सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - 2 रैवन की समुद्री यात्रा : // सुषमा गुप्ता

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एक दिन रैवन समुद के किनारे एक पहाड़ की चोटी पर बैठा हुआ था कि उसने एक व्हेल समुद्र में जाता देखा। उसको देखते ही उसने सोचा "मेरे दिमाग में एक विचार आया है। आज मैं एक नयी चीज़ आजमा कर देखता हूँ।"

सो उसने व्हेल को पुकार कर कहा - "व्हेल, अब की बार जब तुम ऊपर आओ तो अपनी आँखें बन्द कर लेना और मुँह खोल लेना। मैं तुम्हारे मुँह में एक चीज़ रखूँगा।"

फिर उसने अपना रैवन का मुखौटा पहना, अपने पंखों के नीचे आग जलाने की मशीन छिपायी और पानी के ऊपर उड़ गया।

कुछ ही देर में व्हेल ऊपर आ गयी। उसने वैसा ही किया जैसा रैवन ने उससे करने को कहा था। उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और मुँह खोल दिया। व्हेल का खुला हुआ मुँह देख कर रैवन तुरन्त ही उसके गले तक नीचे चला गया।

व्हेल ने सोचा कि रैवन ने उसके मुँह में जो कुछ भी रखना था रख दिया सो रैवन के अपने गले में उतरने के बाद उसने अपना मुँह बन्द कर लिया और जो कुछ उसके गले में था उसको सटक लिया। फिर वह समुद्र में नीचे उसकी सतह तक चला गया।

व्हेल के पेट में पहुँच कर रैवन खड़ा हो गया। उसने अपनी चोंच ऊपर की तरफ करके चारों तरफ को निगाह डाली तो अपने आपको एक बहुत ही सुन्दर कमरे के दरवाजे पर पाया। उस कमरे में एक तरफ को एक लैम्प जल रहा था।

यह सब देख कर वह उस कमरे के अन्दर चला गया। उसको यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि वहाँ एक बहुत सुन्दर नौजवान लड़की बैठी हुई थी।

सारी जगह बिल्कुल सूखी और साफ थी। उस कमरे की छत व्हेल की रीढ़ की हड्डी पर टिकी हुई थी और उसकी दीवारें व्हेल की पसलियों की बनी हुईं थीं।

लैम्प में एक नली से बूँद बूँद करके तेल आ रहा था और वही उस लैम्प को जला भी रहा था। यह नली व्हेल की रीढ़ की हड्डी के साथ साथ जा रही थी।

जब रैवन कमरे के अन्दर घुसा तो वह लड़की चौंक कर खड़ी हो गयी और चीख कर बोली - "तुम यहाँ अन्दर कैसे आये? तुम पहले आदमी हो जो मेरे घर में आये हो।"

वह लड़की क्योंकि बहुत ही छोटी और सुन्दर थी रैवन उससे जितनी मुलायमियत से बोल सकता था बोला - "मैं व्हेल के गले से हो कर आया हूँ।"

इसके अलावा वह यह भी जान गया था कि वह व्हेल की आत्मा थी सो वह आगे बोला - "मैं यहाँ थोड़ी देर रुकना चाहूँगा। क्या मैं यहाँ रुक सकता हूँ?"

वह लड़की बोली - "क्योंकि तुम अभी बाहर नहीं जा सकते इसलिये जाहिर है कि तुमको यहाँ रुकना तो पड़ेगा ही। चाहे तुम को अच्छा लगे या न लगे, चाहे मुझको अच्छा लगे या न लगे, पर तुम क्योंकि मेरे मेहमान हो इसलिये मुझे तुम्हारे लिये कुछ खाने पीने का इन्तजाम भी करना पड़ेगा।"

वह गयी और कुछ खाना ले कर लौटी जो उसने बैरीज़ और तेल के साथ रैवन को दिया और बोली - "ये बैरीज़ मैंने पिछली गरमियों में इकठ्ठी की थीं।"

रैवन वहाँ व्हेल की आत्मा का चार दिन तक मेहमान बन कर रहा और उसको वहाँ रहने में बहुत अच्छा लगा। पर वह एक बात पर बहुत आश्चर्य करता रहा कि वह नली क्या थी जो उस मकान की छत के साथ साथ जा रही थी।

जब भी वह लड़की उस कमरे के बाहर जाती वह रैवन को यह कह कर जाती कि किसी भी हालत में उसको उस नली को नहीं छूना है। और उस लड़की की यह बात उसको और ज़्यादा उत्सुक बनाती कि वह देखे कि वह नली क्या है।

सो पाँचवें दिन जब वह लड़की कमरे से बाहर गयी तो रैवन उस लैम्प के पास गया और उसमें से उसने तेल की एक बूँद उठा कर चाट ली। अब वह उसको इतनी मीठी लगी कि वह उसमें गिरने वाली हर बूँद को उठा उठा कर चाटने लगा।

क्योंकि वह बहुत भूखा था उसको उस तेल को बूँद बूँद करके खाना बहुत धीमा लगा सो उसने ऊपर से उस नली में से एक टुकड़ा तोड़ कर खा लिया।

जैसे ही उसने ऐसा किया उस नली के टूटे हुए हिस्से से बहुत सारा तेल निकल कर नीचे बहने लगा और वह लैम्प बुझ गया। साथ में वह कमरा भी बहुत ज़ोर से डाँवाडोल हो उठा। इससे रैवन इधर उधर लुढ़कने लगा

यह सब चार दिन तक चलता रहा। रैवन थकान और जख्मों की वजह से बिल्कुल मरा सा हो गया। फिर सब कुछ शान्त हो गया क्योंकि वह व्हेल मर गया था। ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि वह नली उस व्हेल के दिल का एक हिस्सा थी और रैवन ने उसके दिल का एक हिस्सा तोड़ दिया था।

व्हेल की आत्मा भी फिर वहाँ वापस नहीं आयी क्योंकि व्हेल तो मर गया था तो व्हेल की आत्मा भी उसके शरीर से निकल गयी थी। व्हेल का शरीर तैरता तैरता समुद्र के किनारे जा लगा।

रैवन अब व्हेल के मरे हुए शरीर में एक कैदी की तरह रह रहा था और सोच रहा था - "मैं अब एक सुन्दर नाव में हूँ। मेरी यह यात्रा तो बहुत ही अच्छी रही पर अब मैं इसमें से बाहर कैसे निकलूँ?"

