सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्राची - अगस्त 2017 : आत्म कथ्य // मैं और मेरी सर्जना // रामदरश मिश्र

न में थकान सी आने लगी है. 80 (यह लेख तब लिखा गया था, जब लेखक 80 वर्ष के हो रहे थे) वर्ष के तन में थकान तो आएगी ही, फिर भी मन है कि मानता नहीं. कहता है चलो-चलो, अधिक नहीं तो एक बार चलो अपने डुमरी गांव में. गांव गये कितने साल हो गये-दस एक साल तो हो ही गये होंगे. मेरा मन भी अजीब है, अवसर पाकर भी देश या विदेश के उन स्थानों पर जाने से बिदकता है जहां जाने की कितनी तड़प लोगों में होती है किन्तु अपने गांव जाने की बेचैनी सदैव उसे तड़पाती रहती है. तन जाने से डरता है. उसे भय बना रहता है कि दिल्ली के वातावरण में रहने का आदी वह इस अवस्था में जैसे ही गांव जाएगा, वहां की असुविधाएं और अलग प्रकार की दिनचर्या उसके ऊपर बीमारी बनकर लद जाएगी.

इस तन ने उस परिवेश का कितना कठिन शीत-घाम रहा है, कितने-कितने मौसमों और ऋतुओं के प्रीतिकर और अप्रीतिकर साहचर्य को गहरे जिया है, कितने लम्बे-लम्बे कठोर रास्ते तय किये हैं, खेतीबाड़ी के कितने-कितने भारी-भारी काम अपने पर उठाये हुए फिरा है लेकिन अब? अब वह इस 15 अगस्त को अस्सी साल का हो रहा है. मन की सनक में क्या अब भी उसे वहां की असुविधाओं के जंगल में ले जाकर छोड़ दिया जाए और लौटने दिया जाए बीमारी का बोझ लादे हुए? यह पगला मन क्यों बार-बार गांव की उन असुविधाओं की ओर तन को ठेलना चाहता है. शायद इसलिए कि उन असुविधाओं के भीतर भी जीवन-सौंदर्य का गहरा राग प्रवहमान था. सच बात तो यह है कि तब ये असुविधाएं, असुविधाएं लगती ही नहीं थीं और लगती थीं तो उनके साथ चलते-चलते भीतर एक शक्ति महसूस होने लगती थी और उनके बीच में उगते हुए हर-त्योहार, पर्व-मेले, शादी-ब्याह आदि के सामूहिक राग तथा प्रकृति की विविध छवियों के छन्द हमारी धमनियों में रक्त की तरह बहते रहते थे, और उदासी में भी उल्लास तथा हंसी के फूल खिलते रहते थे.

शहर में रहते हुए मुझे 58 साल हो गये किन्तु वह गांव मुझसे नहीं छूटा. बुलाता ही रहता है. आज भी बुलाता है. मगर कहा न कि तन उसकी पुकार सुनकर भी चुप रहता है. कभी-कभी गांव की पुकार बड़ी गहरी हो उठती है. आज भी महसूस हुई लेकिन तन की वही उदासीनता.

तन तो चाहे जैसा हो मन तो अभी भी वैसा है, जैसा पहले था. तन को उदासीन होना हो तो हो, मन तो उसी ललक से भरा हुआ है और न जाने कब वह चुपके से गांव में पहुंच जाता है. आज भी पहुंच गया. गोरखपुर से बस में सवार हुआ और चल पड़ा गांव की ओर. पहले तो गोरखपुर से गांव तक की बीस मील की दूरी पैदल पार करनी पड़ती थी, अब पैदल की दूरी सिमटकर दो मील की रह गयी है. आजादी के 55-56 साल बाद ही सही, पक्की सड़क गांव के करीब तक ले जायी गयी है. सो मन बस में सवार होकर चल पड़ा गांव की ओर. बस से उतरकर गांव की ओर चला. हां, यह बिशनपुरा है. यहां पहुंचते ही मन भावुक हो उठा. हां, यह वही जगह है जहां सोमवार को बाजार लगता है. इस बाजार के दक्षिणी हिस्से में जो बड़ी-बड़ी दुकानें दिखाई दे रही हैं, वहां पहले हमारा प्राइमरी स्कूल था. वह गिर गया और काफी दिनों तक खंडहर बना रहा, फिर बाजार का हिस्सा बन गया. मुझे अभी भी लग रहा है कि वहां हमारा प्राइमरी स्कूल है. यहां आते ही बचपन की कितनी स्मृतियां जाग पड़ी हैं. वे सीधे और मरकटे मास्टर, वे तरह-तरह के सहपाठी, खट्टे-मीटे विविध प्रसंग, रोती-हंसती आंखें, खेल-कूद, आपसी झगड़े और प्यार, स्कूल की दहशत और छुट्टी होने पर उमड़ता हुआ मुक्त उल्लास. सोमवार का दिन होता था तो हम स्कूल के बन्द और डराते हुए माहौल से निकलकर सीधे बाजार के मुक्त कोलाहल में समा जाते थे और खोजते थे अपने-अपने पिताओं को, गांव के लोगों को. खरीदने की कुछ क्षमता न होने पर भी यों ही घूमते-घामते बहुत कुछ पाने की अनुभूति से गुजरते रहते थे. तब यह आजार एक खुला हुआ मैदान-सा था जहां दूर-दूर के सामान विक्रेता आते थे, अपनी दुकान लगाते थे और फिर चले जाते थे. अब तो इसमें स्थायी रूप से अनेक दुकानें बन गयी हैं.

आगे बढ़ा तो मिडिल स्कूल की बिल्डिंग दिखाई पड़ी. यह भी जर्जर अवस्था में है किन्तु खुदा का शुक्र है कि अभी बनी हुई है. इसे अहाते से गुजरते हुए रोमांच हो आया. यह वहीं अमला का पेड़ है, जिसके फलों का कसैला स्वाद अभी तक जुबान पर चिपका है. आम, पाकड़, पीपल सभी तो हैं अपने भीतर हमारा कितना-कितना अतीत छिपाये हुए. यहां दर्जा सात की पढ़ाई होती थी, यहां छः की, यहां पांच की. यहां बिकाऊ पण्डित बैठते थे, यहां मौलवी साहब, यहां मुंशीजी. याद आया-यहीं हां, ठीक यही मैं बैठा था जब मेरी पहली कविता फूटी थी. तब मैं दर्जा छह में था और मेरे एक सहपाठी ने सूचित किया कि उसके गांव का एक लड़का कविता लिखता है. यह सुनते ही मेरे भीतर कब से कुलबुलाता और दमित होता एक कवि जाग पड़ा और उसने विश्वासपूर्वक कहा-‘‘मैं भी कविता लिख सकता हूं.’’ उसी दिन पास के बगीचे में कांग्रेस की सभा थी. मैंने उसी पर कविता लिखनी शुरू की और इस बार कविता जैसी कोई चीज बन गयी. मुझे कितनी खुशी हुई होगी, इसकी कल्पना की जा सकती थी. मेरे साथ मेरे अभिन्न मित्र भी खुशी व्यक्त कर रहे थे. मैं फूला-फूला फिर रहा था.

