सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्राची - अगस्त 2017 : साक्षात्कार // एक लेखक की हैसियत से कविता ही मेरे बहुत निकट रही // (डॉ. रामदरश मिश्र जी से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत)


हिंदी साहित्य के वरिष्ठ और श्रेष्ठ साहित्यकार, विविध विधाओं में सिद्धहस्त, पुरोधा पीढ़ी के साहित्यकार,आलोचक की दृष्टि रखने वाले, बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. रामदरश मिश्र जी जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन रचना-कर्म में पूरी सक्रियता और मनोयोग से लगाया और जो भी हिंदी साहित्य को दिया वो प्रेरणादायी है.

आपने अनेक कविता संग्रह, कहानी संग्रह, उपन्यास, समीक्षा, ललित निबंध, यात्रा वृतांत, डायरी, आत्मकथा, आलोचना, संस्मरण, संचयन-संपादन आदि हिंदी साहित्य को भेंट किये. आपके लेखन में गाँव की मिट्टी की गंध समाहित है. आप विविध विधाओं के निष्णात आज आयु के दसवें दशक में भी गति शील है.

अनेक पुरस्कार से सम्मानित मिश्र जी को अभी हाल ही में ‘‘आग की हँसी’’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया.

जब मै उनसे मिली तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा सपना साकार हो गया हो. जिन्हें मैंने बचपन में पढ़ा और फिर पढाया आज मै उनका साक्षात् दर्शन कर रही हूँ और उनकी कविता उनके मुख से सुन रही हूँ. ये मेरे लिए बहुत हो गौरव की बात है द्यप्रस्तुत है उनके साथ की गई बातचीत के अंश ......

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डॉ. भावना शुक्ल : अभी-अभी आपने बताया आपका गजल संग्रह आ रहा है. हम यहीं से शुरुआत करते हैं. आप हमें नए गजल संग्रह में से कुछ अंश गजल के सुनाइये.

डॉ. रामदरश मिश्र : भावना बेटी मैंने बातों के दौरान कवितायें तो सुना डालीं, पर गजल नहीं सुनाई. मेरे मन की बात कही. यह गजल मुझे बहुत पसंद है

याद आना था न, पर याद आया

एक भूला-सा पहर याद आया

बेचते-बेचते गया थक मैं,

आज बाजार में घर याद आया

पाया क्या-क्या न मगर क्या खोकर,

भूल बैठा हूँ, ठहर, याद आया

भूल बैठा था जिसे पा मंजिल,

कच्चे रास्तों का सफर याद आया

छांह में पलते हुए अश्मों की,

अपने आँगन का शजर याद आया

कोई है जो कि भूला-भूला सा,

फूल-सा जिन्दगी भर याद आया

डॉ. भावना शुक्ल : बहुत ही शानदार गजल सुनाई. यथार्थ का बहुत ही उम्दा चित्रण किया है.

आप सुदीर्घकाल से साहित्य साधना कर रहे. आप अनुभव संपन्न हैं. सबसे पहले हम जानना चाहेंगे कृपया आप हमें काव्य भाषा के सन्दर्भ में कुछ बताइए?

डॉ. रामदरश मिश्र : मैंने अपनी सृजन यात्रा कविता से ही प्रारंभ की थी और आज तक उसे शिद्दत से जी रहे हैं. मेरा पहला काव्य संग्रह ‘पंथ के गीत’ 1951 में प्रकाशित हुआ था. तब से आज तक कई संग्रह आ चुके हैं. इनमें कुछ ‘बैरंग-बेनाम चिटठियां’, ‘पक गई है धूप’, ‘कंधे पर सूरज’, ‘दिन एक नदी बन गया’, ‘जुलूस कहां जा रहा है’, ‘आग कुछ नहीं बोलती’ और ‘हंसी होंठ पर आंखें नम हैं’ जैसी बेहतरीन रचनाएं शामिल हैं.

