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रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 9 नर गिलहरी और रैवन // सुषमा गुप्ता

एक बार रैवन समुद्र के किनारे किनारे उड़ रहा था। कुछ समुद्री चिड़ियाँ नीचे चट्टानों पर बैठी थीं। उन्होंने उसको देख कर उसे बुरे बुरे नामों से पुकारना शुरू कर दिया - "ओ तुम गन्दी चीज़ें खाने वाले, ओ तुम सड़ा हुआ माँस खाने वाले, ओ तुम काले।"

रैवन पलटा और यह चिल्लाते हुए उड़ गया - "ओ चिड़ियों, तुम लोग मुझे इतने बुरे नामों से क्यों पुकारती हो?"

वह उस पानी के ऊपर से बहुत दूर उड़ गया और पानी के उस पार एक पहाड़ पर आ बैठा।

सामने ही उसको एक नर गिलहरी का बिल दिखायी दिया। उसको देख कर उसने सोचा - "अगर मुर्दा माँस खाना खराब बात है तो अब से मैं ज़िन्दा माँस खाऊॅगा। अब आज से मैं एक हत्यारा बनूँगा।"

यह सोच कर वह उस नर गिलहरी के बिल के आगे खड़ा हो गया और उसमें रहने वाले के आने का इन्तजार करने लगा। जल्दी ही नर गिलहरी अपना खाना ले कर घर वापस आ गया।

नर गिलहरी ने रैवन से कहा - "तुम बिल्कुल ही मेरे घर के दरवाजे के सामने खड़े हो। थोड़ा हट कर खड़े हो जाओ ताकि मैं अपने घर के अन्दर जा सकूँ।"

रैवन बोला - "मैं यहाँ हट कर खड़े होने के लिये नहीं आया हूँ। लोग कहते हैं कि मैं मुर्दा माँस खाता हूँ। आज मैं उनको यह दिखाना चाहता हूँ कि मैं केवल मुर्दा माँस ही नहीं खाता मैं ज़िन्दा माँस भी खाता हूँ इसलिये आज मैं तुमको खा कर ही रहूँगा।"

नर गिलहरी बोला - "ठीक है। पर अगर तुम मुझे खाना ही चाहते हो तो मेरे ऊपर एक ऐहसान कर दो। मैंने सुना है कि तुम बहुत अच्छा नाचते हो तो मेरे मरने से पहले तुम मुझे अपना नाच दिखा दो।

अगर तुम उतना ही अच्छा नाचते हो जितना कि लोग कहते हैं तो तुम्हारा नाच देखने के बाद तो मैं तो खुशी से ही मर जाऊॅगा। अगर तुम नाचोगे तो मैं गाऊॅगा और फिर तुम मुझे खा लेना।"

यह सुन कर तो रैवन खुशी से फूल गया और उसने नाचना शुरू कर दिया और नर गिलहरी ने भी यह दिखाया कि वह उसके नाच का बहुत आनन्द ले रहा था।

नर गिलहरी ने गाया - "ओह रैवन, तुम कितना अच्छा नाचते हो, ओह रैवन तुम कितना अच्छा नाचते हो।"

कुछ देर नाचने गाने के बाद दोनों सुस्ताने के लिये रुक गये। नर गिलहरी बोला - "मैं तुम्हारा नाच देख कर बहुत खुश हुआ रैवन भाई। तुम अपनी आँखें बन्द कर लो और बस एक बार और नाच दो और मैं गाता हूँ।"

रैवन ने अपनी आँखें बन्द कर लीं और कूदना शुरू कर दिया और नर गिलहरी ने गाना शुरू कर दिया - "ओह रैवन, तुम कितनी सुन्दरता से नाचते हो। ओह रैवन, तुम कितने बड़े बेवकूफ हो।" और वह रैवन की टाँगों के बीच से निकल कर सुरक्षित अपने बिल में घुस गया।

फिर वहाँ से उसने अपनी नाक बाहर निकाली और हॅसा - "चिकि चिकि चिकि चिकि। जितने लोगों से मैं अब तक मिला हूँ तुम उनमें सबसे बड़े बेवकूफ हो।

जब तुम नाच रहे थे तो कैसी कैसी हॅसी वाली शक्लें बना रहे थे। मैं तो बड़ी मुश्किल से गा सका, बस हॅसता ही रहा। देखो, मेरी तरफ देखो, मैं कितना मोटा हूँ। क्या तुम मुझे खाना नहीं चाहोगे?"

और वह रैवन को तब तक तंग करता रहा जब तक कि वह तंग होकर वहाँ से उड़ नहीं गया।

इस तरह उस नर गिलहरी ने रैवन से अपनी जान बचायी।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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