कितने-कितने रूपों और रंगों में वह स्कूल मुझमें बसा हुआ है. बाद में मैं कितने-कितने बड़े-बड़े शिक्षा संस्थानों में छात्र और शिक्षक के रूप में जुड़ा किन्तु इन दो स्कूलों की जो गन्ध मुझमें व्याप्त हुई, वह और कहीं नहीं मिली-गन्ध, एक आदिम गन्ध. इन स्कूलों के बारे में कहना शुरू करूं तो कहता ही रह जाऊंगा और मुझे अपने गांव पहुंचने की जल्दी है. आगे बढ़ा तो रास्ते में रानापार गांव आया. इस गांव में पैठते ही बड़ा घर मिला. लगा कि इस विशाल जर्जर घर के आगे की खुली सहन में बने झोंपड़े में मदनेशजी बैठे होंगे. उनके हाथ में रामायण या महाभारत या संस्कृत का अन्य कोई क्लासिक होगा. और मुझे देखते ही कहेंगे-‘‘अरे आओ-आओ, कब आये भाई.’’ लेकिन कोई आवाज नहीं आयी तो मुझे अपनी भूल का अनुभव हुआ-‘‘अरे ये तो कबके जा चुके हैं इस लोक से.’’ मन उदास हो गया और दलितों की बस्ती को पार करता हुआ आगे बढ़ने लगा. लेकिन मदनेशजी अपने अनेक रूपों में साथ चलते रहे. मेरे लिए उनका सबसे विशिष्ट रूप था कवि गुरू का. हां, मैंने कविता लिखनी शुरू तो कर दी मगर वह क्या है, कैसी है इसका भान कहां था? गांव के एक सहपाठी मित्र ने सुझाव दिया कि चलो चलते हैं कवि मदनेशजी के यहां. वे कविता देखकर बता सकते हैं कि कैसी है? हम दोनों उनके यहां बहुत संकोच के साथ पहुंचे. जाकर उनके पास खड़े हो गये. वे बोले-‘‘कैसे आये हो?’’ मेरे मित्र ने ही कहा-‘‘पण्डितजी, रामदरश भाई ने कुछ कविताएं लिखी हैं आपको दिखाना खहते हैं.’’

‘‘हां-हां, क्यों नहीं, क्यों नहीं, दिखाओ तो सही.’’

मैंने झिझकते हुए अपनी कुछ कविताएं उनके हाथ में पकड़ा दीं और डरा हुआ सोचता रहा, पता नहीं ये क्या कहेंगे.

‘‘अच्छी हैं, बहुत अच्छी हैं, बेशक-बेशक तुम बहुत अच्छा लिखोगे.’’ मदनेशजी की आवाज सुनकर मैं प्रफुल्लित हो उठा.

‘‘कहां रहते हो?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘डुमरी.’’

‘‘अच्छा डुमरी के हो. किसके बेटे हो?’’

‘‘रामचन्द्र मिश्र के.’’

‘‘अच्छा चन्नर भाई के सपूत हो. अच्छा, बहुत अच्छा. देखो तुम कविताएं लिखकर मुझे दिखाया करो, संकोच नहीं करने का.’’

मैं बहुत पुलकित होकर घर लौटा और उत्साह के साथ कविताएं लिखने लगा. मदनेशजी सनेही स्कूल के कवि थे. उनके निर्देशन में मैं छन्द का अभ्यास करने लगा. वे मेरी कविताएं

सुधारते थे और प्रोत्साहित करते थे. धीरे-धीरे मुझे छन्द की पकड़ हो गयी और छन्द में गांव की प्रकृति, सामाजिक जीवन तथा निजी सुख-दुःख की अभिव्यक्ति करने लगा. 1940-41 में मैंने घनाक्षरी छन्द में ‘चक्रव्यूह’ नामक एक खण्ड काव्य लिखा. उन्हीं की सहायता से 1940 में मेरी पहली कविता ‘चांद’ छपी-गोरखपुर की ‘सरयूपारीण’ पत्रिका में. रानापार पार करते ही मेरा गांव दिखाई देने लगता है. रास्ते में बारी आयी-यानी आम के पेड़ों का बगीचा. इस बारी में आते ही अपने बचपन के खेलते हुए दिन उतरा आये. हम लोग गर्मियों में स्कूल से छूटते थे तो इस बारी में घण्टों खेलते थे. यह बारी मुख्य मार्ग पर है अतः आने-जानेवालों की चहल-पहल मची रहती थी और आम के दिनों में तो क्या कहना! बूढ़े, बच्चे, जवान सभी का मेला लगा रहता था. इसके सारे पेड़ों के नाम थे और हम उन्हें उन्हीं नामों से पुकारते थे. देख रहा हूं-इसके तमाम पेड़ कट गये हैं, यह लगभग आधा रह गया है और कटे पेड़ों की जगह से ईंट के भट्ठे का धुआं निकल रहा है. इसके बीच से जाती हुई कच्ची सड़क की धूल में खेलते हुए हम सोचते थे, पता नहीं कहां से आती है यह सड़क और कहां जाती है. हम इस पर से जाती हुई बैलगाड़ियों, साइकिलों और पैदल यात्रियों को रह-रहकर निहारा करते थे और मन ही मन पूछते थे-‘‘कहां जाओगे भाई ?’’ अब यह सड़क पिचरोड हो गयी है.

इस बगीचे से गांव की ओर एक धूल भरी कच्ची सड़क जाती थी, अब वह भी थोड़ी सख्त बना दी गयी है. उससे होकर गांव में प्रवेश करने लगा. हां प्रवेश करने से पहले एक छोटा-सा नाला पड़ता था, उसी के पास पहला घर पड़ता है-शिवदत्त बाबा का-यानी गांव के सबसे धनी व्यक्ति का. अब नाला नहीं है, पाट दिया गया है लेकिन मेरी स्मृति से कैसे जा सकता है?