कविता की भाषा सहज होनी चाहिए. भाषा ऐसी हो जिसमें खुलेपन की आड़ लेकर ‘कविता’ को नग्न न किया जाये. अनेक कवि अपनी सहज भाषा के साथ फैंटेसी की चमक पैदा करते हैं. इसके साथ ही लोक गाथाओं का सानिध्य भी पा लेते हैं. एक बहुत मूल्यवान प्रसंग है. फिराक साहब का साक्षात्कार कुछ लोग ले रहे थे. किसी से उनसे पूछा आपकी दृष्टि में विश्व का सबसे महान ग्रन्थ कौन-सा है? फिराक जी ने उत्तर दिया, ‘रामचरितमानस’, क्योंकि रामचरितमानस सबसे सहज ग्रन्थ है और सहज लिखना बहुत कठिन होता है, और उस जमाने के सारे भक्त कवि बड़े सहज थे.

डॉ. भावना शुक्ल : हम आपकी लेखन प्रेरणा के सन्दर्भ में जानना चाहेंगे?

डॉ. रामदरश मिश्र : जब मैं छठीं कक्षा में था तब मुझे इतना महसूस हुआ था कि मैंने कविता लिखी है. कविता मेरे भीतर की उपज थी, लेकिन कई वषरें तक शिक्षा के क्रम में उस देहाती परिवेश में ही रहा जिनमें नए साहित्य की सर्जना का कोई वातावरण नहीं था. बस में अपनी गति से लिखता जा रहा था छन्द अलंकार आदि का अभ्यास कर रहा था और हिंदी साहित्य के जो गुरु थे उनसे प्रोत्साहन प्राप्त कर रहा था. कविता में और भाषा में जो निखार स्वतः आ रहा था, वो आ रहा था लेकिन मुझे ठीक ज्ञान नहीं था कि उस समय कविता का मिजाज और भाषा का रूप कैसा है. सन 1945 में बनारस पहुँचने के बाद मैंने अपने को नए साहित्यकार के रूप में पाया और वहाँ से मेरी काव्य यात्रा प्रारंभ हुई.

साहित्य लेखन के लिए जिस संवेदना एवं भावुकता की आवश्यकता होती है. वह मेरी माँ में और मेरे पिताजी में थी.लोक साहित्य के साथ इन दोनों का गहरा जुडाव था. मुझे इन दोनों से ही प्रेरणा मिली, जिसके आधार पर मेरी साहित्यिक रचना शुरू हुई और धीरे-धीरे परिवेश के प्रभाव में उसमें गति आ गई, नई-नई दिशाएं खुलती गईं. मेरी रचना को निखारने में मेरे गुरुओं और साहित्यिक मित्रों ने अपनी भूमिका निभाई.

डॉ.भावना शुक्ल : कविता की आलोचना के विषय में आपके क्या विचार है? गुटबाजी की राजनीति से कविता पर क्या प्रभाव पड़ा है?

डॉ. रामदरश मिश्र : हिंदी साहित्य जगत में आलोचकों ने कविता की शानदार आलोचना लिखी है और हिंदी आलोचना को समृद्ध किया है. साहित्य में समरसता का माहौल देखते ही देखते न जाने कहाँ को गया. पिछले पांच-छह दशकों में आलोचकों की गुटबाजी ने हिंदी कविता को काफी नुकसान पहुँचाया है. आलोचकों ने सही व निष्पक्ष आलोचना लिखने के स्थान पर टुच्ची राजनीति को बढ़ावा दिया है. पुराने और नए कवियों को आगे बढाने और पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. कभी-कभी बिना पढ़े ही सरसरी तौर पर कविता देखी और आलोचना लिख दी, क्योंकि कवि को अधिक भाव नहीं देना है.और कभी कविताओं का अतिरंजित मूल्यांकन करते हैं. मुझे ऐसे आलोचकों और उनकी आलोचना पर आश्चर्य होता है जिन्हें निराला, दिनकर और मुक्तिबोध से भी अधिक वजनदार और महत्वपूर्ण लगती है युवा पीढी की कवितायें.

