बनाने बैठ गये।

वे काम करते जा रहे थे और बीच बीच में गुनगुनाते जा रहे थे और बातें करते जा रहे थे जिससे ऐसा लग रहा था कि उनको अपना काम करने में बहुत ही मजा आ रहा था।

पर उन बूढ़े बुढ़िया ने देखा कि उन दोनों जूते बनाने वालों के कपड़े बहुत ही फटे हुए हैं सो उन्होंने अगली रात के लिये उनके लिये कुछ सोच लिया।

जैसे ही वे उनके बारे में सोच रहे थे कि उन्होंने रैवन की एक और आवाज सुनी और एक पल के अन्दर ही वे दोनों जूते बनाने वाले घर के दरवाजे में से निकल कर सुबह होते हुए आसमान में गायब हो गये।

सुबह उठ कर पति पत्नी ने नाश्ता किया और कुछ देर तक जो कुछ उन्होंने रात को देखा था उस बारे में बात की और फिर उन दोनों जूते बनाने वालों के लिये जाड़ों के लिये दो बढ़िया सूट सिलने बैठ गये।

उनको वे दो सूट बनाने में सारा दिन लग गया क्योंकि वे उनके लिये बहुत बढ़िया सूट बनाना चाहते थे। जब वे सूट बना कर उठे तो शाम हो चुकी थी सो उन्होंने खाना खाया और उन जूते बनाने वालों के इन्तजार में बैठ गये।

उन्होंने उन जूते बनाने वालों के कपड़े सुन्दर तरीके से तह कर के उनकी काम करने की जगह रख दिये और थोड़ा सा खाना, सूखी मछली और सील मछली का तेल, भी वहीं रख दिया ताकि जब वे काम कर रहे होंगे तो कुछ खा भी सकें।

फिर वे जा कर अपने अपने बिस्तरों में लेट गये और उनके आने का इन्तजार करने लगे।

उस दिन भी ठीक आधी रात के समय रैवन की आवाज सुनायी दी और वे ही दो जूते बनाने वाले पुराने चिथड़े पहने घर में आये।

वे सीधे अपने काम की जगह गये तो उन्होंने अपने लिये कुछ भेंट रखी देखी - वे कपड़े और कुछ खाना जो उन बूढ़ों ने उनके लिये बनाया था।

उनको देख कर वे इतने खुश हुए कि उन्होंने वे कपड़े तुरन्त ही पहन लिये और वहीं एक छोटी सी तस्वीर बनायी और नाचने लगे।

कुछ देर नाचने के बाद वे अपना काम करने बैठ गये। कुछ कुछ देर में वे सील के सूखे माँस के टुकड़े सील के तेल में डुबो डुबो कर खाते रहते थे। वे बहुत खुश थे।

जूते बनाने वालों ने इस रात उतना ज़्यादा काम नहीं किया जितना पिछली रात किया था पर फिर भी सुबह होने से पहले उन्होंने इतने सुन्दर दो जोड़ी जूते तैयार कर दिये थे जितने सुन्दर जूते उस गाँव में पहले किसी ने कभी देखे भी नहीं थे।

वहाँ से जाने से पहले उन्होंने उन सुन्दर जूतों को तारीफ की नजर से एक बार देखा। दोनों जोड़ी जूतों पर मोतियों से "कुयाना" लिखा हुआ था।

जब वे जूते बनाने वाले काम कर रहे थे तो पहले तो वे बूढ़ा और बुढ़िया उनको काम करते देखते रहे पर फिर उनकी आँख लग गयी। सुबह से पहले ही रैवन की फिर से आवाज सुनायी पड़ी तब उनकी आँख खुली।

उन्होंने देखा कि चमकीले काले रंग का एक रैवन उनके दरवाजे के बाहर खड़ा है। वे तुरन्त ही दरवाजे पर समय पर पहुँच गये।

उन्होंने देखा कि वे दोनों जूते बनाने वाले रैवन के शरीर पर कूद रहे थे जिनको वह रैवन पूर्णमासी के चाँद के अन्दर ले गया।

जैसे ही रैवन हवा में उड़ा उसने अपनी चमकीली गरदन घुमायी और चार बार आवाज निकाली। फिर उसने अपना नकली चेहरा ऊपर उठाया और बोला - "हर एक को मैरी क्रिसमस और हैपी न्यू ईयर।"

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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