मैंने जब पहले-पहल तैरना सीखा था, तब बढ़ियाये हुए इस नाले के इस पास से उस पार, उस पार से इस पार हो रहा था. बड़ा मजा आ रहा था. लेकिन एक बार धारा का वेग मुझे पोखरे की ओर बहा ले गया. मैं किनारे आने के लिए हाथ-पांव मारने लगा किन्तु धारा मुझे अपने में लपेटकर गहराई की ओर लिये जा रही थी. चारों ओर दूर-दूर तक हाहाकार मचा करता हुआ बाढ़ का जल ही जल था. लगा अब मैं गया इस दुनिया से. इस मकान के आगे रस्सी बंटते हुए हलवाहे सन्तू की नजर मुझ पर पड़ी. उसने आव देखा न ताव, पानी में कूद पड़ा और मुझे खींचकर किनारे लाया. आज जब मैं इस मकान के आगे आया तो सन्तू की याद आ गयी. वह तो कब का इस दुनिया से जा चुका है लेकिन मुझे लगता है कि अभी वह यहां बैठा हुआ रस्सी बंट रहा है.

इस धनी मकान से गांव ही नहीं शुरू होता, होली का उत्सव भी यहीं से शुरू होता था. इस मकान के साथ भिन्न-भिन्न रंग की कई शख्सियतें जुड़ी हैं. हमारे गांव के प्रसिद्ध अधिवक्ता कैलाशपति मिश्र इस घर के थे और उनका गहरा स्नेह मुझे मिला था. लेकिन एक और शख्सियत मेरी यादों में अपनी सुगन्ध बिखेरती रहती है. वे थे तामेश्वर मिश्र.

वे एकदम जवानी में चल बसे थे और जब जिन्दा थे तब मैं बहुत छोटा था. न उनके समीप आ सका, न उन्हें समझ सका था.

जब मैं कविताएं लिखने लगा, तब ज्ञात हुआ तामेश्वर जी कवि थे. वे प्राइमरी स्कूल में शिक्षक भी थे. सुना था कि वे बहुत प्यारे मनुष्य थे. उनके कवि से मेरी भेंट-मुलाकात तो नहीं हुई, किन्तु उनसे मैं एक अदृश्य सम्बन्ध अनुभव करता रहा और वह तड़प भी कि काश, वे मेरे सचेत होने तक जीवित रहे होते तो उनका साहचर्य कितना कुछ दे सका होता.

आगे बढ़ा. यह घर दीनानाथ का है. दीनानाथ मेरे सहपाठी तो थे ही, बड़े अच्छे मित्र थे. उर्दू मिडिल तक हम लोग साथ-साथ पढ़े और खेले-कूदे. गरीब तो हम सभी थे किन्तु दीनानाथ कुछ ज्यादा ही गरीब थे. गरीब इसलिए भी माने जाते थे कि उनके पिताजी भीख मांगते थे. दीनानाथ मिडिल पास करने के बाद कहीं कुछ काम करने लगे, लेकिन क्षयरोग से ग्रस्त होकर चल बसे. उनके जाने की पीड़ा मेरे भीतर इस कदर समायी हुई है कि वे प्रायः मेरे सपनों में आते हैं और लगता है कि वे मरे नहीं, जिन्दा हैं. इनके घर के बाद एक घर और, और फिर मेरा घर.

बच्चों ने शोर किया-‘‘दिल्ली वाले बाबा आ गये, दिल्लीवाले बाबा आ गये.’’ बैठा, पानी-वानी पिया. मझले भाई साहब रामनवलजी, भतीजे, रामनिवास, श्रीनिवास, श्रीप्रकाश पास आकर बैठ गये. देखते-देखते मेरे बाद की पीढ़ी के कुछ लोग आ गये. नयी पीढ़ी के लड़के (जिन्हें मैं नहीं पहचानता) कुछ दूर खड़े होकर मुझे देखने लगे. बड़े भाई साहब के दिवंगत होने के पश्चात् मैं पहली बार गांव गया था और जाते ही लगा था कि वे खेत में गये हुए हैं या खलिहान में हैं. मेरा आना सुनते ही उल्लास के साथ मेरे पास चले अएंगे और पूछेंगे कैसे रहे? बाल-बच्चे कैसे हैं? फिर याद आ गया कि अब वे नहीं रहे. कितना उदास लगा था उनके न होने का वातावरण. ऐसा बार-बार लगता रहा है. जब पिताजी के मरने के बाद गया था तब भी लगा था कि वे कहीं से आकर मेरे पास बैठ गये हैं और उनका अंग-अंग मुझमय हो गया है. जब मां के मरने के बाद पहली बार गया था तब लगा था कि मां अभी लोटे में पानी और गुड़ लेकर निकलेगी और अपनी बहू तथा पोते-पोतियों का हालचाल पूछेगी. मेरी भी अजीब विडम्बना है कि परदेश में रहने के कारण घर के किसी भी व्यक्ति के चिरविदा के समय पास नहीं रह सका और उनके अन्तिम दर्द का साक्षी नहीं बन सका. पिता, मां और भाई साहब मेरे लिए जो कुछ कहना चाहते रहे होंगे, उसे ओठों में दबाये हुए चले गये.

अब यह घर पक्का बन गया है, मेरे बचपन में कच्चा घर था. कमरे तो वही थे, उतने ही थे. आंगन भी वैसा ही था. खाना खाने के लिए जब अन्दर गया तो आंगन सामने आ गया. मां के साथ जुड़ी कितनी-कितनी स्मृतियां भरी हैं इस आंगन में. मां के मुंह से फूटी हुई कितनी-कितनी करुणार्द्र कहानियां समायी हुई हैं इस आंगन में, जो आज तक मुझे भिगोती रहती हैं. मां के प्यार के कितने-कितने रंग भीने हुए हैं इस घर के अन्तराल में. खाना खाते समय मैं उस छोटे से कमरे को देख रहा था. हां, अब पक्का हुआ तो क्या हुआ जगह तो वही हैं, आकार भी वही है. सुना था उसी कमरे में मेरा जन्म हुआ था 15 अगस्त सन् 1924 (श्रावण पूर्णिमा, बृहस्पतिवार संवत् 1961) को. मेरे भोजन के लिए भतीजे ने न जाने कितनी-कितनी चीजें बनवायी थीं. यह रसोईघर तमाम पकवानों की सुगन्ध से महक रहा था. चूल्हा खिलखिला रहा था. धीरे-धीरे न जाने कब कैसे यह चूल्हा बचपन के चूल्हे में बदल गया जो पर्वों और त्योहारों के दिन ही खिलखिलाता था बाकी दिनों में आंच की ठण्डी-ठण्डी हंसी हंसता रहता था. कभी-कभी यह ठण्डी हंसी भी नहीं होती थी. इस सन्नाटे में पिताजी के सैलानीपन और मां की कर्मठता का द्वन्द्व चीखता रहता था. बड़े भइया की किशोरावस्था इस सन्नाटे को तोड़ने की इच्छा से लगातार कसमसा रही थी.