डॉ. भावना शुक्ल : क्या पुरस्कार लेखन की उत्कृष्टता का प्रमाण है?

डॉ. रामदरश मिश्र : हाँ अच्छे लेखन को सम्मान मिलता है और सहज भाव से मिलता है, तो सम्मान और लेखक दोनों गौरवान्वित होते हैं. सम्मान उत्कृष्ट लेखन के लिए एक तरह से सामाजिक तज्ञता है. लेकिन यह भी सही है कि आजकल सम्मान और पुरस्कार को पाने के लिए लेखकों में दौड़ धूप मची रहती है और अनेक तिकड़म भिडाये जाते हैं. ऐसी स्थिति में यदि सम्मान या पुरस्कार मिल भी जाता है तो अच्छा नहीं लगता, लोगों के मन में आदर भाव नहीं रह जाता.

डॉ. भावना शुक्ल : आप अपनी विधागत रचना प्रक्रिया और रचनाओं के सन्दर्भ में कुछ कहना चाहेंगे?

डॉ. रामदरश मिश्र : मैं आपको बेटी एक बात बताना चाहता हूँ कि मैंने लिखने की प्रक्रिया के विषय में कुछ भी नहीं सोचा जो मन में आया लिखता चला गया. मेरे जीवन में बहुत से अनुभव हैं उसे में डायरी में उतार रहा हूँ. मैंने यह अनुभव किया कि मैं अपनी शक्ति भर साहित्य रच चुका हूँ और रचता जा रहा हूँ.

मै ‘अपने लोग’ को अपना सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मानता हूँ ‘और जल टूटता हुआ’ को भी इसी के समकक्ष रखता हूँ. मैं कहना यह चाहता हूँ, मैं अपने हर प्रकार के लेखन से संतुष्ट हूँ. उपन्यास और आत्मकथा भी दी साहित्य को. एक लम्बी आत्मकथा है उपन्यास के रूप में जिसमें बचपन से लेकर आज तक के समय में व्याप्त परिवेश की विविधता का चित्रण हुआ है. यह मेरी राम कहानी नहीं है, यह एक सामाजिक दस्तावेज भी है. श्री लाल शुक्ल ने एक बार कहा था अरे मिश्र जी, तुम्हारी आत्मकथा तो शिक्षा जगत का इतिहास बन गई है. अगर आत्मकथा अपने जीवन की घटनाओं और प्रसंगों की कहानी-मात्र है, तब तो वह गौण मानी जाएगी.

मैंने गीत, गजल, छोटी कविताओं के साथ-साथ बड़ी लम्बी कवितायें भी लिखी हैं. मुझे अब तड़प नहीं है कि मैं यह नहीं लिख पाया वो नहीं लिख पाया और न ही कि मैं कल महान लेखक बनूँगा. मैं अपने लेखन से संतुष्ट हूँ. और आज भी लिख रहा हूँ.

डॉ. भावना शुक्ल : आपको लेखन के कारण कोई संघर्ष करना पड़ा?

डॉ. रामदरश मिश्र : मुझे अपने व्यक्तिगत जीवन में लिखने के कारण संघर्ष नहीं करना पड़ा, वरन इसके विपरीत सम्मान और यश मिलता रहा. हाँ, लेखक बनने के लिए मुझे बहुत संघर्ष करना पड़ा. शुरू के दिनों में भेजी गई कवितायें छपती नहीं थीं. मैंने हार नहीं मानी. मेरे गुरुदेव हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मुझसे कहा ,‘‘तुम पान नहीं खाते हो, सिगरेट नहीं पीते हो, दूसरे खर्चे भी तुम्हारे नहीं हैं, इसलिए तुम डाक खर्च करो और भेजा करो. एक दिन तुम्हारी कवितायें जरूर छपेंगी.’’ गुरुदेव की सीख मैंने शिरोधार्य कर ली. डाक से कवितायें पत्रिकाओं को भेजता रहा. मेरे संघर्ष का प्रतिफल साहित्य समाज के सामने है.