तभी उसको धम धम की सी कुछ आवाज सुनायी दी। वह बोला "अरे यह मैं क्या सुन रहा हूँ? यह तो ऐसा लग रहा है जैसे इस मकान की छत पर कोई चल रहा है।"

और वह बिल्कुल ठीक था। सचमुच ही व्हेल के मरे हुए शरीर पर दो आदमी चल रहे थे। वे अपने गाँव के लोगों को बुला रहे थे ताकि वे उस व्हेल को काट सकें।

बहुत जल्दी ही वहाँ बहुत सारे लोग आ गये और उन्होंने सबने व्हेल के शरीर को काटना शुरू कर दिया।

रैवन ने जल्दी से अपना मुखौटा पहन लिया और एक चिड़िया बन गया। फिर वह एक दूर वाले कोने में जा कर बैठ गया और ध्यान से अपने बाहर निकलने के मौके की तलाश में चुपचाप बैठा रहा।

जब व्हेल की पीठ में काफी बड़ा छेद हो गया तो लोग उसका माँस वहाँ से उठा कर दूसरी जगह ले जाने लगे।

एक बार जब वे माँस ले जा रहे थे तो रैवन को मौका मिल गया। सबकी आँख बचा कर वह उस छेद में से हो कर बाहर उड़ गया और एक पहाड़ी की चोटी पर जा कर बैठ गया।

तब उसे ध्यान आया कि वह अपनी आग की मशीन तो व्हेल के पेट में ही भूल आया था - "अरे अपनी आग की मशीन तो मैं वहीं भूल गया। अब मैं क्या करूँ?"

उसने अपनी चोंच ऊपर की और अपना रैवन का कोट उतार कर वह फिर से एक जवान आदमी बन गया। जवान आदमी बन कर वह समुद्र के किनारे की तरफ व्हेल की तरफ चला।

लोग जो वहाँ व्हेल के शरीर पर काम कर रहे थे उन्होंने देखा कि काले से रंग का एक आदमी एक अजीब सी हिरन की खाल का कोट पहने उनकी तरफ चला आ रहा है। वे उसकी तरफ उत्सुकता़ से देखने लगे कि वह कौन था।

वह काला आदमी उनके पास आ कर बोला - "ओ, सो आप लोगों को एक बड़ा सा व्हेल मिल गया? यह तो अच्छा है। मैं भी आप लोगों की इसको काटने में सहायता कर सकता हूँ।"

कह कर उसने अपने कोट की बाँहें ऊपर कीं और काम पर लग गया।

बहुत जल्दी ही काम करने वाले आदमियों में से एक आदमी ने व्हेल का अन्दर का हिस्सा काटा और चिल्लाया - "अरे देखो, मुझे व्हेल के पेट के अन्दर क्या मिला? आग जलाने की एक मशीन।"

जैसे ही रैवन ने देखा कि आग जलाने की मशीन व्हेल के अन्दर से निकल आयी उसने तुरन्त ही अपने कोट की बाहें नीचे कर लीं और काम छोड़ दिया।

वह बोला - "अरे यह तो बड़ा अपशकुन है। मेरी बेटी कहती है कि अगर लोग व्हेल को काट रहे हों और उसके पेट से आग जलाने की मशीन मिल जाये तो बहुत सारे लोग मर जाते हैं। इससे पहले कि व्हेल की आत्मा मुझे पकड़े मैं तो भाग जाता हूँ।"

और यह कह कर वह वहाँ से भाग गया। जब वह काला आदमी वहाँ से चला गया तो वहाँ काम कर रहे लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे।

फिर बोले - "शायद यह आदमी ठीक कहता है। और अगर ऐसा है तो हम लोगों को भी यहाँ से चले जाना चाहिये।" यह कह कर वे सब लोग भी वहाँ से भाग गये।

रैवन जब वहाँ से भागा तो वह बहुत दूर नहीं गया बल्कि पास में ही छिप कर बैठ गया और देखने लगा कि उसके ऐसा कहने पर वे लोग क्या करते हैं।

जब उसने देखा कि उसकी योजना के अनुसार वहाँ से सारे लोग भाग गये तो वह बहुत हॅसा। वह अपने छिपने की जगह से बाहर निकला, उसने अपना रैवन का कोट पहना, उसकी चोंच नीचे की तरफ की और व्हेल के मरे हुए शरीर के पास आया।

उसने वहाँ से उसके माँस के बहुत सारे टुकड़े उठाये और पास की एक गुफा में रख दिये।

उसकी आदमी के रूप में गाँव जाने की हिम्मत नहीं हुई कहीं ऐसा न हो कि गाँव के लोग उसे पहचान लें कि यह तो वही आदमी है जिसने उनके साथ चाल खेली थी और फिर व्हेल के माँस के लिये वहाँ आ जायें।

वह अपनी इस चाल पर बहुत खुश था। अब उसके पास बहुत दिनों के लिये बहुत सारा खाना था। खाना खाते खाते वह बोला - "धन्यवाद ओ व्हेल के भूत, नाव की सवारी के लिये भी और इस दावत के लिये भी।"

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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