आखिर एक दिन उनकी इच्छा फलवती हुई, सन्नाटा यहां-वहां से दरका, चूल्हे को उसकी सहज खिलखिलाहट प्राप्त हो गयी. बरसात में भहरा-भहरा कर गिरनेवाली दीवारोंवाला कच्चा घर पक्के घर में बदल गया और मैं...हां, मैं पढ़ाई के रास्ते पर निःशंक आगे बढ़ने लगा. प्राइमरी में था. फीस माफ थी केवल एक पैसा गेम फीस लगती थी. पिताजी वह भी नहीं दे पाते थे.

याद है, उस दिन मास्टर ने गेम फीस लाने के लिए मुझे घर भेज दिया. मैं गया. पिताजी ने कहा-अभी नहीं हैं, फिर दूंगा. मैं अड़ गया. कहा कि बिना लिये जाऊंगा तो मास्टरजी मारेंगे. पिताजी ने हाथ में खरहरा लेकर मुझे खदेड़ लिया. मैं भागने लगा. वे दूर तक मुझे खदेड़ते हुए गये. पता नहीं उस दिन मैं स्कूल गया कि नहीं. कहां वह दिन और कहां बाद में हिन्दू विश्वविद्यालय की पढ़ाई. बाद की पढ़ाई बड़े भइया के कारण ही सम्भव हो सकी.

‘‘क्या सोच रहे हैं चाचाजी? खाते क्यों नहीं?’’ भतीजे ने मुझे टोंका.

‘‘अरे कुछ नहीं, बस यों ही.’’ मैं चौंक-सा उठा.

‘‘नहीं, कुछ तो है.’’

‘‘अरे कुछ नहीं रे. यहां बहुत दिन बाद आया हूं न, बचपन की स्मृतियां जाग-जाग जा रही हैं.’’

तिजहर को इच्छा हुई कि अपना गांव घूम आऊं. निकल पड़ा यों ही. साथ में भाई साहब भी हो लिये. घर के पिछवाड़े पहुंचा तो याद आया-यहां एक अमरूद का पेड़ था. हम लड़के अमरूद तोड़ते थे तो नरेश भाई की मां (अमरूद की मालकिन) आंधी की तरह हहराती हुई निकलती थीं और हम सब भाग चलते थे. आगे बढ़ते गये. यह घर ब्रजनाथ का है. हां, वे हैं गोरखपुर में, उनसे भेंट हुई थी. यह घर छेदीराय का है-छेदीराय जो लोगों के बीच विदूषक था. पता नहीं है कि नहीं. मैं बड़बड़ा उठा.

‘‘कौन?’’ भाई साहब बोले.

‘‘छेदीराय.’’

‘‘अभी जीवित हैं.’’

‘‘बहुत अच्छा. उनसे मिलूंगा.’’

यह मेरे प्रिय मित्र और दूर तक सहपाठी कपिलदेव का घर है. ज्ञात हुआ था कि वे भी नहीं रहे. यह रामलला और घूरनाथ का घर है. खबर मिली थी कि दोनों चले गये. भाई साहब समझ गये थे कि मैं घूमने की प्रक्रिया में जानना चाहता हूं कि बचपन के साथियों में कौन-कौन लोग हैं और कौन-कौन चले गये. अतः उनके घर आते ही स्वतः ही बोल पड़ते थे कि ये हैं या नहीं रहे. यह मुक्तिनाथ का घर है यह राम कृपाल का. दोनों नहीं हैं. हां, वैद्यजी यानी सीतारामजी अभी हैं और एक दूकान पर बैठते हैं. यह जोखू तेली का घर है, नहीं रहे. जोखू तेली का प्रसंग आते ही परम शरारती सन्तू यानी सन्त प्रसाद याद आ गये. याद आ गया स्कूल से छुट्टी होने पर सन्तू का जोखू को खदेड़ना और जोखू का लोमड़ी की तरह भागना. हंसी आ गयी.

‘‘क्या बात है?’’ भाई साहब बोले.

‘‘जोखू के साथ सन्तू याद आ गये.’’

‘‘हां, वे बेचारे भी नहीं रहे. बुरी मौत मरे.’’

‘‘और केशव?’’

‘‘वे हैं, ठीक-ठाक हैं.’’

गांव से गुजरते हुए अनेक अनपहचाने चेहरे मिलते रहे और मुझे उत्सुकता से देखते रहे. शायद उन्हें बताया गया था कि रामदरश मिश्र नामक एक प्राणी इस गांव के हैं और दिल्ली में रहते हैं. कुछ लिखते-विखते हैं. ये चेहरे शायद इस भाव से मुझे देख रहे हैं कि अच्छा, यही हैं रामदरश मिश्र. गांव से गुजरने की प्रक्रिया में वे स्थान आते रहे जहां मित्रों के साथ खेलता-कूदता था. गाता-बजाता था, झगड़े करता था, फिर प्यार से लिपट जाता था.

गांव से बाहर निकल गया. यों ही एक चक्कर लगा आने की इच्छा हुई. दिखाई पड़ा भगड़ा नाला, जिसके द्वारा राप्ती बरसात के दिनों में फुफकारती हुई आती थी और पूरे क्षेत्र को बाढ़ की लपेट में ले लेती थी. इसी के तट पर नाग पंचमी को लड़कियां पुतलियां दहाती थीं और हम बच्चे डण्डों से उन्हें पीटते थे. यहां पर पाकड़ का एक पेड़ था जिस पर न जाने कितनी दुष्ट रूहों का डेरा था और हम यहां से गुजरते हुए कांपने लगते थे. थोड़ी दूर पर घण्टहवा पीपल दिखाई पड़ रहा था जिस पर मृतकों के घण्टे बांधे जाते थे और जिस पर कई भूतों का बसेरा माना जाता था. इस रास्ते से होनेवाली अपनी तमाम यात्राएं याद आ गयीं-पढ़ाई के लिए जा रहा हूं, मेले में जा रहा हूं, बारात के साथ जा रहा हूं, सम्बन्धी के यहां जा रहा हूं, जा रहा हूं, जा रहा हूं.