डॉ. भावना शुक्ल : आपने विविध विधाओं में लिखा किस विधा ने आपको बहुत आकर्षित किया?

डॉ. रामदरश मिश्र : जी हाँ मैंने विविध विधाओं में लेखन किया है और सभी मुझे प्रिय भी हैं और आकर्षित भी करती हैं. साहित्यकार की हैसियत से, लेकिन एक लेखक की हैसियत से कविता ही मेरे बहुत निकट रही है. लेखन का प्रारंभ कविता से ही किया, उसके बाद कहानी में आया, फिर उपन्यास में आया और गाहे-बगाहे अनेक विधाओं में लिखा. एक बात रेखांकित करने की है कि बहुत से लोगों ने कविता से शुरुआत की और कथा में आकर कविता छोड़ बैठे. जब वे लोग कहते है कि वे कविता से कहानी में आये, तो मैं कहता हूँ मैं कविता के साथ आया. कविता मेरी आधोपांत चलती रही और उसके साथ कथा साहित्य भी चलता रहा. वह मुझसे बाद में जुड़ा लेकिन यह कविता की तरह ही प्रिय रहा. खास करके उपन्यास तो मुझे बहुत प्रिय रहा, क्योंकि जो बात मैं कविता-कहानी में नहीं कह सकता, वह उपन्यास में मैंने कही. जीवन को जिस समग्रता से कोई और विधा नहीं देख पाता. एक बार जब मैं उपन्यास में फंसा तो फंसता ही गया और लगभग ग्यारह उपन्यास आ गये. एक बात और है कि कविता मुझे प्रिय है और कविता मेरी हर विधा के साथ लगी रही. चाहे निबंध लिख रहा हूँ, चाहे कहानी लिख रहा हूँ, चाहे मेरी आत्मकथा हो, कविता का एक जो अपना दबाव या प्रसन्न प्रभाव है, मेरे अन्य लेखन पर भी रहा है. कविता ही ने मुझे बहुत आकर्षित किया है.

डॉ. भावना शुक्ल : नवोदित रचनाकारों को आप कुछ मार्गदर्शन करेंगे?

डॉ. रामदरश मिश्र : मार्गदर्शन तो दो तरह से होता है. एक तो यह कि आप जो लिख रहे हैं, वह अपने समय के साथ हो और आने वाली पीढ़ियों को महसूस हो कि आज के लेखन का यह सही स्वरूप हो सकता है. यानी कि वे आपके साहित्य को पढ़कर मार्ग पाएँ. और इस सन्दर्भ में एक बात बड़े महत्त्व की है. आपकी सर्जना और आपके विचार ऐसे हों जो नई पीढ़ियों को किसी तरह बांधते नहीं हों. ऐसा न हो कि आप उन्हें एक खास विचार धारा में, एक खास तरह के शिल्प में जकड दें और वे उसी जकडबंदी में मुब्तला होकर अपना रचना कार्य करते रहें.

दूसरा रास्ता यह होता है कि नए लेखक आपसे मिलें. अपनी रचनाएं दिखाएँ आपको. आप उनकी रचना का सही-सही आकलन करके उनको उनकी शक्ति और अशक्ति की पहचान कराएँ. या उनकी रचना के प्रकाशन और प्रचार के लिए यथा संभव कुछ करें. मेरे पास जो भी नवोदित आते हैं, मैं उन्हें खुले मन से सुनता हूँ, उन्हें मार्गदर्शन करता हूँ. बस मैं एक बात और कहना चाहता हूँ जितना पढ़ोगे उतना ही लेखन निखरेगा.

सम्पर्क : डब्ल्यू जेड/21 हरी सिंह पार्क

मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व )

नई दिल्ली-11 00 56

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