सोमवार, 18 सितंबर 2017

रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 8 रैवन और मिंक // सुषमा गुप्ता

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एक बार रैवन और मिंक ने यह निश्चय किया कि वे लोग वहाँ जा कर रहेंगे जहाँ मछलियाँ बहुत होती हैं। वहाँ जा कर वे एक बड़ा भालू भी मारने वाले थे। सो वे उस जगह की तरफ चल दिये।

दोनों के पास एक एक नाव थी सो वे अपनी अपनी नाव में बैठ कर वहाँ पहुँच गये जहाँ उनको एक भालू घूमता दिखायी दे गया पर वे उसका कुछ नहीं कर सके क्योंकि वे उसको भाला मारने से बहुत डर रहे थे।

तब रैवन ने मिंक से कहा - "तुम एक मछली की पूँछ में छेद कर दो। इससे मैं उसके अन्दर चला जाऊॅगा। और क्योंकि यह हो सकता है कि तब वह घूमने वाला भालू मुझे खा ले और जब वह मुझे निगल लेगा तो मैं उसकी छाती काट कर बाहर निकल आऊॅगा।

जब वह भालू मेरे पास आये तो तुम उसको जरा ध्यान से देखना। मैं जब उसमें से कूद कर बाहर आऊॅ तो तुम उसको भाला मार देना। हो सकता है कि वह तभी मर जाये।"

मिंक राजी हो गया और उसने रैवन को एक मछली की पूँछ में बन्द करके उस रास्ते पर डाल दिया जिस पर से भालू जा रहा था।

कुछ देर बाद वहाँ कुछ आया तो उन्होंने देखा कि वह भालू था। पर जब भालू ने उस मछली की पूँछ को खाने के लिये अपना मुँह खोला तो रैवन ने काँव काँव किया और उस मछली की पूँछ में से उड़ गया।

वह डर गया था इसलिये उस मछली की पूँछ के अन्दर नहीं रह सका। यह देख कर वह भालू भी वहाँ से भाग गया।

मिंक ने रैवन से पूछा - "यह तुमने क्या किया? तुमने उसे जाने कैसे दिया जबकि वह तुम्हारे इतने पास आ चुका था? अब जब शाम हो जायेगी तब तुम्हारी बजाय यह काम मैं करूॅगा।"

सो जब शाम हुई तो मिंक मछली की पूँछ में जा कर बैठ गया। रैवन बोला जब तुम बाहर आओगे तब मैं उसको भाला मारूॅगा।

आखिर एक भालू उधर आया और उसने वह मछली की पूँछ निगल ली। जैसे ही भालू ने वह पूँछ निगली वह इधर उधर नाचने लगा। उसी समय मिंक भी उसकी छाती फाड़ कर बाहर निकल आया।

इसी समय रैवन को भालू को भाला मारना था सो उसने अपना भाला उसको फेंक कर मारा। उसने भाला मारा तो पर उसका भाला दो पेड़ों के बीच में अटक कर रह गया और वह भालू तक नहीं पहुँच सका।

रैवन ने अपने भाले को उन पेड़ों से बाहर निकालने की कोशिश भी की पर इतनी ही देर में मिंक ने भालू की छाती फाड़ कर जो छेद किया था वह भालू उसी छेद होने से मर गया।

मिंक ने फिर आ कर पूछा - "अरे क्या हुआ? तुम तो जब मैं बाहर आ रहा था तब उसको भाला मारने वाले थे? तुमने अपना भाला अपने पेट के सामने क्यों रखा हुआ था? क्या इसलिये कि तुम उसको एकदम से न मार सको?"

रैवन बोला - "नहीं नहीं। मेरा भाला दो पेड़ों के बीच में अटक गया था इसलिये मैं उसको नहीं मार सका।"

दोनों ने मिल कर फिर उस भालू की खाल निकाली और उसका माँस काटा। उन्होंने उसकी चर्बी भी निकाली।

रैवन बोला - "जैसे हमारे पुरखे लोग निकालते थे वैसे ही हम भी अब इस चर्बी में से इसका तेल निकालेंगे। वे पहले इसकी आँतें निकाल लेते थे और उसके बाद उसका तेल निकालते थे। मैं तुमको दिखाऊॅगा कि वे यह काम कैसे करते थे।"

सो मिंक तो चर्बी पकाने पर लग गया और रैवन उसकी आँत को रास्ते पर बिछाने के लिये ले कर चला गया।

भालू की आँत वाकई बहुत लम्बी होगी जो वह इतने लम्बे रास्ते पर बिछ पायी। रैवन ने आँत के एक किनारे पर एक गाँठ बाँध दी ताकि उधर से तेल बाहर निकल कर जमीन पर न गिर जाये।

और उसका दूसरा सिरा पकड़ कर वह बोला - "मैं अब जंगल की तरफ चलता हूँ और तुम उसका तेल पका कर उसकी आँत में भरना। वह जल्दी ही भर जायेगी। हमारे पुरखे यह काम इसी तरह से करते थे।"

सो मिंक यह काम करता रहा। वह आँत में तेल भरता रहा और रैवन जंगल में चला गया। उसने जंगल का एक चक्कर लगाया और वहाँ आने का निश्चय किया जहाँ वह आँत खत्म होती थी।

मिंक उस आँत को भरता रहा पर वह तो भरने पर ही नहीं आ रही थी। तेल आँत में गिरता जा रहा था गिरता जा रहा था पर आँत थी कि वह तो भर ही नहीं रही थी। उसको लगा कि रैवन जरूर ही आँत के आखिरी सिरे पर खड़ा होगा।

सो उसने अपना काम रोक दिया और आँत के आखिरी सिरे पर आया तो उसने देखा कि रैवन तो वहाँ खड़ा खड़ा तेल पी रहा था। "आहा तो इसी लिये यह आँत तेल से नहीं भर रही। अब मुझे पता चला।"

मिंक को यह देख कर बहुत गुस्सा आया। उसने एक जलती हुई लकड़ी उठायी और रैवन के पीछे दौड़ा और उसके सिर पर मारी। रैवन पीछे गिर पड़ा और बेहोश हो गया।

मिंक ने उस आँत के उस सिरे को फिर से बाँधा और फिर वहीं वापस चला गया जहाँ वह चर्बी पका रहा था। आखिर रैवन को होश आया तो वह जंगल में भाग गया।

मिंक फिर से अपने काम पर लग गया था। इस बार वह आँत भर गयी थी। जब शाम हो गयी तब रैवन वहाँ लौटा। उसके चेहरे पर उस जली हुई लकड़ी की कालिख लगी हुई थी।

मिंक ने हॅस कर पूछा - "अरे, तुम्हें क्या हुआ? तुम्हारे चेहरे पर यह कालिख कैसे लगी हुई है?"

रैवन ने जवाब दिया - "मैं एक जला हुआ पेड़ खिसका रहा था जो मेरे पुरखे छोड़ गये थे वही मेरे ऊपर गिर पड़ा इसी से मेरे चेहरे पर यह कालिख लग गयी।"

मिंक यह सुन कर हॅस पड़ा।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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