ये सारी यात्राएं मेरा अनुभव बनती चली गयी हैं और उतरती रही हैं मेरी रचनाओं में. काली माई के थान से गुजरा, बरम बाबा की पीढ़ी से गुजरा, डीह राजा की मृत्तिका-मूर्ति से गुजरा. लगा था कि वैज्ञानिक सोच और विकास के तेज प्रवाह में सभी बह गये होंगे लेकिन आश्चर्य कि उनके आसपास की चहल-पहल वैसी ही थी, बल्कि बढ़ गयी थी. मैं एक-एक कर अपने खेतों से गुजरता रहा. यद्यपि चकबन्दी की हलचल में सभी इधर से उधर हो गये हैं तो भी क्या? जहां वे पहले थे वहां से होकर जाते समय एक अद्भुत रोमांच हो आता था. लगता था मैं उनमें खाद फेंक रहा हूं, उन्हें गोड़ रहा हूं, निराई कर रहा हूं. धान, कोदो, सावां, टागुन, मक्का, अरहर, फिर गेहूं, जौ, सरसों, सीसी, मटर आदि की रंग-बिरंगी उमड़ती फसलों के सौन्दर्य के बीच भूला-भूला-सा, फूला-फूला-सा बह रहा हूं, कटिया कर रहा हूं, फसल ढोकर खलिहान में ला रहा हूं.

खलिहान की याद आते ही मैं अपने खलिहान में पहुंच गया. पाकड़ के दो बड़े-बड़े, उनके बीच फैला हुआ गांव भर का खलिहान, चैत का महीना, पाकड़ों में से फूटते किसलय, उनके बीच बोलती हुई कोयल, दंवरी की ध्वनियां, रात को किसी के कण्ठ से फूटता हुआ चैता. क्या अद्भुत दृश्य होता था. दंवरी हांकते हुए, अनाज ओसाते हुए, अनाज और भूसा ढो-ढोकर घर लाते हुए मेरे दिन मुझमें इतने गहरे समाये हुए हैं कि शहर के बन्द सुविधामय कमरे में भी दस्तक देते रहते हैं. इन तमाम स्थानों, दृश्यों, क्रिया-कलापों, प्रकृति और समाज की प्रीतिकर-अप्रीतिकर छवियों से लदा-फंदा मेरा बचपन और कैशोर-काल आज मुझे सामने से पुकार रहा है. यों मेरे संस्कारों से घुला-मिला होकर मौन भाव से तो सदा मेरी रचनाओं में समाता ही रहता है.

हां, यह वह पोखरा है जिसमें हम बच्चे मस्ती से नहाते थे और खेतों में से उखाड़कर लायी हुई घास इसके तट के पानी में पटक देते थे धुलने के लिए. मस्ती और भय का द्वन्द्व हर जगह चला करता था. इस पोखरे के पास बंसवारी है. लोग कहते थे कि इसमें चुड़ैलें रहती हैं, जो रात को नाचती-गाती हैं. दूसरी और इमली का एक बड़ा-सा पेड़ है, उस पर भी भूतों का डेरा है. खुद पोखरे में ही कितने बुड़वे रहते हैं. इस भय के बीच भी हम बच्चे इस पोखरे में खुलकर नहाते थे, हां अकेले नहाने में भय लगता था. यह काल्पनिक भय इतना बद्धमूल हो गया कि जीवन भर साथ चलता रहा-पहले चेतन में, बाद में अचेतन में. द्वन्द्व हमारी मस्ती और काल्पनिक भय का ही नहीं था, यथार्थ का भी था. जेठ की भयानक लू के बाद जब आषाढ़ बरसता था, तब जड़-चेतन आनन्द से नाच उठते थे, धरती रसमयी होकर अपने भीतर से फसलें उगलने लगती थी. एक ओर पुरवाई में लहराती फसलों की हंसी आंखों में भावी समृद्धि का लोक रच देती थी, दूसरी ओर आनेवाली बाढ़ की आशंका से आंखें थर्रा-थर्रा उठती थीं. रिमझिम-रिमझिम बरसते सावन के संगीत के साथ भादों के जलप्लावन की दहाड़ टकराती रहती थी. जाड़ों में खेतों में झूमती फसलें गा रही होती थीं और घरों में भूख-उपवास का सन्नाटा पसरा होता था. हां, फागुन-चैत यानी बसन्त में एक सम लक्षित होता था. संगीत प्रकृति में भी होता था, खेतों में भी होता था, पेट में भी होता था और कण्ठों में भी होता था. पूरा कछार भीतर से बाहर तक विविध छवियों की चित्र-पाटी बन जाता था. और यह सब कुछ विह्वल भाव से मेरे भीतर उतरता रहता था. इतना उतरा कि बाद में मेरी कविताओं में, कहानियों में, उपन्यासों में, निबन्धों में, आत्मकथा में बार-बार उमड़ता रहा और लगता रहा कि अभी और कुछ है, और कुछ है जो उमड़ने से रह गया है.

बार-बार तुम आये, छाये छाये छाये

लेकिन हर बार लगा पहले पहले आये

आंखों ने कहा तुम्हें बार-बार देखा है

लेकिन हर बार खिंचीं नयी नयी रेखा है

ओठों ने कहा तुम्हें बार बार गाया है

लेकिन हर बार रहे तुम जैसे अनगाये

‘‘अरे खाना-पीना नहीं होगा?’’ पत्नी ने आवाज दी. मैं चौंक पड़ा और एकाएक गांव से लौटकर अपने कमरे में आ गया.

‘‘हां हां क्यों नहीं, कितने बजे हैं?’’

‘‘दो बज रहे हैं.’’

‘‘चलो भाई यह काम भी कर लेते हैं.’’

खाना खाकर आराम करने के लिए लेटा और अपनी अगली कहानी के बारे में सोचने लगा. सोचता-सोचता अनजाने मन फिर भटक गया अपने अतीत की ओर. सम्पादक ने पत्र लिखा था कि आप कहानी के साथ अपनी रचना-यात्रा पर एक छोटा-सा लेख भी भेजिएगा. शायद इसीलिए कहानी पर सोचता हुआ मन उस जीवन-यात्रा की ओर चला गया जो मेरी रचना-यात्रा का स्रोत रही है. याद आने लगीं-एक के बाद एक खण्डित यात्राएं. उर्दू मिडिल करने के बाद विशेष योग्यता की पढ़ाई करने ढरसी गया. ढरसी मेरे गांव से पांच कोस की दूरी पर एक गांव है. वहां पण्डित राम गोपाल शुक्ल विशेष योग्यता की कक्षा चलाते थे. वहां मैं साल भर रहा. घर से दूर होने का यह पहला अवसर था. शुक्लजी का आचार्यत्व, अनेक अनजाने गांवों से आनेवाले नये-नये छात्रों का साथ, अपने हाथ से खाना बनाने की क्रिया, कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का वहां आना-जाना और उनसे परिचय, ये सब नये अनुभव थे जो शुरू में बेगाने लगते रहे, फिर अत्यन्त प्रिय बन गये. अपेक्षाकृत एक बड़ी दुनिया में मेरे कवि की पहचान प्रसारित होने का अद्भुत सुख था. शुक्लजी मेरी कविताएं संवारते थे. कोर्स में इतना कुछ था, जिससे गुजरकर हिन्दी साहित्य के व्यापक साहित्य परिप्रेक्ष्य के ज्ञान की शुरुआत हुई. तुलसी, सूर, बिहारी, रत्नाकर, हिन्दी साहित्य का इतिहास, अलंकार, छन्द आदि कितने विषय थे-जिन्होंने मुझे साहित्य की समझ का प्रारम्भिक उजास दिया.

यह परीक्षा पास करने के बाद मैं विशारद और साहित्यरत्न करने के लिए बरहज चला गया. मेरा सामाजिक परिप्रेक्ष्य और भी बड़ा हुआ, सुख-दुःख के अनुभवों का विस्तार हुआ और साहित्य के कुछ और व्यापक लोक से साक्षात्कार हुआ. वहां मेरे कवि को कुछ और बड़ा परिप्रेक्ष्य प्राप्त हुआ लेकिन शुरू से जिस ढर्रे पर कविताएं लिख रहा था उसी ढर्रे पर लिखता रहा, हां उस ढर्रे में परिष्कार होता गया. मुझे दिशा देनेवाला कोई ऐसा कवि या आचार्य नहीं मिला जो तत्कालीन साहित्य-रचना के मार्ग से अवगत कराया. हां, मेरी कविताओं की चर्चा अवश्य वहां चारों ओर फैली हुई थी.

सन् 45 में मैट्रिक की पढ़ाई करने बनारस गया तो वहां प्रसादजी के अत्यन्त प्रिय शिष्य डॉ. राजेन्द्र नारायण शर्मा के सम्पर्क में आया. उन्होंने दो काम किये-एक तो मेरी कविताओं का खूब परिष्कार कर उन्हें छायावादी रंग दे दिया, दूसरे उन्होंने अपने प्रभाव से ‘आज’, समाज’, संसार’ आदि समाचार पत्रों में मेरी कविताएं खूब प्रकाशित करायीं और मैं बनारस में व्यापक तौर पर जान लिया गया. जब सन् 46 में बी.एच.यू. में प्रविष्ट हुआ तब धीरे-धीरे नयी चेतना के कई कवियों के सम्पर्क में आया और मुझे बताया गया कि जिस शैली में मैं लिख रहा हूं, उसका समय बीत चुका है. अब कविता नये स्वर और नये मार्ग ग्रहण कर चुकी है. धीरे-धीरे मैं इस नये मार्ग की ओर उन्मुख हुआ और 50 के पास तक आते-आते लगा कि मेरी कविता नया रूप ले रही है. मैं प्रगतिवाद की ओर उन्मुख होने लगा और इसी समय नयी कविता की यात्रा भी शुरू हुई. इसलिए मेरी कविता नयी कविता की उस धारा में शामिल होने लगी जिसकी दृष्टि प्रगतिवादी और वस्तु सामाजिक है तथा जिसकी भाषा लोक भाषा के करीब जाने के प्रयास में है. मुझे लगने लगा कि मेरी बात (चाहे वह प्रकृति ये सम्बद्ध हो, चाहे प्रेम से, चाहे सामाजिक समस्याओं से) अधिक सघन और मूर्त तथा भाषा अधिक सहज और ठोस हो रही है.

मैं प्रगतिवाद की ओर उन्मुख तो हुआ किन्तु अपने स्वभाव के अनुसार ही उसके साहित्यिक या राजनीतिक दल से सम्बद्ध नहीं हुआ. इसीलिए मैंने वस्तु और शिल्प दोनों ही क्षेत्रों में अपने को मुक्त रखा-किसी वर्जना या स्वीकृति के कठघरे में कैद नहीं हुआ. आज तक मैं समय के साथ तो चल रहा हूं किन्तु समय के खण्डों को ले-लेकर जो वाद उछाले जाते रहे हैं और जिनके बैनर के नीचे आ-आकर लोग-बाग इतिहास में अपने-अपने नाम दर्ज कराते रहे हैं, मैं उनसे नहीं जुड़ पाया. इसका खामियाजा मुझे भोगना पड़ा. यानी जब साहित्य के इतिहास को वादों का इतिहास मान लिया जाएगा तब वादों से असम्बद्ध लोगों की इतिहास में जगह कहां से हो सकती है? इतना विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि मेरे अनुभव में जो सत्य उभरा, वही मेरे साहित्य में आया. उस अनुभव को मैंने एक सामाजिक दृष्टि से रचा. गांव से लेकर बनारस, बड़ौदा, अहमदाबाद, नवसारी, दिल्ली तक जो मेरी जीवन-यात्रा रही, उसने इन स्थानों और समयों के विविध अनुभवों को मेरे भीतर संचित किया और वे अनुभव मेरी रचनाओं में उतरते रहे-कभी कविता बनकर, कभी कहानी बनकर, कभी उपन्यास बनकर, कभी निबन्ध बनकर, कभी संस्मरण और यात्रावृत्त बनकर तथा कभी आत्मकथा बनकर.

बनारस में मैंने जीवन के अमूल्य दस वर्ष व्यतीत किये. मैट्रिक से लेकर पी.ए.डी. की शैक्षिक यात्रा की. इस दरम्यान वहां कितना कुछ सीखा, पाया, सुख-दुःख भोगा, अनेक महत्त्वपूर्ण मित्रों का साहचर्य तथा स्नेह पाया. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान गुरू का आशीषमय सान्निध्य प्राप्त किया और मेरा जीवन तथा साहित्य दोनों समृद्ध हुए. नौकरी को लेकर मैं बहुत भटका हूं और न जाने कितनी बार अपरिचय को परिचय में उतारने की जद्दोजहद करता रहा हूं. बी.एच.यू. का छात्र था. एम.ए. में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया था किन्तु वहां नौकरी नहीं लगी. पी.एच.डी. का शोध प्रबंध जमा कर दिया. अब तो काशी से दूर कहीं जाना ही था. अब तो काशी से दूर कहीं जाना ही था. पी.एच.डी. करते समय परिवार के साथ एक किराये के कमरे में रहता था. हेमन्त पैदा हो चुका था. पास में पैसा नहीं था और हेमन्त लगातार बीमार चलता था. उन दिनों की तस्वीर मेरी ‘शाम’ ‘बन्द कर लो द्वार’ आदि कई कविताओं में देखी जा सकती है. ‘एक रात’ कहानी भी उसी तकलीफ की कथा है. इन तकलीफों के बीच भी बनारस मुझे बहुत प्रिय लगता था. यहां हमारे साहित्यकार मित्रों की एक आत्मीय दुनिया थी. किन्तु जब यहां नौकरी नहीं लगी और पी.एच.डी. का शोध प्रबन्ध जमा कर दिया, तब अपनी यह प्यारी नगरी छोड़नी ही थी. दर्द फूट पड़ा-

आखिरी मोड़ ना कि हां कहिए

और रोयें कहां कहां कहिए

राह यह आज तक बहाना थी

आज से जाएं हम, जहां कहिए

बनारस छोड़ना पड़ा और नौकरी लगी बड़ौदा में. मन भर आया-अपने शहर ने आश्रय नहीं दिया और इन अनजाने-अनपहचाने शहर ने मुझे अपनाया. ‘बड़ौदे की शाम’ निबन्ध में यह प्रतीति व्यक्त हुई. फिर वहां भी अजनबीपन का एक अजब दर्द था. साल भर बाद मुझे गुजरात विश्वविद्यालय के सेण्ट जेवियर कॉलेज से जुड़ने का अवसर मिला तो वहां चला गया. एक अजनबीपन में अपनी दुनिया खोजने लगा. फिर नयी जगह का सन्नाटा, नयी उदासी, अकेलापन, संघर्ष. फिर वहां से नवसारी, फिर अहमदाबाद और फिर दिल्ली. दिल्ली में भी पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय का सान्ध्य संस्थान, फिर साउथ कैम्पस. मेरी शैक्षिक यात्रा कितनी कटी-फटी, टूटी-फूटी और निरन्तर यायावरी रही है. न जाने मेरी कितनी कविताओं, कहानियों और उपन्यासों में यह यायावरी जिन्दगी बोलती है-

भटक रहा खानाबदोश-सा

आज यहां, कल वहां

छोड़ जानी-पहचानी हुई बस्तियां

रोज बसाता घर/घर रोज छूट जाता है

ज्यों ही जुड़ा कहां से क्षण भर

रिश्ता हाय टूट जाता है

फिर फिर अनजाने चेहरे हैं मुझे घूरते

अनजानी राहों के नये-नये भटकावे

अनजानी रीतियां/अजनबी स्वर, पहनावे

अनजानी आंखों से अनजानी टकराहट

कानों पर उठती-गिरती अनजानी आहट

भटक रहा खानाबदोश-सा

लेकिन बड़ौदा से लेकर दिल्ली तक की यायावरी जिन्दगी में भिन्न-भिन्न स्थानों से कितना कुछ पाया, इसका गहरा अहसास मुझे है. इस यात्रा ने मुझे नये-नये अनुभव दिये, नयी-नयी जीवन-शैली दी, नये-नये साहचर्य दिये, नयी-नयी चुनौतियां एवं तज्जन्य विश्वास दिये, मेरी दृष्टि को व्यापकता दी और कुल मिलाकर एक बड़ा संसार दिया और मैं तथा मेरी रचनात्मकता दोनों निरन्तर समृद्ध हुए. मैंने शहरों से शहरों तक की यात्राओं में बहुत कुछ पाया किन्तु लगता है कि

मूलधन तो गांव के जीवन का अनुभव ही रहा, बाद के अनुभव तो ब्याज की तरह लगते रहे. इसलिए शहरों में रहते हुए भी मुझमें और मेरी रचनाओं में गांव बार-बार आता रहा-पात्र बनकर, स्थितियां बनकर, प्राकृतिक मानवीय सौन्दर्य बनकर तथा दृष्टि बनकर.

लोग प्रायः पूछते हैं-‘‘आप कविता से कहानी या उपन्यास में कब और क्यों आये?’’ मेरा उत्तर होता है-‘‘मैं कविता से नहीं, कविता के साथ कहानी या अन्य विधाओं में आया. कविता के साथ तो मैं निरन्तर चलता रहा हूं, यहां तक कि अन्य विधाओं में भी अपने कवि की उपस्थिति अनुभव करता रहता हूं.’’ सच बात तो यह है कि मैं तैयारी करके विधाओं में नहीं आया, सहज भाव से आया. बनारस में नये साहित्यकारों का जो लोक था, उसमें कवि भी थे, कहानीकार भी थे और मैं गाहे-बगाहे कहानी या निबन्ध लिख दिया करता था. जब मुझे लगा कि मेरे भोगे हुए यथार्थ का कुछ ऐसा रूप-रंग है जो अपनी अभिव्यक्ति के लिए कविता के अतिरिक्त भी कोई विधा चाहता है, तब मैं कहानी की ओर भी झुका और धीरे-धीरे मेरा झुकाव सघन होता गया. साथ-साथ व्यक्ति व्यंजक निबन्ध का भी सहारा लेता रहा. सन् 60 तक तो मेरी कहानी यात्रा बहुत मन्द गति से चलती रही किन्तु उसके बाद उसकी रफ्तार में तेजी आ गयी. कहानियों में ग्राम, यथार्थ के साथ-साथ शहर का यह यथार्थ भी आता रहा, जो मेरे आसपास घटित होता था.

सोचा नहीं था कि उपन्यास भी लिखूंगा. जब कहानी-लेखन में हाथ कुछ सध गया और इच्छा जागने लगी कि गांव के यथार्थ के विविध आयाम को परस्पर अनुस्यूत कर कुछ लिखा जाए, तब उपन्यास की ओर मेरी दृष्टि गयी. उन्हीं दिनों ‘‘मैला आंचल’’ प्रकाशित हुआ और उसने रास्ता दिखा दिया कि कैसे ग्राम जीवन के समग्र यथार्थ को एक साथ चित्रित किया जा सकता है. इस उपन्यास से प्रेरित होकर मैं उपन्यास लेखन में प्रवृत्त हो गया, परिणामस्वरूप ‘पानी के प्राचीर’ आया. लगा यह विधा बड़ी सशक्त है और कुछ-कुछ मेरी पकड़ में आ रही है. प्रवाह बह चला. फिर तो क्रमशः ‘जल टूटता हुआ’, ‘बीच का समय’, ‘सूखता हुआ तालाब’, ‘अपने लोग, ‘रात का सफर’, ‘आकाश की छत’, ‘बिना दरवाजों का मकान’, ‘दूसरा घर’, ‘थकी हुई सुबह’, और ‘बीस बरस’ उपन्यास आये जिनमें गांव से लेकर शहरों तक की जिन्दगी के उस यथार्थ के चित्र हैं जिनके बीच में से मैं गुजरता रहा हूं.

आलोचना मेरे मन से नहीं पेशे से जुड़ी हुई विधा रही है. एम.ए. में ‘ऐतिहासिक उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा’ विषय पर लघु शोध प्रबन्ध लिखा, फिर पी.एच. डी का शोध प्रबन्ध लिखा. उसके बाद पत्र-पत्रिकाओं के आग्रह पर आलोचनात्मक निबन्ध और समीक्षाएं लिखता रहा. ‘हिन्दी उपन्यासः एक अन्तर्यात्रा’ ‘हिन्दी कहानीः अन्तरंग पहचान’, ‘छायावाद का रचना-लोक’, ‘हिन्दी कविताः आधुनिक आयाम’ आदि सभी पुस्तकें मुझसे साग्रह लिखवायी गयी हैं. अपनी स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से मैंने कुछ ही आलोचनात्मक निबन्ध लिखे हैं. हां, व्यक्ति व्यंजक निबन्ध तो मेरे अन्तरतम से फूटते रहे हैं. निबन्ध मेरी मुख्य विधाओं में शामिल नहीं है, कभी-कभार ही लिखता रहा हूं. ये निबन्ध पत्र-पत्रिकाओं में तो छप जाते रहे किन्तु पुस्तक के रूप में छापने को कोई तैयार नहीं था. हां, पहली बार जब प्रभात प्रकाशन ने 1982 में मेरा ‘कितने बजे हैं’ निबन्ध-संग्रह प्रकाशित किया, तब मेरे इस रूप पर भी लोगों की दृष्टि गयी और मुझे भी अपनी इस विधा के प्रति कुछ अधिक लगाव महसूस होने लगा. उसके बाद व्यक्ति व्यंजक निबन्धों तथा संस्मरणों की सर्जना में मैं अधिक प्रवृत्त होता गया और मेरे कई संग्रह प्रकाशित हुए. यात्रा-वर्णन भी मेरे परवर्ती लेखन में एक आयाम बनकर जुड़ा. विदेश की कुछ यात्राएं करने का अवसर मिला. देश में तो इच्छा न होने पर भी यात्रा करनी पड़ जाती ही रही है. दोनों प्रकार की यात्राओं ने कभी मुझसे कहा कि ‘‘हमें अपनी रचना में रूप देते क्यों नहीं?’’ और उन्हें रूप मिला शुरू हो गया.

‘सहचर है समय’ मेरी आत्मकथा है. सपने में भी नहीं सोचा होगा कि मैं आत्मकथा लिखूंगा. इसका कारण यह है कि मेरे मन में कहीं यह था कि ‘आत्मकथा’ उनकी होनी चाहिए जिन्होंने किसी क्षेत्र में बहुत जद्दोजहद के साथ बड़ी हैसियत बनायी हो और जिनकी जीवन-यात्रा में समाज कहीं अपने को देख रहा हो और कुछ शक्ति, कुछ आदर्श, कुछ मूल्य अर्जित कर रहा हो. मैं तो एक सामान्य व्यक्ति हूं, मुझमें समाज को क्या मिलेगा? लेकिन धीरे-धीरे ऐसा कुछ बनता गया कि सहज ही, अनजाने ही मेरी आत्मकथा रूप पाती गयी. मेरी रचनाओं पर एम.ए., एम.फिल., और पी.एच.डी. का शोध-कार्य करनेवाले छात्र बार-बार मुझे पत्र लिखकर मेरे जीवन और साहित्य से सम्बन्धित सूचनाएं मांगते रहे. शुरू में तो भेज देता रहा किन्तु जब शोधार्थियों की संख्या बढ़ती गयी, तब सोचा-क्यों न एक बड़ा-सा निबन्ध लिख दूं जिसमें मेरे जीवन के शुरुआती दिनों की सच्चाइयाँ संक्षेप में दर्ज हों. ‘जहां मैं खड़ा हूं’ नाम से एक लम्बा निबन्ध लिखा. वह खूब पसन्द किया गया. फिर मुझसे आग्रह किया गया कि मैं अपने बचपन के जीवन यथार्थ को विस्तार से कह डालूं. बात मुझे भी अच्छी लगी और अपनी स्मृति के सहारे बचपन के दिनों की एक लम्बी यात्रा कर डाली. इसे ‘जहां मैं खड़ा हूं’ नाम से किताबघर ने प्रकाशित किया. यह पुस्तक लोगों को बहुत प्रिय लगी. किताबघर के सत्यव्रत शर्मा ने आग्रह किया कि क्यों न मैं कई खण्डों में अपने समूचे जीवन का वृतान्त लिख डालूं. मैंने उनके प्रस्ताव पर सोचा. उधर मेरे ऊपर काम करनेवाले शोध छात्रों की संख्या बढ़ती गयी और मेरे जीवन के बारे में जानने की उनकी इच्छा का दबाव भी. मैंने तय किया, चलो भाई, यह भी कर डालो. और धीरे-धीरे यह भी कर डाला. मुझे सदा इस बात का ध्यान रहा कि कथा मेरी ही नहीं, मेरे माध्यम से मेरे परिवेश की भी हो. मैं छोटा हुआ तो क्या हुआ, मेरा परिवेश तो बड़ा है. पाठकों को उसके महत्त्व का तो बोध होगा ही. इस बात का भी ध्यान रहा कि अपने को चो कितना उधेड़ लो, यथार्थ के नाम पर गन्दगी परोसने और बिना वजह दूसरों को नंगा करने का छिछोरापन न व्यक्त होने पाये. हमारे समाज में अनेक बुनियादी समस्याएं हैं जिसे हम टकराते हैं, लहूलुहान होते हैं और जीने की शक्ति अर्जित करते हैं. आत्मकथा में इनसे रूबरू होने के स्थान पर यथार्थ के नाम पर चटखारे ले-लेकर यौन-प्रसंगों को परोसना, अपनी सड़ी कुण्ठाओं का प्रसाद बांटना, मस्ती के नाम पर पीने-पिलाने की निरर्थक आवारा प्रसंगों का लज्जतदार वर्णन करना, मुझे प्रिय और सार्थक नहीं लगता. इस तरह की आत्मकथाओं के माहौल में मेरी आत्मकथा फीकी जैसी लगती है, तो लगे, मुझे दुख नहीं है.

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